प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश शिरमें रहे हुए चन्द्रमाकी तरह, वह प्रतिदिन क्षीण होता जाता था। उस कुमारको वैसा देख कर, किसी समय राजाने दुर्बलताका कारण पूछा तो उसने कहा कि-' दुर्बुद्धिके कारण तुम जो प्रजाको पीड़ा दे रहे हो यह अत्यन्त अनुचित कर्म है और इस कारण मैं कृश होता जा रहा हूं'। २४२. जिसे मूर्खोंके बीच वास करना पड़े तथा जिसके स्वामीके कानोंके पास दुर्जनोंकी जीभ लगती हो, उसका यदि जीवन बना रहे तो उसे ही लाभदायक समझना चाहिए, क्षीण होनेमें तो विस्मय ही काहेका। सो मैंने इस गाथाके अर्थको सत्य कर बताया है। उसके इस कथनके अनन्तर राजाने कहा कि-' इस पापनिरत प्रजाके अपुण्योदयने ही तो, निश्चय करके भविष्यमें इसको पीड़ित करनेके लिये, मुझे राजा बनाया है। यदि विधाता इस प्रजाके भाग्यमें परिपालना लिखता तो उस समय पट्ट हस्ती तुम्हारा ही अभिषेक करता।' उसकी इस उक्ति और युक्ति रूप औषधोंसे उस कुमारका वह रोग दूर हो गया और वह शरीरसे पुष्ट होने लगा। इस प्रकार यह कर्मसार प्रबंध समाप्त हुआ ! * राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबंध । २०९) गौडदेशकी लक्षणावती नगरीमें लक्ष्मणसेन नामक राजा अपने उमापतिधर नामक सर्वबुद्धिनिधान ऐसे सचिवके साथ, सारी राज्य व्यवस्थाका विचार करते हुए, राज्य करता था। बादमें वह, मानों अनेक मातंग (हाथी) के सैन्यके संगसे मदान्धता धारण करके, किसी वेश्याके संगरूप कलङ्कपंकमें डूब गया। उमापतिधरने यह व्यतिकर जाना तो, प्रकृतिसे क्रूर होनेके कारण स्वामीको बेकाबू समझ कर, प्रकारा- न्तरसे उसे समझानेके लिये, उसने सभामंडपके भारपट्टपर, गुप्त भावसे इन कविताओंको लिख दिया - २४३. हे जल ! शीतलता तो तुम्हारा ही गुण है, और फिर तुम्हारी स्वाभाविकी स्वच्छताकी तो बात ही क्या कही जाय -तुम्हारे ही स्पर्शसे अन्य अपवित्र वस्तुयें पवित्र होती हैं। इससे बढ़कर और तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है कि तुम्हीं तो शरीरधारियोंके जीव हो। फिर अगर तुम्हीं नीच पथसे जाते हो तो तुम्हें रोकनेमें कौन समर्थ है ? २४४. हे शिव ! तुम अगर छोटे बैल पर चढ़ते हो तो उससे दिग्गजोंकी क्या हानि है? तुम अगर साँपोंका आभूषण पहनते हो तो इससे सोनेका क्या नुकसान है? अगर अपने शिरपर इस जड़ किरण चन्द्रमाको धारण करते हो तो उससे त्रैलोक्यके दीपक सूर्यका क्या बिगड़ता है ? तुम जगत्के ईश हो तो फिर हम तुम्हें क्या कहें ? २४५. यद्यपि फटे हुए ब्रह्मशिरको वह धारण करता है, यद्यपि प्रेतोंसे उसकी मित्रता है, यद्यपि रक्ताक्ष हो कर मातृकाओंके साथ वह क्रीड़ा करता है, यद्यपि श्मशानमें वह प्रीति रखता है और यद्यपि सृष्टि करके वह उसका संहार कर देता है, तो भी, मैं उसमें मन लगा कर भक्ति-पूर्वक सेवा करता हूँ। क्यों कि त्रिलोक शून्य है और वह जगतका एक-मात्र ईश्वर है। २४६. इस महान् प्रदीपकालमें तुम्हीं एक मात्र राजा (चन्द्र) हो, और इसी लिये तो क्या कमलोंकी लक्ष्मीको बद्ध करके कुमुदोंकी श्रीको बढ़ा नहीं रहे हो ? पर इसमें जो ब्रह्माका निवास है और पुष्पोंकी पंक्तिमें इसकी जो प्रतिष्ठा है उसको दूर करनेवाले तुम कौन हो ? क्यों कि वह तो स्वयं विधाता भी करनेमें समर्थ नहीं है।