प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंAn exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश राज्यों में भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के स्वामी (भोज) को प्रसन्न किया। इस प्रकार उसकी वचन-चातुरी से राजा चमत्कृत हुआ। गूर्जर देश के प्रति प्रयाण करनेका राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाण के समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया- ७२. चौल [ का राजा ] समुद्रकी गोद में प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वत की खोह में निवास कर रहा है, कर्णाट का राजा पट्ट बंध (पगडी बाँधना) नहीं करता है, गूर्जर [ का राजा ] निर्झर का आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अब्जों से म्लान होगया है और राजाओं में सुभट समान कान्यकुब्ज कूबडा होगया है- हे भोज ! तुम्हारे मात्र सेनातन्त्र के प्रसार के भय से ही सभी राजा लोग व्याकुल हो रहे हैं। ७३. कोंकण [ का राजा ] कोने में, लाट (नरेश) दरवाज़े के पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगन में सोया करते हैं। अरे कोशल [ नरेश ], तू अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसन पर सोया करते थे। इस प्रकार जिस (भोज) के कारागृह में रात में प्रत्यार्थियों में स्थानप्राप्तिके लिये उठा हुआ पारस्परिक विरोध निरन्तर बढ़ता रहता है। प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्षुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी जमीनपर सुस्थ भारसे सोये हुए तैलप राजाको उठाने लगा। तैलपने उससे कहा-'मै तो यहाँ पुश्त-दर-पुश्त से बास कर रहा हूँ, आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ?' राजा भोजने हँसकर डामर से नाटकके रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-'महाराज ! यद्यपि नाटक में रसकी जमावट बहुत उत्तम है तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्त से जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है। क्यों कि राजा तैलपदेव सूलीपर चढ़ाये हुए मुण्ड के सिरसे पहचाना जाता है।' सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्री के साथ, जो दूसरों के जुटाये न जुट सकती थी, तैलङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया। ४९) बादमें तैलपदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें उसे डामर ने [अपने] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि भीम भी चढ़कर भोगपुरतक आ गया है। जलेपर नमक छिड़कने के समान उसकी उस बात से राजा भोज खूब शंकित हो गया। उसने डामर से कहा- इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आने से रोको। उसने बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसर के जाननेवाले [डामर] को हाथी के साथ हथिनी भेंट दी। उनको लेकर वह पत्तन में आया और भीमको परितुष्ट किया। ५०) एक बार, जब वह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुन का राधा-वेध (मत्स्य-वेध) सुनकर सोचा कि 'अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्रुतित राधावेधको उसने सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियों को जान हो इसलिये नगर में खूब सजावट कराई। किन्तु एक तेली और एक दर्जीके, अवज्ञासे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, राजाको उसकी खबर की गई। तेलीने चंद्रशाला (ऊपरी छत) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रखे हुए संकडे मुँहके पात्रमें तेल डालकर; और दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके दोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें