भारतकोश
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प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

१४२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश २५४. हे जगदेव ! हम नहीं जानते कि किसका हाथ थक जायगा—दरिद्रोंको रचते रचते ब्रह्माका, या उन्हें कृतार्थ करते करते तुम्हारा । २५५. हे जगदेव ! इस जगद्रूप देवमंदिरमें प्रतिष्टित तुम्हारे यशरूपी शिवलिंगके ऊपर [आकाशके] नक्षत्रोंने अक्षतका रूप धारण किया है। [ १७४ ] हे जगदेव ! चारों समुद्रोंमें डुबकी मारनेके कारण तुम्हारी कीर्ति मानों ठंडीसे जकड गई है, इसलिये अब ताप लेनेके निमित्त वह सूर्य-मण्डलको चली है। [ १७५ ] क्षत्रियदेव श्रीजगदेव भूपालका कल्याण हो ! जिसके यशरूपी कमलमें आकाशने भ्रमरका रूप धारण किया । [ १७६ ] पृथ्वीमण्डलपर सुवर्ण वितरण करनेवाला तो एकमात्र जगदेव ही है और उसके मांगनेवालोंकी संख्या हजारोंकी है—ऐसा सोच कर, ऐ मेरे मन विषाद मत करो। सूर्य कितने हैं और प्रबल अन्धकारराशिमें डूबते हुए जन-समूहकी प्राणरक्षाके लिये यात्रामें प्रवृत्त उनके घोड़ोंके खुरसे खुदा हुआ यह दिङ्मण्डल कितना विस्तृत है ! जगदेवकी दी हुई 'न नवम्' ( नया नहीं है ) इस समस्याकी पूर्ति एक पंडितने इस प्रकार की— २५६. समुद्र अगाध है, पृथ्वीमण्डल विशाल है, आकाश विभु है, मेरु पर्वत ऊँचा है, विष्णु प्रथित- महिमा है, कल्पवृक्ष उदार है, गंगा पवित्र है, चंद्रमा अमृतवर्षी है और जगदेव वीर है—ये सब (विशेषण-युक्त विशेष्य ) नये नहीं हैं। [ १७७ ] तुझ समान जगदाता जगदेवके विद्यमान होनेपर, अब लोक साहसांक राजाके चरितके आश्चर्योंमें भी मन्दादर हो गये हैं तो फिर पार्थकी उस सच्ची कथाका कहना तो वृथा ही है। यह पृथ्वीमें बलि है, यह भूचर शक्र है। कृष्णको किसीने देखा नहीं, पृथ्वीमंडळ कल्पवृक्षसे शून्य है। कामदेवका सोच न करना चाहिए। (-इस पद्यका भाव कुछ स्पष्ट नहीं ज्ञात होता।) [ १७८ ] हे जगदेव ! तुम्हारा यशोरूप दुर्वार चंद्रमा जब निरंतर ही अपनी किरणश्रेणीको दसों दिशाओंमें विकीर्ण करने लगा, तब सारे भुवनको राकाके लिये भयका स्थान समझ कर, 'कुहू' शब्द है सो एक मात्र कोकिलके कंठका शरणभूत हो कर रहा । ( 'कुहू' का एक अर्थ अमावश्याकी रात्रि है, और दूसरा कोकिलका शब्द है । जगदेवके यशरूपी चंद्रमाका निरंतर प्रकाश बना रहनेसे अमावश्याका अभाव हो गया, इसलिये कुहू शब्दका व्यवहार केवल, कोकिलके शब्दमें रह गया ।) [ १७९ ] हे प्रभु जगदेव ! तुम्हारे रूपमें मुग्ध हो कर, वातायन पर स्थित सुभ्रू (सुंदर भ्रुवों वाली ) रमणियोकी कमलदलसे द्रोह करनेवाली नाचती हुई आँखें सभय, सालस, सगर्व, सार्द्र, तिरछी, चकित, भ्रान्त और आर्त की नाईं, कहां नहीं पड़तीं हैं । इस प्रकारके बहुतसे काव्य हैं जो यथाश्रुत जानने चाहिये । राजा श्रीपरमर्दी राजकी पट्टदेवीको जगदेव ने अपनी भगिनी माना था। एक बार, राजाने सीमान्त भूपालको हरानेके लिए श्रीजगदेव को भेजा। वह, वहाँ जब देवार्धन कर रहा था उसी समय छल करके आघात करनेवाले शत्रुने उसकी सेनामें उपद्रव मचाया। इसका हाल सुन कर भी वह जगदेव उस देवपूजासे बाहर नहीं निकला। प्रणिधि पुरुषोंके मुँहसे राजाने जगदेव का पराजय हुआ सुना तो यह अश्रुतपूर्व बात सुन कर

प्रकरण २१३-२१५ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४३ अपनी रानीसे पर मर्दीने [ व्यंग्य करते हुए ] कहा कि- 'तुम्हारा भाई समरवीरताका तो बड़ा अहंकार धारण करता है लेकिन शत्रुओं द्वारा आक्रान्त हो कर वह वहाँसे भाग भी नहीं सका'। राजाकी इस मर्मभेदिनी परिहास वाणीको सुन कर रानीने प्रातःकालमें पश्चिमकी ओर देखा । राजाने पूछा 'क्या देखती हो ?' इस पर रानीने कहा कि 'सूर्योदय' । तब राजाने कहा 'पगली, क्या कभी पश्चिम दिशामें भी सूर्योदय होता है?' इसपर वह बोली - 'पश्चिममें सूर्योदयका होना असंभव हो कर भी, कभी विधिके विधानके विरुद्धका होना संभव है; पर क्षत्रियोंमें देव जैसे जगद्देव का पराजय होना तो संभव ही नहीं'। इस प्रकार उस दम्पतीका प्रिय आलाप हो रहा था। इधर, देवपूजाके बाद जगद्देवने ५०० सुभटोंके साथ उठ कर, उस शत्रु राजाकी सेनाका क्रीडामात्र-ही-में इस तरह दलन कर डाला, जिस तरह सूर्य अन्धकारके समूहका, सिंह-शाव गजयूथका और प्रचण्ड अन्धड़ घनघोर मेघमालाका दलन करता है । २१४) वह परमर्दी राजा, जगत्में एक उदाहरणभूत ऐसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करता हुआ, एक निद्राके अवसरको छोड कर, दिनरात अपने ओजके प्रकाशका करनेवाला छुरिका-अभ्यास ( छुरी चलानेकी कलाका परिश्रम ) किये करता था । भोजनके अवसर पर रसोई परोसनेमें व्यस्त ऐसे एक एक रसोईयेको नित्य ही निर्दय भावसे उस छुरिकासे काट डालता था । इस प्रकार सालमें ३६० रसोईयोंका वह संहार करता हुआ 'कोप-कालानल 'के विरुदसे प्रसिद्ध हो गया । २५७. हे आकाश, तुम फैल जाओ; दिशाओ, तुम आगे बढ़ो; हे पृथ्वी, तुम और भी चौड़ी हो जाओ; आदिकालके राजाओंके यशका उज्जृंभण तो तुम लोगोंने प्रत्यक्ष किया ही है; अब परमर्दी राजाके यशोशशिका विकास होनेसे देखो कि यह ब्रह्माण्ड, प्रस्फुटित बीजोंके कारण, फटे हुए दाड़िमकी दशाको प्राप्त हो रहा है। इत्यादि स्तुतियोंसे स्तुत हो कर वह राजा चिर कालतक साम्राज्यके सुखका अनुभव करता रहा । २१५) उसका, सपादलक्षके राजा पृथ्वीराज के साथ युद्ध हुआ और संग्रामाङ्गणमें वह अपने सैन्यके पराजित होने पर, दिग्दिमूढ़ हो कर, किसी एक दिशासे भागता हुआ अपनी राजधानीमें आया । उस परमर्दी राजाके द्वारा पूर्वमें अपमानित कोई सेवक, देश निकालेकी सजा पा कर पृथ्वीराज की सभामें आया । उसके प्रणाम करनेके बाद राजाने उससे पूछा कि-'परमर्दी के नगरमें सुकृती लोग विशेष करके किस देवताकी पूजा करते रहते हैं?' इस प्रकार स्वामीके पूछनेपर उसने शीघ्र ही यह तत्कालोचित पद्य पढ़ा- २५८. शिवकी पूजा करनेमें वह मंद है, कृष्णार्चन करनेकी उसे कोई तृष्णा नहीं है, दुर्गाको प्रणाम करनेमें यह स्तब्ध रहता है, विधाता रूपी ग्रह [ उसके यहाँ पूजा न पानेसे ] व्यग्र रहता है । 'हमारा स्वामी परमर्दी इसीको मुंहमें रख कर पृथ्वीराज नरपतिसे रक्षा पा सका है ' इस बातको सोच कर वहाँकी प्रजा तृण ही की पूजा किये करती है । इस स्तुतिसे प्रसन्न हो कर राजाने उसे यथेष्ट पारितोषिक दे कर अनुगृहीत किया । उसने ( पृथ्वीराज ) इक्कीस बार म्लेच्छराजाको हराया था । तब बाइसवीं बार वही म्लेच्छराज अपनी दुर्धर सेनाके साथ चढ़ कर पृथ्वीराज की राजधानीके पास आ कर ठहरा । मक्खीकी तरह बारबार उड़ा देनेपर भी, इस प्रकार, शत्रुको फिर फिर आते देख उसकी तरफ राजाकी उपेक्षाका होना जाना, तो स्वामीकी असीम कृपाका पात्र और उसके दूसरे शरीरके जैसा वह तुंग नामक क्षात्रतेजधारी वीरश्रेष्ठ, अपनी छायाके जैसे पुत्रके साथ म्लेच्छ- राजकी सेनामें जा घुसा । रातके समय उसने देखा कि उस शत्रुके तंबूके चारों ओर एक खाई खुदी हुई है जिसमें खैरकी लकड़ीकी आग धधक रही है । यह देख वह अपने पुत्रसे बोला-'मैं इस खाईमें कूद पड़ता हूं;

१४४] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रवाह तुम मेरी पीठपर पैर रख कर जा कर म्लेच्छराजको मार डालो'। पिताके ऐसा आदेश करनेपर उसने कहा कि- 'यह काम मेरे लिये साध्य नहीं है कि अपने जीवनकी आकाङ्क्षासे मैं पिताकी मृत्यु देखूं!; सो मैं ही इसमें पड़ता हूं और आप ही मेरी पीठपर पैर रख कर उसका अन्त कर डालें'। उसके वैसा करनेपर, स्वामीके कार्यको सिद्ध- प्राय हुआ मान कर आसानीसे उसने शत्रुको मार डाला और फिर जैसे आया था वैसे ही घर लौट गया। जब प्रभात होनेको आया तो अपने स्वामीको मरा देख कर वह म्लेच्छ सेना दीन हो कर भाग गई। गंभीरप्रकृति होनेके कारण उस तुंग सुभटने राजाको वह कुछ भी हाल नहीं बताया। किसी समय, राजमान्य होनेके कारण अत्यन्त परिचित ऐसी उस तुंग सुभटकी पुत्रवधूको मंगलदर्शक हस्तकंकणोंसे रहित देख कर, राजाने संभ्रमभावसे उसका कारण पूछा। समुद्रकी नाईं गंभीर होनेके कारण, मौनमर्यादाके साथ प्रथम तो उसने कुछ भी नहीं बताया। तब राजाने अपनी शपथ दे कर पूछा। इस पर उसने यह कह कर कि-'यद्यपि अपना गुण कथन करना मेरे लिये दुष्कर कार्य है तथापि आज्ञा होने निवेदन करना पड़ता है' ऐसा कह कर प्रत्युपकारभीरु हो कर उसने वह वृत्तान्त जैसा घटा था वैसा ही निवेदन किया। २५९. उच्च बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तकी यह कोई बड़ी ही अलौकिक कठोरता है कि किसीका उपकार करके फिर वे दूसरेसे प्रत्युपकार पानेके भयसे उनसे निःस्पृह हो रहते हैं। इस प्रकार यह तुंगसुभट प्रबंध समाप्त हुआ। * पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना। २१६) इसके अनन्तर, फिर कभी, उस म्लेच्छराजका पुत्र पिताका वैर स्मरण करके सपादलक्षके राजा पृथ्वीराजके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे बड़ी तैयारीके सहित चढ़ कर आया। पृथ्वीराज की सेनाके वीर धनुर्धरोंके, वर्षाकालकी मूसलधार वृष्टिकी नाईं बरसते हुए, बाणोंकी मारसे वह स-सैन्य भगा दिया गया और फिर पृथ्वीराजने उसका पीछा किया। इस समय भोजन-विभागके अधिकारी पद्मकुलने कहा कि- 'सात सौ साढनियां जो भोजनकी सामग्री ढोती हैं वे पर्याप्त नहीं हैं, इसलिये महाराज कुछ और साढनिया देनेकी कृपा करें'। राजा यह सुन कर बोला कि - 'म्लेच्छराजको मार कर उसके ऊँटोंका झुंड कब्जे किया जायगा, और फिर तुम्हें माँगी हुई साढनिया देनेका प्रबन्ध किया जायगा'। ऐसा कह कर उसे समझा दिया और फिर जब आगे प्रयाण करने लगा तो सोमेश्वर नामक प्रधानने बारबार निषेध किया। राजाने इस भ्रमसे कि यह उस (म्लेच्छ) के पक्षमें है, उसके कान काट लिये। इस अत्यन्त पराभवके कारण, वह अपने स्वामीसे कुपित हो कर उस म्लेच्छपतिके पास चला गया। उसको अपना पराभव-वृत्तान्त कह कर, उसके मनमें विश्वास बिठाया और उसको पृथ्वीराजके पड़ावके पास ले आया। पृथ्वीराज एकादशीके पारणाके पश्चात् जब सोया हुआ था तो उसकी सेनाके वीरोंके साथ म्लेच्छोंकी लड़ाई छिड़वा दी। राजा गाढ़ी नींदमें सो रहा था। उसी अवस्थामें तुर्कोने उसे कैद कर लिया और वे अपने स्थानमें ले गये। फिर दूसरी एकादशीके पारणाके अनन्तरपर, जब वह राजा [कैदीकी हालतमें ] देव-पूजा कर रहा था, उस समय म्लेच्छराजने रँधा हुआ मांस, पत्रके पात्रमें (दोनेमें) रखवा कर उसके तंबूमें भिजवाया। उसके देवपूजामें व्यस्त होनेके कारण, एक कुत्ता आ कर उस मांसको उठा ले गया। तब पहरेदारोंने कहा कि 'इसकी रक्षा क्यों नहीं करते?' इसपर राजाने कहा कि- 'मेरी जिस भोजनसामग्रीको कभी सात सौ साढनिया भी ठीक तरह नहीं ढो सकती थीं, उसी भोजनकी आज यह दुर्दशा है-इस बातको मैं अनाकुल हो कर कौतुकसे देख रहा हूं'। उन्होंने कहा कि-'क्या तुममें अब भी कुछ उत्साह शक्ति बाकी है?' तो उसने कहा 'यदि मैं अपने स्थानपर जा पहुँचूं

प्रकरण २१६-२१८] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४५ तो अपनी शारीरिक ताकत कैसी है सो दिखा दूं'। पहरेदारोंने यह बात उस म्लेच्छराजको जा कर कही तो वह उसके साहसको देखनेकी इच्छासे, उसे उसकी राजधानीमें ले आया और राज-भवनमें ले जा कर उसको गादीपर बिठाया। बादमें ज्यों ही उन्होंने देखा तो उसके महलकी चित्रशालामें ऐसे चित्र बने हुए नजर आये जिनमें सूअर म्लेच्छोंको मार रहे हैं। यह दृश्य देख वह तुर्कोंका राजा अपने मनमें अत्यन्त पीड़ित हुआ और वहीं पर उसने कुठार द्वारा पृथ्वीराज का सिर काट कर उसका संहार कर डाला। इस प्रकार नृपति परमर्दी, जगद्देव और पृथ्वीराज इन तीनोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई। २१७) जहाँ समुद्र ही जिसकी परिखा (खाई) है ऐसे शतानन्दपुरमें महानंद नामक राजा हुआ। उसकी रानीका नाम था मदनरेखा। अन्तःपुर [ में स्त्रियों ] की प्रचुरता होनेसे राजा उसके प्रति विरक्त रहता था। इसलिये पतिको वशीभूत करनेकी इच्छासे वह नानाविध विदेशी जनों और कलाविदोंसे इस बारेमें पूछा करती। तब एक यथार्थवादी विश्वसनीय तांत्रिकने उसे कुछ सिद्धयोग बताया। उसके प्रयोग करनेके अवसरपर उसे इस वाक्यका अनुस्मरण हो आया कि 'मंत्रमूलके बलपर की हुई प्रीतिको पतिद्रोह कहते हैं'। तो उस योगचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। कहा है कि 'मंत्र और औषधिका प्रभाव अचिन्त्य होता है'-इस लिये औषधके माहात्म्यसे वशीभूत हुआ समुद्र ही उसका वशवर्ती हो कर, मूर्तरूप (मनुष्यस्वरूप) बना कर उसके साथ रातमें आ कर रतिरमण करने लगा। इससे वह गर्भवती हो गई। तब उसके ऐसे चिन्होंको देख कर राजा कुपित हो कर उसे किसी प्रवास आदिका दण्ड देनेकी तदबीर सोचने लगा। इससे उसकी मृत्यु निकट समझ कर समुद्रदेव प्रत्यक्ष हुआ और अपना परिचय देते हुए बोला कि- 'मैं समुद्रका अधिष्ठाता देव हूँ, इसलिये डरना मत'। फिर यह राजासे बोला- २६०. शीलवती कुलीन कन्याको, विवाह करके, जो सम-दृष्टिसे नहीं देखता, वह बड़ा भारी पापिष्ठ कहा गया है। इसलिये इस स्त्रीकी अवज्ञा करनेवाले ऐसे तुझको मैं अन्तःपुर और परिवारके साथ अगाध जलमें डुबो दूँगा'। यह सुन कर वह भयभ्रान्ता रानी उसका अनुनय करने लगी। इस पर समुद्रने यह कह कर कि- 'यह मेरा ही लड़का होगा और इसलिये मैं ही कहीं कहींका जल हटा कर इसे साम्राज्यके योग्य नई भूमि दूँगा'-ऐसा कह कर फिर उसने कहीं कहींसे जल हटा कर अन्तरीप (बेट) बना दिये जो लोगोंमें सब 'कौंकण' नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार यह कौंकण-प्रबंध समाप्त हुआ। * ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध। २१८) पाटलीपुत्र नगरमें वराह नामक एक ब्राह्मणका लड़का था जो जन्मसे ही शकुन ज्ञानमें श्रद्धालु था। गरीब होनेके कारण पशु चरा कर अपना निर्वाह किये करता था। एक दिन [जंगलमें] किसी एक पत्थर पर लग्न लिख कर उसे बिना मिटाये ही घर लौट आया। यथासमय उचित कृत्य कर लेनेके बाद रातमें भोजन करनेको बैठा तो उस लग्नके विसर्जन न करनेका स्मरण हो आया। तब उसी समय निर्भय भावसे वहाँ गया तो देखा कि उसपर एक सिंह बैठा है। उसने इसकी भी परवा न की और उसके पेटके नीचे ३७-३८

१४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश हाथ डाल कर उस मिटाने लगा। तब इसके अनन्तर वह सिंहका रूप त्याग करके सूर्यरूपमें प्रत्यक्ष हुआ और कहने लगा 'वर माँगो'। तब उसने माँगा कि- 'मुझे समस्त नक्षत्र ग्रह मण्डलको [प्रत्यक्ष] दिखा दो'। यह सुन सूर्य उसे अपने विमानपर चढ़ा कर ले गया और [सारा ग्रहचार बता कर] एक वर्ष बाद वहीं ले आ कर छोड़ गया। इस तरह वह ग्रहोंके वक्र, अतिचार, उदय, अस्त आदिकी प्रत्यक्ष परीक्षा करके पुन अपने स्थानमें आया। मिहिर (सूर्य) का प्रसाद प्राप्त होनेसे वराहमिहिर इस नामसे प्रसिद्ध हो कर वह श्री नन्द नामक नृपतिक्रा परम मत्य हुआ और उसने 'वाराहीसंहिता' नामक एक नया ज्योतिषशास्त्र बनाया। २१९) एक बार, अपने पुत्र जन्मके अवसरपर, उसने अपने घरमें घटिका रख कर उससे जन्मकालका शुद्ध लग्न ले कर जातक ग्रथके प्रमाणसे ज्योतिष (जन्मपत्र) बनाया। स्वयं प्रत्यक्ष किये हुए ग्रहचक्रके ज्ञानके बलपर उस पुत्रकी आयु एक सौ वर्षकी निर्णीत की। उस महोत्सवमें, श्री भद्रबाहु नामक एक जैनाचार्य-जो उसके छोटे भाई थे-को छोड़कर, राजासे ले कर रंक तक कोई ऐसा नहीं रहा था जो कुछ उपहार हाथमें लेकर उसके वहा नहीं गया हो। तब उस नैमित्तिकने जिनभक्त शकटाल मन्त्रीके आगे, उन सूरिके न आनेके बारेमें उलाहनेके तौरपर कहा। तब उस मन्त्रीने, उन महात्माको, जो सम्पूर्ण शास्त्रके ज्ञाता थे और त्रिकालके भावोंको हथेलीपर रखे हुए आँवलेके फलकी तरह जानते थे, यह बात कह सुनाई। तो उन्होंने कहा कि- 'आजसे बीसवें दिन उस लड़केकी, बिल्लीके निमित्तसे, मृत्यु होगी इसलिये यह समझ कर हम नहीं आये'। उनकी यह उपदेश-वाणी वराहमिहिरसे कही गई। तब उसने अपने कुटुम्बको, उस बालककी भावी विपदसे आवश्यक रक्षा करनेके लिये कहा और बिल्लीसे बचा रखनेके लिये सौ सौ उपाय करने लगा। फिर भी निर्णीत दिनकी रातको उस बालकके सिरपर अर्गला (दरवाजेको बंद करनेके लिये लकडी या लोहेकी बनी हुई एक पट्टी) गिर जानेसे अचानक वह मर गया। फिर उस शोकशांकुसे उसका उद्धार करनेकी इच्छासे श्री भद्रबाहु उसके घर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उसके घरके आँगनमें ज्योतिषकी सभी पुस्तकें इकट्ठी करके जलानेके लिये रखी पड़ी हैं। तब उन्होंने पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो उस सांवत्सर (ज्योतिषी) ने बड़े दुःखके साथ, उन जैनमुनिको उपालंभ देते हुए कहा- 'ये पुस्तकें बड़े भारी मोहान्धकारको उत्पन्न करनेवाली हैं इसलिये अब निश्चय हीइन्हें जला दूंगा, क्यों कि इन्होंने मुझे धोकेमें डाला है'। उसके ऐसा कहनेपर अपने शास्त्रज्ञानके बलसे बालकका जन्मलग्न ठीक तरह निकाल कर उन्होंने सूक्ष्म दृष्टिसे उसका ग्रह-बल बताया तो वह बीस ही दिनका आया। इस प्रकार उसकी शास्त्रविरक्ति जब दूर की गई तो वह ज्योतिषी बोला कि-'आपने जो बिडालसे मृत्यु बताई वह तो ठीक नहीं साबीत हुई'। तब उन्होंने उस अर्गलाको वहाँ मँगवाई, जिसके गिरनेसे मृत्यु हुई थी, तो उसमें बिड़ालकी आकृति खुदी हुई पाई गई। 'क्या भवितव्यतामें भी कभी कुछ परिवर्तन हो सकता है?' ऐसे उस महर्षिने कहते हुए कहा कि- २६१. किस बातके लिये रोया जाय ? यह शरीर क्या चीज है ? ये परमाणु तो अविनाशी हैं। यदि संस्थान-विशेषके लिये ही शोक करना है, तब तो कभी भी प्रसन्न ही नहीं होना चाहिये। २६२. यह सब भाव (अस्तित्व) अमानोत्पन्न है और मायाके विभवसे सम्भावित है। इसका अन्त भी अभाव ही में संस्थित है। इस बातके ज्ञानसे सज्जनोंको भ्रम नहीं पैदा होता। -इस प्रकारकी युक्तिपूर्वक उक्तिसे उसे समता कर वे महर्षि अपने स्थानपर आये। इस तरह समझाये जाने- पर भी वह, मिथ्यात्व रूप धत्तूरके प्रभावसे सच्चे सुवर्णमें भ्रान्तिवाला हो कर, उनके प्रति द्वेषभाव धारण कर रहा। अत [ईर्ष्यावश] अभिचार कर्मसे, उनके भक्तों और उपासकोंमेंसे किसीको कष्ट पहुंचाने लगा और

प्रकरण २१९-२२० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४७ किसीको मारने लगा । अपने प्रौढ़ ज्ञानके द्वारा इन लोगोंका यह वृत्तान्त जान कर उन्होंने विघ्नकी शान्तिके लिये 'उवसग्गहरं पासं' इस नूतन स्तोत्रकी रचना की । इस तरह यह वराहमिहिर प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त । २२०) ढंक नामक पर्वत पर रहनेवाले रणसिंह नामक राजपूतको एक भूपल नामकी पुत्री थी जिसने अपने सौन्दर्यसे नागलोककी बालाओंको भी जीत लिया था । उसे देख कर वासुकि नागका उस पर अनुराग हो गया । उसने उसके साथ संभोग किया और उसमे नागार्जुन नामरू पुत्र पैदा हुआ । उस पाताल पाल (नाग) ने पुत्रस्नेहसे मोहित हो कर उसे सभी ओषधियोंके फल, मूल और पत्तोंका भक्षण कराया । इन ओषधियोंके प्रभावसे वह महासिद्धियोंसे अलङ्कृत हुआ । सिद्धपुरुष होनेके कारण पृथ्वी पर्यटन करता हुआ वह शातवाहन नृपतिके पास गया, जहाँ उसे राजाके कलागुरु होनेकी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । तो भी वह गगन-गामिनी विद्याका अध्ययन करनेकेलिये श्री पादलिप्ताचार्य के पास पादलिप्तपुर गया । निरभिमान हो कर उनकी सेवा करने लगा । भोजनके समय, पादलेपके द्वारा आकाशमें उड कर अष्टापद आदि तीर्थोको नमस्कार करके वे आचार्य वापस आये, तो उनके चरण धो कर रस, वर्ण और गन्धकी परीक्षासे उसमें १०७ महौषधियोंका होना उसने जाना । बादमें गुरुकी आज्ञाकी परवा न करके उसने स्वयं वैसा ही पादलेप किया। इससे मुर्गे और मोरकी नाई कुछकुछ उड़ता हुआ वह एक खड्डेमें गिर पडा और चोट लगनेसे उसका सारा शरीर जर्जरित हो गया । तब गुरुने पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो फिर उसने वह सब वृत्तान्त यथावत् निवेदन किया । उसकी इस चतुरतासे चकित हो कर उसके सिरपर अपना करकमल रखते हुए उन्होंने कहा कि- 'साठी चावलके पानीमें उन ओषधोंको मिलाकर पादलेप करो और इस तरह आकाश गामी बनो' । इस तरह उनके अनुग्रहसे उसे वह सिद्धि प्राप्त हुई । उन्हींके मुहसे यह भी सुना कि श्री पार्श्वनाथ की मूर्तिके सामने समस्त-खीलक्षणयुक्त पतिव्रताके हाथसे निर्गर्दित हो कर जो रस सिद्ध किया जाता है वह कोटिवेधी होता है । [उसने उस मूर्तिकी गवेषणा करते हुए जाना कि-] पूर्व कालमें समुद्र विजय दशार्ह (यादव) ने त्रिकालवेदी श्री नेमिनाथके मुखसे सुन कर, महातिशायी श्री पार्श्वनाथका एक रत्नमय बिंब निर्माण करके द्वारावती के प्रासादमें स्थापित किया था । द्वारावती के जलनेके बाद, जबसे वह पुरी समुद्रमें डूब गई तबसे, वह बिंब समुद्रमें वैसे ही विद्यमान रहा। बादमें देवताके प्रभावसे धनपति नामक जहाजी व्यापारीका जहाज टकराया । 'यहाँ पर एक जिनबिंब है' ऐसी देवताकी वाणी सुन कर धनपति ने वहीं नाविकोंको उसे निकालनेको कहा । उन्होंने सात कच्चे धागोंसे वार कर उसे बाहर निकाला और उसके प्रभावसे चिन्तितसे भी अधिक लाभ प्राप्त हुआ जान, उसे अपनी नगरीमें ले आकर अपने बनाये हुए प्रासादमें स्थापित किया । नागार्जुन ने उस सर्वोतिशायी बिंबको, अपने सिद्धरसकी सिद्धिके लिये चुरा कर, सेढी नदी के किनारे ला कर रखा । उस बिंबके सामने, श्री शातवाहन राजाकी एक मात्र पत्नी चन्द्रलेखा को, सिद्धयन्तरके द्वारा उडवा कर रोज उससे रसमर्दन करवाता । इस प्रकार यहाँ बारवार आने- जानेके कारण उसके साथ घनिष्ठ वधुभाव पैदा हो गया । इससे उसने नागार्जुन से इस रस-मर्दनका हेतु पूछा । उसने भी अपनी कल्पनासे कोटिवेध रसका यह यथावत् वृत्तान्त कहा और वर्णनातीत रूपसे उसका सम्मान करके उसके प्रति अनन्यसामान्य सौजन्य बताया । इसके बाद एक दिन उसने अपने पुत्रोंसे यह वृत्तान्त कहा । ये दोनों इसके लोभी होकर राज्यत्याग करके नागार्जुन द्वारा अलङ्कृत उस भूमिमें आ कर गुप्त वेश बना कर रहे । उस रसके ग्रहण करनेकी इच्छासे, जिसके यहाँ नागार्जुन भोजन किये करता था, उसे अर्थदान करके अपने

१४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश वशमें कर, उसकी बात पूछने लगे । यह भी इस बातके जाननेकी इच्छासे, नागार्जुनके लिये नमक ज्यादा देकर रसोई बनाती । इस तरह ६ महीना बीत जानेपर रसोईमें खारापनका अनुभव करते हुए नागार्जुनने उसका दोष निकाला । तब उसने इशारेसे उन्हें सूचित किया कि अब रस सिद्ध हो गया है। भानजे बने हुए इन लड़कोंने उस रसको उड़ा लेनेकी लालसासे,-परम्परा द्वारा यह जान कर कि वासुकिने इसका मृत्यु कुशके शस्त्रसे होना बताया है, उसी शस्त्रसे उसे मार डाला। पर वह रस तो सुप्रतिष्ठ देवताधिष्ठित होनेके कारण तिरोहित हो गया। जहाँ वह रस स्तंभित किया गया था वहीं पर स्तंभनक नामक श्री पार्श्वनाथका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जो रसको भी मात करनेवाला, सकल लोकका अभिलषित फलदाता है। बादमें कुछ कालके व्यतीत होनेपर यह मूर्ति, मुखमात्र जितने भागको छोड़ कर बाकी भूमिके अंदर दब गई। स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव । २२१) इसके अनन्तर, श्री अभयदेव सूरिने शासन देवताके आदेशसे, ६ महीनेतक माया रहित हो कर आचाम्लका व्रत करके, खड़िया (पट्टीपर लिखनेकी धोली मिट्टीकी डलिया) के प्रयोगसे जब नवाङ्ग वृत्तिकी रचना समाप्त की तो उनके शरीरमें भारी कुष्ठ रोग प्रादुर्भूत हो गया । तब पातालका पालक धरणेन्द्र नामक नागराज सफेद सर्पका रूप बना कर आया और उनके शरीरको जीभसे चाट कर उन्हें नीरोग किया । फिर श्रीमान् अभयदेव सूरिको उस तीर्थकी यात्राका उपदेश दिया । उन्होंने श्रीसंघके साथ वहाँ आ कर गोपाल बालकोंके द्वारा उस भूमिका पता लगाया, जहाँ एक गाय रोज दूधकी धारा छोड़े करती थी। वहाँ जा कर एक उत्तम ऐसे नये द्वात्रिंशतिका स्तवनकी रचना की। उसके ३३ वें पद्यकी रचना होनेपर श्री पार्श्वनाथका यह बिंब प्रकट हुआ । फिर देवताके कथनसे उन्होंने उस पद्यको गुप्त रखा । २६३. जो स्वामी, अपने जन्मके चार सहस्र वर्ष पूर्व ही इंद्र, वासुदेव और वरुणके द्वारा अपने वास स्थानपर पूजे गये, इसके बाद कान्ती के धनिक धनेश्वर द्वारा तथा फिर महान् नागार्जुन द्वारा जिनकी पूजा की गई, वे स्तंभनकपुरमें स्थित श्री पार्श्वनाथ जिन तुम्हारी रक्षा करें । इस प्रकार नागार्जुनकी उत्पत्ति तथा स्तंभनक तीर्थके अवतारका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन । २२२) प्राचीन कालमें, अवन्तिपुरीमें कोई ब्राह्मण पाणिनिव्याकरणके अध्यापनका कार्य करता था। वह नियमसे नित्य सिप्रानदीके तटपर स्थित चिन्तामणि गणेशको प्रणाम किये करता था। किसी समय विद्या- र्थियोंने फक्किका-व्याख्यान आदिके प्रश्नोंसे उसे उद्विग्न कर दिया था, इसलिये वर्षाकालमें जब वह नदी भर कर बह रही थी तो वह उसमें कूद पड़ा। दैवयोगसे एक उखड़े हुए वृक्षका मूल उसके हाथमें आ गया जिसका सहारा पा कर वह तीरपर पहुँच गया। वहाँपर साक्षात् परशुरामको देख कर प्रणाम किया। वे उसके उत्साहके ऐसे अनुष्ठानसे प्रसन्न हो कर बोले कि 'इच्छा हो सो मांगो'। उसने पाणिनिके व्याकरणका संपूर्ण रहस्यज्ञान मांगा। उन्होंने उसका देना स्वीकार किया और उसे 'खडिया' प्रदान की। उससे उसने प्रतिदिन व्याकरणकी व्याख्या बनानी शुरू की जो छह महिनेके अंतमें समाप्त हुई। फिर शीघ्र ही गणेशकी अनुज्ञा ले कर, उस प्रथम आदर्शके साथ, वह पुरीमें प्रविष्ट हुआ। [रातको] नगरके किसी एक महोलेके चौकमें बैठा ही बैठा सो गया। तब सबेरे उसे वहाँ उस तरह पड़ा देख किसी एक वेश्याकी दासियोंने, वेश्यासे उसका हाल कहा। उसने उन्हेंसे उसे मँगवा कर अपने हिंडोलेकी खाटपर रखवाया। तीन दिन और रातके बाद जब उसकी नींद कुछ कुछ खुली तो उस चित्रशालाकी आश्चर्यजनक चित्रकारीको देख कर वह अपनेको स्वर्गलोकमें उत्पन्न हुआ समझा। तब उस

प्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४९ वेश्याने सब वृत्तान्त कहा और स्नान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसभामें गया । वहा पर पाणिनि व्याकरण की यथास्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पंडितोंने उसका बड़ा सत्कार किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया । २२३) फिर उसके क्रमश चारों वर्णोंकी चार स्त्रियाँ हुईं । इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृहरि पुत्र हुआ । हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके संकेतसे भूमिगृहमें बैठा कर गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अन्य तीनों लड़कोंको प्रत्यक्ष (पासमें बैठा कर) पढ़ाया जाता था । उन्हें इस तरह पढ़ाते हुए- २६४. दान भोग और नाश-द्रव्यकी ये तीन गति हैं । [ और जो न देता है न भोग करता है उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति (नाश) होती है । ] यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरिने रज्जुका संकेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रों ने आगेके उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा-' अरे वेश्यापुत्र, अमी तक रस्सीको क्यों नहीं हिलाता ?' तब यह प्रत्यक्ष आ कर कुढ़ कर शास्त्रकी निंदा करता हुआ कहने लगा- २६५. सौ सौ प्रयास करके प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान ही गति हो सकती है । अन्य तो [गति नहीं] विपत्ति है । इस पाठसे [उन सबने] वित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरिने वैराग्यशतक आदि अनेक प्रबंध बनाये । इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * वाग्भट वैद्यका प्रबंध । २२४) धारानगरीमें, मालव मण्डल के भूषणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैद्य वाग्भट नामक था । उसने आयुर्वेदोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभावसे पहले रोग उत्पन्न किया और फिर सुश्रुत कथित पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानीके बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस बातकी परीक्षाके लिये जल छोड़ दिया । तीन दिनके बाद प्याससे तालु और ओठ सूख गये । तब उसने इस प्रकार कहा- २६६. कहीं गर्म, कहीं ठंडा, कहीं गर्म करके ठंडा किया हुआ और कहीं औषधके साथ [ इस प्रकार पानी सब हालतमें दिया जाता है] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है। इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पढ़ा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक ग्रंथ बनाया । उसका जामाता जो लघु बाहड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध बाहडके साथ राजमंदिरमें गया । सबेरे ही श्री भोजराजके शरीरकी देख भाल कर वृद्ध बाहड (वाग्भट) ने कहा कि-' आज आपका शरीर नीरोग है' । तो यह सुन कर लघु बाहडने मुह मरोडा । तब श्री भोज के उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि-' आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेषमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है, जो कृष्णाच्छायासे सूचित होता है'। इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय भाव बतला देनेके कारण राजा उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और व्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लाखके मूल्यसे बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके वह रसायन सिद्ध किया गया और सायंकाल कांचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके बिस्तरके पास रख दिया । सबेरे देवतार्चनके बाद राजाने जब वह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनकी पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई ।

An exact transcription of the text from the image is provided below:

पर उस लघु वैद्यने, किसी कारणवश, उस काचकी कुपीको भूमिपर पटक कर तोड़ दिया । राजाके यह कहनेपर कि 'अः यह क्या किया ?' उसने कहा- 'रसायनकी सुगन्धिसे ही व्याधि भाग गई है । अब व्याधिके अभावमें इस वातुक्षयकारी औषधका रखना व्यर्थ है । आज रात्रिके अन्तमें वह कृष्णच्छाया महाराजके शरीरको छोड कर कहीं दूर चली गई दिखाई दी है और इसमें खुद आप ही प्रमाण हैं' । उसके इस प्रत्यय (विश्वास) से सन्तुष्ट हो कर राजाने दरिद्रताको दूर करने वाला [भारी] पारितोषिक उसे दिया । २२५) इसके बाद, उन सभी व्याधियोंको उस वैद्यने भूतळसे नष्ट कर दिया। तब उन्होंने जा कर स्वर्ग लोकके वैद्य अश्विनी-कुमारोंसे अपना यह पराभव वृत्तान्त कहा। वे दोनों इस वृत्तान्तसे मनमें आश्चर्य-चकित हो कर नीळवर्णके पक्षीका रूप बना कर, व्याधियोंके लिये प्रतिभट जैसे लघु वाग्भट के धवलगृह (मकान) की खिड़कीके नीचे वलभी (टोंडे) पर बैठ कर 'कोऽरूक' (कौन नीरोग है ?) ऐसा शब्द बोले। उस आयुर्वेदज्ञने अपने समीपहीमें सुने जानेवाले इस शब्दको साभिप्राय समझ कर चिर कालतक उसका विचार करके कहा- २६७. अल्प शाक खानेवाला, चावलके साथ घी लेनेवाला, दूधके रसोंका व्यवहार करनेवाला, पानी ज्यादा नहीं पीनेवाला, प्रकृतिके विरुद्ध-वातकारक और विदाही (जलन पैदा करनेवाले) पदार्थोंको न खानेवाला, अस्थिर भावसे न खानेवाला, खाये हुएके जीर्ण होने (पच जाने) पर खानेवाला और अल्प भोजन करनेवाला 'अरुक्' अर्थात् नीरोग होता है। ऐसा सुन कर मनमें कुछ चकित हो कर वे चले गये। फिर दूसरे दिन, दूसरी वेलामें, उसी प्रकारका पक्षीका रूप बना कर, वैसा ही पुराना शब्द करते हुए, वे वैद्यके घर पर आये । फिर उनकी बातके उत्तरमें वैद्यने कहा- २६८. वर्षांमें जो स्थिर रहता है (अर्थात् यात्रा नहीं करता), शरत्कालमें पेय पदार्थोंका सेवन करता है, हेमन्त और शिशिरमें खूब भोजन करता है, वसन्तमें मदमस्त बनता है और ग्रीष्ममें [दिनको] शयन करता है, हे पक्षी, वही पुरुष नीरोग होता है। ऐसा कहनेपर वे फिर चले गये। तीसरे दिन, योगीका रूप बना कर उसके घर गये और वे बोले- २६९. हे वैद्य, वह कौनसी ऐसी औषधि है जो न पृथ्वीमें उत्पन्न होती है, न आकाशमें, न बाजारमें मिलती है, न पानीमें पैदा होती है; और फिर सर्व शास्त्रोंको सम्मत है। इसपर वैद्यने कहा- २७०. पृथ्वी या आकाशमें न होनेवाली, पथ्य तथा रसवर्जित ऐसी महौषधि पूर्वोचार्यों द्वारा बताई हुई लङ्घन (उपवास) रूप है। इस प्रकार अपने अभिप्रायके ठीक अनुकूल प्रत्युत्तर पा कर वे दोनों वैद्य चमत्कृत हुए और फिर प्रत्यक्ष हो कर यथामितम वर प्रदान कर अपने स्थानपर चले गये। इस प्रकार वैद्य वाग्भटका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई। २२६) धामणउत्ति ग्राममें बसनेवाला धारा नामक कोई नैगम (व्यवहारी), जो अपनी बस्तीमें देवरमण देवकी भी स्पर्द्धा करनेवाला था, सप्ताङ्गिनी हो कर, प्रचुर द्रव्यका व्यय करके जीर्णोद्धको मिटाता हुआ, अपने पाँच पुत्रोंके साथ, श्रीरैवतक गिरिकी उपत्यका (तलहट्टी) में जा कर विश्राम किया। दिगंबर संप्रदायके भक्त ऐसे गिरिनगरके राजाने, उसे श्वेतांबर भक्त समझ कर यात्रासे अटकाना

प्रकरण २२५-२२९ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १५१ चाहा। इस पर दोनोंके सैनिकोंमें लड़ाई छिड़ गई। असीम युद्धसे जूझते हुए, अतिप्रिय ऐसी देवभक्तिसे उत्साहित हो कर उसके पाँचों पुत्र, वहा मारे गये और वे मर कर पाँच क्षेत्रपाल हुए। उनके क्रमशः ये नाम हुए- १ कालमेघ, २ मेघनाद, ३ भैरव, ४ एकपद, और ५ त्रैलोक्यपाद। तीर्थके विरोधियोंको मृत्युके मुँह पहुँचाते हुए ये पाँचों विजयी हो कर पर्वतके चारों ओर वर्तमान हैं। २२७) फिर उनका धारा नामक पिता जो अकेला ही बच रहा था, उसने कान्यकुब्ज देशमें जा कर श्री बप्पभट्टसूरिके व्याख्यानके अवसरपर श्री संघकी आन दे कर यह कहा कि-' रैवतक तीर्थमें दिगंबरोंने अपनी वसति बना ली है और श्वेताम्बरोंको पाखंडी कह कर पर्वतपर चढ़ने नहीं देते हैं। इस लिये उनको जीतकर उस तीर्थका उद्धार कीजिये और अपने दर्शनकी प्रतिष्ठा करके तब फिर ये व्याख्यान दीजिए'। उसके ऐसे वचन रूप ईंधनसे जिनकी क्रोधरूप अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी वैसे वे आचार्य उस आम राजा को साथ ले कर, उसी श्रेष्ठीके साथ, पर्वतकी उपत्यकामें पहुँचे। सात दिनोंमें, वादस्थानमें दिगंबरोंको पराजित करके संघके सामने श्री अम्बिकाको प्रत्यक्ष किया। 'इक्कोवि नमुक्कारो' और 'उज्जिन्तसेलसिहरे' ये दो गाथायें अम्बिकाके मुखसे सुन कर सितांबर दर्शनकी प्रतिष्ठा सिद्ध हुई और फिर वे पराजित दिगंबर 'बला- नक मंडपसे' झम्पापात करके नीचे गिर पड़े। इस प्रकार यह क्षेत्राधिपोत्पत्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। * सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना। २२८) एक बार, भवानीने शिवसे पूछा कि-'तुम कितने कार्पटिकोंको राज्य देते रहते हो!'-उसके ऐसा पूछनेपर [शिवने कहा-] 'इन लाखों यात्रियोंमें जो कोई एक पूरा भक्ति-परायण होता है उसीको मैं राज्य देता हूं'। इस बातकी परीक्षाके लिये, गौरी (पार्वती)को पंगुमग्न बूढ़ी गाय बना कर और स्वयं मनुष्यरूप धारण कर, शिवजी तटस्थ खड़े रहे और कीचड़मेंसे गायका उद्धार करनेके लिये पथिकोंको बुलाने लगे। वे सब लोग तो सोमेश्वर नजदीक होनेसे उसके दर्शनके लिये बड़े उत्कंठित थे, इसलिये उन्होंने उसका उपहास किया। पर पथिकोंका कोई एक दल कृपालु हो कर उसके उद्धारका प्रयत्न करने लगा तो शिवजी सिंहरूप धारण करके उन्हें डराने लगे। तब उनमेंसे एक ही ऐसा पथिक निकला जो मृत्युकी भी परवा न करके उस गायके समीप पहुँचा। उसीको अडग बतला करके शिवने पार्वतीको बताया कि वही एक राज्यके योग्य है। इस प्रकार यह वासनाका प्रबंध समाप्त हुआ। * पूर्वजन्मका किया भोगना। २२९) सोमेश्वर की यात्राको जाता हुआ एक कार्पटिक रास्तेमें किसी लोहारके घर सोया। उस लोहारकी स्त्रीने अपने पतिको मार कर कृपाणिकाको उस कार्पटिकके सिरहाने रख दी और फिर चिल्लाने लगी। आरक्षक (राज्यके सिपाही) ने वहाँ आ कर उस अपराधीके हाथ काट डाले। इसमे वह सदैव उस देवको उपालंभन दिया करता। एक रातको देव प्रत्यक्ष हो कर बोला-'तुम अपने पूर्व-जन्मकी बात सुनो। एक बार दो भाइयोंमेंसे एकने एक बकरीके दोनों हाथोंसे कान पकड़े और दूसरेने उसे मार डाला। उसके बाद यह बकरी मर कर यह स्त्री हुई। जिसने इसे मारा था वह इस समय इसका पति हुआ। तुमने जो इसके कान पकड़े थे, इससे तुम्हारा समागम होनेपर, तुम्हारे हाथ काटे गये। सो इसमें मुझे क्यों उपालंभ देते हो!' इस प्रकार यह कृपाणिका-प्रबंध समाप्त हुआ। *

१५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश जिनपूजाका माहात्म्य । २३०) प्राचीन कालमें, शखपुर नामक नगरमें शंख नामका राजा था। वहाँ पर, नाम और कर्म दोनोंहीसे 'धनद' (धन देने वाला) नामका एक सेठ था। उसने एक बार सोचा कि लक्ष्मी हाथीके समान चंचल है, अतः वह हाथमें उपहार ले कर राजाके पास आया और उसे संतुष्ट किया। राजाकी दी हुई भूमिमें, अपने चार पुत्रोंके साथ सलाह करके, शुभलग्नमें उसने एक जिनमंदिर बनवाया। उसमें, प्रतिष्ठित बिंबोंकी स्थापना करके उस प्रासादके व्यय-निर्वाहके लिये आमदनीके अनेक मद कायम किये। उसकी पूजाके लिये अनेक पुष्प, वृक्ष, लता आदिसे अलंकृत एक सुंदर बगीचा बनवा दिया और उसके कार्यचिन्तक गोष्ठिक नियुक्त किये। इसके अनन्तर, पूर्वकृत दुष्कर्मके फलके उदयसे क्रमशः उसकी लक्ष्मी घट गई और वह कर्जदार हो गया। मान- प्रतिष्ठाके म्लान हो जानेके कारण वह किसी गाँवमें जा कर रहने लगा। नगरमें जा-आ कर लड़के जो कुछ पैदा करते उसीपर गुजर करता हुआ वह काल व्यतीत करने लगा। एक बार, जब चातुर्मासिक पर्व निकट आया तो वहाँ जानेवाले पुत्रोंके साथ वह धनद भी शंखपुर पहुँचा। वहाँ अपने बनाये हुए प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ते, उसके उद्यानकी पुष्प चुननेवाली ( माळिन ) ने उसे फूलोंकी डाली भेंट की। परमानंद निर्भर हो कर उसीसे उसने जिनेंद्रकी पूजा की। रातमें गुरुके सामने अपनी दुरवस्थाकी बड़ी निंदा करने लगा। तब उन्होंने उसे कपर्दी यक्षका आराधन करनेके लिये मंत्र दिया। फिर एक कृष्ण चतुर्दशीकी रातको उस मंत्रकी आराधना करके कपर्दी यक्षको प्रत्यक्ष किया। गुरुके उपदेशानुसार उससे, चातुर्मासिक दिनके अवसर पर जो पुष्प-चतुःसरिका (फूलकी चौसरी छड़ी) से जिनेशकी पूजा की थी उसके पुण्यफलकी याचना की। उसने कहा कि—'एक फूलकी पूजाका पुण्यफल भी, बिना सर्वज्ञके, मैं देनेमें असमर्थ हूँ'। फिर भी उस कपर्दी यक्षने, उस साधार्मिकके प्रति अतुल्य वात्सल्यभाव धारण करके, उसके घरके चारों कोनोंमें, सुवर्णपूर्ण चार कलश निधिरूपमें रख दिये, और वह तिरोहित हो गया। प्रातः काल वह अपने घर आया और धर्मकी निंदा करनेवाले उन पुत्रोंको वह धन समर्पण किया। वे भी आग्रहके साथ पितासे उस धनलाभका कारण पूछने लगे। इसपर, उनके हृदयमें धर्मके प्रभावका आविर्भाव करनेके लिये, जिनपूजाके प्रभावसे संतुष्ट हुए कपर्दी यक्ष द्वारा, इस संपत्तिके प्राप्त होनेकी बात कह सुनाई। वे भी सम्पत्ति पा कर फिर उसी जन्मस्थानमें जा कर रहे और अपने धर्मस्थानोंका व्ययनिर्वाह करने लगे। फिर विविध भाँति जिन शासनकी प्रभावना करते हुए वे विधर्मियोंके मनोंमें भी जैन धर्मके प्रभावको स्थापित करते रहे। इस प्रकार जिनपूजा संबंधी यह धनदका प्रबंध समाप्त हुआ। * श्री मेरुतुंगाचार्य विरचित प्रबन्धचिन्तामणिमें, विक्रमादित्यके कहे हुए पात्रविवेचनसे ले कर जिनपूजासंबंधी धनदके प्रबंध तकका वर्णनवाला, यह प्रकीर्णनामक पाँचवाँ प्रकाश समर्थित हुआ। [ इस प्रकाशकी ग्रन्थसंख्या ७७४ है। समग्र ग्रन्थकी श्लोक सख्या ३१५० है ]

ग्रन्थकारकी प्रशस्ति । बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे, तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटनरूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है ॥ १ ॥ यह, प्रबन्धसंग्रहरूप चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशंसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है। सो इस ग्रन्थके अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति (विष्णु) की नाईं शोभित होते हैं ॥ २ ॥ मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका संकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है। पण्डित लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥ ग्रहों रूपी कौड़ियोंसे जब तक द्युलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रन्थ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥ विक्रमादित्य संवत्‌के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह ग्रन्थ समाप्त हुआ॥ ५॥ [ गद्यमें फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५ रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्धमान (काठियावाडके आधुनिक वढवान नगर) में यह प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थ समाप्त किया गया। ————:o:———— परिशिष्ट कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सम्बन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध* श्रीमान् हेमचन्द्रके समान तो गुरु और श्रीमान् कुमारपालके समान जिनभक्त राजा न तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥ १ ॥ प्रभु श्री हेमाचार्यके पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो हिंसाका निवारण किया था उसका [ रूपकात्मक ] प्रबन्ध इस प्रकार है — एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री कुमारपाल नामक राजाने, घुड़दौड़ की क्रीड़ा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने सौन्दर्यसे सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख बाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था। यद्यपि वह

  • टिप्पणी—यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध, इस ग्रन्थकी बहुसंख्यक पोथियोंमें लिखा हुआ मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है—पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रबन्ध है इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें ग्रन्थके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है। कुमारपालने अपने धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्रसूरिके पास जैनधर्मकी गृहस्थ दीक्षा (श्रावकधर्मव्रत) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार किया, उस समयको लक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबन्धका प्रणयन किया गया है। इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो आचार्य हेमचन्द्रके आश्रममें पलकर बड़ी रूपवती - सुकुमारी हो गई है। अन्यान्य राजाओंके अधार्मिक आचरण देख कर यह किसीके साथ विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्मभावसे मुग्ध हो कर, आचार्यके आदेशसे यह उसका पाणिग्रहण कर लेती है—बस यही इस प्रबन्धका सारांश है। ३९

१५४ ] प्रबन्धचिन्तामणि सदाचार-प्रसरण-शीला थी फिर भी धीमी चालसे चलनेवाली थी । वह मुनियोंके साथ क्रीड़ा किया करती थी । अपनी सुकोमल वाणीके प्रपञ्चसे उसने त्रैलोक्यको चमत्कृत कर दिया था, और उसकी आकृति मन्द मुसकानसे खूब मधुर हो रही थी। इस बालिकाको देख कर उसके रूपसे हत-चित्त हो कर राजाने किसी निकटस्थ प्रसन्नचित्त (साधुजन) से पूछा कि- ' भला यह लड़की कौन है ?' उसने कहा कि-' अपार ऐसे शास्त्र-सागरके पारको देख लेनेके कारण जिन्होंने ' कलिकाल सर्वज्ञ' की प्रसिद्धि प्राप्त की है; द्वादश भेदोंवाली तपस्याकी आराधनाके द्वारा, अष्ट महासिद्धियोंको जिन्होंने वशमें कर लिया है; समग्र भूपालोंके शिर प्रदेशकी मणियोंने जिनके चरणोंका चुम्बन किया है; उन्हीं महर्षि भगवान् आचार्य श्री हेमचन्द्रके आश्रममें रहनेवाली यह अहिंसा नामक कन्या है। इसके यथार्थ रूपका निरूपण करनेमें स्मृति और पुराणके वचन तो पर्याप्त नहीं है, किन्तु समस्त जन्तुओंके पितृ-स्वरूप श्री जिनेन्द्र देवके उपदिष्ट स्पष्ट सिद्धान्तों और उपनिषदों द्वारा आभासित हृदयवाले किसी मुनिश्रेष्ठने इसकी स्थितिकी रीतिका पूरा निरूपण किया है - अन्य किसीने वैसा नहीं किया। यह वचन सुन कर राजा अपने आवासमें लौट आया। पर उस कन्याका स्वरूप जान कर, उसका अङ्गीकार करनेके लिये परम उत्सुक वह राजा, उसके पाणिग्रहणके द्वारा अपनी भाग्य-सम्पद आदिको कृतार्थ करनेकी कामनासे, अपने 'विवेक' नामक परम मित्रके बताये हुए मार्गसे उन मुनियोंके आश्रममें जा पहुंचा। उस कन्याके सामने उसीका 'सदाचार' नामक भाई खेल रहा था। उसीने जा कर सम-चित्तवृत्तिवाले महर्षि श्री हेमचन्द्र सूरिको राजाके आगमनका वृत्तान्त बतलाया। राजाने पृथ्वीतलपर मस्तक टेक कर, उन्हें भक्ति और हर्षके साथ, प्रणाम किया और फिर उस कन्याका स्वरूप पूछा। इस पर वे बोले-' हे नरपुंगव ! सुनो, त्रैलोक्यके एकमात्र सम्राट् श्री अर्हद्धर्मकी पट्ट महादेवी श्रीमती अनुकंपा देवीके कुक्षि सरोवरकी राजहंसी जैसी, नि सीम सुन्दरी यह 'अहिंसा' नामक कन्या है। जिस लग्नमें यह कन्या पैदा हुई थी उस लग्नके प्रभावको इसके सर्वज्ञ पिताने इस प्रकार निर्दिष्ट किया था-' यह अतीव पुण्यवती, सुदतियोंकी शिरोमणि कन्या है। पुत्रजन्मोत्सवसे भी अधिक प्रशंसनीय इसका जन्म है। क्यों कि- लक्ष्मी [ रूप कन्यासे] समुद्रको और वाग्देवी [ रूप कन्यासे] ब्रह्माको निष्कृत देख कर, कुपुत्रके दु खसे सूर्य और चन्द्रमा ताप और कलंकका त्याग नहीं करते हैं ॥ २ ॥ इस लिये क्रमशः बढ़ती हुई यह कन्या अपने अनुरूप वर न पानेके कारण वृद्ध-कुमारी हो जाने पर किसी अनुरूप राजासे साग्रह विवाहित होगी। इस प्रकार सतियोंमें श्रेष्ठ यह कन्या अपने पति और पिता दोनोंको उन्नतिकी पराकाष्ठापर पहुँचा देगी। और इससे विवाह करनेवाला वह पुरुष भी खेलहीमें महा-मोह नामक राजाको जीत कर परमानन्दका भाजन बनेगा।' यह सुन कर राजा बोला- 'प्रभो ! यह अर्हद्धर्मकी पुत्री इस समय आपके ही चरण कमलोंकी उपासना करती है, अतः इसका विवाह आपकीके कहनेसे होगा, अन्य किसीसे नहीं। सो पूज्य-पाद मुझपर प्रसन्न हों, विषादगण विषण्ण हों, महामोहका विजय करना प्रारम्भ हो, और [ उससे ] मैं परमानन्द प्राप्त करूँ।' उसके इस कथनके बाद गुरु बोले-' यह वृद्धा कुमारी है, इसका सङ्कल्प दुष्पूरणीय है। यह सङ्कल्प इसीके मुँहसे सुन कर विवाह करना चाहिये, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार उनकी अमृतकी जैसी वह वाणी सुन कर, उसने कन्याके पास सुबुद्धि नामक दासी भेज कर उसे बुलवाया। वह दासी उस कन्याके पास जा कर भक्ति-पूर्वक प्रणाम करके बोली-'स्वामिनि, राजकन्ये, [ आज ] तुम धन्यतमा हो, जो तुम्हें, अठारह देशोंके सम्राट्, और समस्त सामन्तोंके मस्तक-मणिक्योंकी किरण मालासे जिनका चरण अलंकृत है वह चौलुक्य-चक्रवर्ती तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं।' उसकी इस बातसे कुछ मुँह बना कर, उपहासके उल्लासके साथ, उसने कहा-' सखि, जिस महान् साम्राज्यका अन्त नरक है उसके लोभकी बातका विस्तार

कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध [ १५५ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ । पुरुष प्रायः परुष आशयवाले, और नाना प्रकारके अनुरागवाले होते हैं; उनसे मेरा क्या काम है । क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे विडंबित होना [ अच्छा ] नहीं ॥ ३ ॥ पर सुनो, - अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर ( बड़े धनसंपन्न ) से भी नहीं प्राप्त होता । [ देखो न ] भागीरथी ( गंगा ) को शिव तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति ( विष्णु ) उसे पैरसे भी नहीं छूने ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलाषा तो वृथा ही समझो । क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी पूरा होना कठिन है ।' ऐसा कहनेवाली उस युवतीसे वह (दासी) बोली-' सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी हूँ, कुछ अपडाप तो करनेकी नहीं; सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ । मेरा भी नाम सुबुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊँगी ।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट, [ ऐसा जो पुरुष होगा ] वही मेरा पति होगा ॥ ५ ॥ दुर्गतिके बन्धु जैसे द्यूत स्वभाववाले सात पुरुषों (अर्थात्, सात व्यसनों) को जो अपने चित्तसे दूर निकाल फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥ ६ ॥ मेरे सहोदर भाई सदाचारको अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा वही मेरा पति होगा ॥ ७ ॥ उसकी इस बातको सुन कर वह बोली-' ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा (सुबुद्धि) तब हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करनेके लिये, श्री हेमसूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्थोंका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तभी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी बीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी समीपमें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई । उसकी इस अवज्ञामयी प्रतिज्ञाके कठोर भावसे हृदयमें सन्तप्त हो कर राजा बड़ी बेचैनी धारण करने लगा । तब सुबुद्धिने कहा-' हे श्रीनिधे ! धीरज धरो, पौरुष-शालियोंको दुष्कर क्या है ? और इस बाधाके दूर करनेके उपाय भी तो हैं । महर्षि हेमचन्द्रका अनुसरण करो और उनका उपदेश सुनो !' इस प्रकार उसकी बात सुन कर विनयका सहारा पा कर यह राजा सूरिके पास गया । उनके पद-पद्मोंपे प्रणाम कर उनकी कन्याकी उस प्रतिज्ञाका वृत्तान्त कहा । [ सूरि बोले-] ' वत्स ! यदि परिणयनकी चाह है तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो । यह कन्या अपने पतिकी निःसीम उन्नतिके लिये होगी । क्यों कि- उत्तम वंशोत्पन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कौन प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता ! लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप ( कृष्ण ) और उग्र ( शिव ) ने जिस तरह [ प्रतिष्ठा ] पाई थी । ॥ ८ ॥ उनकी यह बात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेवाली ऐसी हस्तावलम्बी किये हुए उस राजाने, अनेक प्रकारके अभिग्रह धारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राप्त किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । सं० १२१६ मार्गशीर्ष सुदि द्वितीयाको, बलवान् लग्नमें, संवेग नामक हाथीपर आरूढ हो, रत्नत्रयसे अलंकृत, शुभमनरूप वस्त्र धारण करके, दक्षिण हस्तमें कंकण बाँध कर, यह [हेमसूरिकी] पौषधशालाके द्वारपर आया । उस समय श्वेतच्छत्र द्वारा उसका आतप निवारण किया जा रहा था; श्रद्धा नामक बहन उसकी चरण-आरती उतार रही थी;

१५६ ] प्रबन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ वरातिन बन कर मंगल गान कर रहीं थीं; अमारि-घोषणाके पटह बज रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिषसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था; पापरूप कचरेको दूर हटाया जा रहा था; सद्बोध पुष्पोंसे सन्मार्गकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं; तब कन्याकी माँ अनुकंपा महादेवी ने श्रीअर्हन् के साक्षी रहते प्रोक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका- पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेळुक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवांगवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक ग्रन्थपरिमाण, हेम सूरिकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामक शास्त्र स्थापित किया गया। वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक (कोडियों) के स्थापनकी जगह; वीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये। शमी काष्ठके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र ग्रन्थ स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हेम सूरिके अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई। मूलगुण और उत्तर गुणोंसे इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और 'चत्तारिमंगल' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोंकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्थात् निःसन्तान विधवा स्त्रियोंके राज्यग्राह्य धन) का त्याग करने रूप दान किया। उसी समय उसका पट्टबन्ध किया गया (-उसे पट्ट महादेवी बनाया गया), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा (जो राजाकी पूर्वपत्नी थी) अपनी सौत अहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई। बहुत दिन बाद देखनेके कारण तथा पराभवके दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- 'सुंदरी ! तुम कौन हो ? '- 'हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं।' -'तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है ? '-' पराभवके कारण। '-' वह (पराभव) किससे हुआ ? '- ' क्या बताऊं ! 'कहो न '- 'हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपतिने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वितलसे निकाल दिया ॥ ९ ॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा बोले कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक्त हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है; तो फिर मैं अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालूँगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो'-यह कह कर उसे अपने समीप रखा। अहिंसा देवीके साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव करता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा। इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमकी प्रसादपूर्ण क्रीड़ा- ओंका स्मरण करती हुई यह अहिंसा देवी भी, कलिमलिन जनोंके पापस्पर्शका परिहार करनेकी इच्छासे, उसके साथ 'सहगमन' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध समाप्त हुआ। -:०:-