प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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प्रकरण २०३-५ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३५
' नहीं महाराज, हम लोग सुखी नहीं हैं।' उनके ऐसा कहनेपर विभ्रमसे भ्रान्तचित्त हो कर उनको विदा किया; और फिर कभी किसी बातकी विचारणाके समय नगरके प्रधान जनोंको बुला कर पूछा कि 'आप लोग क्यों सुखी नहीं हैं?' और साथ ही काठके पात्रके साथ उस कुदालको ऊंचा करके वैसे रखनेका कारण भी पूछा। उन्होंने कहा कि-'जहाँपर स्वामीने काष्ठपात्र आदि देखा है वह धनी, अपने धनकी गिनती न जान कर, कठौतसे ही उसकी नापको जतानेका संकेत करता है। और हम लोग सुखी नहीं हैं सो तो आपके सन्तानाभावसे । यह नगर कोटिध्वजोंसे भरा है। आपने चिर कालतक इसका लालन किया है, पर अब कौन इसे उन्नत बनायेगा ?' यह सुन कर राजाने अपने अन्तःपुरकी पुरानी रानियोंको बंध्या समझ कर नई रानीके करनेकी इच्छा की। तब उसकी अनुमति पा कर वे लोग, पुष्य नक्षत्रवाले रविवारके दिन, पुष्यार्क योगमें, किसी बडे शकुन शास्त्रज्ञके साथ शकुनागारमें गये। वहाँ पर, एक मात्र लकड़ीका बोझ उठा कर अपना पेट भरनेवाली ऐसी कंगालिन स्त्रीको देखी जिसके सिरपर दुर्गा बैठी थी और जो आसन्नप्रसवनाली स्थितिमें थी। शकुनज्ञने उसकी अक्षतादिसे पूजा की। उन लोगोंने कारण पूछा तो उसने कहा कि-'अगर बृहस्पतिका मंतव्य सच है, तो इसके गर्भमें जो कोई लड़का है वही यहाँका भावी राजा होगा'। इस बातको असंभव समझ कर उन्होंने लौट कर मानोन्मत्त उस राजाको, ज्यों की त्यों, वह सब बात कह सुनाई। राजाने इससे मनमें खिन्न हो कर, अपने निजी मनुष्योंको भेज कर, उस स्त्रीको जमीनमें गाड़ देनेकी आज्ञा की। उन्होंने जा कर उससे कहा कि 'इष्ट देवताका स्मरण कर लो'। उनके ऐसा कहनेपर वह मरणभयसे व्याकुल हो उठी। इतनेमें संध्याके हो जानेसे उनकी अनुज्ञा ले कर वह शौच जानेके लिये गई, तो वहीं उसको पुत्रका प्रसव हो गया। वह उसे वहीं छोड़ कर लौट आई। फिर उसको जमीनमें गाड़ कर उन मनुष्योंने राजाको उसकी सूचना दी। इधर एक हिरनी उस बालकको, नित्य दोनों शाम दूध पिला कर, बड़ा करने लगी। उस समय, महालक्ष्मी देवीके सामनेकी टकशालामें जो नया सिक्का पडने लगा उसमें हिरनीके चार पैरके नीचे एक बालककी प्रतिकृति पडती हुई देखी गई, जिसके कारण लोगोंमें यह बात फैलने लगी कि कोई नया राजा उत्पन्न हुआ है। इससे उस रत्नशेखरने पता लगवा कर उस बच्चेको मरवा डालनेके लिये चारों ओर अपने सैनिक भेजे। उन्होंने प्रयत्न करके उस बालरूको प्राप्त किया। लेकिन बाल-हत्याके भयसे स्वयं उसे न मार कर, नगरके सदर दरवाजेके रास्तेमें इस तरह रख दिया, कि जिससे सायंकालके समयमें, उस मार्गसे निकलनेवाली गायोंकी खुरोकी चोटोंसे आप ही आप वह मर जाय और लोकमें कोई अपवाद न हो। उसे वहाँ छोड़ कर, कुछ दूर खड़े हुए, वे जब देखने लगे तो उतनेमें वहाँ गायोंका एक झुंड आता उन्हें दिखाई दिया। पर, मानों मूर्तिमंत पुण्यके पुंजकी नाईं उस बालकको देख कर वे सब गायें, पैरोंसे स्तंभितकी नाईं, खड़ी रह गई। इसके बाद, पीछेसे आगे आ कर एक साँडने, वृषभ जैसे ही तेजस्वी उस बालकको, अपने पैरोंके बीचमें रख कर, सब गायोंको आगे चलनेके लिये प्रेरित किया। बादमें, इस वृत्तान्तको सुन कर, राजा उन सामन्त और नगर लोकोंके द्वारा, उस बालकको मँगा कर, अपने पुत्रकी नाईं उसका पालन करने लगा। 'श्रीपुञ्ज' ऐसा उसका नाम रखा गया।
श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन । २०५) इसके बाद, जब वह रत्नशेखर राजा स्वर्गगामी हुआ तो श्रीपुञ्जका अभिषेक हुआ। कुछ दिन राज्य करनेपर उसके एक पुत्री पैदा हुई। यद्यपि वह सर्वांग सुन्दर थी पर मुँह उसका बानरका-सा था। इससे वह विषयविमुख हो कर वैराग्यके साथ रहने लगी और श्रीमाताके नामसे प्रसिद्ध हुई। एक बार उसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया। पिताके सामने उसने उसे निवेदन किया कि-'मैं पूर्व जन्ममें अर्बुद
पञ्चम प्रकाश: वस्तुपाल-तेजपाल व ऐतिहासिक प्रबन्ध
गिरि पर बानरकी स्त्री थी । वहा पर किसी एक वृक्षकी, एक शाखासे दूसरी शाखापर कूदते हुए, कोई अगम्य शल्यसे तालुमें विद्ध हो कर मैं मर गई । उसीके नीचे कामिक नामक तीर्थका कुण्ड था जिसमें मेरा धड़ गिर पड़ा । उस तीर्थके पुण्य-प्रभावसे मेरा यह शरीर तो मनुष्यका हो गया; किन्तु वह मेरा मस्तक अभी तक वैसे ही पड़ा है इसलिये मैं बानरके मुखवाली हुई हू । श्रीपुज ने यह सुन कर अपने विश्वसनीय आदमियोंको [वहाँ भेज कर] उसके शिरको कुण्डमें डाल देनेके लिये आदेश दिया । उन्होंने जा कर चिर कालसे उसी प्रकार पड़े हुए मुखको वैसा ही देखा और फिर उसे कुण्डमें डाला । तब वह श्री माता मनुष्यके मुखवाली हो गई । फिर माता-पिताकी अनुज्ञा ले कर अर्बुदजितनी संख्यावाले गुणोंकी धारक यह, उस अर्बुदपर्वत पर जा कर तपस्या करने लगी । एक बार, एक आकाशचारी योगीने उसे देखा तो वह उसके सौन्दर्यसे हृत-हृदय हो कर आकाशसे नीचे उतरा और प्रेमालाप-पूर्वक उससे कहने लगा कि 'तुम मुझसे ब्याह क्यों नहीं कर लेती ?'। उसके ऐसा पूछनेपर वह बोली कि—' इस समय रात्रिका पहला पहर व्यतीत हुआ है, चौथे पहरमें—जब तक मुर्गा न बोल उठे तब तकमें—अगर किसी नियके बलसे तुम बड़ी सुन्दर ऐसी बारह पथा (पत्थरकी सीढियाँ) बनवा दो तो मैं तुमको वर दूँगी' । उसके ऐसा कहनेपर, तुरन्त हीं उस कार्यके लिये उसने अपने चेटकोंके झुंडको नियुक्त किया और दो ही पहरमें वे सब पथायें बनवा दीं । पर इधर श्री माता ने उतनेहीमें मुर्गेकी बनावटी आवाज कर दी । उसने आ कर कहा कि [पथा तैयार है इससे अब] 'विवाहके लिये तैयार हो जांओ' तो इसपर श्री माता ने कहा कि 'जब वे बन रही थीं तभी मुर्गेकी आवाज हो गई थी' । तो उसने कहा 'वह तो तुम्हारी मायाजालके बनाये हुए बनावटी मुर्गेकी ध्वनि थी; सो इसको कौन नहीं जानता' । ऐसा उत्तर देते हुए, नदीके किनारे अपनी बहनके द्वारा विवाहका उपहार उपस्थित कराया । श्री माता ने ' सब विद्याओका मूल जो यह त्रिशूल है इसे यहीं छोड़ कर विवाहके लिये तैयार रहो' ऐसा कह कर उसे वहा बुलाया । प्रेमके वशमें हतचित्त हो कर वह वैसा ही करके उसके समीप आया। श्रीमाता ने बनावटी कुत्ते बना कर उसके पैरों पर छोड़ दिये और हृदयमें त्रिशूलका आघात करके उसे मार डाला । इस प्रकार नि सीम शीलके साथ उसने अपनी सारी जिन्दगी बिताई । उस अखण्ड शीलाकी मृत्युके बाद, श्री पुञ्ज राजाने वहाँपर शिखरके बिनाका एक प्रासाद बनवाया । क्यों कि ६-६ महीनेके बाद, उस पर्वतके अधोभागमें रहनेवाला अर्बुद नाग जब हिलता है तो वह पहाड़ काँपने लगता है । इसलिये वहाँके सभी प्रासाद शिखर रहित [बनाये जाते] हैं । इस प्रकार श्री पुञ्जराज और उसकी पुत्री श्रीमाताका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ । * चौडदेशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण । २०६) चौड देशमें एक गोवर्धन नामक राजा हुआ । उसके वहाँ, सभामण्डपके सामनेके खंभेमें न्याय घटा बंधी हुई थी जो न्याय करानेके प्रार्थीजनोंके द्वारा बजाई जा कर निनाद किया करती । एकबार उसके इकलौते कुमारके रथारूढ़ हो कर कही जाते समय, रास्तेमें अज्ञातभावसे एक गौका बछड़ा मर गया । उसकी माता गायने, आँखोंसे अजस्र आँसू वर्षाते हुए, अपने पराभवके प्रतीकारार्थ सींगोंसे वह न्याय-घटा बजाई। अर्जुनके समान कीर्तिवाले उस राजाने, घटाका झंकार सुन कर, गायका समूल वृत्तान्त जाना और अपने न्यायकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रातःकाल रथारूढ हो कर, उस अपने एकमात्र प्रिय पुत्रको, उसी रास्तेमें रख कर, उस धेनुके समक्ष उसपर अपना रथ घुमाया । उस राजाके ऐसे सत्व और परम भाग्यसे रथका चक्र (पहिया) ऊपर हो उठा और वह कुमार नहीं मरा । इस प्रकार यह गोवर्धननृपप्रबंध समाप्त हुआ । *
प्रकरण २०५-२०८ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३७ पुण्यसार राजाका वृत्तांत । २०७) कान्तीपुरी में, प्राचीन कालमें, कोई पुराण नृपति, निरभिमान भावसे राज्य कर रहा था । एक बार वह राजपाटिका में जानेके लिये निकला, तो उसके पीछे पीछे उसका परम-मित्र मतिसागर नामक महामात्य भी चला । रास्तेमें घोड़ा बिगड़ उठा और वह राजाको दूर ले भगा । साथकी चतुरंग सेना क्रमशः दूर दूर रह जाने लगी । पर अत्यंत वेगवाले घोड़ेपर चढ़ कर वह मंत्री उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक चला गया । कितनी ही दूर चले जानेपर, राजा मार्ग लाँघनेके श्रमसे बिल्कुल थक गया और सुकुमारताके कारण रुधिरके दवारसे वहीं मर गया । मंत्रीने उसका अन्तष्ट्य करके, उसके घोड़ेको और उसके वेशको साथ ले आ कर सायंकाल नगरमें प्रवेश किया । सीमान्तमें रहे हुए शत्रु राजाओंके भयसे राज्यको निर्विघ्न रखनेकी इच्छासे, उस राजा-ही-की उम्रके और रूपके जैसे एक कुम्हारको राजाका वह पोशाक पहना कर और उसी घोड़ेपर चढ़ा कर महलमें प्रवेश कराया । फिर रानीको सारा हाल बता कर, सचिवने पुण्यसार नाम दे कर उसीको राजा बनाया । इस प्रकार कितनाक काल बीत जानेपर, वह मंत्री सेनाका बड़ा समूह ले कर किसी शत्रु राजाके ऊपर चढ़ाई ले गया और अपने एक खूब विश्वस्त सहायकको राजाकी सेवामें रख गया । बादमें यह राजा निरंकुश हो कर, वेश्यापतिकी तरह, स्वैर विहार करता हुआ 'समस्त कुम्हारोंको अपने पास बुला और मिट्टीके हाथी, घोड़े, बैल आदि बना कर उनके साथ चिर काल तक खेला करने लगा। ऐसा करनेपर समस्त राजलोक उसकी अवहेलना करने लगे जिसको सुन कर स्कंधागारसे ( लड़ाईके मैदानसे ) कुछ नौकरों को साथ ले कर मंत्री वहाँ आया और राजासे इस प्रकार बोला कि- 'यदि अपने स्वभावकी चल-विचलनाके कारण, तुम उस कुम्हारपनकी बातको न भूल कर किसी मर्यादाको नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें देशसे निकाल कर किसी अन्य कुम्हारके बालकको राजा बना दूँगा' । उसकी इस उक्तिसे क्रुद्ध हो कर राजा बोला-' अरे, कौन है यहाँ ?' उसके ऐसा कहते ही वे मिट्टीके पुतले सजीव हो उठे और मंत्रीको चिपट पड़े । इस असंभव जैसे महान् आश्चर्यको देख कर और राजाके प्रकट प्रभावसे विस्मित हो कर मंत्री उसके चरणोंपर गिर पड़ा और अपने को छुड़ानेकी अभ्यर्थना करने लगा । फिर राजाके वैसा ही करने (छुड़ा देने) पर भक्ति-पूर्ण मंत्रीने कहा- 'आपको साम्राज्य देनेमें मैं निमित्त मात्र हूँ। आपके पुण्यप्रभावसे पुतले सचेतन हो कर इस प्रकार आज्ञाकारी हो रहे हैं, सो इसमें पूर्वजन्मके कर्म ही कारण हैं; और इसलिये आपका यह जो पुण्यसार नाम है वह सार्थक है। इस प्रकार यह पुण्यसारका प्रबंध समाप्त हुआ ।' * कर्मसार राजाका प्रबन्ध । २०८) प्राचीन कालमें, कुसुमपुर नगरका नंदिवर्धन नामक राजकुमार, देशान्तर भ्रमणके कौतुकसे माता-पितासे बिना पूछे ही अपने छत्रधरके साथ चल पड़ा । यदृच्छासे घूमता हुआ, एक प्रातः कालमें, किसी गाँवमें जा पहुँचा । वहाँ, पुत्रहीन राजा मर गया था, इससे सचिवोंने अभिरिक्त करके पहहस्तीको किसी नये राजाकी तलाशमें सारे नगरमें घुमाया । संयोगवश वह वहापर आया और उस निकटस्थ गुप्त कुमारको, दुःस्वप्नकी नाईं भूल कर, ससंभ्रम उस हाथीने छत्रधरका अभिषेक किया । प्रधानोंने बड़े महोत्सवके साथ उसको नगरमें प्रवेश कराया । उसने राजकुमारको भी वैसे ही ठाठके साथ अपने साथ ले कर, महलमें प्रवेश किया । बादमें- ' मैं राजलोकका स्वामी हूं; लेकिन तुम मेरे स्वामी हो' इस प्रकारके अन्तरंग वचनोंसे वह उस राजकुमारकी आराधना करता रहा । पर यह राजा राजगुणोंके अयोग्य था और बेहद बेवकूफ था। वर्णाश्रम धर्मके पालनके परिभ्रममें अनभिज्ञ और प्रजाका पीड़क हो कर ज्यों ज्यों यह राज्य करता था त्यों त्यों, शंखाके ३५-३६
१३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश शिरमें रहे हुए चन्द्रमाकी तरह, वह प्रतिदिन क्षीण होता जाता था। उस कुमारको वैसा देख कर, किसी समय राजाने दुर्बलताका कारण पूछा तो उसने कहा कि-' दुर्बुद्धिके कारण तुम जो प्रजाको पीड़ा दे रहे हो यह अत्यन्त अनुचित कर्म है और इस कारण मैं कृश होता जा रहा हूं'। २४२. जिसे मूर्खोंके बीच वास करना पड़े तथा जिसके स्वामीके कानोंके पास दुर्जनोंकी जीभ लगती हो, उसका यदि जीवन बना रहे तो उसे ही लाभदायक समझना चाहिए, क्षीण होनेमें तो विस्मय ही काहेका। सो मैंने इस गाथाके अर्थको सत्य कर बताया है। उसके इस कथनके अनन्तर राजाने कहा कि-' इस पापनिरत प्रजाके अपुण्योदयने ही तो, निश्चय करके भविष्यमें इसको पीड़ित करनेके लिये, मुझे राजा बनाया है। यदि विधाता इस प्रजाके भाग्यमें परिपालना लिखता तो उस समय पट्ट हस्ती तुम्हारा ही अभिषेक करता।' उसकी इस उक्ति और युक्ति रूप औषधोंसे उस कुमारका वह रोग दूर हो गया और वह शरीरसे पुष्ट होने लगा। इस प्रकार यह कर्मसार प्रबंध समाप्त हुआ ! * राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबंध । २०९) गौडदेशकी लक्षणावती नगरीमें लक्ष्मणसेन नामक राजा अपने उमापतिधर नामक सर्वबुद्धिनिधान ऐसे सचिवके साथ, सारी राज्य व्यवस्थाका विचार करते हुए, राज्य करता था। बादमें वह, मानों अनेक मातंग (हाथी) के सैन्यके संगसे मदान्धता धारण करके, किसी वेश्याके संगरूप कलङ्कपंकमें डूब गया। उमापतिधरने यह व्यतिकर जाना तो, प्रकृतिसे क्रूर होनेके कारण स्वामीको बेकाबू समझ कर, प्रकारा- न्तरसे उसे समझानेके लिये, उसने सभामंडपके भारपट्टपर, गुप्त भावसे इन कविताओंको लिख दिया - २४३. हे जल ! शीतलता तो तुम्हारा ही गुण है, और फिर तुम्हारी स्वाभाविकी स्वच्छताकी तो बात ही क्या कही जाय -तुम्हारे ही स्पर्शसे अन्य अपवित्र वस्तुयें पवित्र होती हैं। इससे बढ़कर और तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है कि तुम्हीं तो शरीरधारियोंके जीव हो। फिर अगर तुम्हीं नीच पथसे जाते हो तो तुम्हें रोकनेमें कौन समर्थ है ? २४४. हे शिव ! तुम अगर छोटे बैल पर चढ़ते हो तो उससे दिग्गजोंकी क्या हानि है? तुम अगर साँपोंका आभूषण पहनते हो तो इससे सोनेका क्या नुकसान है? अगर अपने शिरपर इस जड़ किरण चन्द्रमाको धारण करते हो तो उससे त्रैलोक्यके दीपक सूर्यका क्या बिगड़ता है ? तुम जगत्के ईश हो तो फिर हम तुम्हें क्या कहें ? २४५. यद्यपि फटे हुए ब्रह्मशिरको वह धारण करता है, यद्यपि प्रेतोंसे उसकी मित्रता है, यद्यपि रक्ताक्ष हो कर मातृकाओंके साथ वह क्रीड़ा करता है, यद्यपि श्मशानमें वह प्रीति रखता है और यद्यपि सृष्टि करके वह उसका संहार कर देता है, तो भी, मैं उसमें मन लगा कर भक्ति-पूर्वक सेवा करता हूँ। क्यों कि त्रिलोक शून्य है और वह जगतका एक-मात्र ईश्वर है। २४६. इस महान् प्रदीपकालमें तुम्हीं एक मात्र राजा (चन्द्र) हो, और इसी लिये तो क्या कमलोंकी लक्ष्मीको बद्ध करके कुमुदोंकी श्रीको बढ़ा नहीं रहे हो ? पर इसमें जो ब्रह्माका निवास है और पुष्पोंकी पंक्तिमें इसकी जो प्रतिष्ठा है उसको दूर करनेवाले तुम कौन हो ? क्यों कि वह तो स्वयं विधाता भी करनेमें समर्थ नहीं है।
प्रकरण २०९-२१० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३९ २४७. हे हार ! तुम सद्वृत्त, सद्गुण, महार्ह, और अमूल्य हो कर प्रियाके घन ऐसे स्तनतटके उपयुक्त तुम्हारी सुंदर मूर्ति है । किन्तु हाय, पामरीके कठोर कंठमें लग कर टूट जानेसे तुमने अपनी यह गुणिता खो दी है । किसी राजासभाके अवसरपर आये हुए राजाने इन कविताओंको देखा और उनका अर्थ समझ कर भीतर ही भीतर मंत्रीसे द्वेष धारण करने लगा । क्यों कि- २४८. आजकल प्रायः सन्मार्गका उपदेश करना, उसी तरह कोपका कारण होता है, जैसे नकटेको दर्पण दिखाना । इस न्यायसे कुपित हो कर राजाने उसे पदभ्रष्ट कर दिया । इसके बाद उस राजाने, एक बार, राज- पाटिकासे लौटते हुए रास्तेमें दुर्गतिग्रस्त, निरुपाय और एकाकी ऐसे उस उमापतिधरको देखा, तो क्रोधपूर्वक उसे मार डालनेके लिये, हस्तिपालके द्वारा उस पर हाथी चलवा दिया । तब उसने महावतसे कहा कि-'जब तक, मैं राजाके सामने कुछ कह पाऊँ तब तक, तुम वेगसे हाथीको जरा थाम रखो' । उसकी बात सुन कर उसने वैसा ही किया; तो फिर वह उमापतिधर बोला- २४९. जिसको, सज्जन ऐसे गुरु लोग उपदेश नहीं देते उस शिवका कैसा हाल हो रहा है ?-नंगा फिरता है, शरीरमें धूल लगाता है, बैलकी पीठपर चढ़ता है, साँपोंसे खेला करता है, और जिसमेंसे लोहू टपकता है ऐसे हाथीके चमडेको पहन कर नाचता है । इस प्रकारके आचारवाह्य तथा अन्य कई प्रकारके [ निंद्य ] आचरणोंसे यह प्रेम रखे करता है । इस प्रकार उसके विद्वानरूपी वचनानुशासे उस राजाका मनरूपी हाथी वश हुआ, और वह अपने चरित्रके विषयमें पश्चात्ताप करता हुआ अपनी खूब निंदा करने लगा । धीरे धीरे उस वासनासे मुक्त हो कर उसने फिरसे उसे अपना प्रधान बनाया । इस प्रकार लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध । २१०) काशीनगरी में जयचन्द्र नामक राजा, महती साम्राज्य लक्ष्मीका पालन करता हुआ, पंगु ( लंगड़ा ) इस विरुदको धारण करता था । कारण यह था कि बड़े भारी सैन्य समूहसे व्याकुलित होनेके कारण, वह गंगा-यमुना नदीरूप लाठीके सहारे बिना कहीं आ-जा नहीं सकता था। वहाँ रहनेवाले किसी शालापतिकी सुह्य नामक पत्नी, जिसने अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकके स्त्रीजनोंको जीत लिया था, किसी समय भयानक ग्रीष्म ऋतुमें जलकेलि करके गंगाके किनारे खड़ी थी । तब उस खञ्जननयनाने देखा कि एक साँपके शिरपर खंजन पक्षी बैठा है। वहीं पर नहानेके लिए आये हुए किसी ब्राह्मणके पैरों पड़ कर उसने उस असंभव शकुनका विचार पूछा । उस नैमित्तिकने कहा कि-'अगर मेरा सदा आदेश मानना मंजूर करो तो मैं इसका विचार निवेदन करूँ, नहीं तो नहीं' । उसने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की, तो ब्राह्मणने कहा कि-'आजसे सातवें दिन तुम इस राजाकी पटरानी होंगी '-ऐसा कह-सुन कर वे दोनों यथा-स्थान चले गये । जिस दिनके लिये निमित्तज्ञने निर्णय दिया था उसी दिन राजपाटिकासे लौटते हुए राजाने, किसी एक गढ़ीमें अगम्य २. थमे सुभग अंगवाली उस शालापतिकी स्त्रीको खड़े देखा। उसे अपने चित्तका मर्मम् चोरनेवाली १ इस पदमें प्रयुक्त सद्वृत्त, सद्गुण और गुणित्व ये शब्द प्रसिद्ध अर्थके अतिरिक्त रूपसे हारके पक्षमें इन अर्थोके वाचक हैं-सद्वृत्त=अच्छी गोलाईवाला; सद्गुण=अच्छे धागेवाला, गुणित्व=धागेकी बनावटवाला ।
१४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश समझ कर उसने अपने पास रख लिया और पटरानी बनाया। इसके बाद उस कृतज्ञाने ब्राह्मणके प्रति की हुई अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके राजासे उस विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलानेके लिये प्रार्थना की। राजाने डुग्गी पिटवा कर विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलवाया तो उस नामके सात सौ ब्राह्मण आ कर उपस्थित हुए। उनमेंसे उस एकको पहिचान कर अलग बैठाया और बाकी सबको यथोचित सत्कारके साथ बिदा किया गया। बादमें उस विपत्तिग्रस्त विद्याधर से राजाने कहा कि- 'जो इच्छा हो माँगो' । राजाके आदेशसे प्रमुदित हो कर उस ब्राह्मणने 'सदैव उसकी अंगसेवा' की प्रार्थना की। राजाने स्वीकार करके, उसके असीम चातुर्यकी पर्यालोचना करते हुए उसे सर्वाधिकारके भारका धारण करनेवाला धुन्धर पद दिया। यह क्रमशः सम्पत्तिशाली बन गया। अपने अन्तःपुरकी बत्तीस सुंदरियोंके लिये ऊँची जातिके कर्पूरके बने हुए नित्य नये आभरण बनवाता और यह कह कर कि पुराने आभरण निर्माल्य हैं उन्हें एक छोटी कुईमें डलवा देता। इस प्रकार साक्षात् देवता- वतारकी नाईं दिव्य भोगोंको भोगता हुआ [नित्य] अठारह हजार ब्राह्मणोंको यथेच्छ भोजन दान करनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता। २११) इसके बाद, विदेशी राजाके ऊपर चढ़ाई करनेके लिये राजाकी आज्ञासे, चतुर्दश विद्याओंके ज्ञाता विद्याधरने नाना देशोंमें घूमते हुए, एकबार एक ऐसे देशमें जा कर डेरा दिया जहाँ जलानेके लिये इन्धन (लकड़ी आदि) नहीं था। तब उन ब्राह्मणोंकी रसोईके समय, रसोईयोंके वस्त्र तेलमें भिगो कर उन्हींको इन्धन बना कर नित्यकी भाँति ही उनको भोजन कराया। इस तरह शत्रुओंको जीत कर जब वह लोट कर वापस नगरके समीप आया तो मालूम हुआ कि, पिण्याक (भोजन) के बनानेकी इच्छासे जो दुकूल जलाये गये, उससे राजा कुपित हो गया है। इससे उसने अपने घरको तो याचकोंके द्वारा लुटवा दिया और स्वयं तीर्थयात्राके लिये निकल पड़ा। राजा भी फिर पीछे जा कर उसका अनुनय करने लगा, पर उसने स्वाभिमानवश, अपनी उस (भोजन बनानेकी) इच्छाके कारण राजाका वैसा आशय (क्रोधयुक्त भाव) हो गया था यह बता कर, जैसे तैसे उसकी अनुमति ले कर अपना अन्त साधन किया। २१२) अनन्तर, सूहबदेवीने राजासे अपने पुत्रके लिये युवराज पदवी माँगी। राजाने कहा कि- 'रलेतिनके लड़केको हमारे वंशमें राज्य नहीं दिया जाता'। इससे उसने राजाको मारनेके लिये म्लेच्छोंको बुलवाया। उस स्थान पर रहनेवाले पुरुषों (राजदूतों) से इस बातका हाल जान कर, राजाने एक दिगंबर भिक्षुकसे, जिसने पद्मावतीसे वर प्राप्त किया हुआ था, सादर निमित्त (कोई मांत्रिक उपाय) पूछा। उसने राजाको विश्वास पूर्वक कहा कि- 'पद्मावतीका आदेश म्लेच्छागमनके विरुद्ध है'। इसके अनन्तर कुछ दिनके बाद, यह सुन कर कि म्लेच्छ नजदीक आ गये हैं, राजाने उस दिगम्बरसे फिर पूछा कि यह 'क्या बात है !' तो उसने उसी रातको राजाके सामने ही पद्मावतीको होमादि देना आरम्भ किया। तब उसकी उस उत्तम आकर्षण-विद्याके बलसे, होमकुण्डकी ज्वालाओंमें प्रत्यक्ष हो कर, पद्मावतीने तुरुष्कों (तुरुकों) के आगमनका निषेध ही बताया। तब फिर उस क्रुद्ध दिगम्बरने उसके कान पकड़ कर अत्यन्त क्रोधसे कहा कि- 'म्लेच्छ सेनाके निकट आ जानेपर भी तू ऐसी मिथ्या बात बोल रही है'। इस तरह फटकारी जानेपर उसने कहा कि- 'तू जिस पद्मावतीको अति भक्तिके साथ यह पूछ रहा है वह तो हमारे प्रतापके बलसे कहीं भाग गई है। मैं तो उस म्लेच्छराजकी कुलदेवी हूँ। मिथ्या बोल कर लोगोंमें विश्वास पैदा करके, उन्हें म्लेच्छोंके द्वारा विश्वास (प्राण-रहित) कराती रहती हूँ'। ऐसा कह कर वह तिरोहित हो गई। बादमें प्रातःकालमें ही म्लेच्छ सेना द्वारा वाणारसी नगरीका घिर जाना राजाने जान पाया। उनके धनुषोंके टंकारोंमें, राजाके चौदह सौ नगाड़ोंकी आवाज कहीं डूब गई और म्लेच्छ सेनाके भयसे
२१०-२१३ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४१ मनमें व्याकुल हो कर उस सूहवदेवीके पुत्रको अपने हाथीपर बैठा कर (उसके साथ) राजा गंगाके जलमें डूब मरा। इस प्रकार यह जयचन्द्रका प्रबंध समाप्त हुआ। * जगद्देव क्षत्रियका प्रबंध । २१३) त्रिविध वीरश्रेष्ठत्वको धारण करनेवाला जगदेव नामक एक क्षत्रिय वीर हुआ। वह श्री सिद्धराजके द्वारा खूब सम्मानित होता था। फिर भी उसके गुणरूप मत्रके वशीभूत हो कर शत्रुमर्दन ऐसे राजा परमर्दीने जब उसे आग्रहपूर्वक अपने यहा बुलाया, तो पृथ्वीरूप रमणीके केशकलापके समान उस कुन्तल देशमें वह गया। दरवाजेपर पहुँच कर जब उसने राजाको अपने आनेकी खबर भिजवाई उस समय [ राजाके आगे ] एक वेश्या, नंगी हो कर 'पुण्यचलन' नृत्य कर रही थी। वह तत्काल ही लज्जित हो कर अपनी चादर ओढ कर वहीं बैठ गई। जब राजाके द्वारपालने जगदेव को प्रवेश कराया तो राजाने उठकर आलिंगन दिया और प्रिय आलाप आदि किया। इस सम्मानके बाद, फिर उसे प्रधान परिधानदुकूल और लाखोंकी कीमतके अतुलनीय ऐसे दो अन्य वस्त्र भेंट स्वरूप दिये। बादमें जगदेवके महामूल्यवान आसन पर बैठ जानेपर सभाका संभ्रम जब दूर हुआ, तो राजाने उस वेश्याको नाचनेका आदेश किया। तब उस उचितज्ञा चतुर नारीने कहा कि--'संसारके एकमात्र पुरुष श्री जगदेव नामक अब यहापर विद्यमान हैं इसलिये इनके सामने बिना वस्त्रके नाचने में लजाती हू। स्त्रिया स्त्रियोंके सामने ही यथेष्ट चेष्टा कर सकती हैं'। उसकी इस लोकोत्तर प्रशंसासे मनमें प्रमुदित हो कर जगदेवने राजाके दिये हुए उन दोनों वस्त्रोंको उसे दे डाला। इसके बाद, जब परमर्दीके प्रसादसे जगदेवको किसी एक देशका आधिपत्य मिला तो उसे सुन- कर उसका ऋणग्रस्त उपाध्याय उससे मिलने आया। उसने यह काव्य भेंट किया- • २५०. हम दो आदमीके पुण्यको मानते हैं-एक तो अक्षत्रिय त्रिविसे वालिको मारनेवाले किसी भगवान् (रामचंद्र) के, और दूसरे संगीतमें आसक्त कुन्तल पतिके। इनमेंसे एक (रामचंद्र) ने तो मरुत्तनय (हनुमान्) की दोनों सुंदर भुजाओं रूप कामधेनुका दोहन किया और दूसरे (कुन्तलपति) ने, हे प्रतिपक्ष (शत्रु) के लिये प्रत्यक्ष परशुराम, आप जैसे चिन्तामणिको प्राप्त किया। इस काव्यके पारितोषिकमें उस स्थूललक्ष (लक्षण-सम्पन्न) ने आधा लाख दिया। २५१. चकोरने पांथ (मुसाफिर) से पूछा कि 'हे मित्र ! बताओ पृथ्वीमें बसने लायक वह कौनसा देश है जहाँपर चिर कालतक रात्रि नहीं होती ?' (इसपर पांथने कहा कि) ' श्री जगदेव नामक पुरुष जो सुवर्णदान कर रहा है उससे थोडे ही दिनोंमें मेरु पर्वत समाप्त हो जायगा। और फिर सूर्यका छिपना बंद हो कर एक मात्र अद्वैत ऐसा (बिना रात्रिका) दिन ही बना रहेगा। २५२. पृथ्वीकी रक्षा करनेमें दक्ष ऐसे दाहिना हाथवाले, दाक्षिण्यकी शिक्षा देनेमें गुरुके समान, कल्याणके स्थान और धन्यजन्म ऐसे जगदाना जगदेवके विद्यमान होनेपर, विद्वानोंके घर भी ऐसे बन गये हैं कि जिनमें प्रतिदिन, मतवाले हाथी और घोड़ोंके बांधने योग्य वृक्षोंकी रस्सियां टूट जानेके कारण, नौकर लोग व्याकुल बने रहते हैं। २५३. तुम्हारे जीवित रहते बलि, कर्ण और दधीचि जीते हैं और हमारे जीवित रहते दारिद्र जीता है।
१४२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश २५४. हे जगदेव ! हम नहीं जानते कि किसका हाथ थक जायगा—दरिद्रोंको रचते रचते ब्रह्माका, या उन्हें कृतार्थ करते करते तुम्हारा । २५५. हे जगदेव ! इस जगद्रूप देवमंदिरमें प्रतिष्टित तुम्हारे यशरूपी शिवलिंगके ऊपर [आकाशके] नक्षत्रोंने अक्षतका रूप धारण किया है। [ १७४ ] हे जगदेव ! चारों समुद्रोंमें डुबकी मारनेके कारण तुम्हारी कीर्ति मानों ठंडीसे जकड गई है, इसलिये अब ताप लेनेके निमित्त वह सूर्य-मण्डलको चली है। [ १७५ ] क्षत्रियदेव श्रीजगदेव भूपालका कल्याण हो ! जिसके यशरूपी कमलमें आकाशने भ्रमरका रूप धारण किया । [ १७६ ] पृथ्वीमण्डलपर सुवर्ण वितरण करनेवाला तो एकमात्र जगदेव ही है और उसके मांगनेवालोंकी संख्या हजारोंकी है—ऐसा सोच कर, ऐ मेरे मन विषाद मत करो। सूर्य कितने हैं और प्रबल अन्धकारराशिमें डूबते हुए जन-समूहकी प्राणरक्षाके लिये यात्रामें प्रवृत्त उनके घोड़ोंके खुरसे खुदा हुआ यह दिङ्मण्डल कितना विस्तृत है ! जगदेवकी दी हुई 'न नवम्' ( नया नहीं है ) इस समस्याकी पूर्ति एक पंडितने इस प्रकार की— २५६. समुद्र अगाध है, पृथ्वीमण्डल विशाल है, आकाश विभु है, मेरु पर्वत ऊँचा है, विष्णु प्रथित- महिमा है, कल्पवृक्ष उदार है, गंगा पवित्र है, चंद्रमा अमृतवर्षी है और जगदेव वीर है—ये सब (विशेषण-युक्त विशेष्य ) नये नहीं हैं। [ १७७ ] तुझ समान जगदाता जगदेवके विद्यमान होनेपर, अब लोक साहसांक राजाके चरितके आश्चर्योंमें भी मन्दादर हो गये हैं तो फिर पार्थकी उस सच्ची कथाका कहना तो वृथा ही है। यह पृथ्वीमें बलि है, यह भूचर शक्र है। कृष्णको किसीने देखा नहीं, पृथ्वीमंडळ कल्पवृक्षसे शून्य है। कामदेवका सोच न करना चाहिए। (-इस पद्यका भाव कुछ स्पष्ट नहीं ज्ञात होता।) [ १७८ ] हे जगदेव ! तुम्हारा यशोरूप दुर्वार चंद्रमा जब निरंतर ही अपनी किरणश्रेणीको दसों दिशाओंमें विकीर्ण करने लगा, तब सारे भुवनको राकाके लिये भयका स्थान समझ कर, 'कुहू' शब्द है सो एक मात्र कोकिलके कंठका शरणभूत हो कर रहा । ( 'कुहू' का एक अर्थ अमावश्याकी रात्रि है, और दूसरा कोकिलका शब्द है । जगदेवके यशरूपी चंद्रमाका निरंतर प्रकाश बना रहनेसे अमावश्याका अभाव हो गया, इसलिये कुहू शब्दका व्यवहार केवल, कोकिलके शब्दमें रह गया ।) [ १७९ ] हे प्रभु जगदेव ! तुम्हारे रूपमें मुग्ध हो कर, वातायन पर स्थित सुभ्रू (सुंदर भ्रुवों वाली ) रमणियोकी कमलदलसे द्रोह करनेवाली नाचती हुई आँखें सभय, सालस, सगर्व, सार्द्र, तिरछी, चकित, भ्रान्त और आर्त की नाईं, कहां नहीं पड़तीं हैं । इस प्रकारके बहुतसे काव्य हैं जो यथाश्रुत जानने चाहिये । राजा श्रीपरमर्दी राजकी पट्टदेवीको जगदेव ने अपनी भगिनी माना था। एक बार, राजाने सीमान्त भूपालको हरानेके लिए श्रीजगदेव को भेजा। वह, वहाँ जब देवार्धन कर रहा था उसी समय छल करके आघात करनेवाले शत्रुने उसकी सेनामें उपद्रव मचाया। इसका हाल सुन कर भी वह जगदेव उस देवपूजासे बाहर नहीं निकला। प्रणिधि पुरुषोंके मुँहसे राजाने जगदेव का पराजय हुआ सुना तो यह अश्रुतपूर्व बात सुन कर
प्रकरण २१३-२१५ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४३ अपनी रानीसे पर मर्दीने [ व्यंग्य करते हुए ] कहा कि- 'तुम्हारा भाई समरवीरताका तो बड़ा अहंकार धारण करता है लेकिन शत्रुओं द्वारा आक्रान्त हो कर वह वहाँसे भाग भी नहीं सका'। राजाकी इस मर्मभेदिनी परिहास वाणीको सुन कर रानीने प्रातःकालमें पश्चिमकी ओर देखा । राजाने पूछा 'क्या देखती हो ?' इस पर रानीने कहा कि 'सूर्योदय' । तब राजाने कहा 'पगली, क्या कभी पश्चिम दिशामें भी सूर्योदय होता है?' इसपर वह बोली - 'पश्चिममें सूर्योदयका होना असंभव हो कर भी, कभी विधिके विधानके विरुद्धका होना संभव है; पर क्षत्रियोंमें देव जैसे जगद्देव का पराजय होना तो संभव ही नहीं'। इस प्रकार उस दम्पतीका प्रिय आलाप हो रहा था। इधर, देवपूजाके बाद जगद्देवने ५०० सुभटोंके साथ उठ कर, उस शत्रु राजाकी सेनाका क्रीडामात्र-ही-में इस तरह दलन कर डाला, जिस तरह सूर्य अन्धकारके समूहका, सिंह-शाव गजयूथका और प्रचण्ड अन्धड़ घनघोर मेघमालाका दलन करता है । २१४) वह परमर्दी राजा, जगत्में एक उदाहरणभूत ऐसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करता हुआ, एक निद्राके अवसरको छोड कर, दिनरात अपने ओजके प्रकाशका करनेवाला छुरिका-अभ्यास ( छुरी चलानेकी कलाका परिश्रम ) किये करता था । भोजनके अवसर पर रसोई परोसनेमें व्यस्त ऐसे एक एक रसोईयेको नित्य ही निर्दय भावसे उस छुरिकासे काट डालता था । इस प्रकार सालमें ३६० रसोईयोंका वह संहार करता हुआ 'कोप-कालानल 'के विरुदसे प्रसिद्ध हो गया । २५७. हे आकाश, तुम फैल जाओ; दिशाओ, तुम आगे बढ़ो; हे पृथ्वी, तुम और भी चौड़ी हो जाओ; आदिकालके राजाओंके यशका उज्जृंभण तो तुम लोगोंने प्रत्यक्ष किया ही है; अब परमर्दी राजाके यशोशशिका विकास होनेसे देखो कि यह ब्रह्माण्ड, प्रस्फुटित बीजोंके कारण, फटे हुए दाड़िमकी दशाको प्राप्त हो रहा है। इत्यादि स्तुतियोंसे स्तुत हो कर वह राजा चिर कालतक साम्राज्यके सुखका अनुभव करता रहा । २१५) उसका, सपादलक्षके राजा पृथ्वीराज के साथ युद्ध हुआ और संग्रामाङ्गणमें वह अपने सैन्यके पराजित होने पर, दिग्दिमूढ़ हो कर, किसी एक दिशासे भागता हुआ अपनी राजधानीमें आया । उस परमर्दी राजाके द्वारा पूर्वमें अपमानित कोई सेवक, देश निकालेकी सजा पा कर पृथ्वीराज की सभामें आया । उसके प्रणाम करनेके बाद राजाने उससे पूछा कि-'परमर्दी के नगरमें सुकृती लोग विशेष करके किस देवताकी पूजा करते रहते हैं?' इस प्रकार स्वामीके पूछनेपर उसने शीघ्र ही यह तत्कालोचित पद्य पढ़ा- २५८. शिवकी पूजा करनेमें वह मंद है, कृष्णार्चन करनेकी उसे कोई तृष्णा नहीं है, दुर्गाको प्रणाम करनेमें यह स्तब्ध रहता है, विधाता रूपी ग्रह [ उसके यहाँ पूजा न पानेसे ] व्यग्र रहता है । 'हमारा स्वामी परमर्दी इसीको मुंहमें रख कर पृथ्वीराज नरपतिसे रक्षा पा सका है ' इस बातको सोच कर वहाँकी प्रजा तृण ही की पूजा किये करती है । इस स्तुतिसे प्रसन्न हो कर राजाने उसे यथेष्ट पारितोषिक दे कर अनुगृहीत किया । उसने ( पृथ्वीराज ) इक्कीस बार म्लेच्छराजाको हराया था । तब बाइसवीं बार वही म्लेच्छराज अपनी दुर्धर सेनाके साथ चढ़ कर पृथ्वीराज की राजधानीके पास आ कर ठहरा । मक्खीकी तरह बारबार उड़ा देनेपर भी, इस प्रकार, शत्रुको फिर फिर आते देख उसकी तरफ राजाकी उपेक्षाका होना जाना, तो स्वामीकी असीम कृपाका पात्र और उसके दूसरे शरीरके जैसा वह तुंग नामक क्षात्रतेजधारी वीरश्रेष्ठ, अपनी छायाके जैसे पुत्रके साथ म्लेच्छ- राजकी सेनामें जा घुसा । रातके समय उसने देखा कि उस शत्रुके तंबूके चारों ओर एक खाई खुदी हुई है जिसमें खैरकी लकड़ीकी आग धधक रही है । यह देख वह अपने पुत्रसे बोला-'मैं इस खाईमें कूद पड़ता हूं;
१४४] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रवाह तुम मेरी पीठपर पैर रख कर जा कर म्लेच्छराजको मार डालो'। पिताके ऐसा आदेश करनेपर उसने कहा कि- 'यह काम मेरे लिये साध्य नहीं है कि अपने जीवनकी आकाङ्क्षासे मैं पिताकी मृत्यु देखूं!; सो मैं ही इसमें पड़ता हूं और आप ही मेरी पीठपर पैर रख कर उसका अन्त कर डालें'। उसके वैसा करनेपर, स्वामीके कार्यको सिद्ध- प्राय हुआ मान कर आसानीसे उसने शत्रुको मार डाला और फिर जैसे आया था वैसे ही घर लौट गया। जब प्रभात होनेको आया तो अपने स्वामीको मरा देख कर वह म्लेच्छ सेना दीन हो कर भाग गई। गंभीरप्रकृति होनेके कारण उस तुंग सुभटने राजाको वह कुछ भी हाल नहीं बताया। किसी समय, राजमान्य होनेके कारण अत्यन्त परिचित ऐसी उस तुंग सुभटकी पुत्रवधूको मंगलदर्शक हस्तकंकणोंसे रहित देख कर, राजाने संभ्रमभावसे उसका कारण पूछा। समुद्रकी नाईं गंभीर होनेके कारण, मौनमर्यादाके साथ प्रथम तो उसने कुछ भी नहीं बताया। तब राजाने अपनी शपथ दे कर पूछा। इस पर उसने यह कह कर कि-'यद्यपि अपना गुण कथन करना मेरे लिये दुष्कर कार्य है तथापि आज्ञा होने निवेदन करना पड़ता है' ऐसा कह कर प्रत्युपकारभीरु हो कर उसने वह वृत्तान्त जैसा घटा था वैसा ही निवेदन किया। २५९. उच्च बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तकी यह कोई बड़ी ही अलौकिक कठोरता है कि किसीका उपकार करके फिर वे दूसरेसे प्रत्युपकार पानेके भयसे उनसे निःस्पृह हो रहते हैं। इस प्रकार यह तुंगसुभट प्रबंध समाप्त हुआ। * पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना। २१६) इसके अनन्तर, फिर कभी, उस म्लेच्छराजका पुत्र पिताका वैर स्मरण करके सपादलक्षके राजा पृथ्वीराजके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे बड़ी तैयारीके सहित चढ़ कर आया। पृथ्वीराज की सेनाके वीर धनुर्धरोंके, वर्षाकालकी मूसलधार वृष्टिकी नाईं बरसते हुए, बाणोंकी मारसे वह स-सैन्य भगा दिया गया और फिर पृथ्वीराजने उसका पीछा किया। इस समय भोजन-विभागके अधिकारी पद्मकुलने कहा कि- 'सात सौ साढनियां जो भोजनकी सामग्री ढोती हैं वे पर्याप्त नहीं हैं, इसलिये महाराज कुछ और साढनिया देनेकी कृपा करें'। राजा यह सुन कर बोला कि - 'म्लेच्छराजको मार कर उसके ऊँटोंका झुंड कब्जे किया जायगा, और फिर तुम्हें माँगी हुई साढनिया देनेका प्रबन्ध किया जायगा'। ऐसा कह कर उसे समझा दिया और फिर जब आगे प्रयाण करने लगा तो सोमेश्वर नामक प्रधानने बारबार निषेध किया। राजाने इस भ्रमसे कि यह उस (म्लेच्छ) के पक्षमें है, उसके कान काट लिये। इस अत्यन्त पराभवके कारण, वह अपने स्वामीसे कुपित हो कर उस म्लेच्छपतिके पास चला गया। उसको अपना पराभव-वृत्तान्त कह कर, उसके मनमें विश्वास बिठाया और उसको पृथ्वीराजके पड़ावके पास ले आया। पृथ्वीराज एकादशीके पारणाके पश्चात् जब सोया हुआ था तो उसकी सेनाके वीरोंके साथ म्लेच्छोंकी लड़ाई छिड़वा दी। राजा गाढ़ी नींदमें सो रहा था। उसी अवस्थामें तुर्कोने उसे कैद कर लिया और वे अपने स्थानमें ले गये। फिर दूसरी एकादशीके पारणाके अनन्तरपर, जब वह राजा [कैदीकी हालतमें ] देव-पूजा कर रहा था, उस समय म्लेच्छराजने रँधा हुआ मांस, पत्रके पात्रमें (दोनेमें) रखवा कर उसके तंबूमें भिजवाया। उसके देवपूजामें व्यस्त होनेके कारण, एक कुत्ता आ कर उस मांसको उठा ले गया। तब पहरेदारोंने कहा कि 'इसकी रक्षा क्यों नहीं करते?' इसपर राजाने कहा कि- 'मेरी जिस भोजनसामग्रीको कभी सात सौ साढनिया भी ठीक तरह नहीं ढो सकती थीं, उसी भोजनकी आज यह दुर्दशा है-इस बातको मैं अनाकुल हो कर कौतुकसे देख रहा हूं'। उन्होंने कहा कि-'क्या तुममें अब भी कुछ उत्साह शक्ति बाकी है?' तो उसने कहा 'यदि मैं अपने स्थानपर जा पहुँचूं
प्रकरण २१६-२१८] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४५ तो अपनी शारीरिक ताकत कैसी है सो दिखा दूं'। पहरेदारोंने यह बात उस म्लेच्छराजको जा कर कही तो वह उसके साहसको देखनेकी इच्छासे, उसे उसकी राजधानीमें ले आया और राज-भवनमें ले जा कर उसको गादीपर बिठाया। बादमें ज्यों ही उन्होंने देखा तो उसके महलकी चित्रशालामें ऐसे चित्र बने हुए नजर आये जिनमें सूअर म्लेच्छोंको मार रहे हैं। यह दृश्य देख वह तुर्कोंका राजा अपने मनमें अत्यन्त पीड़ित हुआ और वहीं पर उसने कुठार द्वारा पृथ्वीराज का सिर काट कर उसका संहार कर डाला। इस प्रकार नृपति परमर्दी, जगद्देव और पृथ्वीराज इन तीनोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई। २१७) जहाँ समुद्र ही जिसकी परिखा (खाई) है ऐसे शतानन्दपुरमें महानंद नामक राजा हुआ। उसकी रानीका नाम था मदनरेखा। अन्तःपुर [ में स्त्रियों ] की प्रचुरता होनेसे राजा उसके प्रति विरक्त रहता था। इसलिये पतिको वशीभूत करनेकी इच्छासे वह नानाविध विदेशी जनों और कलाविदोंसे इस बारेमें पूछा करती। तब एक यथार्थवादी विश्वसनीय तांत्रिकने उसे कुछ सिद्धयोग बताया। उसके प्रयोग करनेके अवसरपर उसे इस वाक्यका अनुस्मरण हो आया कि 'मंत्रमूलके बलपर की हुई प्रीतिको पतिद्रोह कहते हैं'। तो उस योगचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। कहा है कि 'मंत्र और औषधिका प्रभाव अचिन्त्य होता है'-इस लिये औषधके माहात्म्यसे वशीभूत हुआ समुद्र ही उसका वशवर्ती हो कर, मूर्तरूप (मनुष्यस्वरूप) बना कर उसके साथ रातमें आ कर रतिरमण करने लगा। इससे वह गर्भवती हो गई। तब उसके ऐसे चिन्होंको देख कर राजा कुपित हो कर उसे किसी प्रवास आदिका दण्ड देनेकी तदबीर सोचने लगा। इससे उसकी मृत्यु निकट समझ कर समुद्रदेव प्रत्यक्ष हुआ और अपना परिचय देते हुए बोला कि- 'मैं समुद्रका अधिष्ठाता देव हूँ, इसलिये डरना मत'। फिर यह राजासे बोला- २६०. शीलवती कुलीन कन्याको, विवाह करके, जो सम-दृष्टिसे नहीं देखता, वह बड़ा भारी पापिष्ठ कहा गया है। इसलिये इस स्त्रीकी अवज्ञा करनेवाले ऐसे तुझको मैं अन्तःपुर और परिवारके साथ अगाध जलमें डुबो दूँगा'। यह सुन कर वह भयभ्रान्ता रानी उसका अनुनय करने लगी। इस पर समुद्रने यह कह कर कि- 'यह मेरा ही लड़का होगा और इसलिये मैं ही कहीं कहींका जल हटा कर इसे साम्राज्यके योग्य नई भूमि दूँगा'-ऐसा कह कर फिर उसने कहीं कहींसे जल हटा कर अन्तरीप (बेट) बना दिये जो लोगोंमें सब 'कौंकण' नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार यह कौंकण-प्रबंध समाप्त हुआ। * ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध। २१८) पाटलीपुत्र नगरमें वराह नामक एक ब्राह्मणका लड़का था जो जन्मसे ही शकुन ज्ञानमें श्रद्धालु था। गरीब होनेके कारण पशु चरा कर अपना निर्वाह किये करता था। एक दिन [जंगलमें] किसी एक पत्थर पर लग्न लिख कर उसे बिना मिटाये ही घर लौट आया। यथासमय उचित कृत्य कर लेनेके बाद रातमें भोजन करनेको बैठा तो उस लग्नके विसर्जन न करनेका स्मरण हो आया। तब उसी समय निर्भय भावसे वहाँ गया तो देखा कि उसपर एक सिंह बैठा है। उसने इसकी भी परवा न की और उसके पेटके नीचे ३७-३८
१४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश हाथ डाल कर उस मिटाने लगा। तब इसके अनन्तर वह सिंहका रूप त्याग करके सूर्यरूपमें प्रत्यक्ष हुआ और कहने लगा 'वर माँगो'। तब उसने माँगा कि- 'मुझे समस्त नक्षत्र ग्रह मण्डलको [प्रत्यक्ष] दिखा दो'। यह सुन सूर्य उसे अपने विमानपर चढ़ा कर ले गया और [सारा ग्रहचार बता कर] एक वर्ष बाद वहीं ले आ कर छोड़ गया। इस तरह वह ग्रहोंके वक्र, अतिचार, उदय, अस्त आदिकी प्रत्यक्ष परीक्षा करके पुन अपने स्थानमें आया। मिहिर (सूर्य) का प्रसाद प्राप्त होनेसे वराहमिहिर इस नामसे प्रसिद्ध हो कर वह श्री नन्द नामक नृपतिक्रा परम मत्य हुआ और उसने 'वाराहीसंहिता' नामक एक नया ज्योतिषशास्त्र बनाया। २१९) एक बार, अपने पुत्र जन्मके अवसरपर, उसने अपने घरमें घटिका रख कर उससे जन्मकालका शुद्ध लग्न ले कर जातक ग्रथके प्रमाणसे ज्योतिष (जन्मपत्र) बनाया। स्वयं प्रत्यक्ष किये हुए ग्रहचक्रके ज्ञानके बलपर उस पुत्रकी आयु एक सौ वर्षकी निर्णीत की। उस महोत्सवमें, श्री भद्रबाहु नामक एक जैनाचार्य-जो उसके छोटे भाई थे-को छोड़कर, राजासे ले कर रंक तक कोई ऐसा नहीं रहा था जो कुछ उपहार हाथमें लेकर उसके वहा नहीं गया हो। तब उस नैमित्तिकने जिनभक्त शकटाल मन्त्रीके आगे, उन सूरिके न आनेके बारेमें उलाहनेके तौरपर कहा। तब उस मन्त्रीने, उन महात्माको, जो सम्पूर्ण शास्त्रके ज्ञाता थे और त्रिकालके भावोंको हथेलीपर रखे हुए आँवलेके फलकी तरह जानते थे, यह बात कह सुनाई। तो उन्होंने कहा कि- 'आजसे बीसवें दिन उस लड़केकी, बिल्लीके निमित्तसे, मृत्यु होगी इसलिये यह समझ कर हम नहीं आये'। उनकी यह उपदेश-वाणी वराहमिहिरसे कही गई। तब उसने अपने कुटुम्बको, उस बालककी भावी विपदसे आवश्यक रक्षा करनेके लिये कहा और बिल्लीसे बचा रखनेके लिये सौ सौ उपाय करने लगा। फिर भी निर्णीत दिनकी रातको उस बालकके सिरपर अर्गला (दरवाजेको बंद करनेके लिये लकडी या लोहेकी बनी हुई एक पट्टी) गिर जानेसे अचानक वह मर गया। फिर उस शोकशांकुसे उसका उद्धार करनेकी इच्छासे श्री भद्रबाहु उसके घर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उसके घरके आँगनमें ज्योतिषकी सभी पुस्तकें इकट्ठी करके जलानेके लिये रखी पड़ी हैं। तब उन्होंने पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो उस सांवत्सर (ज्योतिषी) ने बड़े दुःखके साथ, उन जैनमुनिको उपालंभ देते हुए कहा- 'ये पुस्तकें बड़े भारी मोहान्धकारको उत्पन्न करनेवाली हैं इसलिये अब निश्चय हीइन्हें जला दूंगा, क्यों कि इन्होंने मुझे धोकेमें डाला है'। उसके ऐसा कहनेपर अपने शास्त्रज्ञानके बलसे बालकका जन्मलग्न ठीक तरह निकाल कर उन्होंने सूक्ष्म दृष्टिसे उसका ग्रह-बल बताया तो वह बीस ही दिनका आया। इस प्रकार उसकी शास्त्रविरक्ति जब दूर की गई तो वह ज्योतिषी बोला कि-'आपने जो बिडालसे मृत्यु बताई वह तो ठीक नहीं साबीत हुई'। तब उन्होंने उस अर्गलाको वहाँ मँगवाई, जिसके गिरनेसे मृत्यु हुई थी, तो उसमें बिड़ालकी आकृति खुदी हुई पाई गई। 'क्या भवितव्यतामें भी कभी कुछ परिवर्तन हो सकता है?' ऐसे उस महर्षिने कहते हुए कहा कि- २६१. किस बातके लिये रोया जाय ? यह शरीर क्या चीज है ? ये परमाणु तो अविनाशी हैं। यदि संस्थान-विशेषके लिये ही शोक करना है, तब तो कभी भी प्रसन्न ही नहीं होना चाहिये। २६२. यह सब भाव (अस्तित्व) अमानोत्पन्न है और मायाके विभवसे सम्भावित है। इसका अन्त भी अभाव ही में संस्थित है। इस बातके ज्ञानसे सज्जनोंको भ्रम नहीं पैदा होता। -इस प्रकारकी युक्तिपूर्वक उक्तिसे उसे समता कर वे महर्षि अपने स्थानपर आये। इस तरह समझाये जाने- पर भी वह, मिथ्यात्व रूप धत्तूरके प्रभावसे सच्चे सुवर्णमें भ्रान्तिवाला हो कर, उनके प्रति द्वेषभाव धारण कर रहा। अत [ईर्ष्यावश] अभिचार कर्मसे, उनके भक्तों और उपासकोंमेंसे किसीको कष्ट पहुंचाने लगा और
प्रकरण २१९-२२० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४७ किसीको मारने लगा । अपने प्रौढ़ ज्ञानके द्वारा इन लोगोंका यह वृत्तान्त जान कर उन्होंने विघ्नकी शान्तिके लिये 'उवसग्गहरं पासं' इस नूतन स्तोत्रकी रचना की । इस तरह यह वराहमिहिर प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त । २२०) ढंक नामक पर्वत पर रहनेवाले रणसिंह नामक राजपूतको एक भूपल नामकी पुत्री थी जिसने अपने सौन्दर्यसे नागलोककी बालाओंको भी जीत लिया था । उसे देख कर वासुकि नागका उस पर अनुराग हो गया । उसने उसके साथ संभोग किया और उसमे नागार्जुन नामरू पुत्र पैदा हुआ । उस पाताल पाल (नाग) ने पुत्रस्नेहसे मोहित हो कर उसे सभी ओषधियोंके फल, मूल और पत्तोंका भक्षण कराया । इन ओषधियोंके प्रभावसे वह महासिद्धियोंसे अलङ्कृत हुआ । सिद्धपुरुष होनेके कारण पृथ्वी पर्यटन करता हुआ वह शातवाहन नृपतिके पास गया, जहाँ उसे राजाके कलागुरु होनेकी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । तो भी वह गगन-गामिनी विद्याका अध्ययन करनेकेलिये श्री पादलिप्ताचार्य के पास पादलिप्तपुर गया । निरभिमान हो कर उनकी सेवा करने लगा । भोजनके समय, पादलेपके द्वारा आकाशमें उड कर अष्टापद आदि तीर्थोको नमस्कार करके वे आचार्य वापस आये, तो उनके चरण धो कर रस, वर्ण और गन्धकी परीक्षासे उसमें १०७ महौषधियोंका होना उसने जाना । बादमें गुरुकी आज्ञाकी परवा न करके उसने स्वयं वैसा ही पादलेप किया। इससे मुर्गे और मोरकी नाई कुछकुछ उड़ता हुआ वह एक खड्डेमें गिर पडा और चोट लगनेसे उसका सारा शरीर जर्जरित हो गया । तब गुरुने पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो फिर उसने वह सब वृत्तान्त यथावत् निवेदन किया । उसकी इस चतुरतासे चकित हो कर उसके सिरपर अपना करकमल रखते हुए उन्होंने कहा कि- 'साठी चावलके पानीमें उन ओषधोंको मिलाकर पादलेप करो और इस तरह आकाश गामी बनो' । इस तरह उनके अनुग्रहसे उसे वह सिद्धि प्राप्त हुई । उन्हींके मुहसे यह भी सुना कि श्री पार्श्वनाथ की मूर्तिके सामने समस्त-खीलक्षणयुक्त पतिव्रताके हाथसे निर्गर्दित हो कर जो रस सिद्ध किया जाता है वह कोटिवेधी होता है । [उसने उस मूर्तिकी गवेषणा करते हुए जाना कि-] पूर्व कालमें समुद्र विजय दशार्ह (यादव) ने त्रिकालवेदी श्री नेमिनाथके मुखसे सुन कर, महातिशायी श्री पार्श्वनाथका एक रत्नमय बिंब निर्माण करके द्वारावती के प्रासादमें स्थापित किया था । द्वारावती के जलनेके बाद, जबसे वह पुरी समुद्रमें डूब गई तबसे, वह बिंब समुद्रमें वैसे ही विद्यमान रहा। बादमें देवताके प्रभावसे धनपति नामक जहाजी व्यापारीका जहाज टकराया । 'यहाँ पर एक जिनबिंब है' ऐसी देवताकी वाणी सुन कर धनपति ने वहीं नाविकोंको उसे निकालनेको कहा । उन्होंने सात कच्चे धागोंसे वार कर उसे बाहर निकाला और उसके प्रभावसे चिन्तितसे भी अधिक लाभ प्राप्त हुआ जान, उसे अपनी नगरीमें ले आकर अपने बनाये हुए प्रासादमें स्थापित किया । नागार्जुन ने उस सर्वोतिशायी बिंबको, अपने सिद्धरसकी सिद्धिके लिये चुरा कर, सेढी नदी के किनारे ला कर रखा । उस बिंबके सामने, श्री शातवाहन राजाकी एक मात्र पत्नी चन्द्रलेखा को, सिद्धयन्तरके द्वारा उडवा कर रोज उससे रसमर्दन करवाता । इस प्रकार यहाँ बारवार आने- जानेके कारण उसके साथ घनिष्ठ वधुभाव पैदा हो गया । इससे उसने नागार्जुन से इस रस-मर्दनका हेतु पूछा । उसने भी अपनी कल्पनासे कोटिवेध रसका यह यथावत् वृत्तान्त कहा और वर्णनातीत रूपसे उसका सम्मान करके उसके प्रति अनन्यसामान्य सौजन्य बताया । इसके बाद एक दिन उसने अपने पुत्रोंसे यह वृत्तान्त कहा । ये दोनों इसके लोभी होकर राज्यत्याग करके नागार्जुन द्वारा अलङ्कृत उस भूमिमें आ कर गुप्त वेश बना कर रहे । उस रसके ग्रहण करनेकी इच्छासे, जिसके यहाँ नागार्जुन भोजन किये करता था, उसे अर्थदान करके अपने
१४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश वशमें कर, उसकी बात पूछने लगे । यह भी इस बातके जाननेकी इच्छासे, नागार्जुनके लिये नमक ज्यादा देकर रसोई बनाती । इस तरह ६ महीना बीत जानेपर रसोईमें खारापनका अनुभव करते हुए नागार्जुनने उसका दोष निकाला । तब उसने इशारेसे उन्हें सूचित किया कि अब रस सिद्ध हो गया है। भानजे बने हुए इन लड़कोंने उस रसको उड़ा लेनेकी लालसासे,-परम्परा द्वारा यह जान कर कि वासुकिने इसका मृत्यु कुशके शस्त्रसे होना बताया है, उसी शस्त्रसे उसे मार डाला। पर वह रस तो सुप्रतिष्ठ देवताधिष्ठित होनेके कारण तिरोहित हो गया। जहाँ वह रस स्तंभित किया गया था वहीं पर स्तंभनक नामक श्री पार्श्वनाथका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जो रसको भी मात करनेवाला, सकल लोकका अभिलषित फलदाता है। बादमें कुछ कालके व्यतीत होनेपर यह मूर्ति, मुखमात्र जितने भागको छोड़ कर बाकी भूमिके अंदर दब गई। स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव । २२१) इसके अनन्तर, श्री अभयदेव सूरिने शासन देवताके आदेशसे, ६ महीनेतक माया रहित हो कर आचाम्लका व्रत करके, खड़िया (पट्टीपर लिखनेकी धोली मिट्टीकी डलिया) के प्रयोगसे जब नवाङ्ग वृत्तिकी रचना समाप्त की तो उनके शरीरमें भारी कुष्ठ रोग प्रादुर्भूत हो गया । तब पातालका पालक धरणेन्द्र नामक नागराज सफेद सर्पका रूप बना कर आया और उनके शरीरको जीभसे चाट कर उन्हें नीरोग किया । फिर श्रीमान् अभयदेव सूरिको उस तीर्थकी यात्राका उपदेश दिया । उन्होंने श्रीसंघके साथ वहाँ आ कर गोपाल बालकोंके द्वारा उस भूमिका पता लगाया, जहाँ एक गाय रोज दूधकी धारा छोड़े करती थी। वहाँ जा कर एक उत्तम ऐसे नये द्वात्रिंशतिका स्तवनकी रचना की। उसके ३३ वें पद्यकी रचना होनेपर श्री पार्श्वनाथका यह बिंब प्रकट हुआ । फिर देवताके कथनसे उन्होंने उस पद्यको गुप्त रखा । २६३. जो स्वामी, अपने जन्मके चार सहस्र वर्ष पूर्व ही इंद्र, वासुदेव और वरुणके द्वारा अपने वास स्थानपर पूजे गये, इसके बाद कान्ती के धनिक धनेश्वर द्वारा तथा फिर महान् नागार्जुन द्वारा जिनकी पूजा की गई, वे स्तंभनकपुरमें स्थित श्री पार्श्वनाथ जिन तुम्हारी रक्षा करें । इस प्रकार नागार्जुनकी उत्पत्ति तथा स्तंभनक तीर्थके अवतारका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन । २२२) प्राचीन कालमें, अवन्तिपुरीमें कोई ब्राह्मण पाणिनिव्याकरणके अध्यापनका कार्य करता था। वह नियमसे नित्य सिप्रानदीके तटपर स्थित चिन्तामणि गणेशको प्रणाम किये करता था। किसी समय विद्या- र्थियोंने फक्किका-व्याख्यान आदिके प्रश्नोंसे उसे उद्विग्न कर दिया था, इसलिये वर्षाकालमें जब वह नदी भर कर बह रही थी तो वह उसमें कूद पड़ा। दैवयोगसे एक उखड़े हुए वृक्षका मूल उसके हाथमें आ गया जिसका सहारा पा कर वह तीरपर पहुँच गया। वहाँपर साक्षात् परशुरामको देख कर प्रणाम किया। वे उसके उत्साहके ऐसे अनुष्ठानसे प्रसन्न हो कर बोले कि 'इच्छा हो सो मांगो'। उसने पाणिनिके व्याकरणका संपूर्ण रहस्यज्ञान मांगा। उन्होंने उसका देना स्वीकार किया और उसे 'खडिया' प्रदान की। उससे उसने प्रतिदिन व्याकरणकी व्याख्या बनानी शुरू की जो छह महिनेके अंतमें समाप्त हुई। फिर शीघ्र ही गणेशकी अनुज्ञा ले कर, उस प्रथम आदर्शके साथ, वह पुरीमें प्रविष्ट हुआ। [रातको] नगरके किसी एक महोलेके चौकमें बैठा ही बैठा सो गया। तब सबेरे उसे वहाँ उस तरह पड़ा देख किसी एक वेश्याकी दासियोंने, वेश्यासे उसका हाल कहा। उसने उन्हेंसे उसे मँगवा कर अपने हिंडोलेकी खाटपर रखवाया। तीन दिन और रातके बाद जब उसकी नींद कुछ कुछ खुली तो उस चित्रशालाकी आश्चर्यजनक चित्रकारीको देख कर वह अपनेको स्वर्गलोकमें उत्पन्न हुआ समझा। तब उस
प्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४९ वेश्याने सब वृत्तान्त कहा और स्नान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसभामें गया । वहा पर पाणिनि व्याकरण की यथास्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पंडितोंने उसका बड़ा सत्कार किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया । २२३) फिर उसके क्रमश चारों वर्णोंकी चार स्त्रियाँ हुईं । इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृहरि पुत्र हुआ । हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके संकेतसे भूमिगृहमें बैठा कर गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अन्य तीनों लड़कोंको प्रत्यक्ष (पासमें बैठा कर) पढ़ाया जाता था । उन्हें इस तरह पढ़ाते हुए- २६४. दान भोग और नाश-द्रव्यकी ये तीन गति हैं । [ और जो न देता है न भोग करता है उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति (नाश) होती है । ] यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरिने रज्जुका संकेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रों ने आगेके उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा-' अरे वेश्यापुत्र, अमी तक रस्सीको क्यों नहीं हिलाता ?' तब यह प्रत्यक्ष आ कर कुढ़ कर शास्त्रकी निंदा करता हुआ कहने लगा- २६५. सौ सौ प्रयास करके प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान ही गति हो सकती है । अन्य तो [गति नहीं] विपत्ति है । इस पाठसे [उन सबने] वित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरिने वैराग्यशतक आदि अनेक प्रबंध बनाये । इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * वाग्भट वैद्यका प्रबंध । २२४) धारानगरीमें, मालव मण्डल के भूषणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैद्य वाग्भट नामक था । उसने आयुर्वेदोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभावसे पहले रोग उत्पन्न किया और फिर सुश्रुत कथित पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानीके बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस बातकी परीक्षाके लिये जल छोड़ दिया । तीन दिनके बाद प्याससे तालु और ओठ सूख गये । तब उसने इस प्रकार कहा- २६६. कहीं गर्म, कहीं ठंडा, कहीं गर्म करके ठंडा किया हुआ और कहीं औषधके साथ [ इस प्रकार पानी सब हालतमें दिया जाता है] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है। इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पढ़ा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक ग्रंथ बनाया । उसका जामाता जो लघु बाहड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध बाहडके साथ राजमंदिरमें गया । सबेरे ही श्री भोजराजके शरीरकी देख भाल कर वृद्ध बाहड (वाग्भट) ने कहा कि-' आज आपका शरीर नीरोग है' । तो यह सुन कर लघु बाहडने मुह मरोडा । तब श्री भोज के उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि-' आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेषमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है, जो कृष्णाच्छायासे सूचित होता है'। इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय भाव बतला देनेके कारण राजा उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और व्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लाखके मूल्यसे बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके वह रसायन सिद्ध किया गया और सायंकाल कांचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके बिस्तरके पास रख दिया । सबेरे देवतार्चनके बाद राजाने जब वह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनकी पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई ।
An exact transcription of the text from the image is provided below:
पर उस लघु वैद्यने, किसी कारणवश, उस काचकी कुपीको भूमिपर पटक कर तोड़ दिया । राजाके यह कहनेपर कि 'अः यह क्या किया ?' उसने कहा- 'रसायनकी सुगन्धिसे ही व्याधि भाग गई है । अब व्याधिके अभावमें इस वातुक्षयकारी औषधका रखना व्यर्थ है । आज रात्रिके अन्तमें वह कृष्णच्छाया महाराजके शरीरको छोड कर कहीं दूर चली गई दिखाई दी है और इसमें खुद आप ही प्रमाण हैं' । उसके इस प्रत्यय (विश्वास) से सन्तुष्ट हो कर राजाने दरिद्रताको दूर करने वाला [भारी] पारितोषिक उसे दिया । २२५) इसके बाद, उन सभी व्याधियोंको उस वैद्यने भूतळसे नष्ट कर दिया। तब उन्होंने जा कर स्वर्ग लोकके वैद्य अश्विनी-कुमारोंसे अपना यह पराभव वृत्तान्त कहा। वे दोनों इस वृत्तान्तसे मनमें आश्चर्य-चकित हो कर नीळवर्णके पक्षीका रूप बना कर, व्याधियोंके लिये प्रतिभट जैसे लघु वाग्भट के धवलगृह (मकान) की खिड़कीके नीचे वलभी (टोंडे) पर बैठ कर 'कोऽरूक' (कौन नीरोग है ?) ऐसा शब्द बोले। उस आयुर्वेदज्ञने अपने समीपहीमें सुने जानेवाले इस शब्दको साभिप्राय समझ कर चिर कालतक उसका विचार करके कहा- २६७. अल्प शाक खानेवाला, चावलके साथ घी लेनेवाला, दूधके रसोंका व्यवहार करनेवाला, पानी ज्यादा नहीं पीनेवाला, प्रकृतिके विरुद्ध-वातकारक और विदाही (जलन पैदा करनेवाले) पदार्थोंको न खानेवाला, अस्थिर भावसे न खानेवाला, खाये हुएके जीर्ण होने (पच जाने) पर खानेवाला और अल्प भोजन करनेवाला 'अरुक्' अर्थात् नीरोग होता है। ऐसा सुन कर मनमें कुछ चकित हो कर वे चले गये। फिर दूसरे दिन, दूसरी वेलामें, उसी प्रकारका पक्षीका रूप बना कर, वैसा ही पुराना शब्द करते हुए, वे वैद्यके घर पर आये । फिर उनकी बातके उत्तरमें वैद्यने कहा- २६८. वर्षांमें जो स्थिर रहता है (अर्थात् यात्रा नहीं करता), शरत्कालमें पेय पदार्थोंका सेवन करता है, हेमन्त और शिशिरमें खूब भोजन करता है, वसन्तमें मदमस्त बनता है और ग्रीष्ममें [दिनको] शयन करता है, हे पक्षी, वही पुरुष नीरोग होता है। ऐसा कहनेपर वे फिर चले गये। तीसरे दिन, योगीका रूप बना कर उसके घर गये और वे बोले- २६९. हे वैद्य, वह कौनसी ऐसी औषधि है जो न पृथ्वीमें उत्पन्न होती है, न आकाशमें, न बाजारमें मिलती है, न पानीमें पैदा होती है; और फिर सर्व शास्त्रोंको सम्मत है। इसपर वैद्यने कहा- २७०. पृथ्वी या आकाशमें न होनेवाली, पथ्य तथा रसवर्जित ऐसी महौषधि पूर्वोचार्यों द्वारा बताई हुई लङ्घन (उपवास) रूप है। इस प्रकार अपने अभिप्रायके ठीक अनुकूल प्रत्युत्तर पा कर वे दोनों वैद्य चमत्कृत हुए और फिर प्रत्यक्ष हो कर यथामितम वर प्रदान कर अपने स्थानपर चले गये। इस प्रकार वैद्य वाग्भटका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई। २२६) धामणउत्ति ग्राममें बसनेवाला धारा नामक कोई नैगम (व्यवहारी), जो अपनी बस्तीमें देवरमण देवकी भी स्पर्द्धा करनेवाला था, सप्ताङ्गिनी हो कर, प्रचुर द्रव्यका व्यय करके जीर्णोद्धको मिटाता हुआ, अपने पाँच पुत्रोंके साथ, श्रीरैवतक गिरिकी उपत्यका (तलहट्टी) में जा कर विश्राम किया। दिगंबर संप्रदायके भक्त ऐसे गिरिनगरके राजाने, उसे श्वेतांबर भक्त समझ कर यात्रासे अटकाना
प्रकरण २२५-२२९ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १५१ चाहा। इस पर दोनोंके सैनिकोंमें लड़ाई छिड़ गई। असीम युद्धसे जूझते हुए, अतिप्रिय ऐसी देवभक्तिसे उत्साहित हो कर उसके पाँचों पुत्र, वहा मारे गये और वे मर कर पाँच क्षेत्रपाल हुए। उनके क्रमशः ये नाम हुए- १ कालमेघ, २ मेघनाद, ३ भैरव, ४ एकपद, और ५ त्रैलोक्यपाद। तीर्थके विरोधियोंको मृत्युके मुँह पहुँचाते हुए ये पाँचों विजयी हो कर पर्वतके चारों ओर वर्तमान हैं। २२७) फिर उनका धारा नामक पिता जो अकेला ही बच रहा था, उसने कान्यकुब्ज देशमें जा कर श्री बप्पभट्टसूरिके व्याख्यानके अवसरपर श्री संघकी आन दे कर यह कहा कि-' रैवतक तीर्थमें दिगंबरोंने अपनी वसति बना ली है और श्वेताम्बरोंको पाखंडी कह कर पर्वतपर चढ़ने नहीं देते हैं। इस लिये उनको जीतकर उस तीर्थका उद्धार कीजिये और अपने दर्शनकी प्रतिष्ठा करके तब फिर ये व्याख्यान दीजिए'। उसके ऐसे वचन रूप ईंधनसे जिनकी क्रोधरूप अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी वैसे वे आचार्य उस आम राजा को साथ ले कर, उसी श्रेष्ठीके साथ, पर्वतकी उपत्यकामें पहुँचे। सात दिनोंमें, वादस्थानमें दिगंबरोंको पराजित करके संघके सामने श्री अम्बिकाको प्रत्यक्ष किया। 'इक्कोवि नमुक्कारो' और 'उज्जिन्तसेलसिहरे' ये दो गाथायें अम्बिकाके मुखसे सुन कर सितांबर दर्शनकी प्रतिष्ठा सिद्ध हुई और फिर वे पराजित दिगंबर 'बला- नक मंडपसे' झम्पापात करके नीचे गिर पड़े। इस प्रकार यह क्षेत्राधिपोत्पत्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। * सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना। २२८) एक बार, भवानीने शिवसे पूछा कि-'तुम कितने कार्पटिकोंको राज्य देते रहते हो!'-उसके ऐसा पूछनेपर [शिवने कहा-] 'इन लाखों यात्रियोंमें जो कोई एक पूरा भक्ति-परायण होता है उसीको मैं राज्य देता हूं'। इस बातकी परीक्षाके लिये, गौरी (पार्वती)को पंगुमग्न बूढ़ी गाय बना कर और स्वयं मनुष्यरूप धारण कर, शिवजी तटस्थ खड़े रहे और कीचड़मेंसे गायका उद्धार करनेके लिये पथिकोंको बुलाने लगे। वे सब लोग तो सोमेश्वर नजदीक होनेसे उसके दर्शनके लिये बड़े उत्कंठित थे, इसलिये उन्होंने उसका उपहास किया। पर पथिकोंका कोई एक दल कृपालु हो कर उसके उद्धारका प्रयत्न करने लगा तो शिवजी सिंहरूप धारण करके उन्हें डराने लगे। तब उनमेंसे एक ही ऐसा पथिक निकला जो मृत्युकी भी परवा न करके उस गायके समीप पहुँचा। उसीको अडग बतला करके शिवने पार्वतीको बताया कि वही एक राज्यके योग्य है। इस प्रकार यह वासनाका प्रबंध समाप्त हुआ। * पूर्वजन्मका किया भोगना। २२९) सोमेश्वर की यात्राको जाता हुआ एक कार्पटिक रास्तेमें किसी लोहारके घर सोया। उस लोहारकी स्त्रीने अपने पतिको मार कर कृपाणिकाको उस कार्पटिकके सिरहाने रख दी और फिर चिल्लाने लगी। आरक्षक (राज्यके सिपाही) ने वहाँ आ कर उस अपराधीके हाथ काट डाले। इसमे वह सदैव उस देवको उपालंभन दिया करता। एक रातको देव प्रत्यक्ष हो कर बोला-'तुम अपने पूर्व-जन्मकी बात सुनो। एक बार दो भाइयोंमेंसे एकने एक बकरीके दोनों हाथोंसे कान पकड़े और दूसरेने उसे मार डाला। उसके बाद यह बकरी मर कर यह स्त्री हुई। जिसने इसे मारा था वह इस समय इसका पति हुआ। तुमने जो इसके कान पकड़े थे, इससे तुम्हारा समागम होनेपर, तुम्हारे हाथ काटे गये। सो इसमें मुझे क्यों उपालंभ देते हो!' इस प्रकार यह कृपाणिका-प्रबंध समाप्त हुआ। *
१५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश जिनपूजाका माहात्म्य । २३०) प्राचीन कालमें, शखपुर नामक नगरमें शंख नामका राजा था। वहाँ पर, नाम और कर्म दोनोंहीसे 'धनद' (धन देने वाला) नामका एक सेठ था। उसने एक बार सोचा कि लक्ष्मी हाथीके समान चंचल है, अतः वह हाथमें उपहार ले कर राजाके पास आया और उसे संतुष्ट किया। राजाकी दी हुई भूमिमें, अपने चार पुत्रोंके साथ सलाह करके, शुभलग्नमें उसने एक जिनमंदिर बनवाया। उसमें, प्रतिष्ठित बिंबोंकी स्थापना करके उस प्रासादके व्यय-निर्वाहके लिये आमदनीके अनेक मद कायम किये। उसकी पूजाके लिये अनेक पुष्प, वृक्ष, लता आदिसे अलंकृत एक सुंदर बगीचा बनवा दिया और उसके कार्यचिन्तक गोष्ठिक नियुक्त किये। इसके अनन्तर, पूर्वकृत दुष्कर्मके फलके उदयसे क्रमशः उसकी लक्ष्मी घट गई और वह कर्जदार हो गया। मान- प्रतिष्ठाके म्लान हो जानेके कारण वह किसी गाँवमें जा कर रहने लगा। नगरमें जा-आ कर लड़के जो कुछ पैदा करते उसीपर गुजर करता हुआ वह काल व्यतीत करने लगा। एक बार, जब चातुर्मासिक पर्व निकट आया तो वहाँ जानेवाले पुत्रोंके साथ वह धनद भी शंखपुर पहुँचा। वहाँ अपने बनाये हुए प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ते, उसके उद्यानकी पुष्प चुननेवाली ( माळिन ) ने उसे फूलोंकी डाली भेंट की। परमानंद निर्भर हो कर उसीसे उसने जिनेंद्रकी पूजा की। रातमें गुरुके सामने अपनी दुरवस्थाकी बड़ी निंदा करने लगा। तब उन्होंने उसे कपर्दी यक्षका आराधन करनेके लिये मंत्र दिया। फिर एक कृष्ण चतुर्दशीकी रातको उस मंत्रकी आराधना करके कपर्दी यक्षको प्रत्यक्ष किया। गुरुके उपदेशानुसार उससे, चातुर्मासिक दिनके अवसर पर जो पुष्प-चतुःसरिका (फूलकी चौसरी छड़ी) से जिनेशकी पूजा की थी उसके पुण्यफलकी याचना की। उसने कहा कि—'एक फूलकी पूजाका पुण्यफल भी, बिना सर्वज्ञके, मैं देनेमें असमर्थ हूँ'। फिर भी उस कपर्दी यक्षने, उस साधार्मिकके प्रति अतुल्य वात्सल्यभाव धारण करके, उसके घरके चारों कोनोंमें, सुवर्णपूर्ण चार कलश निधिरूपमें रख दिये, और वह तिरोहित हो गया। प्रातः काल वह अपने घर आया और धर्मकी निंदा करनेवाले उन पुत्रोंको वह धन समर्पण किया। वे भी आग्रहके साथ पितासे उस धनलाभका कारण पूछने लगे। इसपर, उनके हृदयमें धर्मके प्रभावका आविर्भाव करनेके लिये, जिनपूजाके प्रभावसे संतुष्ट हुए कपर्दी यक्ष द्वारा, इस संपत्तिके प्राप्त होनेकी बात कह सुनाई। वे भी सम्पत्ति पा कर फिर उसी जन्मस्थानमें जा कर रहे और अपने धर्मस्थानोंका व्ययनिर्वाह करने लगे। फिर विविध भाँति जिन शासनकी प्रभावना करते हुए वे विधर्मियोंके मनोंमें भी जैन धर्मके प्रभावको स्थापित करते रहे। इस प्रकार जिनपूजा संबंधी यह धनदका प्रबंध समाप्त हुआ। * श्री मेरुतुंगाचार्य विरचित प्रबन्धचिन्तामणिमें, विक्रमादित्यके कहे हुए पात्रविवेचनसे ले कर जिनपूजासंबंधी धनदके प्रबंध तकका वर्णनवाला, यह प्रकीर्णनामक पाँचवाँ प्रकाश समर्थित हुआ। [ इस प्रकाशकी ग्रन्थसंख्या ७७४ है। समग्र ग्रन्थकी श्लोक सख्या ३१५० है ]
ग्रन्थकारकी प्रशस्ति । बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे, तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटनरूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है ॥ १ ॥ यह, प्रबन्धसंग्रहरूप चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशंसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है। सो इस ग्रन्थके अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति (विष्णु) की नाईं शोभित होते हैं ॥ २ ॥ मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका संकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है। पण्डित लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥ ग्रहों रूपी कौड़ियोंसे जब तक द्युलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रन्थ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥ विक्रमादित्य संवत्के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह ग्रन्थ समाप्त हुआ॥ ५॥ [ गद्यमें फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५ रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्धमान (काठियावाडके आधुनिक वढवान नगर) में यह प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थ समाप्त किया गया। ————:o:———— परिशिष्ट कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सम्बन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध* श्रीमान् हेमचन्द्रके समान तो गुरु और श्रीमान् कुमारपालके समान जिनभक्त राजा न तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥ १ ॥ प्रभु श्री हेमाचार्यके पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो हिंसाका निवारण किया था उसका [ रूपकात्मक ] प्रबन्ध इस प्रकार है — एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री कुमारपाल नामक राजाने, घुड़दौड़ की क्रीड़ा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने सौन्दर्यसे सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख बाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था। यद्यपि वह
- टिप्पणी—यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध, इस ग्रन्थकी बहुसंख्यक पोथियोंमें लिखा हुआ मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है—पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रबन्ध है इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें ग्रन्थके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है। कुमारपालने अपने धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्रसूरिके पास जैनधर्मकी गृहस्थ दीक्षा (श्रावकधर्मव्रत) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार किया, उस समयको लक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबन्धका प्रणयन किया गया है। इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो आचार्य हेमचन्द्रके आश्रममें पलकर बड़ी रूपवती - सुकुमारी हो गई है। अन्यान्य राजाओंके अधार्मिक आचरण देख कर यह किसीके साथ विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्मभावसे मुग्ध हो कर, आचार्यके आदेशसे यह उसका पाणिग्रहण कर लेती है—बस यही इस प्रबन्धका सारांश है। ३९