प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश उपस्थित हुए हैं । किन्तु भोजनके समय मक्खी पड़ जानेके समान, इस तैलङ्ग देश के तैलप नामक राजाके सेनापतिको, जो मुझे जीतनेके लिये आया है, जब तक शिक्षा न दे लूं तब तक आप पीछेसे हमला इत्यादि न करके रुक जाइये, यही अनुरोध करने मैं आपके पास आया हूं । मूलराज ने जब ऐसा कहा तो उस राजाने इस प्रकार कहा-राजा होकर भी अपने प्राणोंकी परवा न करके, सामान्य सैनिककी भाँति अकेले ही इस प्रकार शत्रुगृहमें प्रवेश करके चले आये इसलिये [ मैं तुम्हारे साहससे मुग्ध हूँ और ] जब तक जीऊंगा तब तक तुम्हारे साथ हमारी सन्धि बनी रहेगी । उस राजाके ऐसा कहने पर 'ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो' इस प्रकार निवारण करता हुआ, उसके द्वारा भोजनार्थ निमंत्रित होनेपर, अवज्ञापूर्वक अस्वीकार करके, वह हाथमें तलवार लेकर उठ चला और उसी साढनीपर सवार होकर, अपनी उस सेनासे परिवृत होकर उस बारप सेनापतिकी सेनापर टूट पड़ा । उसे मारकर उसके दस हज़ार घोड़े और १८ सौ हाथी छीन कर, जितनेमें पड़ाव डालनेकी तैयारी कर रहा था, उतनेमें तो अपने गुप्तचरोंसे यह सब हाल सुनकर वह सपादलक्ष का राजा वहाँसे भाग निकला । २६) उस राजाने पत्तन में श्रीमुलराज वस हिका [ नामक जैन मन्दिर ] और श्रीमुञ्जालदेव स्वामी (शिव) का प्रासाद बनवाया । वह प्रति सोमवारको शिवकी भक्ति करनेके निमित्त सोमेश्वर पत्तन (सोमनाथ पाटन) की यात्राको जाता था । उसकी इस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर सोमनाथ उपदेश देकर मण्डली नगरी में आये । उस राजाने वहाँ 'मूलेश्वर' नामका मन्दिर बनवाया । नमस्कार करनेकी इच्छासे हर्षित होकर वहाँपर नित्य आनेवाले उस राजाकी, उस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर, सोमनाथने यह कहा कि-मैं समुद्रके साथ तुम्हारे नगरमें अवतीर्ण हूँगा। यह कहकर सोमेश्वर अणहिल्ल- पुरमें अवतीर्ण हुए । आये हुए समुद्रकी सूचना मिले इसलिये नगरके सभी जलाशयोंका पानी खारा होगया । उस राजाने वहाँपर त्रिपुरुष प्रासाद नामक शिवका मन्दिर बनवाया । २७) इसके बाद, वह उस प्रासादके प्रबंधक होने योग्य किसी उचित, तपस्वीकी खोज करते हुए उसने एक कान्थडी नामक तपस्वीका नाम सुना, जो सरस्वती नदीके किनारे, एकान्तर दिनोंको उपवास किया करता था और पारणाके दिन अनिर्दिष्ट भिक्षाके पाँच ग्रासका आहार किया करता था । जब राजा उसकी वन्दना करने गया, तो उस समय उसे तीन दिनका ज्वर था । उसने अपने ज्वरको कंथामें संक्रा मित कर दिया । राजाने उसे देखकर पूछा कि-यह कंथा (गुदड़ी) काँप क्यों रही है ? । राजाके साथ बात करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैने ज्वरको उसमें संक्रामित किया है-ऐसा कहनेपर, राजा बोला-यदि इतनी शक्ति है तो फिर ज्वरको सर्वथा दूर क्यों नहीं कर देते ? । राजाके यों कहनेपर उसने- २६. पूर्वजन्मके सञ्चित हमारे जो कोई भी रोग हों वे अब उपस्थित हों । मैं उनसे ऋण होकर शिवके उस परम पदको प्राप्त होना चाहता हूँ । शिवपुराण के इस वचनको कह कर बताया कि-' कर्म भोगे बिना क्षय नहीं होते' यह जानते हुए मैं इसे कैसे दूर कर सकूँ ? । राजाने फिर त्रिपुरुष धर्म स्थानक के प्रबंधक होनेके लिये उससे प्रार्थना की । २७. अधिकार मिलनेसे तीन महीनोंमें, और मठका महन्त बननेसे तीन दिनोंमें [ नरक प्राप्त होता है ]; और अगर शीघ्र ही नरकप्राप्तिकी इच्छा हो तो एक दिन पुरोहित बन जाओ । इस स्मृति-वाक्यके तत्त्वको जानते हुए, तपरूपी नौकासे संसार सागरको पार करके मैं फिर इस गोष्- दमें कैसे डूबना चाहूं । इस वाक्यसे निषिद्ध होकर राजाने [ और कोई उपाय न सोच कर ] ताम्र-शासनको