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प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 181 में से

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प्रकरण १९१-१९७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १२९ शोभनदेवके पास गई तो उसने कहा कि क्या- 'वैधव्यसे डर कर सन्धि कराने आई हो ?' तब अपने वीरचूड़ामणि पति वीरधवलको उन्नत बनाती हुई वह बोली-'केवल पितृकुलके विनाशकी आशंकासे मैं बारंबार ऐसा कह रही हूं। जब वह वीर घोडे पर चढ़ेगा तो ऐसा कौन सुभट है जो उसके सामने खड़ा रहेगा ?' यह कह कर वह सक्रोध चली गई। लड़ाई छिड़ने पर वीरधवलको [ एक सख्त ] प्रहार लग गया और उसकी व्यथासे व्याकुल हो कर वह जमीन पर गिर पड़ा। तब सुभटोंका दिल कुछ हिम्मत हारता हुआ देख, लवण- प्रसादने अपनी सेनाको यह कह कर उत्साहित किया कि- 'अरे ! यह तो केवल एक ही सैनिक गिरा है' ऐसा कह कर समस्त शत्रुसेनाका खेलमें ही समूल ध्वंस कर दिया। सत्त्वगुणसे दीप्त वह वीरधवल [ इस प्रकार ] रणरसिकताके वश हो कर इक्कीस बार अपने पिताके आगे गिरा था। वीरधवलकी मृत्यु । २३१. वह भीम जैसा पराक्रमशाली (वीरधवल ) पल्ल ग्राम की समरभूमिमें घावोंके लगने पर घोड़ेकी पीठ परसे गिरा, पर गर्वसे नहीं । १९५) वीरधवल की आयुके अन्तमें, प्रतितीर्थ ( परलोक ) को प्रस्थान करने वालेको दान करनेसे एकका हजार गुणा मिलता है, इस रूढ़िके अनुसार तेजपालने अपने सारे जन्मका पुण्य दान कर दिया । फिर जब वह स्वामी चल बसा तो उसके सौभाग्यके अतिशयसे १२० सेवकोंने सहगमन किया । तब तेजपालने प्रेतवनमें पहरेदारोंको बिठा कर लोगोंको उस आग्रहसे निवृद्ध किया । २३२. अन्यान्य ऋतु तो आती-जाती रहती हैं पर ये दो ऋतु आ कर फिर नही गईं। वीरधवल वीरके विना प्रजाओंकी आँखोंमें वर्षा और हृदयमें ग्रीष्म [ सदाके लिये रह गईं । ] १९६) इसके बाद, मंत्रीने वीरधवलके पुत्र वीसल देव को राजपद पर अभिषिक्त किया । * अनुपमाकी मृत्यु । श्री अनुपमादेवी की मृत्युके बाद श्री तेजपालके हृदयमें जो शोककी गांठ बंध गई वह किसी तरह छूटती नहीं जान कर, वहां पर आये हुए श्री विजयसेन सूरिसम समर्थ पुरुषके द्वारा वह विपत्ति शान्त कराई गई । कुछ चेतना होने पर लज्जित तेजपालसे सूरिने कहा-' हम इस अवसर पर तुम्हारी लीला देखने आये थे । तो वस्तुपालने पूछा कि-' वह क्या ?' इस पर गुरुने कहा-' हमने शिशु तेजपालको ब्याहने के लिये जब धरणिग के पाससे उसकी कन्या इस अनुपमा की मंगनी की थी, तब स्थिरपत्र-दानके पश्चात् एकान्तमें उस कन्याकी विरूपताकी बात सुन कर, इसने उसका संबंध भंग होनेके लिये चन्द्रप्रभके मन्दिरके आहातेमें प्रतिष्ठित क्षेत्राधिपतिको आठ द्रम्म का भोग चढ़ाना माना था। और इस समय उसके वियोगमें पागल हो गये हैं । इन दोनों वृत्तान्तोंमेंसे कौनसी बात सच्ची है ?' इस प्रकार उस पुराने संकेतसे तेजपालने अपने हृदयको दृढ़ किया । वस्तुपालकी मृत्यु । १९७) फिर दूसरी बार, जब मंत्री वस्तुपाल पूर्णायु हुए तो शत्रुंजय की यात्राकी इच्छा की। यह जान कर पुरोहित सोमेश्वर देव यहाँ आया । अमूल्य आसन देने पर भी जब वह नहीं बैठना चाहा तो कारण पूछने पर बोला- ३३-१४

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