प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश २२८. धर्मच्छलका प्रयोग करके जो राजालोक ऋद्धि प्राप्त करते हैं, वह मांके शरीरको बेंच कर पैसा कमानेके समान होती है । इस नीतिशास्त्रके उपदेशद्वारा, उन वृक (भेडियों) जैसोंके मुंहस उस छाग (बकरे) को छुड़ा कर और पाथेयादिसे सस्कृत कर, तीर्थयात्रा करनेके लिये रवाना किया । कुछ सालके बाद, वह जब वापस लौट कर आया तो मन्त्रीने फिर उचित सत्कारसे उसका आदर किया । इससे वह अपने स्थान पर पहुंच कर [अपने सुलतानके सामने] तीर्थ यात्राका बखान करनेके बदले श्रीवस्तुपालके गुणोंका ही बखान करने लगा । इसके बाद वह सुलतान प्रति- वर्ष मन्त्रीके पास यमलकपत्र (संधिपत्र) भेज कर अनुरोध करता रहा कि- 'हमारे देशके आप ही अध्यक्ष हैं, और हम तो आपके सेलभूत (सामंत) हैं। सो हमें किसी करणीय कार्यका आदेश दे करके सदा अनुगृहीत किया करें' । मंत्रीने शत्रुंजय तीर्थके भूमिगृहमें रखनेके लिये सुलतानकी अनुज्ञासे, उसके देशमेंकी मम्माणी नामक खानमेंसे, सैकड़ों प्रयत्न करके युगादि जिन की एक मूर्ति बनवा कर मगवाई। सुलतानने अपनेको धन्य मानते हुए वह कार्य करने दिया । वह मूर्ति जब पर्वत पर चढ़ाई जा रही थी तो मूलनायकके अमर्षसे पर्वत पर बिजली गिरी । इसके बाद मंत्रीश्वरको फिर जीवनांत तक शत्रुंजय देवके दर्शन नहीं हुए । अनुपमाकी दानशीलता । १९२) किसी पर्वके अवसर पर, अनुपमादेवी मुनियोंको यथेच्छ निरुपम दान दे रही थी । तब किसी राजकार्यकी उत्सुकताके कारण स्वयं वीरधवलदेव उस समय वहा आ पहुचा तो उसने देखा कि श्वेताम्बर साधु-यतियोंकी भीड़से मकानका दरवाजा मानो ढपा हुआ है । तब विस्मयसे मनमें चकित हो कर वह मंत्रीसे बोला - 'हे मंत्री, अभिमत देवताकी भाँति, सदा ही इन साधुओंका इस तरह सत्कार क्यों नहीं किया करते ? अगर तुमसे न हो सकता हो तो आधा हिस्सा मेरा रहे । मेरा ही सदा दिया जाय - ऐसा तो इस कारणसे नहीं कहता कि वैसा करने पर तो फिर तुमको यह वृथा ही परिश्रम करने जैसा लगे ।' उसके मुखचन्द्रसे इस प्रकार वाणीरूप किरणके निकलने पर मंत्रीके मनका संताप दूर हुआ और वह बोला- 'स्वामीका आधा हिस्सा क्या ? सब कुछ तो आप ही का है ।' यह कह कर उसने वस्त्र निछावर किया । १९३) एक दूसरी बार, यतिदानके अवसर पर, अनेक मुनियोंकी भीड़के कारण नमन करती हुई श्रीमती अनुपमाकी पीठ पर घीमे भरा हुआ एक पात्र गिर पड़ा । यह देख कर मंत्री तेजपाल बड़ा कुपित हुआ । उसे कुपित देख कर अनुपमाने यह कह कर सान्त्वना दी कि-'आप जैसे स्वामीके प्रभावसे ही तो मुनिजन द्वारा गिराये गये पात्रके घीसे मेरा यह अभ्यङ्ग (घृतस्नान) हुआ ।' इस प्रकार उसकी पूर्णदानकी विधिसे चमत्कृत हो कर, मंत्रीने पश्चाङ्ग प्रसाद पूर्वक उसकी इस उचित उक्तिसे प्रशंसा की- २२९. प्रिय वाणीपूर्वक दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता और त्यागसहित धन, ये चार भद्र ( भले ) कार्य दुर्लभ हैं । इस प्रकारकी अनेक दानवार्ताओंसे प्रसिद्धी पाने वाली उस देवीकी जैनाचार्योने इस तरह स्तुति की- २३०. लक्ष्मी चञ्चला है, शिवा चण्डी (कोपना) है, शची सौतदोषसे दूषित है, गंगा निम्नगामिनी है और सरस्वती वाचाल है । इस लिये अनुपमा तो सब तरहसे अनुपमा ही है । * वीरधवलकी रणशूरता । १९४) एक दूसरी बार, लवणप्रसाद और वीरधवल पञ्चग्रामके [ स्वामीके ] साथ संग्राम करने पर जुड़े । तब श्री वीरधवल की पत्नी जयतलदेवी संधिविधानकी इच्छास अपने पिता प्रतीहार वंशीय श्री