भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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१४२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश २५४. हे जगदेव ! हम नहीं जानते कि किसका हाथ थक जायगा—दरिद्रोंको रचते रचते ब्रह्माका, या उन्हें कृतार्थ करते करते तुम्हारा । २५५. हे जगदेव ! इस जगद्रूप देवमंदिरमें प्रतिष्टित तुम्हारे यशरूपी शिवलिंगके ऊपर [आकाशके] नक्षत्रोंने अक्षतका रूप धारण किया है। [ १७४ ] हे जगदेव ! चारों समुद्रोंमें डुबकी मारनेके कारण तुम्हारी कीर्ति मानों ठंडीसे जकड गई है, इसलिये अब ताप लेनेके निमित्त वह सूर्य-मण्डलको चली है। [ १७५ ] क्षत्रियदेव श्रीजगदेव भूपालका कल्याण हो ! जिसके यशरूपी कमलमें आकाशने भ्रमरका रूप धारण किया । [ १७६ ] पृथ्वीमण्डलपर सुवर्ण वितरण करनेवाला तो एकमात्र जगदेव ही है और उसके मांगनेवालोंकी संख्या हजारोंकी है—ऐसा सोच कर, ऐ मेरे मन विषाद मत करो। सूर्य कितने हैं और प्रबल अन्धकारराशिमें डूबते हुए जन-समूहकी प्राणरक्षाके लिये यात्रामें प्रवृत्त उनके घोड़ोंके खुरसे खुदा हुआ यह दिङ्मण्डल कितना विस्तृत है ! जगदेवकी दी हुई 'न नवम्' ( नया नहीं है ) इस समस्याकी पूर्ति एक पंडितने इस प्रकार की— २५६. समुद्र अगाध है, पृथ्वीमण्डल विशाल है, आकाश विभु है, मेरु पर्वत ऊँचा है, विष्णु प्रथित- महिमा है, कल्पवृक्ष उदार है, गंगा पवित्र है, चंद्रमा अमृतवर्षी है और जगदेव वीर है—ये सब (विशेषण-युक्त विशेष्य ) नये नहीं हैं। [ १७७ ] तुझ समान जगदाता जगदेवके विद्यमान होनेपर, अब लोक साहसांक राजाके चरितके आश्चर्योंमें भी मन्दादर हो गये हैं तो फिर पार्थकी उस सच्ची कथाका कहना तो वृथा ही है। यह पृथ्वीमें बलि है, यह भूचर शक्र है। कृष्णको किसीने देखा नहीं, पृथ्वीमंडळ कल्पवृक्षसे शून्य है। कामदेवका सोच न करना चाहिए। (-इस पद्यका भाव कुछ स्पष्ट नहीं ज्ञात होता।) [ १७८ ] हे जगदेव ! तुम्हारा यशोरूप दुर्वार चंद्रमा जब निरंतर ही अपनी किरणश्रेणीको दसों दिशाओंमें विकीर्ण करने लगा, तब सारे भुवनको राकाके लिये भयका स्थान समझ कर, 'कुहू' शब्द है सो एक मात्र कोकिलके कंठका शरणभूत हो कर रहा । ( 'कुहू' का एक अर्थ अमावश्याकी रात्रि है, और दूसरा कोकिलका शब्द है । जगदेवके यशरूपी चंद्रमाका निरंतर प्रकाश बना रहनेसे अमावश्याका अभाव हो गया, इसलिये कुहू शब्दका व्यवहार केवल, कोकिलके शब्दमें रह गया ।) [ १७९ ] हे प्रभु जगदेव ! तुम्हारे रूपमें मुग्ध हो कर, वातायन पर स्थित सुभ्रू (सुंदर भ्रुवों वाली ) रमणियोकी कमलदलसे द्रोह करनेवाली नाचती हुई आँखें सभय, सालस, सगर्व, सार्द्र, तिरछी, चकित, भ्रान्त और आर्त की नाईं, कहां नहीं पड़तीं हैं । इस प्रकारके बहुतसे काव्य हैं जो यथाश्रुत जानने चाहिये । राजा श्रीपरमर्दी राजकी पट्टदेवीको जगदेव ने अपनी भगिनी माना था। एक बार, राजाने सीमान्त भूपालको हरानेके लिए श्रीजगदेव को भेजा। वह, वहाँ जब देवार्धन कर रहा था उसी समय छल करके आघात करनेवाले शत्रुने उसकी सेनामें उपद्रव मचाया। इसका हाल सुन कर भी वह जगदेव उस देवपूजासे बाहर नहीं निकला। प्रणिधि पुरुषोंके मुँहसे राजाने जगदेव का पराजय हुआ सुना तो यह अश्रुतपूर्व बात सुन कर