प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १३ ] सातवाहन राजका प्रबन्ध [ १३
[ हारका वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] ११. खूब पुष्ट और ऊंचे उठे हुए स्तनोंवाली स्त्रीके वक्षस्थलपर रहा हुआ [ मोतीयोंका ] हार स्थिर होकर रहनेकी ठीक जगह न मिलनेसे छातीपर उद्विग्न अथवा उन्मुख होकर इधर उधर फिरता रहता है—जैसे यमुना नदीके प्रवाहमें पानीके फेनके बुद्बुदे इधर उधर फिरते रहते हैं। [ 'वेणीदण्ड 'का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १२. हे सुन्दरि, तेरा यह कृष्णकांति वेणीदण्ड नितम्ब-बिम्बपर जो शोभ रहा है वह मानों ऐसा लगता है कि सुरतस्थानरूप महानिधिकी रक्षा करनेवाला कोई भुजंग है। [ 'खट्वोद्गालि'के वर्णनवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १३. सुरत-संभोगके समय जो संतोपदायक सुंदर सुखानुभव हुआ, उसका विरह होनेसे, हे प्रिय सखि ! यह खाट चूं चूं ऐसा शब्द कर रही है। [ 'ताल' का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १४. हे शुक ! तूं इसे चांचके लगाने-ही-से गिर जानेवाला पका हुआ. आम्रफल मत समझ । यह तो जरठ हो जानेसे बेस्वादवाला और उभडा हुआ तालफल है । [ दूसरा गाथा-पंचक है उसमें 'कदली वृक्ष', 'विन्ध्य गिरी', 'स्नेहाधार' और 'चन्दन वृक्ष' इन ४ वस्तुओंका अन्योक्तिमय वर्णन है। इसकी आखिरी १० वीं गाथामें कहा गया है कि साळीवाहन राजाने ये गाथायें ९ कोटि (प्रत्येकमें ४ कोडि) देकर ग्रहण कीं। इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है-] १५. जो पुरुष, केलके झाडके समान, दूसरोंको फल देते हुए अपना विनाशका भी विचार नहीं करते, उनके सामने मरना भी वाछनीय है । १६. जिस तरह विन्ध्याचल पर्वत सदा सरस ( हरे भरे ) वृक्षोंको धारण करता है वैसे ही शुष्क- (निकम्मे ) वृक्षोंको भी धारण करता है । उसी तरह बडे पुरुष अपने उत्संगवर्ती—समीपवर्ती निर्गु- णोंका भी त्याग नहीं करते । १७. वे मुञ्झार¹ जिन्होंने तृषित होकर प्रथम ही प्रथम जो स्नेहाधार( जलधारा )का जैसे तैसे करके पान किया है वे फिर आजन्म अन्य पानकी इच्छा नहीं करते । १८. शुष्क हो जानेपर भी जिस चन्दनके वृक्षका, सब जनोंको आनन्द देनेवाला ऐसा सुरभि गन्ध है वह जब सरस भाववाला ( हरा फूला ) होगा तब तो फिर कैसा ही होगा ।
१ यह 'मुञ्झार' क्या वस्तु है इसका अर्थ हमें स्पष्ट नहीं हुआ। यह शब्द भी शुद्ध है या नहीं इसकी हमें शंका है। कोश वगैरह ग्रंथोंमें यह शब्द हमें नहीं मिला।