भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

An exact transcription of the text from the image is provided below:

पर उस लघु वैद्यने, किसी कारणवश, उस काचकी कुपीको भूमिपर पटक कर तोड़ दिया । राजाके यह कहनेपर कि 'अः यह क्या किया ?' उसने कहा- 'रसायनकी सुगन्धिसे ही व्याधि भाग गई है । अब व्याधिके अभावमें इस वातुक्षयकारी औषधका रखना व्यर्थ है । आज रात्रिके अन्तमें वह कृष्णच्छाया महाराजके शरीरको छोड कर कहीं दूर चली गई दिखाई दी है और इसमें खुद आप ही प्रमाण हैं' । उसके इस प्रत्यय (विश्वास) से सन्तुष्ट हो कर राजाने दरिद्रताको दूर करने वाला [भारी] पारितोषिक उसे दिया । २२५) इसके बाद, उन सभी व्याधियोंको उस वैद्यने भूतळसे नष्ट कर दिया। तब उन्होंने जा कर स्वर्ग लोकके वैद्य अश्विनी-कुमारोंसे अपना यह पराभव वृत्तान्त कहा। वे दोनों इस वृत्तान्तसे मनमें आश्चर्य-चकित हो कर नीळवर्णके पक्षीका रूप बना कर, व्याधियोंके लिये प्रतिभट जैसे लघु वाग्भट के धवलगृह (मकान) की खिड़कीके नीचे वलभी (टोंडे) पर बैठ कर 'कोऽरूक' (कौन नीरोग है ?) ऐसा शब्द बोले। उस आयुर्वेदज्ञने अपने समीपहीमें सुने जानेवाले इस शब्दको साभिप्राय समझ कर चिर कालतक उसका विचार करके कहा- २६७. अल्प शाक खानेवाला, चावलके साथ घी लेनेवाला, दूधके रसोंका व्यवहार करनेवाला, पानी ज्यादा नहीं पीनेवाला, प्रकृतिके विरुद्ध-वातकारक और विदाही (जलन पैदा करनेवाले) पदार्थोंको न खानेवाला, अस्थिर भावसे न खानेवाला, खाये हुएके जीर्ण होने (पच जाने) पर खानेवाला और अल्प भोजन करनेवाला 'अरुक्' अर्थात् नीरोग होता है। ऐसा सुन कर मनमें कुछ चकित हो कर वे चले गये। फिर दूसरे दिन, दूसरी वेलामें, उसी प्रकारका पक्षीका रूप बना कर, वैसा ही पुराना शब्द करते हुए, वे वैद्यके घर पर आये । फिर उनकी बातके उत्तरमें वैद्यने कहा- २६८. वर्षांमें जो स्थिर रहता है (अर्थात् यात्रा नहीं करता), शरत्कालमें पेय पदार्थोंका सेवन करता है, हेमन्त और शिशिरमें खूब भोजन करता है, वसन्तमें मदमस्त बनता है और ग्रीष्ममें [दिनको] शयन करता है, हे पक्षी, वही पुरुष नीरोग होता है। ऐसा कहनेपर वे फिर चले गये। तीसरे दिन, योगीका रूप बना कर उसके घर गये और वे बोले- २६९. हे वैद्य, वह कौनसी ऐसी औषधि है जो न पृथ्वीमें उत्पन्न होती है, न आकाशमें, न बाजारमें मिलती है, न पानीमें पैदा होती है; और फिर सर्व शास्त्रोंको सम्मत है। इसपर वैद्यने कहा- २७०. पृथ्वी या आकाशमें न होनेवाली, पथ्य तथा रसवर्जित ऐसी महौषधि पूर्वोचार्यों द्वारा बताई हुई लङ्घन (उपवास) रूप है। इस प्रकार अपने अभिप्रायके ठीक अनुकूल प्रत्युत्तर पा कर वे दोनों वैद्य चमत्कृत हुए और फिर प्रत्यक्ष हो कर यथामितम वर प्रदान कर अपने स्थानपर चले गये। इस प्रकार वैद्य वाग्भटका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई। २२६) धामणउत्ति ग्राममें बसनेवाला धारा नामक कोई नैगम (व्यवहारी), जो अपनी बस्तीमें देवरमण देवकी भी स्पर्द्धा करनेवाला था, सप्ताङ्गिनी हो कर, प्रचुर द्रव्यका व्यय करके जीर्णोद्धको मिटाता हुआ, अपने पाँच पुत्रोंके साथ, श्रीरैवतक गिरिकी उपत्यका (तलहट्टी) में जा कर विश्राम किया। दिगंबर संप्रदायके भक्त ऐसे गिरिनगरके राजाने, उसे श्वेतांबर भक्त समझ कर यात्रासे अटकाना