भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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१४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश वशमें कर, उसकी बात पूछने लगे । यह भी इस बातके जाननेकी इच्छासे, नागार्जुनके लिये नमक ज्यादा देकर रसोई बनाती । इस तरह ६ महीना बीत जानेपर रसोईमें खारापनका अनुभव करते हुए नागार्जुनने उसका दोष निकाला । तब उसने इशारेसे उन्हें सूचित किया कि अब रस सिद्ध हो गया है। भानजे बने हुए इन लड़कोंने उस रसको उड़ा लेनेकी लालसासे,-परम्परा द्वारा यह जान कर कि वासुकिने इसका मृत्यु कुशके शस्त्रसे होना बताया है, उसी शस्त्रसे उसे मार डाला। पर वह रस तो सुप्रतिष्ठ देवताधिष्ठित होनेके कारण तिरोहित हो गया। जहाँ वह रस स्तंभित किया गया था वहीं पर स्तंभनक नामक श्री पार्श्वनाथका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जो रसको भी मात करनेवाला, सकल लोकका अभिलषित फलदाता है। बादमें कुछ कालके व्यतीत होनेपर यह मूर्ति, मुखमात्र जितने भागको छोड़ कर बाकी भूमिके अंदर दब गई। स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव । २२१) इसके अनन्तर, श्री अभयदेव सूरिने शासन देवताके आदेशसे, ६ महीनेतक माया रहित हो कर आचाम्लका व्रत करके, खड़िया (पट्टीपर लिखनेकी धोली मिट्टीकी डलिया) के प्रयोगसे जब नवाङ्ग वृत्तिकी रचना समाप्त की तो उनके शरीरमें भारी कुष्ठ रोग प्रादुर्भूत हो गया । तब पातालका पालक धरणेन्द्र नामक नागराज सफेद सर्पका रूप बना कर आया और उनके शरीरको जीभसे चाट कर उन्हें नीरोग किया । फिर श्रीमान् अभयदेव सूरिको उस तीर्थकी यात्राका उपदेश दिया । उन्होंने श्रीसंघके साथ वहाँ आ कर गोपाल बालकोंके द्वारा उस भूमिका पता लगाया, जहाँ एक गाय रोज दूधकी धारा छोड़े करती थी। वहाँ जा कर एक उत्तम ऐसे नये द्वात्रिंशतिका स्तवनकी रचना की। उसके ३३ वें पद्यकी रचना होनेपर श्री पार्श्वनाथका यह बिंब प्रकट हुआ । फिर देवताके कथनसे उन्होंने उस पद्यको गुप्त रखा । २६३. जो स्वामी, अपने जन्मके चार सहस्र वर्ष पूर्व ही इंद्र, वासुदेव और वरुणके द्वारा अपने वास स्थानपर पूजे गये, इसके बाद कान्ती के धनिक धनेश्वर द्वारा तथा फिर महान् नागार्जुन द्वारा जिनकी पूजा की गई, वे स्तंभनकपुरमें स्थित श्री पार्श्वनाथ जिन तुम्हारी रक्षा करें । इस प्रकार नागार्जुनकी उत्पत्ति तथा स्तंभनक तीर्थके अवतारका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन । २२२) प्राचीन कालमें, अवन्तिपुरीमें कोई ब्राह्मण पाणिनिव्याकरणके अध्यापनका कार्य करता था। वह नियमसे नित्य सिप्रानदीके तटपर स्थित चिन्तामणि गणेशको प्रणाम किये करता था। किसी समय विद्या- र्थियोंने फक्किका-व्याख्यान आदिके प्रश्नोंसे उसे उद्विग्न कर दिया था, इसलिये वर्षाकालमें जब वह नदी भर कर बह रही थी तो वह उसमें कूद पड़ा। दैवयोगसे एक उखड़े हुए वृक्षका मूल उसके हाथमें आ गया जिसका सहारा पा कर वह तीरपर पहुँच गया। वहाँपर साक्षात् परशुरामको देख कर प्रणाम किया। वे उसके उत्साहके ऐसे अनुष्ठानसे प्रसन्न हो कर बोले कि 'इच्छा हो सो मांगो'। उसने पाणिनिके व्याकरणका संपूर्ण रहस्यज्ञान मांगा। उन्होंने उसका देना स्वीकार किया और उसे 'खडिया' प्रदान की। उससे उसने प्रतिदिन व्याकरणकी व्याख्या बनानी शुरू की जो छह महिनेके अंतमें समाप्त हुई। फिर शीघ्र ही गणेशकी अनुज्ञा ले कर, उस प्रथम आदर्शके साथ, वह पुरीमें प्रविष्ट हुआ। [रातको] नगरके किसी एक महोलेके चौकमें बैठा ही बैठा सो गया। तब सबेरे उसे वहाँ उस तरह पड़ा देख किसी एक वेश्याकी दासियोंने, वेश्यासे उसका हाल कहा। उसने उन्हेंसे उसे मँगवा कर अपने हिंडोलेकी खाटपर रखवाया। तीन दिन और रातके बाद जब उसकी नींद कुछ कुछ खुली तो उस चित्रशालाकी आश्चर्यजनक चित्रकारीको देख कर वह अपनेको स्वर्गलोकमें उत्पन्न हुआ समझा। तब उस