प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रकरण ३७-३८ ] . मुञ्जराज प्रबन्ध [ ३१ [ ४१ ] ऐ यन्त्र, +चरखा ! तुम इसलिये न रोओ कि मैं इस स्त्री द्वारा भ्रमाया ( घुमाया ) जा रहा हूँ । ' ये तो कटाक्ष फेंक कर ही ( मनुष्योंको ) घुमाया करती हैं, तो फिर हाथसे खींचने पर की बातका तो कहना ही क्या है ! [ ४२ ] मुञ्ज कहता है कि, हे गुणाढ्यवती ! जो बुद्धि पीछे उत्पन्न होती है, वह अगर पहले ही हो जाय तो कोई विघ्न आकर घेर नहीं सकता । [ ४३ ] जो राजा दशरथ देवताओंके राजा ( इन्द्र ) के तो मित्र थे, और यज्ञ पुरुषके तेजःअंशके समान रामके पिता थे, वही पुत्रविरहके दुःखसे शय्यापर ही पडे पडे मर गये, उनका शरीर जलते हुए तेलके मटकेमें रक्खा गया और बहुत दिनोंके बाद उसका संस्कार हुआ । हाय, कर्मकी गति टेढ़ी है ! [ ४४ ] सिरपर विधु x ( चंद्रमा और विधाता ) के वक्र हो कर आ बैठने पर, शिवके सदृश जो सब देवताओंके गुरु हैं उनका भी कैसा हाल हो गया है सो तो देखो । उनके पास अलंकारमें तो मात्र नर-कपाल है जिसे देखते ही डर लगता है, परिवारमें जिसका सारा शरीर छिन्न भिन्न है ऐसा एक भृंगी है, और सम्पत्तिमें एक ढलती उमरका बूढ़ा बैल है ! फिर हम लोगोंके सिरपर जो विधि यानि विधाता वक्र हो कर आ बैठे तो क्या क्या हाल न हो । इस प्रकार चिरकाल तक भिक्षा मँगवाने बाद राजाकी आज्ञासे मुञ्ज को वध्य-भूमिमें ले गये । वहाँ पहले पहिनेका उसका वस्त्र ले लिया गया । तब वह बोला- [ ४५ ] यह कमर जो हमेशां मतवाले हाथीके ऊपर ही बैठकर चलनेवाली थी, जो सदा विचित्र सिंहासनपर ही बैठती थी और जो अनेक रमणियोंके जघनस्थल पर लालित होती थी; वह आज इस प्रकार विधिवश बिना वस्त्रकी कर दी गई ! तब मुञ्ज ने पूछा कि-' किस प्रकार मुझे मारोगे ?' [ उत्तर मिला ] ' वृक्षकी शाखा में लटका कर ।' तब वह बोला- [ ४६ ] कहाँ तो यह महावनमें रहा हुआ वृक्ष है और कहाँ हम संसारका पालन करनेवाले राजाओंके पुत्र ! अहो, कभी न घट सकनेवाली बातको घटानेमें पटु ऐसा यह विधिका चरित्र बड़ा दुरबोध है ! उन्होंने कहा कि 'इष्ट देवताको याद करो' इस पर वह बोला- ४७. इस यशके पुंजके समान मुञ्ज के गत होनेपर, लक्ष्मी है सो तो विष्णुके पास चली जायगी और वीरश्री है यह वीर मन्दिरमें चली जायगी; किन्तु [ और कोई आश्रयस्थान न मिलनेसे ] सरस्वती है सो निराश्रित हो जायगी ।
- स्त्री जब चरखा चलाती है तब उसमेंसे हूँ...हूँ... इस प्रकारकी आवाज निकलती है । उस आवाजपर यह किसीकी अन्योक्ति है । स्त्री अपने हाथसे चरखेको खूब घुमा रही है इसलिये मानो चरखा रो रहा है । कवि कहता है कि, भाई चरखा तूं रो मत ! स्त्रीके तो कटाक्ष मात्रसे भी मनुष्य घूमने लगते हैं, तो फिर तुझे तो यह अपने हाथसे फिरा रही है । x यहापर 'विधौ वक्रे मूर्ध्नि' इस वाक्यांश पर श्लेष है । संस्कृतमें 'विधु' शब्द चंद्रका वाचक है और 'विधि' विधाताका । इन दोनों शब्दोंका सप्तमी विभक्ति के एक वचनमें 'विधौ' ऐसा रूप बनता है । शिवके पक्षमें 'विधुके वक्र होनेपर;' और दूसरे पक्षमें 'विधिके वक्र होनेपर' ऐसा अर्थ घटाया गया है ।
३२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश इस तरहके उसके अन्य बहुत वाक्य हैं जो परम्पराके अनुसार जानने चाहिये* । बादमें उस मुञ्ज को मारकर उसका सिर सूलीमें पिरोकर अपने आँगनमें रखवाया और उसमें रोज दही लगवा लगवाकर अपने अमर्षका पोषण करता रहा । ४२. जो मुञ्ज यशका पुञ्ज था, हाथियोंका पति था, अवन्ती का स्वामी था, सरस्वतीका पुत्र था, प्राचीन कालके जैसा कृती पुरुष था; वही कर्णाट देश के राजाके द्वारा अपने नेत्रोंकी दुर्बुद्धिसे पकड़ा गया और सूलीपर चढ़ा दिया गया । हाय, कर्मकी गति कैसी विषम है ! * ३८) उसके बाद, मालवा मण्डल के मंत्रियोंने जब यह वृत्तान्त सुना तो, उन्होंने फिर उसके भतीजे भोज को राज्य पदपर अभिषिक्त किया । इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्य रचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'राजा श्रीविक्रमादित्य प्रभृति महासाहसिक और परोपकार-आदि गुणरूपी रत्नोंसे अलंकृत राजाओंके चरित्र' नामक यह पहला प्रकाश समाप्त हुआ।
- मालूम होता है मुञ्जकी यह करुण कथा उस जमानेमें बहुत लोक प्रसिद्ध और लोक साहित्यकी विशिष्ट वस्तु बनी हुई थी । मेरुतुङ्गासूरिने जो यहाँ पर ये कुछ सस्कृत, प्राकृत और देश्य पद्य दिये हैं वे या तो भिन्न भिन्न कर्तृक मुञ्ज विषयक प्रबन्धोंमेंसे उद्धृत किये गये हैं; या परम्परासे सुनकर लिख लिये गये हैं । मुञ्जकी इस कथामें एक तो लक्ष्मीकी अस्थिरता और दूसरी स्त्रीकी अविश्वसनीयता और तीसरी मुञ्ज जैसे महाबुद्धिमान् शक्तिमान् राजाकी, दुश्मनके द्वारा की गई त्रासोत्पादक विडंबना- इन तीन बातोंका विचित्र संघटन हो जानेसे उपदेशकोंको अपने उपदेशकेलिये यह एक वास्तविक घटनाका बतलानेवाला करुण रसका बोधदायक आख्यान ही मिल गया । अभी तक निश्चय नहीं हो सका कि इस कथामें ऐतिहासिक तथ्य कितना है और ग्रन्थकर्ताओंकी बनावट कितनी है । यहाँपर जो पद्य दिये गये हैं वे तो प्रबन्धकर्ताओंकी उपदेशात्मक उक्तियाँ मात्र हैं। कुछ पद्य तो मेरुतुङ्गासूरिके भी पीछेके बने हुए हैं और किसीने प्रसङ्गोचित समझकर इस ग्रंथमें प्रक्षिप्त कर दिये हैं । १. दही लगवानेका मतलब यह कि उसे देखकर कौए आवें और उस मस्तकपर बैठें । किसी दुश्मनका बहुत ही बुरा चाहना होता है तब लोग बोला करते हैं कि-उसके सिरपर तो कौए बैठेंगे । उसी लोकोक्तिका सूचक यह कथन है ।
द्वितीय प्रकाश: मुंजराज व तैलप संघर्ष प्रबन्ध
प्रकरण ३९-४२ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३३ ७. भोज और भीमका प्रबन्ध । ३९) इसके बाद [सं० १०७८ के साठ] जब मालवमण्डल में श्री भोजराज राज्य करता था, तब इधर गुर्जरभूमि में चौलुक्य चन्द्रजाति भीम पृथित्राका शासन करता था। एक रात्रिके अतमें राजा भोजने, अपने चित्तमें लक्ष्मीकी अस्थिरताको विचारते हुए और अपने जीवनको भी तरंगकी भाँति चञ्चल समझते हुए, प्रात कृत्यके बाद, दानमण्डपमें बैठकर नौकरोंके द्वारा याचकोंको बुला, यथेच्छ सुवर्ण टंकोंका (सोनेकी मोहिरोंका) दान देना प्रारंभ किया। ४०) इस पर, रोहक नामक उसके मंत्रीने, खजानेका नाश होता देख, राजाके औदार्य गुणको दोष समझते हुए उसे रोकनेके लिये अन्य उपायोंसे समर्थ न होकर, एक दिन सर्वावसर (न्याय सभा) के उठ जाने बाद सभामण्डपके भारेपर खडियासे इन अक्षरोंको लिख दिया-आपत्ति कालके लिये धनकी रक्षा करनी चाहिए। प्रातः काल यथा समय राजाने उन अक्षरोंको पढ़ा। सभी परिजनोंमेंसे किसीने भी जब उस कार्यके करनेका स्वीकार नहीं किया तो राजाने उसके साथ यह लिख दिया-भाग्यवान्को आपत्ति कहा है। इस पर मंत्रीने जवाबमें लिखा कि-कभी दैव कुपित हो जाय तो ?। इस पर राजाने फिर उसके सामने लिख दिया कि-[तब तो] सञ्चित भी विनष्ट हो जायगा। इससे निरुत्तर होकर उस मंत्रीने अभय वचन माँगकर उस कथनको अपना लिखा बताया। बादमें राजाने कहा, कि मेरे मनरूपी हाथीको ज्ञानरूप अंकुशसे वशमें रखनेके लिये महामात्रके समान ५०० पण्डितोंका यह समूह यथेच्छ रूपसे अपना अपना ग्रास प्राप्त किया करें¹। राजाने अपने जीवनका ध्येय सूचित करनेवाली ऐसी चार आर्याओंको अपने कङ्कणपर खुदवाईं² जिनका अर्थ यह है- ४४. यही उपकार करनेका अवसर है, जब तक कि स्वभावत ही चञ्चल ऐसी यह सम्पत्ति विद्यमान है। फिर वह विपत्ति कि जिसका उदय भी निश्चित है, उसके आनेपर उपकार करनेका अवसर कहाँ रहेगा²। ४५. हे पूर्णिमाके चन्द्रमा ! अपने किरण-समूहकी समृद्धिसे अभी आज इस सारे भुवनको उज्ज्वल कर दे। [फिर यह मौका न मिलेगा, क्यों कि] निर्दय विधाता चिरकाल तक किसीका सुस्थिर होना सह नहीं सकता। ४६. ऐ सरोवर ! दिन और रात याचकोंका उपकार करनेका यही अवसर है। यह जल तो उन पुराने बादलोंके उदय होनेपर फिर सर्व सुलभ ही है। ४७. ऐ किनारेके वृक्षोंको गिरा देनेवाली नदी ! यह सुदूर तक उन्नत दिखाई देनेवाला पानीका पूर तो कुछ ही दिनों तक ठहरेगा, पर यह एक पातक (पेड़का गिरा देना) तो चिरस्थायी होकर रहेगा। और फिर- १ इसका मतलब यह है कि राजा भोजने अपन पास ५०० पंडित रखे थे जिनके निर्वाहके लिय राज्यकी ओरसे स्थायी ग्रासका प्रबन्ध कर दिया गया था। २ पुरातन जमानेमें यह एक प्रथा थी कि-विचारशील लोग, जिस किसी सद्विचारको अपना जीवन ध्येय बना लेते थे उसका सतत स्मरण रहा करे इसलिये उस विचारके सूत्रको अपने हाथके कंकणपर उत्कीण करा (खुदा) लेते थे और उसका सदैव अवलोकन किया करते थे। वस्तुपाल आदि अन्य भी महापुरुषोंने अपने जीवनसूत्र कंकणपर खुदवा रक्खे थे। ९-१०
३४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ४८. सूर्यके अस्त होनेके पहले जो धन याचकोंको नहीं दे दिया गया, मैं नहीं जानता, वह धन प्रातःकाल किसका होगा । इस प्रकार अपना ही बनाया हुआ यह श्लोक जो मेरे कण्ठका आभरण-सा होगया है उसको इष्ट मंत्रकी तरह जपता हुआ, हे मन्त्रिन् ! मैं आप जैसे प्रेतके समान [ लोभी ] पुरुषसे कैसे ठगा जा सकता हूँ । ४१) एक दूसरे अवसरपर, राजा राजपाटिका में घूमता हुआ नदीके किनारे जा खड़ा हुआ । वहाँ सिरपर काठका भारा उठाए हुए और पानीको लाँघ कर आते हुए किसी दरिद्री ब्राह्मणको देखा । उससे उसने पूछा कि- ४९. ' कितना है पानी ब्राह्मण !' उसने कहा-' घुटने तक हे राजा ।' राजाने फिर पूछा-' तेरी अवस्था ऐसी क्यों ? ' वह बोला-' आप जैसे सब कहीं नहीं !' उसके इस वाक्यको सुनकर राजाने जो पारितोषिक उसे दिया, मंत्रीने धर्म-खातेमें इस प्रकार लिख रखा- ५०. " जानुदघ्न " ( जानुत क ) कहनेवाले ब्राह्मणको सन्तुष्ट होकर भोजने एक लाख, फिर एक लाख, फिर एक लाख; और उसपर दस मतवाले हाथी; इस प्रकार दान दिया । ४२) एक दूसरी बार रातमें, आधीरातको राजाकी अचानक नींद खुली । उस समय आकाशमण्डल में चंद्रमा नया ही उदित हुआ था। उसे देखकर वह अपने विचाररूपी समुद्रके उठते हुए तरंगके जैसा यह काव्यार्थ बोलने लगा- ५१. यह चंद्रमाके भीतर, बादलके टुकड़ेकी-सी जो लीला कर रहा ह लोग उसे शशक ( खर- गोश ) कहते हैं, किन्तु मुझे वह ऐसा नहीं मालूम देता । राजाके बारवार ऐसा कहनेपर, कोई चोर जो उसी समय सेंध मारकर, कोशगृहमें घुसा था, अपने प्रतिभाके वेगको रोकनेमें असमर्थ होकर बोल उठा- ' मैं तो चंद्रमाको ऐसा समझता हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी विरहाक्रान्त तरुणियों (स्त्रियों) के कटाक्षरूपी उल्कापातके सैकड़ों व्रणके चिन्हसे वह अंकित हो रहा है ।' उसके ऐसा बोल पड़ने पर, अंगरक्षकोंने उसे पकड़ लिया और कारागारमें बद कर दिया । इसके बाद प्रातःकाल, सभामें ले आये हुए उस चोरको राजाने जिस पारितोषिकसे पुरस्कृत किया, उसे धर्म-खाताके काममें नियुक्त अधिकारीने इस प्रकार लिखा- ५२. उस चोरको, जिसे मृत्युका भय लगा हुआ था, राजाने ऊपर लिखे दो चरणोंके लिये प्रसन्न होकर यह दान दिया-दस करोड़ सुवर्ण मुद्रायें और ऊपर आठ हाथी, जो दाँतोंके आघातसे पर्वतका भेदन करते थे और जिनके मदसे मुदित हो कर भौरे गुजारथ किया करते थे । [ फिर एक बार खिड़कीकी जालीसे आते हुए चंद्रमाको देख कर बोला- [ ४७ ] हे सुध्रु ! खिड़कीकी जालीमेंसे प्रवेश करनेके कारण जिसकी चाँदनी खंड खंड हो गई है, वह चंद्रमा, तुम्हारे वक्षःस्थल पर आकर विराज रहा है । उसी समय घरमें प्रवेश करनेवाले चौरने कहा- ' यह चन्द्रमा मानों तुम्हारे स्तनके संगकी आसक्तिके वश होकर आकाशमेंसे झंपापात कर नीचे कूदा है और दूरसे गिरनेके कारण खड खंड हो गया है ।' इस चोरको भी उसी तरहका दान दिया गया और उसे धर्म-बहीमें लिख दिया गया । ]
प्रकरण ४३-४४ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३५ ४३) इसके बाद, एक बार, जब वह बही [ राजाके आगे ] बाची जाने लगी तो राजा अपनेको बड़ा उदार दानी मानकर घमंडरूपी भूतसे आविष्ट होनेकी भाँति- ५३. मैंने वह किया जो किसीने नहीं किया, वह दिया जो किसीने नहीं दिया, वह साधना की जो असाध्य थी; इसलिये [ अब ] हमारा चित्त दुःखित नहीं है । इस प्रकार बारबार अपने भाग्यकी प्रशंसा करने लगा । तब किसी पुराने मन्त्रीने, उसके अभिमानको दूर करनेकी इच्छासे, श्री विक्रमादित्य की धर्म-बही राजाको दिखाई । उसके ऊपरवाले विभागमें शुरूमें ही पहला काव्य इस प्रकार था- ५४. तुम्हारे मुखकमलमें 'सरस्वती' बसती है, 'शोण' तो तुम्हारा अधर ही है, और रामचन्द्रके वीर्यकी स्मृति दिलानेमें पटु ऐसी तुम्हारी दक्षिण भुजा 'समुद्र' है। ये वाहिनियाँ (सेना और नदियाँ) सदा तुम्हारे पास रहती हैं; क्षणभर भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़तीं; और फिर तुम्हारे अंदर ही यह स्वच्छ मानस (मानसरोवर, मन) है; तो फिर हे राजन्, तुम्हें जलपानकी अभि- लाषा क्यों हो ? १ इस काव्यके पारितोषिकमें राजाने इस प्रकार दान दिया था- ५५. आठ करोड़ स्वर्णमुद्रा, ९३ तुला मोती, मदमत्त भौरोंके कारण क्रोधसे उद्धत ऐसे ५० हाथी, चलनेमें चतुर ऐसे दस हजार घोड़े और सौ वेश्यायें;-यह सब जो पाण्ड्य राजाने दण्डके स्वरूपमें विक्रम राजाको भेंट किया था; वह उसने उस वैतालिकको दानमें दे दिया । २ इस प्रकार उस काव्यके अर्थको जानकर, विक्रमकी उदारतासे अपने सारे गर्व सर्वस्वको पराजित मानकर, उस बही की पूजा करके उसे यथास्थान रखवा दिया । ४४) एक समय, प्रतीहारने आकर सूचित किया-'महाराजके दर्शनके लिये उत्सुक ऐसा एक सरस्वती-कुटुम्ब द्वारपर खड़ा है । 'शीघ्र प्रवेश कराओ' राजाकी ऐसी आज्ञा होनेपर पहले उसकी दासीने प्रवेश करके कहा- ५६. बाप भी विद्वान् है, बापका बेटा भी विद्वान् है, माँ भी विदुषी है, माँकी लड़की भी विदुषी है; जो उनकी बिचारी कानी दासी है यह भी विदुषी है; इसलिये हे राजन् ! मैं समझती हूँ कि यह सारा कुटुम्ब ही विद्याका एक पुञ्ज है । उसके इस हास्यकर वचनसे राजाने जरा हँसकर, उनमेंके सबसे बड़े पुरुषको बुलाया और यह समस्या दी-'असारसे सारका उद्धार करना चाहिये ।' [ उसने इसकी पूर्ति इस तरह की-] ५७. धनसे दान, वचनसे सत्य, और वैसे ही आयुसे धर्म और कीर्ति तथा शरीरसे परोपकार-इस प्रकार असारसे सारका उद्धार करना चाहिये । १ किसी समय विक्रम राजाने अपने नौकरसे पीनेको पानी मांगा तब पासमें बैठे हुए किसी कविने यह पद्य बनाया और राजाको सुनाया । इसमें, सरस्वती, शोण, दक्षिण समुद्र, मानस और वाहिनी इतने शब्दारौर श्लेष हैं । ये सब शब्द द्वयर्थक हैं, जिनमें एक अर्थ प्रसिद्ध जलाशय वाचक है और दूसरा अन्यार्थ वाचक है । यथा-सरस्वती=१ नदी, २ विद्यादेवी, शोण= १ नद, २ रक्तवर्ण, दक्षिण समुद्र=१ महासागर, २ मुद्रारत्नमय हाथ, वाहिनी=१ सेना, २ नदी, मानस=१ सरोवर, २ मन । २ इस पद्यमें जो सामग्री वर्णित की गई है यह विक्रम राजाको दक्षिणके पाण्डय राजाने दण्डके रूपमें दी थी और उसी सामग्रीको विक्रमने किसी वैतालिक यानि स्तुतिपाठक कविको, उक्त श्लोकके कहनेपर पारितोषिकके रूपमें-दानमें दे दिया, यह इसका तात्पर्य है ।
३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रभाव इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]—‘ हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है !’— ‘प्रवाल (तृणाङ्कुर) की शय्याको शरीरका शरण’ बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया— ५८. वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिघल रहा है; और विरहसे आतुर बनी हुई मेना ( हिमालय-पत्नी मेनका ) अपने शरीरको प्रवाल (तृणाङ्कुरों ) की शय्याके शरण कर रही है। इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्टकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया— किससे पिलाऊँ दूध ? ५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसने एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई और सोचने लगी कि कौनसे मुँहसे इसे दूध पिलाऊँ ? —उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की। इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद समस्याके लिये दिया—‘कंठमें काऊ लटक रहा है!’ ६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैंने हे सखि ! यह देखा कि वह काक उसके कठमें लटक रहा *। उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुम्बमेंकी लड़कीको भूलकर, अन्य सबको सत्कार करके बिदा किया। बादमें राजाने जब सर्वोवसर ( राजसभा ) का विसर्जन किया और स्वयं चन्द्रशाला ( चाँदनी=महलके ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तत्र द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा। राजाने उसे [ बुलाकर ] कहा—‘कुछ बोलो’—तो वह बोली कि— ६१. हे राजन्, हे मुञ्जकुलके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूड़ामणि ! इस भवनमें रातमें भी, तुम इस प्रकार छत्र धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी कांतिको देखकर चन्द्रमाको लज्जित होना पड़ता है ओर न भगवती अरुन्धतीको ( पर पुरुषके मुखदर्शनसे ) दुःशीलताका भाजन होना पड़ता है। उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चित्तको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था, उससे विवाह करके अपनी भोगिनी बनाया।
- इस पद्यमें ‘काउ’ इस देश्य शब्दपर श्लेष है। काउ काग-काक-कौआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा गलेमें जो एक लटकता हुआ छोटासा मासपिंड है उसका नाम भी काक-काग ( गुजराती-कागडो ) है। कोई विरहिणी स्त्रीका शरीर इतना कृश होगया है कि जिससे उसके कठमें लटकता हुआ काग स्पष्टतया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ आकर कौआ बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाल है। लेकिन उसके वारवार ऐसा बोलने पर भी वह जब नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिणी चिढकर उस कौवेको उडा देती है। इस कौवेके उडाते समय उसके पासमें बैठी हुई सखिने उसके दुर्बल कठमेंका वह काग नजर आया। इस अर्थकी घटना बतलानेके लिये कविने इस पद्यमें ‘काउ’ शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रथके गुजराती और इंग्रजी भाषान्तरकारोंने इन पद्योंक कुछके कुछ ऊटपटांग अर्थ किये है।
प्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३७ भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्द्धा । ४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, संधिमें दोष उत्पादनके विचारसे भोज राजाने गूर्जर देशकी बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, भीमके पास यह [ प्राकृत ] गाथा लिख भेजी- ६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है] और न सन्धि ही [रहती है]। भीमने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंसे गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको निःसारार्थक देखकर यह सोचमें पड़ गया। उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज बजी हुई नर्तकीको खम्भेके पास खड़ी हुई देखकर मंत्रीने वहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये कहा । यह बोला- [४८] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कंकणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वेष्टित होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके बने हो यह निश्चित होता है। [आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [उसके गुरु ] आचार्यको बुलाकर उस विषयमें पूछा- ६३. विधाताने भीमको अन्धकके * पुत्रोंको मारनेके लिये ही निर्माण किया है। जिस भीमने सौ [ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! ' इस प्रकार गोविन्दाचार्यकी बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ भेजकर, सन्धिका दोषको दूर किया । ४६) बादमें किसी एक रातको, जाड़ेके दिनोंमें, राजा जब वीरचर्यामें घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना- ६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें फूंकते फूंकते आग ठंडी हो गई है, चिन्ताके समुद्रमें डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फलकी तरह सिकुड़ गया हूँ। निद्रा अपमानिता स्त्रीकी भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं हो रही है। यह सुनकर रात बिताकर सबेरे उसे बुलाकर पूछा-'किस प्रकार तुमने रात्रिशेषमें शीतका अत्यन्त उपद्रव सहन किया ?'। 'सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था। [ यह बोला- ] 'महाराज ! मैं खूब गाढ़े तीन वस्त्रोंसे जाड़ा काटता हूँ।' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन वस्त्र क्या हैं ? तब उसने फिर कहा- ६५. रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन्! घुटने, सूर्य और आगके बलपर मैं शीत काटता हूँ। जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया। ६६. तुमने अपनी आत्माको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमूर्ती धनवान पुरुषोंको मुकुरून्
- यहाँपर 'अन्धक' इस शब्दपर श्लेष है। कौरवोंका पिता धृतराष्ट्र अन्धा था इसलिये उनको अन्धक कहा है। भोजका पिता सिंधुल भी अन्धा था इसलिये उसका विशेषण भी अन्धक सार्थक है।
३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश दिया, जो सज्जनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आबद्ध थे । इस प्रकार जब वह सारवान् काव्यका उद्गार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका परितोषिक देनेमें अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया। [ यहाँ P. B. नामक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-] [ ४९ ] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वस्त्र ) नहीं है, आग सुलगानेके लिये सगड़ी नहीं है । कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाके रोकनेका कोई उपाय नहीं है, खानेको मुट्ठीभर चावल नहीं है, घड़ीभर भी मनमें संतोप नहीं है, शृंगार की कोई वृत्ति नहीं है, मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोंसे संकटमें पढा हूँ; ऐसी दशामें हे भोजराज ! तुम्हारे कृपारूपी हाथी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है । इस श्लोकमें आई हुई ग्यारह टी' के हिसाबसे भोजराजने उसे ११ लाखका दान दिया। एक बार, किसी विद्वत्कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाड़ दिया जाय । जब राजपुरुष उन्हें उजाड़ने लगे तो एक जुलाहा उन्हें रोककर राजाके पास गया, और बोला कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं ? तो राजाने पूछा-क्या तू कविता करता है ? वह बोला- [ ५० ] जिसके चरणोंपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे साहसांक महाराज,! मैं काव्य तो करता हूँ पर सुन्दर नहीं कर पाता । जैसा तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता । मैं उसका क्या करूँ ? मैं कविता करता हूँ, कपडा बुनता हूँ और अन्न जाता हूँ । धीवरकी बहू भी हाथमें मांस लेकर राजाके पास गई और बोली- [ ५१ ] 'महाराज, तुम्हारी जय हो !'-' तू कौन है ?'-' लुब्धक (धीवर) की बहू । '- ' हाथमें यह क्या है ? '- ' मास ! '- ' सूखा क्यों है ? '-' यों ही '- और यदि महाराज ! आपको कौतुक हो तो कहती हूँ कि-तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके आँसूकी नदीके किनारे सिद्धोंकी स्त्रियाँ गान करती हैं। गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं । इसलिये उनका यह मास दुर्बल हो गया है । इस प्रकार उक्ति प्रायुक्तियुक्त ये दो काव्य सुनकर राजाने उन्हें नगरके भीतर स्थापन किया । एक बार, कोई विद्वान्, जो गर्वोद्धत था, उस नगरके निवासियोंको घरमें ही गरजनेवाले समझकर अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया । नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वस्त्र धो रहा था बोला-' अरे साड़ीका मैल धोनेवाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है ?' वह बोला- [ ५२ ] घोड़े तोरण लगे हुए मकानोंको ढोते हैं, गायें केसरके सहित कमलोंको चरती हैं, दही यहाँ- पर पीला मिलता है, तिलोंमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोंके दरवाजेके शिखरपर हिरण चरा करते हैं । इसके बाद, किसी बालिकासे पूँछा-' तू कौन है ?' तो वह बोली- [ ५३ ] मरे हुए जहाँ जींदा होते हैं, जिनकी आयु बीत गई हे वे उच्छ्वसित होते हैं और अपने गोत्रमें जहाँ कलह होता है, मैं उस कुलकी बालिका हूँ । इसका अर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ बालिका भी इस तरहकी विधानादी है वहाँके विद्वान् कैसे होंगे, यह उल्टे पाँव लौट गया । १ इस श्लोकमें ' टी ' जिसके अन्तमें है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, तटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोंको गिनकर ११ लाखका मो जने उस कविको दान दिया ऐसा इसका तात्पर्य है।
प्रकरण ४७-५० ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३९ ४७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरमें, राजा राजपाटीमे भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा रहा था । उस समय किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला— ६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ हैं उनके जन्म लेनेसे क्या है ? —इस प्रकार उसके पूर्वार्ध कहनेपर; सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है ? ६८. 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है'—यह कहनेपर, दानशूर भोजनरेन्द्र ने उसको सौ हाथी और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं । उसके इस वचनके अन्तमें [ राजाने कहा ]— ६९. हे जननि ! ऐसा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें । उसके इस वाक्यके पश्चात् [ भिक्षुक बोला ]— उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भंग करें । जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा—' तुम कौन हो ?' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटामें जब अन्य किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है। उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ीं— [ ५४ ] अकुण्ठित मेघोंके नादसे नाचती हुई मयूरियोंकी उन्नत आवाज़से आकुल, मेघागमन कालमे ( वर्षा में ) तो जमीनपर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है। लेकिन, इस भयानक उष्णता भरे ग्रीष्म कालमें करुणासे एक दूसरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका यदि तू पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है!, ७०. जिस सरोवरमें, मेंढक मरे हुओंकी भाँति कोटरोंमें सो गये थे, कच्छप पृथ्वीमें छिप गये थे, और गाढ़े पंकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ बारंबार मूर्छित हो रही थीं, उसी तालाबमें, अकालके मेघने उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुंभस्थल तक डूबे हुए हाथियोंके झुंड पानी पी रहे हैं । इस प्रकार अकालजलद राजशेखर की यह उक्ति है। * राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा । ४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होनेके कारण राजा भीम के देशमें ( गुजरात में ) जब, कण और तृण भी नहीं मिलता था ऐसे कुसमयमें, राजपुरुषोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्—भोजराजाने गुजरात पर चढ़ाई करनेकी बात उठाई )। यह सुनकर भीम को चिन्ता हुई और उसने अपने दामर नामक सान्धि- विग्रहिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेसे रोको । उसका यह आदेश पाकर वह यहाँ गया। वह दामर अत्यंत कुरूप समझा जाता था। भोज ने [ उसका उपहास करनेकी दृष्टिसे ] कहा— ७१. ' हे ब्राह्मण ! तुम्हारे स्वामीके सन्धि-विग्रह पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत हैं ?' [ उत्तर—] 'यों तो बहुत ही हैं, हे मालव-नरेश ! पर वे सब गुणकी दृष्टिसे तीन प्रकारके हैं—अधम, मध्यम और उत्तम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीके अनुसार ये दूत उन उन
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४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश राज्यों में भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के स्वामी (भोज) को प्रसन्न किया। इस प्रकार उसकी वचन-चातुरी से राजा चमत्कृत हुआ। गूर्जर देश के प्रति प्रयाण करनेका राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाण के समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया- ७२. चौल [ का राजा ] समुद्रकी गोद में प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वत की खोह में निवास कर रहा है, कर्णाट का राजा पट्ट बंध (पगडी बाँधना) नहीं करता है, गूर्जर [ का राजा ] निर्झर का आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अब्जों से म्लान होगया है और राजाओं में सुभट समान कान्यकुब्ज कूबडा होगया है- हे भोज ! तुम्हारे मात्र सेनातन्त्र के प्रसार के भय से ही सभी राजा लोग व्याकुल हो रहे हैं। ७३. कोंकण [ का राजा ] कोने में, लाट (नरेश) दरवाज़े के पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगन में सोया करते हैं। अरे कोशल [ नरेश ], तू अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसन पर सोया करते थे। इस प्रकार जिस (भोज) के कारागृह में रात में प्रत्यार्थियों में स्थानप्राप्तिके लिये उठा हुआ पारस्परिक विरोध निरन्तर बढ़ता रहता है। प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्षुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी जमीनपर सुस्थ भारसे सोये हुए तैलप राजाको उठाने लगा। तैलपने उससे कहा-'मै तो यहाँ पुश्त-दर-पुश्त से बास कर रहा हूँ, आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ?' राजा भोजने हँसकर डामर से नाटकके रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-'महाराज ! यद्यपि नाटक में रसकी जमावट बहुत उत्तम है तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्त से जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है। क्यों कि राजा तैलपदेव सूलीपर चढ़ाये हुए मुण्ड के सिरसे पहचाना जाता है।' सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्री के साथ, जो दूसरों के जुटाये न जुट सकती थी, तैलङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया। ४९) बादमें तैलपदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें उसे डामर ने [अपने] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि भीम भी चढ़कर भोगपुरतक आ गया है। जलेपर नमक छिड़कने के समान उसकी उस बात से राजा भोज खूब शंकित हो गया। उसने डामर से कहा- इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आने से रोको। उसने बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसर के जाननेवाले [डामर] को हाथी के साथ हथिनी भेंट दी। उनको लेकर वह पत्तन में आया और भीमको परितुष्ट किया। ५०) एक बार, जब वह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुन का राधा-वेध (मत्स्य-वेध) सुनकर सोचा कि 'अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्रुतित राधावेधको उसने सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियों को जान हो इसलिये नगर में खूब सजावट कराई। किन्तु एक तेली और एक दर्जीके, अवज्ञासे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, राजाको उसकी खबर की गई। तेलीने चंद्रशाला (ऊपरी छत) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रखे हुए संकडे मुँहके पात्रमें तेल डालकर; और दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके दोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें
पिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया; और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा कर दिखावै' ऐसा कह कर राजाका गर्व खंडित किया । [ उसका राधावेध करना देखकर किसो कविने उसकी प्रशंसा में कहा- ] ७४. हे भोजराज ! मैने राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के विपरीत ( राधा ) को नही सह सकते । ५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होते हुए उस राजाको नया नगर बसानेकी इच्छा हुई तो उसने पटह बजवाया । उस समय धारा नामरू एक वेश्या अपने अग्निबेताल नामक पतिके साथ लंका जाकर उस नगरका निवेश देख आई; और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, लंकाका प्रतिच्छन्द पट (मानचित्र) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी बसाई । * दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना । ५२) किसी दिन वह राजा सायंकालके सर्वावसरके बाद अपने नगरके भीतर [ धीरचर्या निमित्त ] घूम रहा था, उसी समय किसी दिगंबर विद्वान्को यह कविता पढ़ते सुना- ७५. न किसी सुभटके सिरपर खड्गके टुकड़े किये, न तेजी घोड़ोंपर सवारी ही की और न गोरी स्त्रीको गले ही लगाई-इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया । राजाने सबेरे ही उसको बुलाकर और वह संकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूंछी । वह बोला- ७६. महाराज ! रमणीय दीपोत्सवके बीत जानेपर जब हाथियोंका मद झरने लगेगा तो मैं अपनी शक्तिसे गौड़देश के साथ सारे दक्षिणापथको एक छत्र नीचे कर दूँगा । उसने अपना ऐसा पौरुष प्रकट किया तो राजाने उसे [ योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर अभिषिक्त किया । कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई । ५३) इधर, जब राजा भीम सिन्धु देशकी विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे सामन्तोंके साथ, अणहिल्लपुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियाँ वपन कराकर उसने जयपत्र ग्रहण किया । तबसे सर्वत्र "कुलचन्द्रने लूट लिया" [ कहावत ] की प्रसिद्धि हुई । वह जयपत्र लेकर मालवामें गया । श्री भोज को यह वृत्तान्त विदित किया । 'तुमने वहाँपर कोयला क्यों नही बोया ? [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह सूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँसे कर वसूल होकर गूर्जर देश में जायगा ।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठाभरण श्रीभोजने [ यह भविष्यवचन ] कहा । ५४) एक बार चन्द्रातप (चाँदनी) में श्रीभोज राजा बैठे थे, पास-ही-में कुलचंद्र भी था। पूर्ण चन्द्रमण्डलको देखकर [पुनः पुनः उसकी ओर देखकर ] (राजाने) यह पढ़ा- ७७. जिन लोगोंकी रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये शीतल है; किन्तु विरहियोंके लिये तो उल्काके समान सन्तापदायक है । उस कविके इस प्रकार आधा कहनेपर कुलचन्द्र बोला- हम लोगोंके न तो प्रिया है और न विरह है, इसलिये दोनों ओरसे भ्रष्ट होनेके कारण हमको तो चंद्रमा दर्पणकी आकृतिके समान दिखाई देता है । न वह उष्ण है, न शीतल । ऐसा कहनेके अनन्तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई । * ११-१२
४२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रभाव ५५) इसके बाद, मालव मण्डलसे लौटे हुए डामर नामक सन्धि-विग्रहिकने भोजकी सभाका वर्णन करते हुए [ सबको ] बहुत आश्चर्य उत्पन्न किया।' और यहाँ (मालवमें) जाकर भीमके अलौकिक रूप सौन्दर्यके वर्णनसे भोजको उसे देखनेकी इच्छासे चञ्चल कर दिया। भोजने अनुरोध किया कि 'या तो भीमको यहाँ ले आओ या मुझे वहाँ ले चलो।' इसी तरह भोजकी सभाको देखनेके लिये उत्कण्ठित भीमने भी वैसा ही अनुरोध किया। किसी एक समय, उपायोंका जाननेवाला वह (डामर) बहुतसा उपहार लेकर भीमको, जो विप्रका वेश धारण किए हुए था और हाथमें पानदान लिये था, साथ लेकर भोजकी सभामें गया। प्रणाम करते हुए उस डामर को [भोजने भीमके] ले आनेके वृत्तान्तके बारेमें पूछा। उसने कहा- 'हमारे स्वामी स्वतन्त्र हैं, जो काम उनको अभिमत नहीं उसे जबर्दस्ती कौन करा सकता है। महाराजको ऐसी दुराशा सर्वथा धारण नहीं करना चाहिये।' भोजने भीमकी उम्र, वर्ण और आकृति पूछी। डामरने सभामें बैठे हुए लोगोंके देखते हुए, पान-दान धारण करनेवालेको लक्ष्य करके कहा-स्वामिन् ! ७८. यही आकृति है, यही वर्ण है, यही रूप और यही अवस्था है। इसमें और उस राजामें अन्तर केवल काच और मणिके समान है। इस प्रकार उसके बतानेपर, चतुर चक्रवर्ती भोजने सामुद्रिक शास्त्रके आधारपर, उस निश्चल दृष्टि- वालेको ही राजा [यही भीम है ऐसा] जब समझ लिया तो, उपायत वस्तुयें (भेंटकी चीजें) ले आनेके बहानेसे उस सन्धि-विग्रहिक (डामर) ने उसे बाहर भेज दिया। जब वे (भेंटकी) चीजें आ गई तो डामरने उनका गुण वर्णन करके तथा इधर उधरकी बातें करके बहुत-सा काल काट दिया। जब राजाने कहा कि-'वह पान-दानवाला अभीतक क्यों नहीं आया, कितना विलम्ब करता है!' तो उस (डामर) ने बताया कि वही तो भीम था। तब राजा उसके पीछे सैन्य दौड़ाने लगा। इसपर डामरने कहा-'बारह बारह योजनके अन्तरपर सवारीके घोड़े खड़े हैं, और एक घड़ीमें योजनभर चली जानेवाली करभियों (साँठनियों) रखी हैं। इन सारी सामग्रियोंसे भीम प्रतिक्षण बहुत-सी भूमि तय करता चला जा रहा है। आप उसे कैसे पकड़ेंगे?' उसके ऐसा बतानेपर वह देर तक हाथ मलता रहा। [यहाँपर Pb संज्ञक आदर्शमें निम्नलिखित प्रकरण अधिक पाये जाते हैं-] इसके बाद एक दूसरे साल, भीम उस डामर को मालव मण्डल में भेजनेकी इच्छासे वार्ता आदि (नीति) सिखा रहा था। डामर ने उठकर वस्त्र झाड़ लिया। तब भीम ने [कारण] पूछा। वह बोला- आपका सिखाया हुआ यहीं छोड़ जाता हूँ। क्यों कि वहाँ जाकर तो मुझे स्वयं ही अवसरोचित बोलना पड़ेगा। दूसरेका सिखाया कितना काम आ सकता है। इसके बाद राजाने उसकी अवसरोचित चातुरी जाननेके लिये, प्रच्छन्न भावसे, सोनेके डिब्बेको राखसे भरकर उसके हाथमें, यह सिखाकर भेंट देनेको कहा कि भोजकी सभाके सिवा अन्यत्र कहीं भी इसे न खोलना। उसे लेकर वह मालवमें गया। भोज की सभामें जाकर उस डिब्बेको, जो अनेक रेशमी वस्त्रोंसे वेष्टित था, राजाको भेंट किया। जब राजाने उसे खोलकर देखा तो भीतर राखका पुञ्ज था। तब राजाने कहा-'अजी, यह कैसी भेंट है?' हाज़िर जवाब डामर ने तत्काल कहा-'महाराज श्रीभीम ने एक कोटिहोम कराया है। यह उसीकी रक्षा है, जो तीर्थके समान पवित्र है। प्रीति-सम्बन्धसे उन्होंने आपको भेंट किया है।' उसके ऐसा कहनेपर, राजाने प्रसन्न होकर, अपने हाथसे सब लोगोंको वह थोड़ी थोड़ी दी। उन सबोंने उससे तिलक करके उसका वंदन किया। अन्तःपुरमें भी वह रक्षा भेजी गई। बादमें वह डामर सम्मानित होकर, प्रति-प्राभृतके (भेंटके बदलेमें दी हुई भेंटके) साथ लौट आया। भीम को जब यह वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो उसने भी उसकी पूजा (सम्मानना) की।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
प्रकरण ५६ ] महाकवि माघका प्रबन्ध [ ४३ पुनः एक बार भीमके चित्तमें कौतुक उत्पन्न हुआ। उसने एक बार डामरके हाथमें अपनी मुद्रासे मुद्रित (मुहर किया हुआ) लेख दिया और हाथमें भेंटकी सामग्री देकर उसे मालवामें भेजा। उसने उस भेंटके साथ वह लेख राजाको दिया। राजाने जब खोलकर पढ़ा तो, उसमें लिखा मिला कि-‘इसको आप शीघ्र ही मार डालिये।' तब विस्मयके साथ राजाने पूछा-‘अजी, इसमें यह क्या लिखा है?' तब उस शीघ्रबुद्धिने कहा-‘महाराज ! मेरी जन्म-पत्रिका में ऐसा लिखा है कि जहाँ इसका रुधिर पड़ेगा वहाँ बारह वर्षतक अकाल पड़ेगा। यही जानकर भीमने, स्वदेशके विनाशसे भीत होकर, प्रच्छन्न लेखके साथ मुझे यहाँ भेजा है। ऐसी स्थिति होनेपर आप अपनी रुचिके अनुसार करें।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने कहा-‘मैं अपने देशकी प्रजाको अनर्थमें नहीं पड़ने दूंगा।' इसके बाद, उसका सम्मान करके उसे विदा किया और वह अपने देशमें आया। उसकी बुद्धिके कौशलसे चमत्कृत होकर भीम उसे बहुत मानने लगा। * महाकवि माघका प्रबन्ध । ५६) इसके बाद, भोजराजा माघ पंडितकी विद्वत्ता और पुण्यवत्ताको सदा सुनकर उसके दर्शनकी उत्सुकतासे अनेक राजकीय आदेश बारंबार भेजकर श्रीमालनगरसे जाड़ेके दिनोंमें उसे अपने यहाँ बुलाया और अत्यन्त मानके साथ भोजनादिसे उसका सत्कार किया। बादमें राजोचित विनोदोंको दिखाकर और रातकी आरतीके अनन्तर अपने निकट ही, अपने ही समान पलँगपर सुलाकर, उसे अपनी निजकी शीतरक्षिका (रजाई, लिहाफ) ओढ़ने दी और चिरकाल तक उसके साथ प्रिय आलाप करता हुआ सुखपूर्वक सो गया। प्रातःकाल मांगल्य तूर्यनादसे जब राजाकी नींद खुली तो माघ पंडितने घर जानेके लिये विदा माँगी। राजाने विस्मित होकर अगले दिनके भोजन आच्छादन आदिके सुखकी बात पूँछी। उसने कहा-‘उस अच्छे- बुरे अन्नकी बात रहने दीजिये।' और कहा कि शीतरक्षिका (रजाई) के भारसे तो मैं थक-सा गया। राजाने अपना खेद प्रकट करते हुए किसी प्रकार जानेकी अनुज्ञा दी। नगरके उपवन तक राजाने अनुगमन किया। माघ पंडितने भी कहा कि कभी अपने आगमनसे मुझे भी धन्य करें। राजाकी अनुज्ञा लेकर माघ पंडित अपने स्थानपर आया। उसके बाद, कितनेएक दिन बीतनेपर, भोज राजा उसकी विभव- सामग्री देखनेकी इच्छासे श्रीमालनगरमें आया। माघ पंडितके द्वारा अगवानी आदिसे यथोचित सत्कृत होकर वह अपनी सारी सेनाके साथ उसकी घुड़सालमें ठहरा। फिर वह अकेला माघ पंडितके महलमें गया। वहाँ उसने सञ्चारक भूमि (महलमें जानेकी पगडंडी) को काचसे जड़ी देखी। स्नान करनेके बाद, देवताके मन्दिरमें जानेपर, वहाँकी भूमिपर, जिसका गच मरकतका था, शैवाल सहित जलकी भ्रान्तिसे धोती और चादरको समेटने लगा। तब पुरोहितने उसका स्वरूप बतलाया। फिर देवताकी पूजा की। बाद जब मंत्रावसर समाप्त हुआ तो, भोजनके समय आई हुई रसोईका आस्वादन किया। ऐसे ऐसे व्यंजनों और फलोंको देखकर, जो उस काल और उस देशमें नहीं होते थे, वह चित्तमें बड़ा विस्मित हुआ। संस्कार किये दूध और चावलकी बनी रसोईका आकण्ठ उपभोग किया। भोजनके अन्तमें चन्द्रशालापर आरोहण करके, ऐसे ऐसे काव्यों, कथाओं, इतिहासों और नाटकोंको देखा, जिन्हें इसके पहले कहीं देखा या सुना नहीं था। जाड़ेके दिनोंमें भी उसे अकस्मात् उग्र ग्रीष्म ऋतु हो जानेकी भ्रान्ति हुई। उस समय सफेद स्वच्छ वस्त्र पहने, हाथमें तालके पंखे लिये हुए अनुचर उसको हवा करने लगे। उसके वस्त्रोंमें सुन्दर चन्दन लेप दिया गया और उस रातको उसने क्षणभरकी नांई बिता दी। सवेरे जब शंखके नादसे राजाकी नींद खुली तो माघ पंडितने शीतकालमें अक- स्मात् कैसे ग्रीष्म ऋतु उतर आई इसका स्वरूप समझाया। [इस प्रकार प्रत्येक क्षण विस्मयके साथ बिताता हुआ
४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक यहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये विदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डलको प्रस्थान किया। माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा था कि पहिले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही संख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विरिसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ मालव मण्डल में जा कर धारा नगरी में वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वयं उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा। उधर भोजने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर संभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुदवनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। घूक हर्ष छोड़ रहा है और चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ही' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोज ने कहा कि सारे प्रबंधकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे विदा किया। वह भी जब वहाँसे चली तो याचकोंने उसे माघ की पत्नी समझकर माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और स्वयं ज्यों की त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिसे, जिसके चरनमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ वह बोला- ८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाथ भी संकुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप लगता है। अतः हे प्राणों! तुम स्वयं चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे क्या होगा !। ८१. दारिद्रयकी आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलसे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी आशा भंग करनेमे जो [सन्ताप] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ! । ८२. अकालमें भिक्षा कहाँ ? बुरी अवस्थावालोंको ऋण क्योंकर मिले ! भू-स्वामियोंसे काम क्योंकर
प्रकरण ५६-५७ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ४१ कराते [ । और दान भी कौन देना चाहे, जब कि ] बिना दान दिये यह सूर्य भी अस्त हो जाता है । [ इस प्रकार ] हे गृहिणी ! कहाँ जायें, और क्या करें ? जीवन-विधि बड़ा गहन हो गया है । ८३. भूखसे कातर बना हुआ यह पथिक मेरा घर पूछते पूछते कहींसे आया है, सो हे गृहिणी ! क्या कुछ है कि इस बुभुक्षितको खानेको दिया जाय ?'-पत्नीने वचनसे तो 'है' यह कहालेकिन फिर 'नहीं है' यह बात बिना अक्षरोंके ही, चंचल नेत्रोंसे टपकते हुए बड़े बड़े अश्रुबिन्दुओंसे सूचित की । ८४. हे प्राणों ! जाओ, याचकके व्यर्थ लौट जानेपर, चले जाओ; बादको भी तो जाना है; 'फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ?' 'फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ?'-इस वाक्यके बोलते ही माघ पण्डितकी मृत्यु हो गई । प्रातःकाल राजा भोजने उस वृत्तान्तको सुनकर, श्रीमालनगरमें [ अनेक ] धनवान् सजातियोंके रहते हुए भी, जो ऐसा पुरुष-रत्न क्षुधापीडित हो कर मर गया, इसलिये उसने उस जातिका नाम 'भिल्लमाल' * ऐसा रख दिया । इस प्रकार श्री माघपण्डितका प्रबन्ध समाप्त हुआ । * महाकवि धनपालका प्रबन्ध । ५७) प्राचीन कालमें, समृद्धिसे विशाल ऐसी विशाला (उज्जयिनी) नामक नगरीमें, मध्यदेशोत्पन्न सं का श्य गोत्रीय सर्वदेव नामक ब्राह्मण वास करता था। जैनदर्शनके संसर्गसे उसका मिथ्यात्व प्रायः शान्त हो गया था । उसके दो पुत्र थे जिनका नाम धनपाल और शोभन था । एक बार श्रीवर्द्धमान सूरि वहाँ आये । गुणानुरागी होनेके कारण सर्वदेव ने उन्हें अपने उपाश्रयमें निवास कराया और अपनी अनन्य भक्तिसे उन्हें सन्तुष्ट किया । उन्हें 'सर्वज्ञ-पुत्रक' जानकर गुम हो जानेवाली पूर्वजोंकी निधिके बारेमें पूँछा । उन्होंने वचन- चातुरीसे पुत्रोंका आधा हिस्सा माँग लिया । संकेत बतानेपर निधि मिली । जब वह आधा भाग देने लगा तो सूरिने दोनों पुत्रोंमेंसे आधा हिस्सा माँगा । धनपाल ने, जिसकी मति मिथ्यात्वके कारण अन्धी हो रही थी, जैन मार्गकी निन्दा करते हुए नहीं कर दी । छोटे लड़के शोभन पर कृपा-परायण हो कर, पिताने उसको देना नहीं चाहा । इसपर उसने अपनी प्रतिज्ञाके भंग होनेके पापको तीर्थमें जाकर प्रक्षालन करनेकी इच्छासे, तीर्थोके प्रति प्रस्थान करना निश्चित किया । पितृभक्त शोभन नामक छोटे पुत्रने, उसको उस आग्रहसे रोककर, पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जैन दीक्षाव्रत ग्रहण कर स्वयं गुरुका अनुसरण किया । धनपाल समस्त विद्याओंका अध्ययन करके श्री भोज के प्रसाद-प्राप्त समस्त पंडित-मण्डलमें सुप्रतिष्ठ हुआ और फिर अपने सहोदरकी ईर्ष्यासे बारह वर्षतक अपने देशमें जैन दर्शनियोंका आगमन निषिद्ध कराया ।
- श्रीमाल नगरका दूसरा नाम भिल्लमाल भी है । वर्तमानमें वह स्थान इसी नामसे प्रसिद्ध है । श्रीमाली जातिके वैश्य और ब्राह्मण कुल इसी स्थानसे निकले हुए हैं । श्रीमालका दूसरा नाम भिल्लमाल ऐसा कब और क्यों पड़ा इसका अन्य कोई दूसरा ऐतिहासिक उल्लेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ । महाकवि माघकी जन्मभूमि श्रीमाल थी यह बात कविके कथन ही से सिद्ध होती है, लेकिन उसकी मृत्युका जो यह करुण वृत्तान्त मेरुतुङ्गाचार्यने लिखा है और उसी प्रसङ्ग परसे भोज राजा ने श्री मालका नाम भिल्लमाल रख दिया यह जो उल्लेख किया है, इसकी सत्यताके लिये और कोई सुनिश्चित प्रमाण जबतक प्राप्त न हो तबतक इस कथनको एक किंवदन्तीके रूपमें ही समझना चाहिए । माघ और भोजकी समकालीनता भी सन्दिग्ध है । और कम से कम यह भोज प्रसिद्ध धारापति परमारवंशीय राजा भोज तो किसी तरह सम्भवित नहीं है । इसकी विशेष विवेचना अगले ऐतिहासिक अवलोकनवाले संदर्भमें की जायगी ।
४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक यहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये बिदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डल को प्रस्थान किया। माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही सङ्ख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विधिसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ मालव मण्डल में जा कर धारा नगरी में वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वय उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा। उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुद्वनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। घूक हर्ष छोड़ रहा है और चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ह्री' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोजने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे बिदा किया। वह भी जब वहाँसे चली तो याचकों ने उसे माघ की पत्नी समझकर माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और व्यर्थ ज्यों की त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिको, जिसके चरणमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ यह बोला- ८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाथ भी सङ्कुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप लगता है। अतः हे प्राणों ! तुम स्वय चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे क्या होगा !। ८१. दरिद्रता आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलमे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी आशा भग करनेसे जो [ सन्ताप ] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ?। ८२. अकालमे भिक्षा कहाँ ! बुरी अवस्थावालोको ऋण क्योंकर मिले ! भूस्वामियोंसे काम क्योंकर
प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७ ८८. अहो ! मैने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है । ८९. हे जिन ! जबतक मैने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है । जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और कोई सफेद वस्तु, नजर नहीं आती । [ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ़ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरेको पीड़ा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्थ ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं ! इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा । धनपाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बड़े दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया । उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लौट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैने [इसके लिये] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ ( बलिदान ) क्यों नहीं करते ? उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप ( यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शुक संवाद में कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस-प्रकृति हैं, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया ।
४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश उस देशके उपासकोंद्वारा अत्यन्त अभ्यर्थनाके साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शास्त्ररूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर लेनेवाला वह शोभन नामक तपोधन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया । धारा में प्रवेश करते ही, पडित धनपालने, जो उस समय राजपाटिका में [ राजाके साथ ] भ्रमणमें जा रहा था, उसे न पहचान कर, उपहासके साथ कहा- 'गर्दभदन्त ( गधेके समान दाँतवाले) भदन्त, तुमको नमस्कार !' इसपर उसने- 'कपिके वृषणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें सुख हो !' [ इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया । तब चमत्कृत होकर धनपालने सोचा कि मैने तो दिल्लगी में भी 'नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो' ] इतना ही कहकर अपनी वचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर धनपालके यह कहने पर कि 'आप किसके अतिथि हैं ?' शोभनमुनि ने कहा- 'हमें आपके ही अतिथि समझिये !' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके साथ उन्हें अपने स्थानपर भेजकर वहीं ठहराया । स्वय घर आकर धनपाल ने प्रिय आलापोंके साथ उसे सपरिकर भोजनके लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोधन तो प्रातुक ( अनुद्दिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये उन्होंने निषेध किया । आग्रहपूर्वक जब उसने दोषका हेतु पूँछा तो कहा- ८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु बृहस्पति के समान श्रेष्ठ कुलीन एक ही गृहस्थके यहाँ भोजन न करे । इसी प्रकार जैन धर्मके दशवैकालिक सूत्रमें भी कथन है- ८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानोंमेंसे अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं बुद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते हैं । इस प्रकार, अपने धर्मसे और परधर्मसे भी, निषिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं । धनपाल उनके चरित्रसे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला गया । स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्याके लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा । उन्हें एक ब्राह्मणी, रसोई तैयार न होनेके कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूँछा कि दही कितने दिनोंका है ? तो धनपाल ने मजाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमें कीड़े पड़ गये हैं?' ब्राह्मणीने जनाब दिया कि इसे दो दिन बीत चुके हैं । यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर धनपाल उसे देखनेके लिये स्नानसे उठकर वहाँ आया । पात्रमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर ( लाख ) का ढेला रखा जिस पर उन जीवोंने चढ़कर उसे दहीके समान ही सफेद कर दिया । धनपाल ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीव रक्षाकी ही प्रधानता है; और उसमें भी जीवोत्पत्ति विषयक ज्ञानका वैदग्ध्य [विशिष्ट प्रकारका ] है । जैसा कि कहा है- ८७. मूग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो कच्चे गोरसमें पड़े तो उसमें त्रस (द्विइन्द्रियादि) जीवोंकी उत्पत्ति होती है; और तीन दिनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है । यह बात एक जैन शास्त्रमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शोभनमुनिके शुभोपदेशसे सम्यक् विश्वास पूर्वक उसने सम्यक्त्व (जैन धर्म) ग्रहण किया । [ इतने दिनोंके बाद अपने मिथ्यात्वको समझते हुए, सो मनसे ही पूँछा कि मेरे भाईको भी कहीं देखा है ? शोभन ने वय, आस्था और गुण आदिमें अपने-ही-से उसकी तुलना की । इसपर उसने अनुमानसे समझा कि यही मेरा भाई है । यह निश्चय करके आनन्दाश्रु त्याग करते हुए उसे आलिंगन करके अपने लडकेको भेज कर उसके गुरुको भी बुलवाया।] स्वभावतः ही धनपाल बडा बुद्धिमान था अतएव कर्म्मप्रकृति प्रभृति जैन-विचार-ग्रन्थोंमें भी बड़ा प्रवीण हुआ । प्रति दिन सबेरे जिन पूजाके अन्तमें-
प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७ ८८. अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है । ८९. हे जिन ! जबतक मैंने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है । जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और कोई सफेद वस्तु नजर नहीं आती । [ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरोको पीडा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्व ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं ! इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा । धनपाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बडे दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया । उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लोट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैंने [ इसके लिये ] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ ( बलिदान ) क्यों नहीं करते ! उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप (यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् (काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शुक संवादमें कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस्र-प्रकृति हैं, बहुरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया ।
४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश [ इस जगह Pb आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निम्नलिखित कथोपकथन अधिक लिखा हुआ पाया जाता है । ] इसके बाद जब राजा गौकी वन्दना करने लगा तो धनपाल भैंसको नमस्कार करता हुआ बोला- [ ५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है, खुराग्रसे और सींगसे जीवोंको मारती है । हे राजन् ! ऐसी यह गौ किस गुणसे वन्दनीय है ? । [ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ? भैंससे इसमें थोड़ी भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती । [ ५९ ] अमेध्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पापको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष वन्दनीय है, छागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्गमें पहुँचता है, छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष हैं, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता है - इस प्रकारकी स्पष्ट दोषयुक्त और व्यर्थ श्रुतियोंके वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है ! [ ६० ] जिनका [ प्राणी- ] वध तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ वन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता है, और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो ! एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूसरोंसे पंडित ( धनपाल ) की विशेष एकाग्रता जानकर राजाने फूलकी डाली देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। धनपाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यों ही घूमकर जिन देवकी पूजा करके चला आया । चार पुरुषके मुँहसे राजाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूँछा। उसने कहा कि महाराज ! जहाँ [ पूजाका उचित ] अवसर हुआ वहाँ पूजा की । राजाने पूछा-' अवसर कहाँ नहीं हुआ ?' पण्डित बोला-विष्णुके पास एकान्त कलत्र होनेसे; रुद्रके आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भयसे कि कहीं ध्यानभंग होनेके कारण शाप न दे दें; विनायकके यहाँ इसलिये कि ये थालीभर मोदक खा रहे थे, उनका स्पर्श मैंने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलाग्रसे संत्रस्त महिष मेरे सामने न आ जाय इस भयसे, हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठें; इस तरह, [ इन देवोंके स्थानमें ] कहीं भी अवसर नहीं हुआ । और भी [ शिवलिंगको देखकर तो मनमें विचार आया कि - ] [ ६१ ] इसके शिरके बिना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पट्ट बन्ध कैसे हो ? जिसके कान और आँख नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य कैसे ? और जिसके पैर ही नहीं उसको मेरा प्रणाम कैसा ? इत्यादि बातें कहने पर, राजाने कहा-'फिर अवसर हुआ भी कहीं ?' तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्नं' और 'नेत्रे सारसुधा' इत्यादि ( वचन बोलकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार ] जैनालय में सदा अवसर रहता है, अतः वही मैने पूजा की । . [ ६२ ] इसके बाद-एक दूसरे दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें शृंगीगणको देख कर राजाने धनपाल से पूछा कि-यह दुर्बल क्यों है ? वह बोला-[ शृंगी शिवकी निम्न प्रकारकी विचित्र ] लीलायें देखकर सोचता रहता है कि- [ ६३ ] यदि यह (शिव) दिगंबर है तो इसकी धनुष्यसे क्या काम है ? अगर धनुष्य है ही तो भस्म क्यों ! यदि भस्म भी हुआ तो स्त्री क्यों ? और यदि स्त्री है तो फिर कामसे द्वेष क्यों है ?-इस प्रकारकी अपने स्वामीकी परस्पर विरुद्ध चेष्टाओंको देखकर [ यह शृंगी हैरान हो रहा है और इसी लिये ] शिराओंसे गाढ बँधे हुए अस्थि-शेष शरीरको धारण कर रहा है ।