भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 181 में से

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प्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४९ वेश्याने सब वृत्तान्त कहा और स्नान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसभामें गया । वहा पर पाणिनि व्याकरण की यथास्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पंडितोंने उसका बड़ा सत्कार किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया । २२३) फिर उसके क्रमश चारों वर्णोंकी चार स्त्रियाँ हुईं । इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृहरि पुत्र हुआ । हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके संकेतसे भूमिगृहमें बैठा कर गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अन्य तीनों लड़कोंको प्रत्यक्ष (पासमें बैठा कर) पढ़ाया जाता था । उन्हें इस तरह पढ़ाते हुए- २६४. दान भोग और नाश-द्रव्यकी ये तीन गति हैं । [ और जो न देता है न भोग करता है उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति (नाश) होती है । ] यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरिने रज्जुका संकेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रों ने आगेके उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा-' अरे वेश्यापुत्र, अमी तक रस्सीको क्यों नहीं हिलाता ?' तब यह प्रत्यक्ष आ कर कुढ़ कर शास्त्रकी निंदा करता हुआ कहने लगा- २६५. सौ सौ प्रयास करके प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान ही गति हो सकती है । अन्य तो [गति नहीं] विपत्ति है । इस पाठसे [उन सबने] वित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरिने वैराग्यशतक आदि अनेक प्रबंध बनाये । इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * वाग्भट वैद्यका प्रबंध । २२४) धारानगरीमें, मालव मण्डल के भूषणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैद्य वाग्भट नामक था । उसने आयुर्वेदोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभावसे पहले रोग उत्पन्न किया और फिर सुश्रुत कथित पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानीके बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस बातकी परीक्षाके लिये जल छोड़ दिया । तीन दिनके बाद प्याससे तालु और ओठ सूख गये । तब उसने इस प्रकार कहा- २६६. कहीं गर्म, कहीं ठंडा, कहीं गर्म करके ठंडा किया हुआ और कहीं औषधके साथ [ इस प्रकार पानी सब हालतमें दिया जाता है] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है। इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पढ़ा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक ग्रंथ बनाया । उसका जामाता जो लघु बाहड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध बाहडके साथ राजमंदिरमें गया । सबेरे ही श्री भोजराजके शरीरकी देख भाल कर वृद्ध बाहड (वाग्भट) ने कहा कि-' आज आपका शरीर नीरोग है' । तो यह सुन कर लघु बाहडने मुह मरोडा । तब श्री भोज के उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि-' आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेषमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है, जो कृष्णाच्छायासे सूचित होता है'। इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय भाव बतला देनेके कारण राजा उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और व्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लाखके मूल्यसे बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके वह रसायन सिद्ध किया गया और सायंकाल कांचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके बिस्तरके पास रख दिया । सबेरे देवतार्चनके बाद राजाने जब वह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनकी पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई ।

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