भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण २०९-२१० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३९ २४७. हे हार ! तुम सद्वृत्त, सद्गुण, महार्ह, और अमूल्य हो कर प्रियाके घन ऐसे स्तनतटके उपयुक्त तुम्हारी सुंदर मूर्ति है । किन्तु हाय, पामरीके कठोर कंठमें लग कर टूट जानेसे तुमने अपनी यह गुणिता खो दी है । किसी राजासभाके अवसरपर आये हुए राजाने इन कविताओंको देखा और उनका अर्थ समझ कर भीतर ही भीतर मंत्रीसे द्वेष धारण करने लगा । क्यों कि- २४८. आजकल प्रायः सन्मार्गका उपदेश करना, उसी तरह कोपका कारण होता है, जैसे नकटेको दर्पण दिखाना । इस न्यायसे कुपित हो कर राजाने उसे पदभ्रष्ट कर दिया । इसके बाद उस राजाने, एक बार, राज- पाटिकासे लौटते हुए रास्तेमें दुर्गतिग्रस्त, निरुपाय और एकाकी ऐसे उस उमापतिधरको देखा, तो क्रोधपूर्वक उसे मार डालनेके लिये, हस्तिपालके द्वारा उस पर हाथी चलवा दिया । तब उसने महावतसे कहा कि-'जब तक, मैं राजाके सामने कुछ कह पाऊँ तब तक, तुम वेगसे हाथीको जरा थाम रखो' । उसकी बात सुन कर उसने वैसा ही किया; तो फिर वह उमापतिधर बोला- २४९. जिसको, सज्जन ऐसे गुरु लोग उपदेश नहीं देते उस शिवका कैसा हाल हो रहा है ?-नंगा फिरता है, शरीरमें धूल लगाता है, बैलकी पीठपर चढ़ता है, साँपोंसे खेला करता है, और जिसमेंसे लोहू टपकता है ऐसे हाथीके चमडेको पहन कर नाचता है । इस प्रकारके आचारवाह्य तथा अन्य कई प्रकारके [ निंद्य ] आचरणोंसे यह प्रेम रखे करता है । इस प्रकार उसके विद्वानरूपी वचनानुशासे उस राजाका मनरूपी हाथी वश हुआ, और वह अपने चरित्रके विषयमें पश्चात्ताप करता हुआ अपनी खूब निंदा करने लगा । धीरे धीरे उस वासनासे मुक्त हो कर उसने फिरसे उसे अपना प्रधान बनाया । इस प्रकार लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध । २१०) काशीनगरी में जयचन्द्र नामक राजा, महती साम्राज्य लक्ष्मीका पालन करता हुआ, पंगु ( लंगड़ा ) इस विरुदको धारण करता था । कारण यह था कि बड़े भारी सैन्य समूहसे व्याकुलित होनेके कारण, वह गंगा-यमुना नदीरूप लाठीके सहारे बिना कहीं आ-जा नहीं सकता था। वहाँ रहनेवाले किसी शालापतिकी सुह्य नामक पत्नी, जिसने अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकके स्त्रीजनोंको जीत लिया था, किसी समय भयानक ग्रीष्म ऋतुमें जलकेलि करके गंगाके किनारे खड़ी थी । तब उस खञ्जननयनाने देखा कि एक साँपके शिरपर खंजन पक्षी बैठा है। वहीं पर नहानेके लिए आये हुए किसी ब्राह्मणके पैरों पड़ कर उसने उस असंभव शकुनका विचार पूछा । उस नैमित्तिकने कहा कि-'अगर मेरा सदा आदेश मानना मंजूर करो तो मैं इसका विचार निवेदन करूँ, नहीं तो नहीं' । उसने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की, तो ब्राह्मणने कहा कि-'आजसे सातवें दिन तुम इस राजाकी पटरानी होंगी '-ऐसा कह-सुन कर वे दोनों यथा-स्थान चले गये । जिस दिनके लिये निमित्तज्ञने निर्णय दिया था उसी दिन राजपाटिकासे लौटते हुए राजाने, किसी एक गढ़ीमें अगम्य २. थमे सुभग अंगवाली उस शालापतिकी स्त्रीको खड़े देखा। उसे अपने चित्तका मर्मम् चोरनेवाली १ इस पदमें प्रयुक्त सद्वृत्त, सद्गुण और गुणित्व ये शब्द प्रसिद्ध अर्थके अतिरिक्त रूपसे हारके पक्षमें इन अर्थोके वाचक हैं-सद्वृत्त=अच्छी गोलाईवाला; सद्गुण=अच्छे धागेवाला, गुणित्व=धागेकी बनावटवाला ।