भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण २७-२९ ] मूलराजका प्रबन्ध [ २३ मण्डफ (परोठे) में वेष्टित करके भिक्षाके लिये आये हुए उस तपस्वीके पर्णपुटमें छोड़ दिया। वह उसे न जानता हुआ लेकर वहाँसे लौट गया। यद्यपि सरस्वती नदीने पहलेतो उसे मार्ग दे दिया था, पर इस बार बढ़ जानेसे जब उसे मार्ग नहीं मिला, तो वह जन्मकालसे लेकर अपने दोषोंका विचार करने लगा। तात्कालिक भिक्षा सम्बंधी दोषको जाननेके लिये जब उसे देखता है, तो उसमें उस राजाका दिया हुआ ताम्र-शासन मालूम दिया। इससे तपस्वीको क्रुद्ध जानकर, राजा वहाँ आया और उसकी सान्त्वनाके लिये यह जब अनुनय विनय करने लगा, तो उसने यह कह कर कि-मैंने स्वयं जो दाहिने हाथसे दान ग्रहण किया है यह अन्यथा कैसे होगा; अपने शिष्य वयजल्लदेवको राजाको सौंपा । उस वयजल्लदेवने कहा कि-शरीरमें उबटनके लिये हमको प्रतिदिन आठ पल उत्तम जातिका चंदन, चार पल कस्तूरी, एक पल कपूर तथा बत्तीस वारांग- नाएँ, और जागीरके साथ श्वेत छत्र प्रदान करो, तो मैं प्रग्रहरूपका पद स्वीकार करूँगा । राजाने सब देनेका स्वीकार कर, त्रिपुरुष धर्मस्थान में उसे 'तपस्वियोंका राजा' के पदपर अभिषिक्त किया। वह 'कंकूखोल' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकारके भोगोंको भोगते हुए भी वह अकुटिल भावसे ब्रह्मचर्य व्रतमें निरत रहा। एक बार रातको मूलराजकी रानी उसकी परीक्षा लेने लगी तो उसे पानका बीड़ा मार कर कुट्टिनी बना दिया और फिर अनुनीत होकर उसे अपने उबटनके लेपसे और स्नानके मैले जलसे स्नान करवा, कर नीरोग किया। यहांपर लाखारूकी उत्पत्ति और त्रिपदिका प्रबंध भी दिया जाता है- २८) प्राचीन कालमें, किसी परमार वंशमें, राजा कीर्तिराज देवकी कामलता नामकी लड़की थी। वह बाल्यकालमें, सखियोंके साथ, किसी महलके आगनमें खेल रही थी। सखियोंने कहा कि अपना अपना वर वरण करो। घोर अन्धकारमें उस कामलताकी आँखोंका मार्ग बंद हो जानेसे, उसने फूहड़ नामक पशुपालका, जो उस महलके एक खंभेकी ओटमें खड़ा हुआ था और जिसे यह कुछ भी वृत्तान्त मालूम नहीं था, वरण कर लिया। इसके अनन्तर, कुछ वर्षोंके बाद, जब किसी अच्छे वरोंकी खोज उसके लिये की जाने लगी, तो पतिव्रता-व्रतके निर्वाहके विचारसे, उसने अपने माता पितासे अनुज्ञा लेकर उसी (पशुपाल) से विवाह किया। उन दोनोंका पुत्र लाखाक हुआ। वह कच्छदेशका राजा बना। यशोराजको उसने [ अपने पराक्रमसे ] खुश किया था और उसकी बड़ी कृपासे वह सबसे अजेय हो गया था। उसने ग्यारह वार मूल- राज की सेनाको त्रासित किया था। एक बार, जब कि वह लाखा, कपिलकोट के किलेमें रहा हुआ था उसी समय, राजा (मूलराज) ने स्वयं जाकर उसे घेर लिया। वह लक्ष (लाखाक) अपने माहेच नामक एक परम साहसी सुभटके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा-जिसको कि उसने कहीं थाह पाइनेके लिये भेजा था। यह बात जानकर मूलराजने उसके आगमनके मार्ग घेर लिये। कार्य समाप्त करके आते हुए उस भृत्यसे राजपुरुषोंने कहा 'हथियार रख दो 1'। अपने स्वामीके कार्यकी सिद्धिके लिये उसने वैसा ही करके युद्धके लिये प्रस्तुत लाखाक के पास आकर प्रणाम किया। इसके बाद सग्रामके अवसरपर- २८. 'उगे हुए सूर्यने जो प्रताप नहीं बताया तो हे लाखा ! वह दिन निकृष्ट कहा जाता है। गिनती करनेसे तो आठ कि दस दिन मिल सकते हैं । १ इस वचनका भावार्थ यह मालूम देता है कि सूर्यका उदय होनेपर भी यदि जिस दिन उसका तेज नहीं दिखाई देता-अर्थात् कुहासा छाया रहता है तो लोक उस दिनको निकृष्ट=दुर्दिन मानते हैं। वीर पुरुष या तेजस्वी पुरुष उत्पन्न होकर भी यदि अपना कोई तेज नहीं बतलावें तो उसका उत्पन्न होना निरर्थक ही समझा जाता है। २ इस दूसरे वचनका भावार्थ यह ज्ञात होता है कि-वीर पुरुषको समय प्राप्त होनेपर शीघ्र ही अपना पराक्रम बतलानेके लिये उद्यत हो जाना चाहिए। दिनोंकी गिनती करते रहनेसे तो कुछ लाभ नहीं होता।