भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण ३७-३८ ] . मुञ्जराज प्रबन्ध [ ३१ [ ४१ ] ऐ यन्त्र, +चरखा ! तुम इसलिये न रोओ कि मैं इस स्त्री द्वारा भ्रमाया ( घुमाया ) जा रहा हूँ । ' ये तो कटाक्ष फेंक कर ही ( मनुष्योंको ) घुमाया करती हैं, तो फिर हाथसे खींचने पर की बातका तो कहना ही क्या है ! [ ४२ ] मुञ्ज कहता है कि, हे गुणाढ्यवती ! जो बुद्धि पीछे उत्पन्न होती है, वह अगर पहले ही हो जाय तो कोई विघ्न आकर घेर नहीं सकता । [ ४३ ] जो राजा दशरथ देवताओंके राजा ( इन्द्र ) के तो मित्र थे, और यज्ञ पुरुषके तेजःअंशके समान रामके पिता थे, वही पुत्रविरहके दुःखसे शय्यापर ही पडे पडे मर गये, उनका शरीर जलते हुए तेलके मटकेमें रक्खा गया और बहुत दिनोंके बाद उसका संस्कार हुआ । हाय, कर्मकी गति टेढ़ी है ! [ ४४ ] सिरपर विधु x ( चंद्रमा और विधाता ) के वक्र हो कर आ बैठने पर, शिवके सदृश जो सब देवताओंके गुरु हैं उनका भी कैसा हाल हो गया है सो तो देखो । उनके पास अलंकारमें तो मात्र नर-कपाल है जिसे देखते ही डर लगता है, परिवारमें जिसका सारा शरीर छिन्न भिन्न है ऐसा एक भृंगी है, और सम्पत्तिमें एक ढलती उमरका बूढ़ा बैल है ! फिर हम लोगोंके सिरपर जो विधि यानि विधाता वक्र हो कर आ बैठे तो क्या क्या हाल न हो । इस प्रकार चिरकाल तक भिक्षा मँगवाने बाद राजाकी आज्ञासे मुञ्ज को वध्य-भूमिमें ले गये । वहाँ पहले पहिनेका उसका वस्त्र ले लिया गया । तब वह बोला- [ ४५ ] यह कमर जो हमेशां मतवाले हाथीके ऊपर ही बैठकर चलनेवाली थी, जो सदा विचित्र सिंहासनपर ही बैठती थी और जो अनेक रमणियोंके जघनस्थल पर लालित होती थी; वह आज इस प्रकार विधिवश बिना वस्त्रकी कर दी गई ! तब मुञ्ज ने पूछा कि-' किस प्रकार मुझे मारोगे ?' [ उत्तर मिला ] ' वृक्षकी शाखा में लटका कर ।' तब वह बोला- [ ४६ ] कहाँ तो यह महावनमें रहा हुआ वृक्ष है और कहाँ हम संसारका पालन करनेवाले राजाओंके पुत्र ! अहो, कभी न घट सकनेवाली बातको घटानेमें पटु ऐसा यह विधिका चरित्र बड़ा दुरबोध है ! उन्होंने कहा कि 'इष्ट देवताको याद करो' इस पर वह बोला- ४७. इस यशके पुंजके समान मुञ्ज के गत होनेपर, लक्ष्मी है सो तो विष्णुके पास चली जायगी और वीरश्री है यह वीर मन्दिरमें चली जायगी; किन्तु [ और कोई आश्रयस्थान न मिलनेसे ] सरस्वती है सो निराश्रित हो जायगी ।

  • स्त्री जब चरखा चलाती है तब उसमेंसे हूँ...हूँ... इस प्रकारकी आवाज निकलती है । उस आवाजपर यह किसीकी अन्योक्ति है । स्त्री अपने हाथसे चरखेको खूब घुमा रही है इसलिये मानो चरखा रो रहा है । कवि कहता है कि, भाई चरखा तूं रो मत ! स्त्रीके तो कटाक्ष मात्रसे भी मनुष्य घूमने लगते हैं, तो फिर तुझे तो यह अपने हाथसे फिरा रही है । x यहापर 'विधौ वक्रे मूर्ध्नि' इस वाक्यांश पर श्लेष है । संस्कृतमें 'विधु' शब्द चंद्रका वाचक है और 'विधि' विधाताका । इन दोनों शब्दोंका सप्तमी विभक्ति के एक वचनमें 'विधौ' ऐसा रूप बनता है । शिवके पक्षमें 'विधुके वक्र होनेपर;' और दूसरे पक्षमें 'विधिके वक्र होनेपर' ऐसा अर्थ घटाया गया है ।