प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया; और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा कर दिखावै' ऐसा कह कर राजाका गर्व खंडित किया । [ उसका राधावेध करना देखकर किसो कविने उसकी प्रशंसा में कहा- ] ७४. हे भोजराज ! मैने राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के विपरीत ( राधा ) को नही सह सकते । ५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होते हुए उस राजाको नया नगर बसानेकी इच्छा हुई तो उसने पटह बजवाया । उस समय धारा नामरू एक वेश्या अपने अग्निबेताल नामक पतिके साथ लंका जाकर उस नगरका निवेश देख आई; और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, लंकाका प्रतिच्छन्द पट (मानचित्र) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी बसाई । * दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना । ५२) किसी दिन वह राजा सायंकालके सर्वावसरके बाद अपने नगरके भीतर [ धीरचर्या निमित्त ] घूम रहा था, उसी समय किसी दिगंबर विद्वान्को यह कविता पढ़ते सुना- ७५. न किसी सुभटके सिरपर खड्गके टुकड़े किये, न तेजी घोड़ोंपर सवारी ही की और न गोरी स्त्रीको गले ही लगाई-इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया । राजाने सबेरे ही उसको बुलाकर और वह संकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूंछी । वह बोला- ७६. महाराज ! रमणीय दीपोत्सवके बीत जानेपर जब हाथियोंका मद झरने लगेगा तो मैं अपनी शक्तिसे गौड़देश के साथ सारे दक्षिणापथको एक छत्र नीचे कर दूँगा । उसने अपना ऐसा पौरुष प्रकट किया तो राजाने उसे [ योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर अभिषिक्त किया । कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई । ५३) इधर, जब राजा भीम सिन्धु देशकी विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे सामन्तोंके साथ, अणहिल्लपुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियाँ वपन कराकर उसने जयपत्र ग्रहण किया । तबसे सर्वत्र "कुलचन्द्रने लूट लिया" [ कहावत ] की प्रसिद्धि हुई । वह जयपत्र लेकर मालवामें गया । श्री भोज को यह वृत्तान्त विदित किया । 'तुमने वहाँपर कोयला क्यों नही बोया ? [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह सूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँसे कर वसूल होकर गूर्जर देश में जायगा ।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठाभरण श्रीभोजने [ यह भविष्यवचन ] कहा । ५४) एक बार चन्द्रातप (चाँदनी) में श्रीभोज राजा बैठे थे, पास-ही-में कुलचंद्र भी था। पूर्ण चन्द्रमण्डलको देखकर [पुनः पुनः उसकी ओर देखकर ] (राजाने) यह पढ़ा- ७७. जिन लोगोंकी रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये शीतल है; किन्तु विरहियोंके लिये तो उल्काके समान सन्तापदायक है । उस कविके इस प्रकार आधा कहनेपर कुलचन्द्र बोला- हम लोगोंके न तो प्रिया है और न विरह है, इसलिये दोनों ओरसे भ्रष्ट होनेके कारण हमको तो चंद्रमा दर्पणकी आकृतिके समान दिखाई देता है । न वह उष्ण है, न शीतल । ऐसा कहनेके अनन्तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई । * ११-१२