भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण २१३-२१५ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४३ अपनी रानीसे पर मर्दीने [ व्यंग्य करते हुए ] कहा कि- 'तुम्हारा भाई समरवीरताका तो बड़ा अहंकार धारण करता है लेकिन शत्रुओं द्वारा आक्रान्त हो कर वह वहाँसे भाग भी नहीं सका'। राजाकी इस मर्मभेदिनी परिहास वाणीको सुन कर रानीने प्रातःकालमें पश्चिमकी ओर देखा । राजाने पूछा 'क्या देखती हो ?' इस पर रानीने कहा कि 'सूर्योदय' । तब राजाने कहा 'पगली, क्या कभी पश्चिम दिशामें भी सूर्योदय होता है?' इसपर वह बोली - 'पश्चिममें सूर्योदयका होना असंभव हो कर भी, कभी विधिके विधानके विरुद्धका होना संभव है; पर क्षत्रियोंमें देव जैसे जगद्देव का पराजय होना तो संभव ही नहीं'। इस प्रकार उस दम्पतीका प्रिय आलाप हो रहा था। इधर, देवपूजाके बाद जगद्देवने ५०० सुभटोंके साथ उठ कर, उस शत्रु राजाकी सेनाका क्रीडामात्र-ही-में इस तरह दलन कर डाला, जिस तरह सूर्य अन्धकारके समूहका, सिंह-शाव गजयूथका और प्रचण्ड अन्धड़ घनघोर मेघमालाका दलन करता है । २१४) वह परमर्दी राजा, जगत्में एक उदाहरणभूत ऐसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करता हुआ, एक निद्राके अवसरको छोड कर, दिनरात अपने ओजके प्रकाशका करनेवाला छुरिका-अभ्यास ( छुरी चलानेकी कलाका परिश्रम ) किये करता था । भोजनके अवसर पर रसोई परोसनेमें व्यस्त ऐसे एक एक रसोईयेको नित्य ही निर्दय भावसे उस छुरिकासे काट डालता था । इस प्रकार सालमें ३६० रसोईयोंका वह संहार करता हुआ 'कोप-कालानल 'के विरुदसे प्रसिद्ध हो गया । २५७. हे आकाश, तुम फैल जाओ; दिशाओ, तुम आगे बढ़ो; हे पृथ्वी, तुम और भी चौड़ी हो जाओ; आदिकालके राजाओंके यशका उज्जृंभण तो तुम लोगोंने प्रत्यक्ष किया ही है; अब परमर्दी राजाके यशोशशिका विकास होनेसे देखो कि यह ब्रह्माण्ड, प्रस्फुटित बीजोंके कारण, फटे हुए दाड़िमकी दशाको प्राप्त हो रहा है। इत्यादि स्तुतियोंसे स्तुत हो कर वह राजा चिर कालतक साम्राज्यके सुखका अनुभव करता रहा । २१५) उसका, सपादलक्षके राजा पृथ्वीराज के साथ युद्ध हुआ और संग्रामाङ्गणमें वह अपने सैन्यके पराजित होने पर, दिग्दिमूढ़ हो कर, किसी एक दिशासे भागता हुआ अपनी राजधानीमें आया । उस परमर्दी राजाके द्वारा पूर्वमें अपमानित कोई सेवक, देश निकालेकी सजा पा कर पृथ्वीराज की सभामें आया । उसके प्रणाम करनेके बाद राजाने उससे पूछा कि-'परमर्दी के नगरमें सुकृती लोग विशेष करके किस देवताकी पूजा करते रहते हैं?' इस प्रकार स्वामीके पूछनेपर उसने शीघ्र ही यह तत्कालोचित पद्य पढ़ा- २५८. शिवकी पूजा करनेमें वह मंद है, कृष्णार्चन करनेकी उसे कोई तृष्णा नहीं है, दुर्गाको प्रणाम करनेमें यह स्तब्ध रहता है, विधाता रूपी ग्रह [ उसके यहाँ पूजा न पानेसे ] व्यग्र रहता है । 'हमारा स्वामी परमर्दी इसीको मुंहमें रख कर पृथ्वीराज नरपतिसे रक्षा पा सका है ' इस बातको सोच कर वहाँकी प्रजा तृण ही की पूजा किये करती है । इस स्तुतिसे प्रसन्न हो कर राजाने उसे यथेष्ट पारितोषिक दे कर अनुगृहीत किया । उसने ( पृथ्वीराज ) इक्कीस बार म्लेच्छराजाको हराया था । तब बाइसवीं बार वही म्लेच्छराज अपनी दुर्धर सेनाके साथ चढ़ कर पृथ्वीराज की राजधानीके पास आ कर ठहरा । मक्खीकी तरह बारबार उड़ा देनेपर भी, इस प्रकार, शत्रुको फिर फिर आते देख उसकी तरफ राजाकी उपेक्षाका होना जाना, तो स्वामीकी असीम कृपाका पात्र और उसके दूसरे शरीरके जैसा वह तुंग नामक क्षात्रतेजधारी वीरश्रेष्ठ, अपनी छायाके जैसे पुत्रके साथ म्लेच्छ- राजकी सेनामें जा घुसा । रातके समय उसने देखा कि उस शत्रुके तंबूके चारों ओर एक खाई खुदी हुई है जिसमें खैरकी लकड़ीकी आग धधक रही है । यह देख वह अपने पुत्रसे बोला-'मैं इस खाईमें कूद पड़ता हूं;

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