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प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक यहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये बिदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डल को प्रस्थान किया। माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही सङ्ख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विधिसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ मालव मण्डल में जा कर धारा नगरी में वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वय उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा। उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुद्वनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। घूक हर्ष छोड़ रहा है और चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ह्री' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोजने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे बिदा किया। वह भी जब वहाँसे चली तो याचकों ने उसे माघ की पत्नी समझकर माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और व्यर्थ ज्यों की त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिको, जिसके चरणमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ यह बोला- ८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाथ भी सङ्कुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप लगता है। अतः हे प्राणों ! तुम स्वय चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे क्या होगा !। ८१. दरिद्रता आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलमे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी आशा भग करनेसे जो [ सन्ताप ] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ?। ८२. अकालमे भिक्षा कहाँ ! बुरी अवस्थावालोको ऋण क्योंकर मिले ! भूस्वामियोंसे काम क्योंकर

प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७ ८८. अहो ! मैने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है । ८९. हे जिन ! जबतक मैने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है । जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और कोई सफेद वस्तु, नजर नहीं आती । [ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ़ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरेको पीड़ा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्थ ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं ! इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा । धनपाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बड़े दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया । उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लौट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैने [इसके लिये] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ ( बलिदान ) क्यों नहीं करते ? उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप ( यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शुक संवाद में कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस-प्रकृति हैं, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया ।

४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश उस देशके उपासकोंद्वारा अत्यन्त अभ्यर्थनाके साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शास्त्ररूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर लेनेवाला वह शोभन नामक तपोधन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया । धारा में प्रवेश करते ही, पडित धनपालने, जो उस समय राजपाटिका में [ राजाके साथ ] भ्रमणमें जा रहा था, उसे न पहचान कर, उपहासके साथ कहा- 'गर्दभदन्त ( गधेके समान दाँतवाले) भदन्त, तुमको नमस्कार !' इसपर उसने- 'कपिके वृषणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें सुख हो !' [ इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया । तब चमत्कृत होकर धनपालने सोचा कि मैने तो दिल्लगी में भी 'नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो' ] इतना ही कहकर अपनी वचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर धनपालके यह कहने पर कि 'आप किसके अतिथि हैं ?' शोभनमुनि ने कहा- 'हमें आपके ही अतिथि समझिये !' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके साथ उन्हें अपने स्थानपर भेजकर वहीं ठहराया । स्वय घर आकर धनपाल ने प्रिय आलापोंके साथ उसे सपरिकर भोजनके लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोधन तो प्रातुक ( अनुद्दिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये उन्होंने निषेध किया । आग्रहपूर्वक जब उसने दोषका हेतु पूँछा तो कहा- ८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु बृहस्पति के समान श्रेष्ठ कुलीन एक ही गृहस्थके यहाँ भोजन न करे । इसी प्रकार जैन धर्मके दशवैकालिक सूत्रमें भी कथन है- ८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानोंमेंसे अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं बुद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते हैं । इस प्रकार, अपने धर्मसे और परधर्मसे भी, निषिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं । धनपाल उनके चरित्रसे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला गया । स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्याके लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा । उन्हें एक ब्राह्मणी, रसोई तैयार न होनेके कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूँछा कि दही कितने दिनोंका है ? तो धनपाल ने मजाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमें कीड़े पड़ गये हैं?' ब्राह्मणीने जनाब दिया कि इसे दो दिन बीत चुके हैं । यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर धनपाल उसे देखनेके लिये स्नानसे उठकर वहाँ आया । पात्रमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर ( लाख ) का ढेला रखा जिस पर उन जीवोंने चढ़कर उसे दहीके समान ही सफेद कर दिया । धनपाल ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीव रक्षाकी ही प्रधानता है; और उसमें भी जीवोत्पत्ति विषयक ज्ञानका वैदग्ध्य [विशिष्ट प्रकारका ] है । जैसा कि कहा है- ८७. मूग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो कच्चे गोरसमें पड़े तो उसमें त्रस (द्विइन्द्रियादि) जीवोंकी उत्पत्ति होती है; और तीन दिनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है । यह बात एक जैन शास्त्रमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शोभनमुनिके शुभोपदेशसे सम्यक् विश्वास पूर्वक उसने सम्यक्त्व (जैन धर्म) ग्रहण किया । [ इतने दिनोंके बाद अपने मिथ्यात्वको समझते हुए, सो मनसे ही पूँछा कि मेरे भाईको भी कहीं देखा है ? शोभन ने वय, आस्था और गुण आदिमें अपने-ही-से उसकी तुलना की । इसपर उसने अनुमानसे समझा कि यही मेरा भाई है । यह निश्चय करके आनन्दाश्रु त्याग करते हुए उसे आलिंगन करके अपने लडकेको भेज कर उसके गुरुको भी बुलवाया।] स्वभावतः ही धनपाल बडा बुद्धिमान था अतएव कर्म्मप्रकृति प्रभृति जैन-विचार-ग्रन्थोंमें भी बड़ा प्रवीण हुआ । प्रति दिन सबेरे जिन पूजाके अन्तमें-

प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७ ८८. अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है । ८९. हे जिन ! जबतक मैंने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है । जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और कोई सफेद वस्तु नजर नहीं आती । [ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरोको पीडा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्व ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं ! इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा । धनपाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बडे दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया । उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लोट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैंने [ इसके लिये ] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ ( बलिदान ) क्यों नहीं करते ! उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप (यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् (काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शुक संवादमें कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस्र-प्रकृति हैं, बहुरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया ।

४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश [ इस जगह Pb आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निम्नलिखित कथोपकथन अधिक लिखा हुआ पाया जाता है । ] इसके बाद जब राजा गौकी वन्दना करने लगा तो धनपाल भैंसको नमस्कार करता हुआ बोला- [ ५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है, खुराग्रसे और सींगसे जीवोंको मारती है । हे राजन् ! ऐसी यह गौ किस गुणसे वन्दनीय है ? । [ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ? भैंससे इसमें थोड़ी भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती । [ ५९ ] अमेध्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पापको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष वन्दनीय है, छागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्गमें पहुँचता है, छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष हैं, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता है - इस प्रकारकी स्पष्ट दोषयुक्त और व्यर्थ श्रुतियोंके वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है ! [ ६० ] जिनका [ प्राणी- ] वध तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ वन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता है, और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो ! एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूसरोंसे पंडित ( धनपाल ) की विशेष एकाग्रता जानकर राजाने फूलकी डाली देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। धनपाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यों ही घूमकर जिन देवकी पूजा करके चला आया । चार पुरुषके मुँहसे राजाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूँछा। उसने कहा कि महाराज ! जहाँ [ पूजाका उचित ] अवसर हुआ वहाँ पूजा की । राजाने पूछा-' अवसर कहाँ नहीं हुआ ?' पण्डित बोला-विष्णुके पास एकान्त कलत्र होनेसे; रुद्रके आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भयसे कि कहीं ध्यानभंग होनेके कारण शाप न दे दें; विनायकके यहाँ इसलिये कि ये थालीभर मोदक खा रहे थे, उनका स्पर्श मैंने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलाग्रसे संत्रस्त महिष मेरे सामने न आ जाय इस भयसे, हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठें; इस तरह, [ इन देवोंके स्थानमें ] कहीं भी अवसर नहीं हुआ । और भी [ शिवलिंगको देखकर तो मनमें विचार आया कि - ] [ ६१ ] इसके शिरके बिना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पट्ट बन्ध कैसे हो ? जिसके कान और आँख नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य कैसे ? और जिसके पैर ही नहीं उसको मेरा प्रणाम कैसा ? इत्यादि बातें कहने पर, राजाने कहा-'फिर अवसर हुआ भी कहीं ?' तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्नं' और 'नेत्रे सारसुधा' इत्यादि ( वचन बोलकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार ] जैनालय में सदा अवसर रहता है, अतः वही मैने पूजा की । . [ ६२ ] इसके बाद-एक दूसरे दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें शृंगीगणको देख कर राजाने धनपाल से पूछा कि-यह दुर्बल क्यों है ? वह बोला-[ शृंगी शिवकी निम्न प्रकारकी विचित्र ] लीलायें देखकर सोचता रहता है कि- [ ६३ ] यदि यह (शिव) दिगंबर है तो इसकी धनुष्यसे क्या काम है ? अगर धनुष्य है ही तो भस्म क्यों ! यदि भस्म भी हुआ तो स्त्री क्यों ? और यदि स्त्री है तो फिर कामसे द्वेष क्यों है ?-इस प्रकारकी अपने स्वामीकी परस्पर विरुद्ध चेष्टाओंको देखकर [ यह शृंगी हैरान हो रहा है और इसी लिये ] शिराओंसे गाढ बँधे हुए अस्थि-शेष शरीरको धारण कर रहा है ।

प्रकरण ५८-७९ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४९ ५८) इसके अनन्तर एक बार राजा सरस्वतीकण्ठाभरण नामक प्रासादमें जा रहा था। उस समय धनपाल पण्डितसे, जो सदा सर्वज्ञ-शासन (जैन धर्म) की प्रशंसा किया करता था, पूछा कि 'सर्वज्ञ तो कभी एक बार हुए थे। पर अब भी उस धर्ममें क्या कुछ ज्ञानातिशय है ?' उसके ऐसा कहनेपर [धनपाल बोला-] 'अर्हत् विरचित (उपदिष्ट) अर्हन्तचूडामणि नामक ग्रन्थमें त्रैलोक्यके तीनों कालके वस्तु विषयके स्वरूपका परिज्ञान आज भी वर्त्तमान है।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने पूछा कि 'हम लोग अभी इस तीन दरवाजेके मण्डपमें स्थित हैं। किस रास्ते होकर यहाँसे बहार निकलेंगे?' राजाको इस प्रकार शास्त्रपर शुल्क लगानेको उद्यत होते देखकर उसने 'बुद्धि यह तेरहवीं मात्रा है' इस लोकोक्तिको सत्य करते हुए, भोजपत्रपर राजाके प्रश्नका निर्णय लिख कर उसे मिट्टीके गोलेमें रख दिया, और उसे ताम्बूलग्राहकको सौंपकर राजासे बोला कि 'महाराज, पधारिये !' राजाने अपनेको उसकी बुद्धिके जालमें फँसा समझा और सोचा कि इसने तीनमेंसे ही किसीका निर्णय किया होगा, इसलिये बढ़इयोंको बुलाकर मण्डपकी पद्मशिलाको हटवा दिया और उसी मार्गसे बहार निकला। फिर उस मिट्टीके गोलेको तोड़कर उसके लिखित अक्षरोंमें, निकलनेके लिये उसी मार्गके निर्णयको पढ़कर कौतुकसे चित्तमें चकित होता हुआ जैन धर्मकी ही प्रशंसा की। (यहाँ D पुस्तकमें निम्नलिखित पद्य अधिक पाये जाते हैं-) [ ६४ ] जो चीज विष्णु दो आँखोंसे, शिव तीनसे, ब्रह्मा आठसे, कार्तिकेय बारहसे, रावण बीससे, इन्द्र दस सौसे और जनता असंख्य नेत्रोंसे भी नहीं देख पाती, बुद्धिमान पुरुष उसीको एक प्रज्ञा- (बुद्धि) रूपी नेत्रसे स्पष्ट देख लेता है। (Pb आदर्शमें यहाँ निम्नलिखित एक और कथन अधिक पाया जाता है-) एक बार जलाशय (तालाब) के अच्छे-बुरे-पनके विषयमें पूछ हुई [सो पण्डितने कहा-] [ ६५ ] सचमुच ही तालाबोंमेंका ठंडा और चन्द्रमाकी किरणोंसे श्वेत बना हुआ जल खूब पी करके प्राणियोंकी सारी तृष्णा नष्ट हो जाती है और वे मनमें प्रमुदित होते हैं, परन्तु जब सूर्यकी किरणे उसे सोख लेती है तो [उसमेंके] अनन्त प्राणी विनष्ट हो जाते हैं और इसीलिये मुनि- लोग कुआँ बावड़ी आदिके बनानेके विषयमें उदासीन भाव प्रकट करते हैं। एक बार राजा अपने बनवाये हुए बहुत बड़े नये तालाबके पास गया। यहाँ पण्डितसे पूछा कि यह धर्मस्थान कैसा है। धनपाल बोला- [ ६६ ] तड़ागके बहाने यह आपकी [एक] दानशाला है जिसमें सदा ही मछली आदि जलजन्तु अच्छी तरहकी रसोई है और जिस स्थानपर बक, सारस, चक्रवाक आदि [मत्स्य भोजी दान ग्रहण करनेवाले] पात्र हैं, वहाँ कितना पुण्य होता होगा सो तो हम नहीं जान सकते। इससे राजा [मनमें] कुपित हुआ। नगरको आते समय वाटिकाके साथ एक बुढ़ियाको वृद्धावस्थासे सिर धुनती हुई देखकर राजाने पूछा-'यह सिर क्यों धुन रही है!' तब धनपाल बोला- [ ६७ ] क्या यह नदी है, या विष्णु? क्या कामदेव है या चन्द्रमा? क्या विधाता है अथवा विद्याधर है? क्या इन्द्र है, कि नल है, कि कुबेर है? ना, ना, यह नहीं है, यह भी नहीं है, यह भी नहीं है, बिल्कुल यह नहीं, यह भी नहीं, वह भी नहीं, और वह भी नहीं, यह तो क्रीड़ा करनेमें प्रवृत्त वैसा हे सखे ! स्वयं राजा भोजदेव है। [इसके सिरके धुननेका यह मतलब है-ऐसा कह कर] इस श्लोकसे रुष्ट राजा को सन्तुष्ट किया। १३-१४

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५० ] प्रबंधचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ५९) इसके बाद, धनपाल ने ऋषभपञ्चाशिका स्तुति की रचना की। सरस्वतीकण्ठाभरण प्रासाद में उसकी बनाई प्रशस्ति-पट्टिकामें किसी समय राजाने [ यह काव्य पढ़ा—] ९५. इसने [ अपने जन्ममें ] पृथ्वीका उद्धार किया, शत्रुके वक्षःस्थलको विदारण किया, और बलिकी राजलक्ष्मी (विष्णुके पक्षमें बलि नामक राजा और भोजके पक्षमें बलशाली राजा) को आत्मसात् किया। इस प्रकार इस युवकने ये काम एक ही जन्ममें किये जो पुराण पुरुष (विष्णु) ने तीन जन्ममें किये थे। इस काव्यको पढ़कर उसके पारितोषिकमें एक सोनेका कलश दिया। उस प्रासादसे निकलकर उसीके द्वारके खंभोंपर मूर्तिमान् मदनको, जो रतिके साथ हस्तताल (ताली) दे रहा था, देखकर राजाने धनपालसे उनके हंसनेका कारण पूछा। इस पर पंडित बोला— ९६. यह है त्रिभुवनमें संयमके लिये विख्यात ऐसा वह शिव, जो इस समय विरहकातर हो कर अपने शरीरमें ही स्त्रीको धारण किये है। इसीने हमें एक समय जीता था ! इस प्रकार प्रियाके हाथसे अपने हाथको बजाता हुआ और हंसता हुआ यह मदनदेव जयवान् हो रहा है। [यहाँ D पुस्तकमें "अज्ञाशेषे शिवमवने०" "दिव्यास्त्रं यदि तस्किमस्य धनुषा०" "अमेय्यमक्षाति०" "पय प्रदान०" "अस्तुत्युत्तमाङ्गे" इत्यादि पद्य पाये जाते हैं। पर चूंकि वे यहाँ अप्रासंगिक हैं और Pb आदर्शके अनुसार इसके पहले ही उल्लिखित हो चुके हैं इसलिये फिर उद्धृत नहीं किये गये।] ९७. पाणिग्रहणके समय शिवका जो भूतिभूषित शरीर पुलकित हुआ उसकी जय हो-जिस शरीरमें [पुलकके बहाने] भस्मावशेष मदन मानों फिर अंकुरित हुआ है। इस प्रकारके तथा इसीतरहके, अन्य अन्य प्रसिद्ध और सिद्ध सारस्वतकवियोंके काव्योंको कह कह कर जब धनपाल राजाको रञ्जित कर रहा था, उसी समय द्वारपालने एक व्यापारीका आना निवेदन किया। सभामें प्रवेश करके, राजाको नमस्कार कर, उसने मोमकी बनी पट्टीपर लिखे हुए कुछ काव्योंको दिखाया। राजाके उसके प्रास्थानके बारेमें पूछने पर वह बोला कि—'मेरा जहाज अकस्मात् समुद्रमें एक जगह रुक गया, जहाजियोंने खोज करके देखा तो वहाँ एक शिवमन्दिर मिला, जिसके ऊपर चारों ओर जल लहरा रहा है पर भीतर पानीका अभाव है। उन्होंने उसकी एक दीवाल पर अक्षर देखकर उसे जाननेकी इच्छासे उसपर मोमकी पट्टी लगा दी। उसी के उभड़े हुए अक्षर इस पट्टीपर हैं। राजाने जब यह सुना तो, उसपर [वैसी ही] मिट्टीकी पट्टी लगवा कर, उसपर पड़े हुए उलटे अक्षरोंको पंडितोंसे पढ़वाया। ९८. 'लड़कपनसे ही, मेरी प्राप्तिके कारण ही यह उन्नतिकी परा कोटिको प्राप्त हुआ है, और इस समय मेरी ही बातसे यह रागका लड़का लजाता है।' इस प्रकार खिन्न होकर अपने पुत्ररूपी यशसे अवलम्ब दिया जाकर वृद्ध 'गुणोंका समूह' समुद्रके तीरपर तपस्याके लिये चला गया। ९९. जो धनुर्धारी प्रतिद्वंद्वियोंकी स्त्रियोंको वैधव्य व्रत देनेवाला है ऐसे उस राजाके दिग्विजयके लिये उद्यत होनेपर और क्रुद्ध होकर प्रति दिशामें उसके भ्रमण करनेपर, और स्त्रियोंकी तो बात ही क्या स्वयं रति भी मारे डरके अपने पतिको, मदान्ध भ्रमरियोंका नील चोला धारण किये हुए पुष्पधनुष्यको [भी हाथमें] नहीं लेने देती। १००. चिन्तारूपी गभीर कूपपर महाशोकरूपी चलती अरघट्ट (घड़ारी) परसे निःश्वास फेंककर अपने बड़ी बड़ी आँखरूपी घटीयंत्रसे छोड़े हुए अश्रुधाराको और नासिकाकी वंशप्रणालीके

विषम पयसे गिरते हुए इस बाष्प रूपी पानीयको, हे महाराज, तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियाँ अविराम भावसे स्तनरूपी दो कलशोंमें ढोया करती हैं । इस प्रकार काव्योंके पूरा पढ़े जानेपर [ आगे यह आधा 'काव्य मिला- ] १०१. 'अहो ! पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम प्राणियोंके लिये सचमुच ही बड़ा विषम होता है ।' इस काव्यका उत्तरार्द्ध ठिच्चप प्रभृति सैकड़ों पंडितोंके पूरा करनेपर भी ठीक नहीं जमता था तब राजाने धनपाल पंडितसे पूछा [ तो उसने अपनी प्रतिभाके बलसे यह यथार्थ पाठ कहा ]-"'हरेहरे ! जो सिर शिवके सिर पर विराज रहे थे वे गधोंके पैरोंसे लुण्ठित हो रहे हैं'।" 'यही उत्तरार्द्ध ठीक जमता है' इस प्रकार जब राजाने कहा तो पंडित बोला-'यदि पदबन्ध और अर्थ दोनों ही, श्री रामेश्वर प्रासाद की दीवालपर ये इसीप्रकार न हों तो, इसके बाद आजीवन मैं कविताका त्याग कर दू ।' उसकी इस प्रतिज्ञाके सुननेके साथ ही राजाने जहाजके यात्रियोंको उसी समुद्रमें गोता लगवाकर मंदिरको खोज निकालनेकी आज्ञा दी । ६ महिने बाद उसे ढूंढ निकाला ओर उसपर फिरसे मोमकी पट्टी लगा कर [ लेखकी नकल ली ] उसमें यही उत्तरार्द्ध निकला । यह देखकर [ राजाने ] उसके उपयुक्त पारितोषिक दिया । इस प्रकार, इस खण्ड प्रशस्ति के अनेक काव्य परंपराके अनुसार समझने चाहिये । ६०) एक बार राजाने सेवामें ढील-ढाल होनेका कारण पंडितसे पूछा । उसने अपनी तिलक मंजरी [ नामक कथा ] की रचनाको व्यग्रताका कारण बताया । शीतकालकी एक रात्रिके अन्तिम प्रहरमें राजाको कोई विनोद नहीं मिल रहा था । उसने पंडितको बुला कर, स्वयं उसकी उस तिलक मंजरी कथाको पढ़ने लगा और पंडित उसकी व्याख्या करने लगा । राजाने उसके ' रस ' के गिरनेके भयसे उसके नीचे सोनेकी थालीमें कचोलक ( कटोरा ) रखा और इस तरह [ बड़े चावके साथ ] समाप्त किया । उस अद्भुत काव्यसे चित्तमें चमत्कृत होकर राजाने कहा कि-' यदि मुझे इस काव्यका कथानायक बनाओ और विनीता के स्थानमें अवन्ती का नाम रखो, तथा शंखावतारतीर्थकी जगह महाकाल को उल्लिखित करो तो जो माँगो वही मैं तुम्हें दूंगा ।' राजाके ऐसा कहने पर उसने कहा कि-जिस प्रकार खद्योत ओर सूर्यमें, सरसों और सुमेरुमें, काच ओर काञ्चनमें, तथा धतूरे और कल्पवृक्षमें महान् अन्तर है उसी तरह तुममें और उनमें है । ऐसा कहता हुआ- १०२. हे दो मुँहवाली, निरक्षर, लोहेकी तराजू ! तुझे क्या कहूँ २ जो तू गुनाके साथ सोनेको तोलते समय पाताल नहीं चली गई । इस प्रकार जब पंडित झिड़क रहा था, तो राजाने उस मूल प्रतिको जलती आगमें इन्धन बना दिया । इस प्रकार वह द्विधा निर्वेद * होकर और द्विधा अवाङ्मुख x होकर अपने मकानके पिछले भागमें एक पुराने मञ्चपर जा बैठा अर नीश्वाससे डालता हुआ लगा होकर सो गया । बालपंडिता ऐसी उसकी लड़कीने उस भक्तिपूर्वक उठाकर स्नान-पान-भोजन आदि कराके, तिलकमञ्जरी की प्रथम प्रतिके लेखनका स्मरण कर करके आधा ग्रंथ लिखा दिया । फिर पण्डितने उत्तरार्द्ध नया लिखकर ग्रंथ संपूर्ण किया । [ यहाँ पर इसके आगे Pb आदर्शमें निम्न लिखित कथन पाया जाता है- ] पंडितने ग्रंथ संपूर्ण किया और फिर रुष्ट होकर नाना गाँव में चला गया। एक बार भोज की सभामें धर्म नामक वादी आया। उस समय यहाँ ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो उसके साथ प्रतिवाद करनेका साहस करता ।

  • द्विधा निर्वेदका मतलब दोनों तरहसे निर्वेद हुआ । १ निर्वेद=खिन्न हुआ २ निर्वेद=ज्ञानशून्य हुआ । x द्विधा अवाङ्मुख १=नीचा मुखवाला, २=वाणीशून्य मुखवाला ।

५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश तब भोजने बहुत मानके साथ धनपाल को बुलाया। उसे आते सुन कर ही वह वादी भाग गया। लोगोंने हँसकर कहा-धर्मस्य त्वरिता गतिः=धर्मकी गति शीघ्र होती है। [इस कहावतको उसने चरितार्थ किया] राजाने सम्मान किया....और वहाँपर योगक्षेमके निर्वाह (गुज़र) की क्या हालत थी सो पूछी। पंडित बोला- [६८] हे राजन्, इस समय हमारा और आपका घर समान है, क्योंकि दोनों ही पृथुकार्तस्वर पात्र (१ गंभीर आर्तनादका पात्र, और २ विपुल सुवर्णपात्रवाला) हैं, दोनों ही भूषित निःशेष परिजन है (१ अलंकारहीन परिजनवाला, और २ सारे परिजन जिसमें भूषित है, ऐसा) हैं, और दोनों ही विलस त्करेणुगहना (१ धूलिपूर्ण, और २ हाथियोंसे सुसज्जित) हैं। (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित और विशेष पंक्तियाँ पाई जाती हैं-) एक बार उसने भोज की सभामें यह काव्य पढ़ा- [६९] हे धाराके अधीश्वर ! पृथ्वीके राजाओंकी गणनामें कौतूहलवान् होकर इस ब्रह्माने आकाशमें खड़ियासे लकीर खींच खींचकर तुम्हारी ही (अकेलेकी) गणना की। वही रेखायें यह स्वर्गंगा हो गई हैं और तुम्हारे समान पृथ्वीमें अन्य भूमिधव (राजा) का अभाव होनेसे उसने उस खड़ियाको फेंक दिया वही यह हिमालय बना है। अन्य पंडित इस काव्य [को अत्युक्ति] पर हँसे। पर धनपालने कहा- [७०] वाल्मीकिने वानरोंसे आहत (मँगवाये गये) पर्वतोंसे समुद्रको बँधवाया और व्यासने अर्जुनके बाणोंसे। तथापि उनकी बातें अयुक्ति नहीं समझी जाती। हम तो कुछ प्रस्तुत विषय ही कहते हैं, तथापि लोग मुँह फाड़ कर हँसते हैं ! इसलिये हे प्रतिष्ठे, तुझे नमस्कार है। एक बार किसी पण्डितके यह कहनेपर कि-हे राजन्, महाभारतकी कथा सुनिये, उसपर परम आर्हत पंडितने कहा- [७१] कानीन (कुमारी कन्याके पुत्र=व्यास) मुनि, जो अपनी भ्रातृवधूके वैधव्यका विध्वंस करने वाला है, उसकी रचना, जिसमें गोलक (विधवा पुत्र) के पाँच पुत्र पाण्डव नेता हैं, जो स्वयं कुंड (जीवितपतिका स्त्रीके अन्य उपपतिसे उत्पन्न पुत्र) है। कहा गया है कि ये पाँचो समान जातिके हैं ! इनका संकीर्तन करना भी यदि पुण्य-कर और कल्याण-कारक हो तो फिर पापकी दूसरी कौन सी गति होगी ? ६१) शोभन मुनिकी 'शोभन चतुर्विंशतिकास्तुति' प्रसिद्ध ही है। 'इस समय क्या कोई [नया] प्रबंध आदि लिखा जा रहा है?' राजाके यह पूछनेपर धनपालने कहा- [७२] गलेमें उतरनेवाली गरम कांजीसे, जल जानेकी आशंकाके कारण सरस्वती मेरे मुँहसे निकल कर चली गई है। इसलिये वैरीयोंकी लक्ष्मीके केश पकड़नेमें व्यग्र हाथवाले महाराज ! मेरे पास अब कवित्व नहीं रहा। राजाने [प्रसन्न होकर दूध पीनेके लिए] सौ गायें दिलवाईं। राजाने जब यह पूछा कि 'गायें मिलीं !' तो- [७३] हे नरवर ! ये गौ तो दूध देती नहीं है और ना ही इन सौमेंसे एकको भी बछड़ा है। इन सौमेंसे बड़ी मुश्किलसे घासखा पाती हुई २० गायें घर तक पहुँच सकती हैं ! इस प्रकार धनपालने [उन बुड्ढी और बेकार गायोंकी] बात कही।

प्रकरण ६२-६४ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ५३ [ ७४ ] धनपाल कविका सरस वचन और मलयगिरिका सरस चन्दन, हृदयमें रखकर कौन निर्वृत (शान्त) नहीं होता । [ इधर शोभन मुनि स्तुति करनेके ध्यानमें [ लीन होनेसे ] एक स्त्रीके घर तीन बार [ भिक्षा लेने ] गया । इससे उस स्त्रीका दृष्टिदोष लगा और वह मर गया । उसने अपने भाईसे अन्त समयमें ९६ स्तुतियोंकी वृत्ति कराके अनशनपूर्वक सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया । ] —इस प्रकार यह धनपाल पंडितका प्रबंध पूर्ण हुआ । * ६२) कभी, उस नगरका निवासी कोई ब्राह्मण, जिसकी वृत्ति केवल भिक्षा ही थी, एक पर्व दिनमें नगरके सब लोगोंके स्नानमें व्यस्त रहनेके कारण भिक्षा न पाकर खाली ताम्र-पात्रके साथ ही घर लौट आया । इसलिये ब्राह्मणी उसे फटकारने लगी । झगड़ा बढ़ा और ब्राह्मणने उसपर प्रहार किया । आरक्षक पुरुष (नगररक्षक=पुलीस) उसे कैद करके राजमंदिरमें लाये । राजाके पूछने पर उसने यह श्लोक पढ़ा— १०३. माँ मुझसे सन्तुष्ट नहीं रहती, और अपनी पतोहूसे भी सन्तुष्ट नहीं रहती; वह (बहू) भी न मुझसे और न माँसे [ सन्तुष्ट ] है । मैं भी न उस (माँ) से और न उस (स्त्री) से [सन्तुष्ट रहता हूँ ] । हे राजन् ! बताओ इसमें दोष किसका है ? इसका अर्थ पंडितोंके न समझने पर, राजाने अपनी बुद्धिसे उसके अभिप्रायको प्राय समझ कर, उसे तीन लाख [दानमें] दिलवाये । और श्लोकके अर्थका व्याख्यान करते हुए कहा कि दारिद्र्य ही कलहका मूल है । सब दर्शनोंसे सत्यमार्गकी पृच्छा । ६३) बादमें, किसी समय, एक बार सब दर्शनोंको एकत्र बुलाकर राजाने मुक्तिका मार्ग पूछा । वे अपने अपने दर्शनका पक्षपात करने लगे । सत्यमार्ग जाननेकी इच्छासे राजाने उन सबको एकमत होनेको कहा । वे सब ६ महीने तक शारदाके आराधनमें लगे रहे । किसी रात्रिके अन्तमें शारदाने यह कहकर कि 'जागते हो ?' राजाको उठाया और १०४. सौगत (बौद्ध) धर्म है सो तो सुनने लायक है (अर्थात् उसके सिद्धान्त सुननेमें अच्छे हैं), और आर्हत (जैन) धर्म है सो करने लायक है । व्यवहारमें वैदिक धर्मका अनुसरण करना योग्य है और परम पदकी प्राप्तिके लिए शिवका ध्यान करना उचित है । (अथवा-अक्षय पदका ध्यान करना चाहिए) राजाको तथा दर्शनों (सब मतवाले पण्डितों) को यह श्लोक सुनाकर श्रीभारती तिरोहित हुई । १०५. 'अहिंसा' जिसका मुख्य लक्षण है वही धर्म है । भारती (सरस्वती) है वही सबकी मान्य देवी है । ध्यानसे मुक्ति प्राप्त होती है यही सब दर्शनोंका मतव्य है । इन दो श्लोकोंको बनाकर उन्होंने राजाको मुक्तिका निर्णय बताया । * शीता पण्डिताका प्रबन्ध । ६४) बादमें, उस नगरकी निवासिनी शीता नामक रन्धनी (रसोई बनानेवाली) को किसी विदेशी- कार्पटिकने सूर्य पर्वके दिन भोजन बनानेके लिए अन्न दे कर, मध्य जलाशयमें स्नान करते समय कगुनीके तेलका पान कर जानेसे, उसके घरपर आते ही, वमन करके मृत्यु प्राप्त हुआ । उसे देखकर, अपनेको द्रव्यके निमित्त मार डालनेका कलंक लगनेकी आशंकासे उस रन्धनीने मरनेके लिए उसी अन्नको खा लिया । यह [ उसके पेटमें ] टिक गया । और उसके प्रभावसे उसको प्रतिभाका बड़ा विभव प्रादुर्भूत हुआ । तीनों

[page-header] ५४ ] , प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश [body] विद्याओंका कुछ अभ्यास करके विजया नामक अपनी नव युवती कन्याके साथ श्रीभोज की सभाको सुशोभित करती हुई श्रीभोज से बोली- १०६. श्रीमन्महाराज भोज की शूरताकी सीमा तो शत्रुओंके कुलोंका क्षय करने तक है, यशकी सीमा ठेठ ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड तक है, पृथ्वीकी सीमा समुद्रके तट तक है, श्रद्धाकी सीमा पार्वती-पति (शिव) के चरणद्वन्द्वमें प्रणाम करने तक है, लेकिन बाकी जो अन्य गुण हैं उनकी तो कोई सीमा ही नहीं है । इसके बाद विनोद-प्रिय राजाने कुच-वर्णनके लिए विजया को आज्ञा दी। वह बोली- १०७. उस पतले शरीरवाली रमणीके स्तनमण्डलकी यदि, ऊँचाई चिबुक तक है; उत्पत्ति भुजलताके मूल तक है; विस्तार हृदय तक है और संहति कमलिनी सूत्र तक है; वर्णकी सीमा स्वर्णकी कसौटा तक है; और कठिनताकी सीमा हीरेकी खानवाली भूमि तक है, तो उसका लावण्य अस्त समय (जीवनकी समाप्ति) तक है। उसके इस वर्णनको सुनकर, उस आधे कवि राजाने कहा- [७५] 'उस कमल-नयनीके दोनों कुचोंका क्या वर्णन किया जाय ?'-इसपर उसने आधा श्लोक यह कहा- सात द्वीपके 'कर' (महसूल) ग्रहण करनेवाले आप जैसे जहाँ 'कर' (हाथ) देते हैं। राजाने एक और आधा काव्य पढ़ा- [७६] 'आघात किये हुए मुरजके समान गभीर ध्वनिवाले और भ्रमरोंके समान नील [वर्णवाले] बादलोंसे वह दिशा रुद्ध-सी क्यो हो गई है ?' इसके उत्तरार्धमें उसने कहा- ['इस लिये कि] प्रधन विरहके खेदसे म्लान बनी हुई बाला, जिसका मुख आँखोंके उगले हुए आँसुओंसे धो गया है, वह वहाँ वास करती है।' १०८. 'जगत्को आनंद देनेवाले उस सुरतको नमस्कार है'-इस प्रकार राजाके कहनेपर [क्यों कि] 'जिसके आनुषंगिक फल हे भोजराज, आप जैसे पुरुष हैं।' विजयाके इस विजयशाली वाक्यको सुनकर राजाने लज्जित होकर मुँह नीचा कर लिया। तब राजाने उसे [अपनी] भोगिनी बनाई। एक बार उसने जालके भीतरसे आते हुए चन्द्र-कर (किरण) के स्पर्श होनेपर [काव्य] पढ़ा- [७७] हे कलंकके श्रृंगारवाले चन्द्र ! बस करो इस करस्पर्शनकी लीलाको । तुम तो शिवके निर्माल्य हो, इससे तुम्हारा स्पर्श करना उचित नहीं। [७८] अनुद्यम परायण (आलसी) राजाओंके समान, क्षणभरमें तारायें क्षीण हो गई; प्राप्य जनोंकी सभामें पतितकी पण्डिताईके समान चन्द्रमाकी कान्ति म्लान हो गई, जैसे मानों पारेने सोना खा लिया हो वैसी प्राची दिशा पिंगलवर्णा हो गई और निर्धन पुरुषोंके गुणकी तरह ये दीपक भी शोभा नहीं प्राप्त करते । [७९] कलिकालमें सज्जनोंकी भाँति तारायें विरल हो गई, मुनिके मनकी नाईं आकाश सर्वत्र प्रसन्न हो गया, सज्जनोंके चित्तसे दुर्जनकी तरह अन्धकार दूर हो रहा है और निरुद्यमियोंकी लक्ष्मीकी तरह रात जल्दी जल्दी बीत रही है। इस प्रकार यहाँ पर बहुत कुछ वक्तव्य (काव्य आदि कहने लायक) है जो परंपरा द्वारा जान लेना चाहिए । -इस प्रकार सीता पंडिताका प्रबंध समाप्त हुआ ।

An exact transcription of the Hindi and Sanskrit text from the image:

प्रकरण ६५-६७] मयूर, बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध [ ५५ मयूर, बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध । ६५) मयूर और बाण नामक दो साला-बहनोई पंडित, अपनी विद्वत्तासे एक दूसरेके साथ स्पर्धा करते हुए भोज की सभामें लब्धप्रतिष्ठ हुए । एक बार बाण पण्डित बहनसे मिलने गया और उसके घर जाकर रातको द्वारपर सो गया ।। उस रातको रूठी हुई] उसकी मानवती बहनको बहनोई द्वारा मनाती -सुना । [बाण ने] उसपर ध्यान दिया तो उसने यह सुना- १०९. हे तन्वंगी, प्रायः [सारी] रात बीत चली, चन्द्रमा क्षीणसा हो रहा है, यह प्रदीप मानों निद्राके अधीन होकर झूम रहा है, और मानकी सीमा तो प्रणाम करने तक ही होती है, अहो ! तो भी तुम क्रोध नहीं छोड़ रही हो ?- [काव्यके] ये तीन पद बारंबार उसे कहते सुनकर [वह चौथा पाद इस प्रकार बोल उठा-] 'हे चण्डि ! कुचोंके निकटवर्ती होनेसे तुम्हारा हृदय भी [उनके जैसा] कठिन हो गया है !' भाईके मुँहसे यह चौथा पाद सुनकर वह लज्जित हो गई और कुपित होकर उसे शाप दिया कि 'तुम कुष्ठी हो !' उस पतिव्रताके व्रतके प्रभावसे उसे उसी समय कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया । प्रातःकाल शालसे शरीर ढककर राजसभामें आया । मयूरने मयूरकी भाँति कोमल वाणीसे उसे 'वरकोढी' यह प्राकृत शब्द कहा । इसपर चतुर चक्रवर्ती राजाने उसकी ओर विस्मयके साथ देखा । प्रसंगान्तर उठनेपर बाणने देवताराधनका विचार किया और लज्जित भावसे वहाँसे उठकर नगरकी सीमापर गया । वहाँ पर एक स्तंभ खडा कर नीचे खदिर काष्ठके अंगारोंसे भरा हुआ कुंड बनवाया । स्तंभके सिरेपर लटकाए हुए छींकेपर स्वयं बैठ गया । वहां सूर्यदेवकी स्तुति बनाना प्रारम्भ किया । प्रति काव्यके अन्तमें छींकेकी एक एक रस्सी चाकूसे काटने लगा । इस प्रकार पाँच काव्योंके अन्तमें उसने पाँच रस्सियां काट दीं । इसके बाद छींकेके अग्रभागमें लगा रहकर उसने छठे काव्यसे सूर्यदेवको प्रत्यक्ष किया । उसके प्रसादसे तत्काल ही वह तेजवान् काञ्चनकी कान्तिवाला हो गया । दूसरे दिन उत्तम वर्णके चन्दनका शरीरमें लेप करके और दिव्य श्वेत वस्त्र लपेट कर [राजसभामें] गया । उसके शरीरसौन्दर्यको [पूर्वतन्] राजाने देखा तो मयूर ने सूर्यके वरका फल बताया । यह सुनकर बाणने बाणकी भाँति इस वाणीसे मयूर का मर्म वेध किया कि 'यदि देवाराधन इतना सरल है तो तुम भी कुछ कोई विचित्र कार्य करके दिखा ओ न ?' उसके ऐसा कहनेपर मयूरने जवाब दिया कि- 'नीरोग आदमीको वैद्यसे क्या काम ? फिर भी तुम्हारी बातको सच कर दिखानेके लिए अपने हाथ-पैर छुरीसे काट देता हूँ और तुमने तो छठे काव्यमें सूर्यको प्रसन्न किया है, परन्तु मै प्रथम काव्यके छठे अक्षरमें ही भवानी- को प्रसन्न करता हूँ ।' यह प्रतिज्ञा कर सुखासनपर बैठकर चण्डिकाके मंदिरके पिछाडे जाकर बैठ गया । वहाँ 'मा भांक्षीर्विभ्रमम्' (ऐसे आदि वाक्यवाली चण्डिका-स्तुति प्रारम्भ की) इसके छठे अक्षरपर ही चण्डिका प्रत्यक्ष हुई और उसकी कृपासे उसका शरीरपल्लव प्रथम तक सुन्दर हो गया । अपने सामने ही उस प्रसादको देखकर राजा और अन्य राजपुरुषोंने सामने आकर उसका जय-जय-कार किया और बड़े समारोह के साथ उसका नगरमें प्रवेश कराया । 'वरकोढी' यह प्राकृत शब्द द्वि-अर्थी है । 'वर कोढी' और 'वरक ओढी' ऐसा इसका पदच्छेद किया जाता है। पहले पदमें वर=अच्छा, कोढी=कुष्टी अर्थात् अच्छे कुष्टी (कुष्ठरोगी) बने ऐसा व्यंग्य है। दूसरे पदमें वरक=शाल ओढी=ऊपर डाली अर्थात् 'शाल ओढ़कर आये हो !' ऐसा आश्चर्यद्योतक वचन है ।

५६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ६६ ) इसी अवसर पर, मिथ्यादृष्टि वालोंके धर्मको इस प्रकार विजयी होते देख, सम्यग्दर्शन ( जैन ) द्वेषी कुछ प्रधान पुरुषोंने राजासे कहा- 'यदि जैनधर्ममें भी कोई ऐसा प्रभाव बतलाने वाला हो तो श्वेताम्बर स्वदेशमें रहे, नहीं तो शीघ्र ही निर्वासित कर दिये जायें ।' इस प्रकार उनके वचनके पश्चात् श्री मान तुंगाचार्यको वहाँ बुलाकर राजाने कहा कि अपने देवताओंके कुछ चमत्कार दिखाइये । ये बोले- 'हमारे देवता तो मुक्त हैं, उनके चमत्कार क्या हो सकते हैं; तथापि उनके किंकर देवताओंके प्रभावका आविर्भाव देखिये ।' इस प्रकार कहके अपने शरीरको चँवालीस हथकड़ियों और बेड़ियोंसे कसवाकर उस नगरके श्री- युगादि देवके मंदिरके पिछले भागमें बैठ गये । 'भक्तामर' इस आदि वाक्यवाली मंत्रगर्भ नई स्तुति बनाने लगे । इसके प्रति काव्यके अन्तमें एक एक बेड़ी टूटती जाती थी। बेड़ियोंकी संख्याके बराबर काव्य बनाकर स्तव पूरा किया और उस मंदिरको अपने सम्मुख परिवर्तित कर शासनका प्रभाव दिखाया । -इस प्रकार श्रीमान्तुङ्गाचार्यका प्रबन्ध पूर्ण हुआ । * गूर्जर देशकी विदग्धताका प्रबन्ध ! ६७) बादमें, किसी एक अवसर पर, राजा अपने देशके पंडितोंके पाण्डित्यकी प्रशंसा करता हुआ गूर्जर देशके पण्डितोंको अविदग्ध (असहृदय) कह कर निन्दा करने लगा । इस पर वहांके स्थानीय [गूर्जर] पुरुषने कहा कि हमारे देशके तो स्त्रियों और ग्वाल लोकके साथ भी आपके देशका कोई बड़ा पंडित तक समानता नहीं कर सकता । जब उसने ऐसी बात कही तो राजा उसे मिथ्याभाषी बनानेकी इच्छासे अपना मनोभाव छिपा कर, कुछ दिन तक चुप-चाप रहा । इधर उस स्थान-पुरुषने भीम को यह वृत्तान्त कहलाया। भीमने स्वदेशकी सीमा पर कुछ रसिक वेश्याओं और कुछ ग्वाल-वेष-धारी पंडितोंको नियुक्त किया। कोई वैसा गोप प्रतापदेवी नामक वेश्याको साथ लेकर रसिक जनोंके लिये अमृतकी सार-भूत ऐसी धारा नगरी के निकट आया । वहाँ उस वेश्याको सजानेके लिये छोड़कर, सबेरे ही गोप [राजसभाके समीप पहुँचा ] राजदौवारिकने उसको राजाके सम्मुख उपस्थित किया । श्री भोज ने कहा कि 'कुछ कहो' इस पर- ११०. हे भोजदेव ! यह तुम्हारे गलेमें जो कण्ठा पड़ा है वह मुझे बहुत अच्छा लग रहा है । मालूम दे रहा है कि तुम्हारे मुखमें जो सरस्वती और वक्षःस्थलमें लक्ष्मी बस रही है उन दोनोंकी सीमा इसने विभक्त कर दी है । इस प्रकार उसकी उक्ति सुनकर विस्मयसे मनमें चकित होकर उसके सामने देख रहा था कि उतनेमें उस उत्तम परिच्छद धारिणी वेश्याको भी देखा । उसके प्रति भोज ने यह आकस्मिक वचन कहा- 'यहाँ क्या !' । इसके अनन्तर वह बुद्धि-निधि सुमुखी, जो स्वजाति (स्त्री जाति) की होनेके कारण मानों सरस्वतीकी खास कृपा-पात्र थी और शरीरधारिणी प्रतिभाकी भाँति [दिखाई देती थी], राजाके गंभीर वचनके भी तत्त्वको समझकर उसको [प्राकृत भाषामें] जवाब दिया कि-'पूछते हैं' उसके इस उचित वचनसे भोज का मुख-कमल विकसित हो गया । उसको कोषाध्यक्षसे तीन लाख दिलवानेको कहा पर वह (कोषाध्यक्ष) इस तथ्यको न समझकर तीन बार कहनेपर भी चुप-चाप बैठा रहा । जब वह नहीं देने लगा तो राजा प्रकाश ही बोला, कि देशकी परिस्थिति और स्वभावकी कृपणताके कारण इसे तीन ही लाख दिला रहा हूँ, यदि उदारताके साथ दिया जाय तो इतना बड़ा साम्राज्य भी देना कम ही है। इस आदेशको सुनकर समस्त राजलोकने राजासे प्रार्थना की कि उन दो वाक्योँका अन्वय क्या है ! इस पर वह बोला- 'इसके कटाक्षोंकी दोनों अंजन रेखाओंको कान तक फैली हुई देखकर मैने कहा कि 'यहाँ क्या !' इसने

प्रकरण ६६-६९ ] भोजका भीमके पास चार वस्तुयें मांगना [ ५७ जवाब दिया कि-‘दोनों नेत्र कान तक फैली हुई अंजन रेखाके बहाने कानोंके पास यह निर्णय करने गये हैं कि क्या यह वही श्री भोज हैं जिनके बारेमें आप लोगोंने पहले सुन रखा है ? यही बात ये पूछते हैं।' प्राकृत भाषामें, व्याकरणके नियमसे द्विवचनका प्रयोग बहुवचनसे होता है। इसी बातकी आशंका करके इसने ‘पुच्छंति’ ऐसा जवाब दिया है। अपनी बुद्धिसे बृहस्पतिकी भी अवज्ञा करनेवाले ऐसे जो पण्डित हैं उनके लिये भी जो अर्थ अविषयीभूत है, उसे सहसा ही कहती हुई यह मानों प्रत्यक्षरूप भारती ही है। सो इसके पारितोषिकमें तीन लाख क्या चीज है? । इसके बाद तीन बार 'तीन लक्ष' देनेके लिये कहनेके कारण अपने सामने ही उसे नव लाख दिलवाया। इस तरह राजा भोजको गूर्जर जनोंकी चतुरता मालूम हो गई तो उसने कहा-‘विवेक तो गूर्जर देश ही में है।' [और तब राजाने 'मालवीय पंडित और गूर्जर गोपाल समान हैं' इस वृद्धजनोंकी वाणीको सत्य मानकर उन्हें विदा किया ।] इस प्रकार यह वेश्या और गोपका प्रबन्ध है। * ६८) यह राजा लड़कपनसे ही- १११. मनुष्य यदि मृत्युको सिरपर बैठी हुई देखे तो उसे आहार भी अच्छा न लगे; तो फिर अकृत्य (अनुचित कार्य) करनेकी तो बात ही कहाँ हो। इस तत्त्वको जाननेके कारण धर्म कार्यमें अप्रमत्त रहता। एक बार [रातको] निद्रा भंगके अनन्तर ‘कोई विद्वान् आकर [कहता है] कि एक तेज घोड़ेपर सवार होकर तुम्हारे पास प्रेतपति (यमराज) आ रहा है, इस लिए उसके अनुसार धर्म-कर्मके लिए सज्जित हो जाइए' इस वचनको बोलनेके लिए नियुक्त किये हुए पंडितको प्रतिदिन उचित दान देता रहा। एक बार अपराह्नमें राजा सिंहासन पर बैठा हुआ पान देनेवालेके दिये हुए बीड़ेसे पानके पत्तेको पहले ही मुँहमें डाल लिया। जब नीतिविदोंने उसका कारण पूछा तो इस प्रकार कहा-'यमराजके दाँतके भीतर पड़े हुए मनुष्योंके लिये वही वस्तु अपनी है जो या तो दान कर दी गई है, या उपभोगमें ली गई है। और तो संशयवाली है। तथा और भी- ११२. [मनुष्योंको] नित्य ही उठ उठ कर विचारना चाहिये कि आज मैंने कौनसा सुकृत किया। [दिनके पूरा होने पर] आयुका एक टुकड़ा ले कर रवि अस्त हो जायगा। ११३. लोग मुझे पूछते रहते हैं कि आपका शरीर तो कुशल है। [लेकिन यह नहीं सोचते कि-] हम लोगोंको कुशल कैसे ? आयु तो दिन-प्रतिदिन बीतती ही जा रही है। ११४. [इस लिये] कल जो करना है उसे आज ही कर लेना चाहिये, जो दोपहरके बाद करना है उसे उसके पहले ही कर लेना चाहिये। मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने किया है या नहीं किया। ११५. क्या मृत्युकी मौत हो गई है, बुढ़ापा बूढ़ा हो गया है, विपत्तियाँ विपदामें पड़ गई हैं और व्याधियाँ बीमार हो गई हैं जो ये आदमी दर्प करते रहते हैं ! इस प्रकार अनित्यता संबंघी चार श्लोकोंका यह प्रबंध है। * भोजका भीमके पास चार वस्तुयें माँगनां । ६९) अन्य किसी दिन भोजने भीम राजाके पास दूतके मुखसे चार चीजें माँगीं। एक वस्तु वह 'जो यहाँ है, यहाँ नहीं; ' दूसरी 'यहाँ है, यहाँ नहीं; ' तीसरी 'जो दोनों जगह है;' और चौथी 'जो १५-१६

५८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश कहीं भी नहीं है।' विद्वानोंके लिये भी इसका अर्थ समझना सन्दिग्ध होनेसे अणहिल्लपुरमें इसके लिये ढोंडी पिटवाई जा रही थी तब किसी गणिकाने उस ढोंडीको छू कर विज्ञापित किया कि-( १ ) गणिका, ( २ ) तपस्वी, ( ३ ) दानेश्वर और ( ४ ) जुआडी रूप इन चार चीजोंको भेज दीजिये। उसके कहने पर राजाने उस दूतको ये चीजें सौंप दीं। 'ऐसा ही होना चाहिये' यह कह कर दूत चारों चीजें ले कर जैसे आया था वैसे ही वापस चला गया। ५. इस प्रकार चार वस्तुओंका यह प्रबंध है। * ७०) एक बार राजा भोज चौरचर्यामें घूम रहा था। उस समय किसी अभागेकी स्त्रीको- ११६. लोकमें तो ऐसा सुना जाता है कि मनुष्यको [ अपनी आयुमें ] दश दशायें आती हैं। पर मेरे पतिकी तो एक ही [दरिद्र] दशा [ सदा बनी रहती ] है, सो मालूम देता है कि बाकीको चोरोंने चुरा लिया है। यह पढ़ते सुन कर उसकी दुरवस्था पर राजाको दया आई और प्रात काल उसके पतिको सभामें बुला कर उसका कुछ भी अच्छा भविष्य सोच कर, दो बिजौरे नींबुओंको, जिनमेंसे प्रत्येकमें एक एक लाखकी कीमत- के रत्न गुप्त भावसे रखवा कर, उसे इनाममें दे दिये। उसने भी इस वृत्तान्तको कुछ न समझ कर, कुछ दाम ले कर, साग-भाजीकी दूकान पर जा कर बेच दिये। उस (दुकानदार) ने भी उसका हाल न जान कर उन दोनों नींबुओंको किसीको भेंट दे दिया। उस आदमीने फिर से उन्हें उसी राजा भोज को भेंट किया। ११७. समुद्रवेलाकी चञ्चल तरंगोंसे घसीटा हुआ यदि कोई रत्न पहाड़ी नदीमें आ भी जाय तो वह फिरसे उसी मार्गसे उसी रत्नाकर (समुद्र) में ही चला जाता है। इस अनुभवसे राजाने [ इस उदाहरणमें ] भाग्य ही को सद्य माना। क्यों कि, कहा भी है कि- ११८. वर्षा कालमें अशेष जगत्‌के प्रीत होने पर भी चातक तो जलका एक बूंद भी नहीं पाता। सच है, अलभ्य वस्तु कैसे मिल सकती है। इस प्रकार यह बिजौरे नींबूका प्रबंध है। * ७१) अन्य किसी एक रातको, राजाने अपने क्रीड़ा-शुक (तोते) को गुप्त रूपसे 'एक अच्छा नहीं है' यह बात पढ़ा कर उसे सिखाया कि तुम प्रातः काल सभामें यही वाक्य उच्चारण करना। बादमें जब उस तोते- ने वैसा ही कहा तो राजाने पंडितोंसे उसका मतलब पूछा। वे उसका मतलब न जानते हुए, उसके जाननेके लिये, उन्होंने ६ महीनेकी मुहल्लत माँगी। इसके बाद उनका मुख्य वररुचि इसका मतलब समझनेके लिये : देशान्तरमें भ्रमण करने लगा। वहा किसी पशुपालने उससे कहा कि मैं इसका मतलब आपके स्वामीको बता : सकता हूं। पर मैं अपने इस कुत्तेके बच्चेको, बुढ़ा होनेके कारण, न तो ढो सकता हूँ,-और बड़ा प्रिय होनेके : कारण, ना ही छोड़ सकता हू। उसके ऐसा कहने पर उसे साथ लेनेकी इच्छासे वररुचि ने उस कुत्तेको कपड़ेमें : लपेट कर अपने कन्धे पर रख लिया और उस पशुपालको साथ ले कर राजाकी सभामें गया। वहाँ उसको उत्तर : देनेवाला बताया। इसके बाद, राजाने उस पशुपालसे उसी बातको पूछा। [उसने जवाब दिया-] महाराज, इस : जीवलोकमें लोग ही 'एक अच्छा नहीं है'। राजाने फिर पूछा-'कैसे?' वह बोला-इसलिये कि यह

प्रकरण ७०-७३ ] इक्षुरस, तथा घुड़सवारोंका प्रबन्ध [ ५९ ब्राह्मण इस कुत्तेको, जो यद्यपि अस्पृश्य है, तथापि उसे कन्धे पर ढोता है, यह लोभ ही की लीला है । इसलिये लोभ ही एक अच्छा नहीं है । इस प्रकार यह 'एक अच्छा नहीं है' प्रबन्ध पूरा हुआ । * ७२) ‡ अन्य किसी समय, केवल मित्रको साथ ले कर राजा रातमें घूम रहा था, तो उसे बड़े जोरकी प्यास लगी । तब उसने एक वेश्याके घर जा कर मित्रके मुखसे जल माँगा । तब बड़े प्रेमके साथ शंभवली नामरू दासी बड़ी देर करके, ईखके रससे भरा पात्र, कुछ खेदके साथ ले आई । मित्रने जो खेदका कारण पूछा, तो बोली कि पहले ईखकी एक ही लट्ठीमेंसे, जब वह शूलसे छेदी जाती थी तो, इतना रस निकल आता था कि घड़ेके साथ पुरवा (शकोरा) भी भर जाता था; पर इस समय राजाका मन प्रजाके विरुद्ध हो रहा है, इसलिये बड़ी देरके बाद भी केवल पुरवा ही भर पाया है । यही इस खेदका कारण है । राजाने उसके खेदके कारण को सुन कर विचार किया कि जिस वणिकने शिव मन्दिरमें वह बडा नाटक करवाया है उसको मैंने अपने मन ही मन, लूटनेका विचार किया था; इसलिये इसकी यह बात ठीक ही समझनी चाहिए । बादमें लौट कर अपने स्थान पर आ कर सो गया । दूसरे दिन प्रजा पर वत्सल भाव मनमें रखता हुआ राजा वेश्याके घर गया । उस दिन उसने यह कह कर राजाको सन्तुष्ट किया कि आज राजा प्रजाके प्रति कृपालु है, क्यों कि आज ईखसे बहुत रस निकला है । इस प्रकार यह इक्षुरसका प्रबन्ध पूर्ण हुआ । * ७३) अन्य किसी एक अवसर पर, धारानगरीके शालापुरमें एक गोत्र देवीका मंदिर था जिसमें नमस्कार करनेके लिये [राजा] नित्य आया करता था, उसमें कुछ बेलाका व्यतिक्रम हो गया । इससे वह देवता प्रत्यक्ष हो कर द्वार पर आ कर उस राजाको देखने लगी, जो उस समय बहुत थोडे नौकरोंके साथ द्वार- देश पर आ पहुंचा था । राजाको देख कर ससंभ्रम वह अपने आसन पर बैठनेकी गड़बड़में, निजका आसन लांघ गई । राजाने प्रणाम करके इस वृत्तान्तको पूछा । देवताने निकट ही शत्रुसेनाका आना बता कर कहा कि शीघ्र जाओ । कुछ ही समयमें राजाने अपनेको गूर्जर सैन्यसे घिरा पाया । वेगवान् घोड़ेपर चढ़कर तेजीसे जाता हुआ वह धारा नगरीके फाटक पर पहुँचा, तो उस समय आल्हया और कोल्हया नामके दो गुजराती सवारोंने उसके कंठमें धनुष्य फेंके और यह कह कर उसे छोड दिया कि 'तुम इतने-ही-से मार डाले जाते !' ११९. जिसके 'गुण'-वान् धनुषने, मानों यह समझ कर ही कि यह भोज 'गुणी' है भागते हुए उस राजाको घोड़ेसे [नीचे] नहीं गिराया । इस प्रकार यह घुडसवारोंका प्रबन्ध पूर्ण हुआ । * [इसके आगे Pb प्रतिमें निम्नांकित प्रबन्ध पाया जाता है-] अन्यदा एक बार रातमें जग कर राजा भोजने अपनी समृद्धिके विस्तारको अपने हृदयमें सोच कर काव्यके ये तीन चरण पढे- ‡ यह इक्षुरसवाला प्रबन्ध किसी प्रतिमें, विक्रम राजाके सम्बन्धमें लिखा हुआ मिलता है और इसलिये इसके पहले, ऊपर पृष्ठ ९ पर भी यह आया हुआ है, लेकिन वहाँ यह प्रक्षिप्त मालूम देता है ।

६० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश [ ८० ] मनोहर युवतियाँ, अनुकूल स्वजन, अच्छे बांधव और प्रेममय वचन बोलनेवाले नौकर हैं।, [ द्वार पर ] हाथियोंके झुंड गरज रहे हैं, और तरल ( तेज ) घोड़े [ हिनहिना रहे हैं ]- इस प्रकार राजा जब यह बारंबार बोल रहा था और चौथे चरणके लिये अक्षर ढूंढ रहा था, उसी समय कोई वेश्याव्यसनी विद्वान्, जो अपनी वेश्याके वचनसे रानीके दो कुण्डल चुरानेके लिये राजाके महलमें चोर बन कर घुसा था, उसने उन तीन चरणोंको सुना । तब उसने सोचा कि 'जो होना हो सो हो, पर जो चौथा चरण मनमें स्फुरित हो आया है उसे कैसे दबा रखू ?' और यह बोला- ' आंखोंके मींच जाने पर [ इनमेंसे फिर ] कुछ भी नहीं है ।' राजाने सन्तुष्ट हो कर कुण्डलके साथ उसको मनोवांछित दिया । ७४) अन्य समय, एक बार, यही राजा, राजपाटीसे लौट कर नगरके गोपुरमें [ जब आ रहा था तब ] एक बिना लगामका घोड़ा दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देख कर लोग आकुल-व्याकुल हो कर इधर उधर भागने लगे । उनमें एक तक्र विक्रय करनेवाली ग्वालिन भी सपाटेमें आ गई और उसके सिरपर जो छाँछसे भरी हुई हंडिया थी वह नीचे गिर पड़ी । उसमेंसे नदीके प्रवाहकी तरह गोरस निकल कर बह चला, जिसे देख कर उसका मुख-कमल खिल उठा । भोज ने यह देख कर पूछा कि विषादके समय भी तुम्हारे इस हर्षका कारण क्या है ? राजाके यह पूछने पर वह बोली- १२०. राजाको मार कर, पतिको सांपसे काटा हुआ देख कर, मैं विधिवश परदेशमें वेश्या हुई । पुत्रको [ अपने साथ ] वेश्यागामी पा कर मैं चितामें प्रविष्ट हुई । इसके बाद, गोपकी गृहिणी बनी; तो फिर आज मैं इस तक्रके लिये क्या सोच करूं ? [ वह इस प्रकार बोली । उस प्रदेशसे एक बड़ी नदी प्रादुर्भूत हुई, जिसका नाम मही पड़ा । ] इस प्रकार गोपगृहिणीका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * ७५) एक बार, प्रातःकाल, श्री भोज एक उपशिला ( छोटे पत्थर ) को लक्ष्य करके आनन्दपूर्वक धनुर्वेदका अभ्यास कर रहा था, उसी समय श्वेताम्बर वेशधारी श्री चंदनाचार्यने अपनी तात्कालिकोत्पन्न प्रतिभाकी सुन्दरतासे इस उचित पद्यको कहा- १२१. यह खण्डित शिला चाहे खण्डित हो जाओ, पर हे राजन् ! इसके बाद क्रीड़ा करना बस कर दीजिये; और देव ! प्रसन्न हो कर पाषाणवेधके व्यसनकी यह रसिकता छोड़िये । क्यों कि अगर यह क्रीड़ा बढ़ी तो बड़े बड़े पर्वतोंको बेध करोगे और यह धरती ध्वस्ताधारा ( आधार जिसका ध्वस्त हो गया है) हो कर, हे नृपतिलक ! पातालके मूलमें चली जायगी । उनकी इस प्रकारकी कविताके चमत्कारसे चमत्कृत हो कर भी राजाने कुछ सोच कर कहा-'सर्व- शास्त्र-पारंगत हो कर भी आपने जो 'ध्वस्ताधारा' यह पढ़ा उससे कोई उत्पात सूचित होता है ।' * भोज और कर्णका संघर्ष । ७६) इधर, डाहल देशके राजाकी देम ति नामक रानी महा योगिनी थी । एक बार, जब कि वह आसन्न प्रसवा थी, सदैव ज्योतिर्विदोंसे यह पूछा करती थी कि 'किस शुभ लग्नमें उत्पन्न पुत्र सार्वभौम (सम्राट) होता है !' इसके बाद, उन्होंने अच्छी तरह विचार कर बताया कि 'जब शुभ ग्रह उच्च राशि, और केन्द्र (प्रथम

प्रकरण ७४-७६ ] भोज और कर्णका संघर्ष [ ६१ चतुर्थ, सप्तम, और दशम ) में हों, तथा पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ और एकादशमें हों, तो जो पुत्र होगा वह सार्वभौम राजा होगा। यह सुन कर, निश्चित प्रसव समयके बाद, १६ पहर तक, योगकी युक्तिसे गर्भस्तंभ करके ज्योतिषीके निर्णीत लग्नमें कर्ण नामक पुत्रको उसने जन्म दिया। उस गर्भधारणके दोषसे पुत्रप्रसवके अनन्तर आठवें पहरमें वह मर गई। सुलग्नमें जन्म होनेके कारण कर्णने अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त किया। एक सौ छत्तीस राजाओंके, भौंरेके समान काले-काले केश-कलापसे उसके दोनों विमल चरण-कमल पूजे जाते थे और चारों प्रकारकी राजनीतियोंमें परम प्रवीणता प्राप्त करके, विद्यापति प्रभृति महाकवियोंसे वह स्तुत होता था। जैसे [ एक बार कर्पूर कविने कहा-] १२२. + जिनके मुंहमें तो 'हारावाप्ति'१ है, आँखोंमें 'कंकणभार'२ है, नितंबमें 'पत्रावली'३ है, और दोनों हाथ 'सतिलक'४ है—हे श्री कर्ण ! तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंको, विधिवश, वनमें, इस समय भूषण पहननेकी यह कैसी [विलक्षण] रीति ग्रहण करनी पड़ी है। ऐसा कहने पर चतुर चक्रवर्ती राजाने कहा—'यदि 'विधिवश' ऐसा हुआ तो फिर वर्णनीय राजाका क्या रहा ? दैवने भी जिस बातकी चिन्ता नहीं की वह हो।' अतएव राजाको इसमें कुछ भी चमत्कार नहीं जान पड़ा और उसे बिना कुछ दिये ही विदा कर दिया। घर जाने पर भार्याने पूछा-'क्या दिया राजाने?' उसने कहा—'वही वृत्तस्वरूप !' (अर्थात् श्लोकमें जो वर्णन किया गया है वही स्वरूप) वह बोली- यदि 'विधिवशात्' की जगह 'त्वत् वशात्' कहा गया होता तो वह सब कुछ दिलाता। तब फिर नाचिराज कविने कर्ण नृपकी स्तुति की। जैसे- [८१] गोपियोंके पीन पयोधरसे विष्णुका हृदय [रूपी कमल] आहत हो गया है इसलिये मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी कमलकी आशंकासे तुम्हारे नेत्रोंमें ही अब विश्राम कर रही है। इसलिये हे श्रीमन् कर्ण नरेश ! जहाँ तुम्हारी भ्रूलता चलती है वहाँ भयभ्रान्त हो कर दारिद्यकी मुद्रा टूट जाती है। इससे अत्यन्त तुष्ट हो कर राजाने हाथके मारुले इत्यादिके उचित दानसे उसे पुरस्कृत किया। इस प्रकार जब वह मार्गमें आ रहा था, तो कर्पूर कविने खीस कहा कि राजाने मुझे जो कुछ दिया है उसे, अब मैं अपने घर ले आता हूं। यह कह कर वह उसके सामने गया। [२२] 'हे कन्ये ! तू कौन है?'-'कर्पूर कवि ! क्या तू मुझे नहीं पहचानता ?'-'क्या भारती है?'-' 'सच है'-'तू विथुरा क्यों है?'-'मैं लूट ली गई!'-'माँ किसके द्वारा ?'-'दुष्ट विधाताके द्वारा'- 'उसने तुम्हारा क्या ले लिया ?'-'मुझ और भोज रूपी दोनों आँख '-'तो जी कैसे रही हो?' --'क्योंकि दीर्घायु श्री नाचिराज कवि अन्धेकी लकड़ी रूप बने होनेसे।' नाचिराज कविने इस काव्यसे सन्तुष्ट हो कर कर्णराजसे जो कुछ स्वर्ण, दुकूल आदि प्राप्त किया था वह सब कर्पूर कविको दे दिया। कर्ण नरेन्द्रने यह सुना, तो कर्पूरको बुलाके पूछा कि-' हे कवे ! भोज के विद्यमान रहते 'मुझ-भोज' यह पद कैसे उदाहृत किया ?' वह बोला-'महाराज, जल्दी में 'हर्ष- मुझ' की जगह मुझ-भोज मुंहसे निकल गया।' तब राजाने सोचा कि यह बात भोजका अमंगल सूचित करती है। [८३] श्रीमत् कर्ण नरेन्द्रने मान और विनयसे सब याचकोंका मनोरथ पूर्ण कर दिया, इसलिये चिन्तामणिके आँगनमें शिखावाली दूर्वायें हमेशा श्यामल हो रही है। कल्पतरुके शून्य तटमें निर्भीक होकर पशु-पक्षी बैठ रहे हैं। और कामधेनु निकट ही रुडंदको बेटा कर आलस्यमे निद्रा ले रही है।

  • इस पद्यमें शब्दोंके श्लेष द्वारा दो भिन्न अर्थ निकाले गये हैं । १ हारावाप्ति=हारकी प्राप्ति और 'हा' ऐसा 'राव' शब्दकी प्राप्ति । २ कंकण=हाथका आभूषण और क=कनी उसका कण=अश्रुबिंदु । यों तो पत्रावली स्तन पर बंधी जाती है, लेकिन इन स्त्रियोंको तो पहननेके लिये पूरा वस्त्र नहीं है इस लिये पत्रवर्गोंसे नितंब प्रदेशको ढाकना पड़ा है। ४ सतिलक तो कपाल होता है लेकिन इन स्त्रियोंके तो अब हाथ ही सतिलक=तिलवाले हैं।

६२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ७७) इस प्रकार महाकवि गण उसके नाना यशकी स्तुति करते थे । एक बार उस कर्ण राजाने श्री भोज के प्रति प्रधानोंको भेज कर [ यह कहलाया-] ‘ आपकी नगरीमें आपके बनाये हुए १०४ मन्दिर हैं, इतने ही आपके गीत-प्रबंध और इतने ही विरुद हैं; इसलिये, या चतुरंग [ सेना ] की लड़ाईमें, या द्वन्द्व युद्धमें, या चारों विद्याओंका शास्त्रार्थ करनेमें, या त्यागमें मुझे जीत कर एक सौ पांच विरुदोंके पात्र बनो । नहीं तो मैं तुम्हें जीत कर १३७ राजाओंका स्वामी बनूँगा ।’ इस प्रकार उसके प्रभावके आवि- र्भावसे भोज का मुखकमल किंचित् म्लान हो गया । वह काशी नगरीके स्वामीको सब प्रकारसे जीत जाने योग्य समझ कर और अपनेको पराजित मान कर, अनुरोधपूर्वक उसकी अभ्यर्थना करके इस प्रकार उससे स्वीकार कराया कि-' मैं अवन्ती में, और श्री कर्ण वाणारसी में एक ही लग्नमें नींव दे कर स्पर्द्धाके साथ ऐसे मंदिर बनवावें जो ५० हाथ ऊंचे हों। जहाँके प्रासादमें प्रथम कलश ध्वजारोपणका उत्सव हो उसमें दूसरा राजा छत्र-चामर छोड़ कर, हाथी पर बैठ कर वहाँ आवे । इस प्रकार भोज के यथा-रुचि अंगीकार करनेकी बात जब कर्ण के कानों पहुँची तो वह यद्यपि क्रुद्ध हुआ तथापि भोज को उस तरह भी नीचा दिखानेके लिये [उद्यत हुआ]। एक ही लग्नमें अलग अलग दोनों जगह जब प्रासाद आरंभ किये गये तो, सारी तैयारी करके, सूत्रधारोंसे कर्ण ने अपने प्रासादको बनाते समय पूछा कि-' बताओ एक दिनमें, सूर्योदय और सूर्यास्तके बीच कितना काम किया जा सकता है ? ' इसके जवाबमें उन्होंने, चतुर्दशीके अनध्यायके दिन, सात हाथ ऊंचे ग्यारह मन्दिर, सूर्योदयमें आरम्भ करके शामको कलश तक बना कर राजाको दिखा दिये। उस सारी सामग्रीसे राजाने प्रसन्न हो, आलस्य छोड़ कर, भोजके मंदिरका जब मुँडेरा बाँधा जा रहा था तभी अपने मंदिर पर कलश स्थापित करा दिया; और ध्वजारोपणका लग्न निर्णय कर, दूत भेज कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके लिये श्री भोज को निमंत्रित किया। तब मालवा मण्डलका अधिपति भोज अपनी प्रतिज्ञा भंग होनेके भयसे, उस तरह जानेमें असमर्थ हो कर चुप हो रहा । इसके बाद प्रासाद पर ध्वजारोपण हो जानेके बाद, पुरातन कर्णके नवीन अवतारके समान उस कर्ण राजाने उतने ही राजाओंके साथ प्रयाण करके श्री भोज के ऊपर आक्रमण किया । उस अवसर पर श्री भोजके राज्यका आधा हिस्सा देनेकी प्रतिज्ञा करके श्री कर्ण ने मालवमण्डल पर पूंठ पीछेसे आक्रमण करनेके लिये श्री भीमको आमंत्रित किया । इस तरह उन दो राजाओंसे आक्रान्त होने पर राजा भोजका दर्प, मंत्रसे आक्रान्त सर्पके विषकी भाँति दूर हो गया । अकस्मात् उसी समय भोजका स्वास्थ्य बिगड़ गया जिसको वहाँ वालोंने छुपा रखा, और नियुक्त मनुष्यों द्वारा सभी घाटोंके रास्ते रोक दिये गये तथा अन्यदेशीय पुरुषोंका प्रवेश एकदम अटका दिया गया । तब भीम ने अपने सन्धिविग्रहिक डामरको, जो उस समय कर्णके पास था, भोजका वृत्तान्त जाननेके लिये अपने आदमी भेज कर पूछा । उसने भी उस पुरुषको एक गाथा पढ़ा कर भेजा, जिसने श्री भीमकी सभामें आ कर कह सुनाया । यथा- १२३. आमका फल [अब] पक गया है, वृन्त शिथिल हो गया है, आँधी जोरोंसे चल रही है और शाखा काँपने लगी है। और आगे हम नहीं जानते कि इस कार्यका परिणाम क्या होगा । इस गाथाके रहस्यको जान कर राजा भीम चुप हो रहा । श्री भोज के परलोक-मार्ग की यात्रा जब निकट आई तो उसने उपयुक्त धर्मकृत्य किया और समस्त राजपुरुषोंको राज्यानुशासन दे कर और यह आदेश दे कर कि मेरे हाथ विमानके बाहर रखना, स्वर्ग गया । [ २४ ] अरे ! पुत्र, कलत्र और पुत्रियोंको क्या कर रहे हो और खेती बाड़ीको भी क्या कर रहे हो ! मनुष्यको तो अपने हाथ पग दोनों झाड़कर अकेले ही आना है और अकेले ही जाना है । भोज के इस वाक्यको वैद्याने लोगोंसे कहा । ’ *

. प्रकरण ७७-७८ ] भोज और कर्णका संघर्ष [ ६३ कर्णसे भीमका आधा भाग लेना । ७८) [ इसके बाद, जब वह राजा भोज स्वर्गगामी हुआ ] तो उस वृत्तान्तको जान कर कर्णने उसके दुर्गम दुर्गको तोड़ कर भोज की सारी लक्ष्मी हस्तगत की । तब श्री भीमने डामरको आदेश किया कि- 'तुम या तो श्री कर्णसे मेरा प्राप्य आधा राज्य ले आओ या अपना सिर ले आओ।' इस प्रकार राजादेश पालन करनेकी इच्छासे, ३२ पदातियोंके साथ, उसने राजाके तंबूमें घुसकर मध्याह्न कालमें सोये हुए श्री कर्ण को बन्दीरूपमें गिरफ्तार किया । इसके बाद उस राजाने राज्य-ऋद्धिके दो विभागोंमेंसे एकमें शिव, शालिग्राम, गणेश इत्यादि देवताओंको रखा और दूसरेमें राज्यकी अन्य सारी वस्तुओंको रखा । 'अपनी इच्छाके अनुसार इन दोमेंसे एक हिस्सा ले लो ।' उसके ऐसा कहने पर, वह सोलह प्रहर तक तो वैसे ही पडा रहा, फिर भीम की आज्ञा [ आने पर ] देवताओंके भंडारको ले कर ही उन्हें श्री भीम को भेंट किया । इस प्रबन्धका सारा इतिहास इन दो काव्योंमें संगृहीत है । जैसे- १२४. पचास हाथ प्रमाणके दो शिवमंदिर एक ही लग्नमें प्रारम्भ किये गये । यह स्थिर हुआ कि जिस राजाके मंदिर पर पहले कलशारोपण होगा, उसके पास दूसरा राजा छत्र और चामर रहित हो कर आयगा । इस संवादमें राजा भोज की बुद्धि व्ययसे विमुख हो गई और इस प्रकार वह कर्ण देवके द्वारा जीता गया । १२५. भोज राजाके स्वर्ग जानेके बाद अतिबली कर्णने जो धारापुरीके भंग करनेका उपाय किया तो राजा भीम को सहायक बनाया । उसके भृत्य डामरने बंदी किये हुए कर्ण से गणपति के सहित नीलकंठेश्वरको सोनेकी पालकीके साथ ग्रहण किया । १२६. कवियों और कामियोंमें, योगियों और भोगियोंमें, धन देनेवालों और सज्जनोंका उपकार करनेवालोंमें, तथा धनी, धनुर्धर और धार्मिकोंमें भोज जैसा राजा पृथ्वी तलपर नहीं हुआ । १२७. राजा भोज ने अपने त्यागोंके कारण कल्पवृक्षके समान अशेष दुःखोंको त्रासित किया, साक्षात् बृहस्पति की नांई शीघ्रतापूर्वक नाना प्रबंधोंकी रचना की । राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) करने में वह अर्जुनके समान [ सिद्ध ] था । इसीलिये बहुत दिनोंसे, उसकी कीर्तिसे उत्सुक-चित्त देवताओंके द्वारा निमंत्रित हो कर वह स्वर्ग गया । इस प्रकार भोज के अनेक प्रबन्ध हैं जो परंपराके अनुसार जानने चाहिये । * इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'श्रीभोजराज और श्रीभीमराजके नाना यशोंका वर्णन' नामक यह दूसरा प्रकाश समाप्त हुआ ।