प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक यहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये बिदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डल को प्रस्थान किया। माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही सङ्ख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विधिसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ मालव मण्डल में जा कर धारा नगरी में वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वय उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा। उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुद्वनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। घूक हर्ष छोड़ रहा है और चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ह्री' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोजने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे बिदा किया। वह भी जब वहाँसे चली तो याचकों ने उसे माघ की पत्नी समझकर माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और व्यर्थ ज्यों की त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिको, जिसके चरणमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ यह बोला- ८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाथ भी सङ्कुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप लगता है। अतः हे प्राणों ! तुम स्वय चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे क्या होगा !। ८१. दरिद्रता आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलमे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी आशा भग करनेसे जो [ सन्ताप ] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ?। ८२. अकालमे भिक्षा कहाँ ! बुरी अवस्थावालोको ऋण क्योंकर मिले ! भूस्वामियोंसे काम क्योंकर