प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
१५४ ] प्रबन्धचिन्तामणि सदाचार-प्रसरण-शीला थी फिर भी धीमी चालसे चलनेवाली थी । वह मुनियोंके साथ क्रीड़ा किया करती थी । अपनी सुकोमल वाणीके प्रपञ्चसे उसने त्रैलोक्यको चमत्कृत कर दिया था, और उसकी आकृति मन्द मुसकानसे खूब मधुर हो रही थी। इस बालिकाको देख कर उसके रूपसे हत-चित्त हो कर राजाने किसी निकटस्थ प्रसन्नचित्त (साधुजन) से पूछा कि- ' भला यह लड़की कौन है ?' उसने कहा कि-' अपार ऐसे शास्त्र-सागरके पारको देख लेनेके कारण जिन्होंने ' कलिकाल सर्वज्ञ' की प्रसिद्धि प्राप्त की है; द्वादश भेदोंवाली तपस्याकी आराधनाके द्वारा, अष्ट महासिद्धियोंको जिन्होंने वशमें कर लिया है; समग्र भूपालोंके शिर प्रदेशकी मणियोंने जिनके चरणोंका चुम्बन किया है; उन्हीं महर्षि भगवान् आचार्य श्री हेमचन्द्रके आश्रममें रहनेवाली यह अहिंसा नामक कन्या है। इसके यथार्थ रूपका निरूपण करनेमें स्मृति और पुराणके वचन तो पर्याप्त नहीं है, किन्तु समस्त जन्तुओंके पितृ-स्वरूप श्री जिनेन्द्र देवके उपदिष्ट स्पष्ट सिद्धान्तों और उपनिषदों द्वारा आभासित हृदयवाले किसी मुनिश्रेष्ठने इसकी स्थितिकी रीतिका पूरा निरूपण किया है - अन्य किसीने वैसा नहीं किया। यह वचन सुन कर राजा अपने आवासमें लौट आया। पर उस कन्याका स्वरूप जान कर, उसका अङ्गीकार करनेके लिये परम उत्सुक वह राजा, उसके पाणिग्रहणके द्वारा अपनी भाग्य-सम्पद आदिको कृतार्थ करनेकी कामनासे, अपने 'विवेक' नामक परम मित्रके बताये हुए मार्गसे उन मुनियोंके आश्रममें जा पहुंचा। उस कन्याके सामने उसीका 'सदाचार' नामक भाई खेल रहा था। उसीने जा कर सम-चित्तवृत्तिवाले महर्षि श्री हेमचन्द्र सूरिको राजाके आगमनका वृत्तान्त बतलाया। राजाने पृथ्वीतलपर मस्तक टेक कर, उन्हें भक्ति और हर्षके साथ, प्रणाम किया और फिर उस कन्याका स्वरूप पूछा। इस पर वे बोले-' हे नरपुंगव ! सुनो, त्रैलोक्यके एकमात्र सम्राट् श्री अर्हद्धर्मकी पट्ट महादेवी श्रीमती अनुकंपा देवीके कुक्षि सरोवरकी राजहंसी जैसी, नि सीम सुन्दरी यह 'अहिंसा' नामक कन्या है। जिस लग्नमें यह कन्या पैदा हुई थी उस लग्नके प्रभावको इसके सर्वज्ञ पिताने इस प्रकार निर्दिष्ट किया था-' यह अतीव पुण्यवती, सुदतियोंकी शिरोमणि कन्या है। पुत्रजन्मोत्सवसे भी अधिक प्रशंसनीय इसका जन्म है। क्यों कि- लक्ष्मी [ रूप कन्यासे] समुद्रको और वाग्देवी [ रूप कन्यासे] ब्रह्माको निष्कृत देख कर, कुपुत्रके दु खसे सूर्य और चन्द्रमा ताप और कलंकका त्याग नहीं करते हैं ॥ २ ॥ इस लिये क्रमशः बढ़ती हुई यह कन्या अपने अनुरूप वर न पानेके कारण वृद्ध-कुमारी हो जाने पर किसी अनुरूप राजासे साग्रह विवाहित होगी। इस प्रकार सतियोंमें श्रेष्ठ यह कन्या अपने पति और पिता दोनोंको उन्नतिकी पराकाष्ठापर पहुँचा देगी। और इससे विवाह करनेवाला वह पुरुष भी खेलहीमें महा-मोह नामक राजाको जीत कर परमानन्दका भाजन बनेगा।' यह सुन कर राजा बोला- 'प्रभो ! यह अर्हद्धर्मकी पुत्री इस समय आपके ही चरण कमलोंकी उपासना करती है, अतः इसका विवाह आपकीके कहनेसे होगा, अन्य किसीसे नहीं। सो पूज्य-पाद मुझपर प्रसन्न हों, विषादगण विषण्ण हों, महामोहका विजय करना प्रारम्भ हो, और [ उससे ] मैं परमानन्द प्राप्त करूँ।' उसके इस कथनके बाद गुरु बोले-' यह वृद्धा कुमारी है, इसका सङ्कल्प दुष्पूरणीय है। यह सङ्कल्प इसीके मुँहसे सुन कर विवाह करना चाहिये, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार उनकी अमृतकी जैसी वह वाणी सुन कर, उसने कन्याके पास सुबुद्धि नामक दासी भेज कर उसे बुलवाया। वह दासी उस कन्याके पास जा कर भक्ति-पूर्वक प्रणाम करके बोली-'स्वामिनि, राजकन्ये, [ आज ] तुम धन्यतमा हो, जो तुम्हें, अठारह देशोंके सम्राट्, और समस्त सामन्तोंके मस्तक-मणिक्योंकी किरण मालासे जिनका चरण अलंकृत है वह चौलुक्य-चक्रवर्ती तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं।' उसकी इस बातसे कुछ मुँह बना कर, उपहासके उल्लासके साथ, उसने कहा-' सखि, जिस महान् साम्राज्यका अन्त नरक है उसके लोभकी बातका विस्तार
कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध [ १५५ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ । पुरुष प्रायः परुष आशयवाले, और नाना प्रकारके अनुरागवाले होते हैं; उनसे मेरा क्या काम है । क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे विडंबित होना [ अच्छा ] नहीं ॥ ३ ॥ पर सुनो, - अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर ( बड़े धनसंपन्न ) से भी नहीं प्राप्त होता । [ देखो न ] भागीरथी ( गंगा ) को शिव तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति ( विष्णु ) उसे पैरसे भी नहीं छूने ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलाषा तो वृथा ही समझो । क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी पूरा होना कठिन है ।' ऐसा कहनेवाली उस युवतीसे वह (दासी) बोली-' सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी हूँ, कुछ अपडाप तो करनेकी नहीं; सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ । मेरा भी नाम सुबुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊँगी ।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट, [ ऐसा जो पुरुष होगा ] वही मेरा पति होगा ॥ ५ ॥ दुर्गतिके बन्धु जैसे द्यूत स्वभाववाले सात पुरुषों (अर्थात्, सात व्यसनों) को जो अपने चित्तसे दूर निकाल फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥ ६ ॥ मेरे सहोदर भाई सदाचारको अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा वही मेरा पति होगा ॥ ७ ॥ उसकी इस बातको सुन कर वह बोली-' ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा (सुबुद्धि) तब हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करनेके लिये, श्री हेमसूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्थोंका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तभी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी बीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी समीपमें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई । उसकी इस अवज्ञामयी प्रतिज्ञाके कठोर भावसे हृदयमें सन्तप्त हो कर राजा बड़ी बेचैनी धारण करने लगा । तब सुबुद्धिने कहा-' हे श्रीनिधे ! धीरज धरो, पौरुष-शालियोंको दुष्कर क्या है ? और इस बाधाके दूर करनेके उपाय भी तो हैं । महर्षि हेमचन्द्रका अनुसरण करो और उनका उपदेश सुनो !' इस प्रकार उसकी बात सुन कर विनयका सहारा पा कर यह राजा सूरिके पास गया । उनके पद-पद्मोंपे प्रणाम कर उनकी कन्याकी उस प्रतिज्ञाका वृत्तान्त कहा । [ सूरि बोले-] ' वत्स ! यदि परिणयनकी चाह है तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो । यह कन्या अपने पतिकी निःसीम उन्नतिके लिये होगी । क्यों कि- उत्तम वंशोत्पन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कौन प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता ! लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप ( कृष्ण ) और उग्र ( शिव ) ने जिस तरह [ प्रतिष्ठा ] पाई थी । ॥ ८ ॥ उनकी यह बात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेवाली ऐसी हस्तावलम्बी किये हुए उस राजाने, अनेक प्रकारके अभिग्रह धारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राप्त किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । सं० १२१६ मार्गशीर्ष सुदि द्वितीयाको, बलवान् लग्नमें, संवेग नामक हाथीपर आरूढ हो, रत्नत्रयसे अलंकृत, शुभमनरूप वस्त्र धारण करके, दक्षिण हस्तमें कंकण बाँध कर, यह [हेमसूरिकी] पौषधशालाके द्वारपर आया । उस समय श्वेतच्छत्र द्वारा उसका आतप निवारण किया जा रहा था; श्रद्धा नामक बहन उसकी चरण-आरती उतार रही थी;
१५६ ] प्रबन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ वरातिन बन कर मंगल गान कर रहीं थीं; अमारि-घोषणाके पटह बज रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिषसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था; पापरूप कचरेको दूर हटाया जा रहा था; सद्बोध पुष्पोंसे सन्मार्गकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं; तब कन्याकी माँ अनुकंपा महादेवी ने श्रीअर्हन् के साक्षी रहते प्रोक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका- पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेळुक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवांगवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक ग्रन्थपरिमाण, हेम सूरिकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामक शास्त्र स्थापित किया गया। वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक (कोडियों) के स्थापनकी जगह; वीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये। शमी काष्ठके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र ग्रन्थ स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हेम सूरिके अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई। मूलगुण और उत्तर गुणोंसे इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और 'चत्तारिमंगल' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोंकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्थात् निःसन्तान विधवा स्त्रियोंके राज्यग्राह्य धन) का त्याग करने रूप दान किया। उसी समय उसका पट्टबन्ध किया गया (-उसे पट्ट महादेवी बनाया गया), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा (जो राजाकी पूर्वपत्नी थी) अपनी सौत अहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई। बहुत दिन बाद देखनेके कारण तथा पराभवके दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- 'सुंदरी ! तुम कौन हो ? '- 'हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं।' -'तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है ? '-' पराभवके कारण। '-' वह (पराभव) किससे हुआ ? '- ' क्या बताऊं ! 'कहो न '- 'हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपतिने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वितलसे निकाल दिया ॥ ९ ॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा बोले कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक्त हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है; तो फिर मैं अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालूँगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो'-यह कह कर उसे अपने समीप रखा। अहिंसा देवीके साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव करता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा। इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमकी प्रसादपूर्ण क्रीड़ा- ओंका स्मरण करती हुई यह अहिंसा देवी भी, कलिमलिन जनोंके पापस्पर्शका परिहार करनेकी इच्छासे, उसके साथ 'सहगमन' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध समाप्त हुआ। -:०:-