भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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१४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश' ३. शीलव्रतके विषयमें भूयराजका प्रबंध । १४) यह प्रबंध इस प्रकार है—कान्यकुब्ज देशमें, जो छत्तीस लाख गाँवोंका प्रगणा है, ' कल्याण कटक' नामक राजधानीमें भूयराज नामक राजा राज्य कर रहा था । किसी दिन प्रभात कालमें जब कि वह राजपाटिका करनेके लिये जा रहा था, उस समय खिड़की पर बैठी हुई किसी मृग-नयनीको देखता हुआ उसका अपहरण करनेके लिये अपने पानीयके अधिकारी पुरुषको आदेश किया । उसने उसे राज-भवनमें लाकर किसी संकेत स्थलपर रखकर राजाको निवेदन किया । वहाँ आकर राजाने उसका हाथ पकड़कर खींचना चाहा तो इसपर वह राजासे बोली—' स्वामिन्, आप तो सर्व देवताके अवतार हैं; अफसोस कि आपका इस नीच नारीमें क्यों अभिलाष है ?' उसके इस वाक्यसे राजाकी कामाग्नि कुछ शान्त हुई, और वह बोला कि—' तुम कौन हो ?' उसके यह कहनेपर कि 'मैं आपकी दासी हूं'—राजाने कहा कि 'यह बात क्या ठीक कह रही हो !' तो उसने बताया कि 'आपका दास जो पानीयका अधिकारी है, मैं उसकी स्त्री, और आपकी दासानुदासी हूं ? ' उसकी बातसे राजा चकित हुआ और उसकी कामपीडा सर्वथा विलीन हो गयी । उसको अपनी पुत्री मानकर उसे बिदा किया । उस (स्त्री) के शरीरमें हमारे हाथ लगे हैं, यह सोचकर उनके निग्रह (नष्ट करने) की इच्छासे रातको यह भ्रान्ति जन्माकर कि खिड़कीके रास्ते कोई प्रवेश कर रहा है, अपने ही पहरेदारोंसे अपने दोनों ही हाथ कटवा डाले । सबेरे पहरेदारोंको मंत्रीलोग दण्ड देने लगे तो उन्हें रोककर मालवमण्डलमें महाकाल देवके प्रासाद (मन्दिर) में जाकर उनकी आराधना करता रहा । देवताके आदेशसे जब दोनों भुजायें लग गईं तो अपने अन्तःपुरके साथ सारा मालवदेश उसी देवको समर्पण कर दिया और परमार [ जातिके ] राजपूतोंको उसकी रक्षाके अधिकारी नियुक्त करके स्वयं तापसी दीक्षा ग्रहण की । —इस प्रकार शीलव्रत विषयक यह भूयराजका प्रबन्ध है ॥ ९ ॥