प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमालोचना ८ 'अयः स्वभावादचलं बलाच्चलत्यचेतनं चुम्बकसन्निधाविव । तनोति विश्वेचितुरीचितेरिता जगन्ति मायेश्वरतेयमीशितुः' ॥ ईश्वर और मायाका सम्बन्ध कैसा है ? ईश्वर सृष्टि करते हैं या स्वतन्त्र माया सृष्टि करती है ?, इस प्रश्नको इस श्लोकमे बडी सरलतासे समझाया गया है । चुम्बक लौहके सन्निधानसे स्वभावतः अचल लौह जैसे चल हो जाता है उसी प्रकार माया भी ईश्वरेक्षित होकर जगत् की सृष्टि करती है, यही मायेक्षण ही ईश्वर की ईश्वरता है । कितने सरल रूपसे यह गूढतत्त्व हृदयङ्गम कराया गया है । भक्तिका स्वरूप सदासे मधुररूपमे वर्णित होता रहा है और वही उसकी वास्तविक रूपरेखा होती है । भक्तका एक मधुरचित्र इस ग्रन्थमे देखिये :— 'तोयार्द्राः सुरसरितः सिताः परागैरर्चन्तश्च्युतकुसुमैरिन्दुमौलिम् । प्रोद्गीतां मधुपकुलैः स्तुति पठन्तो नृत्यन्ति प्रचललताभुजैः समीराः' ॥ वायुरूपभक्त शिवभक्तिमे ओत-प्रोत है, वह गङ्गा स्नान करके विभूतिसे अपने अङ्गोंको स्वच्छ बना रखा है, उसकी विभूति पराग ही है, वृक्षोंसे फूल चू रहे हैं मानों वह भक्त वायु अपने आराध्यके ऊपर फूल चढ़ा रहा है, भ्रमर शब्द कर रहे हैं, मानो वह महिम्नः स्तोत्रका मधुर पारायण कर रहा है, लतायें झूल रही हैं, मानो वह भक्तिकी प्रचुरतामें नाच रहा है । जिन्होने बैद्यनाथ आदि शैवतीर्थोमे भक्तोको भावना की तन्म- यतामे विभूति रमाये तथा—'कखन हरब दुःख मोर' इत्यादि नचारियां गाते देखा है उन्हे इस पदकी मधुरता अनायास प्रतीत हो जायगी । इस प्रकार आप इन उद्धरणोसे समझ सकेंगे कि यह रूपक किस कोटिकी कविता प्रस्तुत करता है । जहा तक अभिनयकी योग्यताका प्रश्न है प्रतीक नाटकोमे पात्रोंकी मानवीकरणमे जितनी सफलता प्राप्त होगी, अभिनय भी उसी मात्रामें सफल होगा । हम पहले लिख आये हैं कि इस ग्रन्थमे भावनाओका मानवाकरण सफलहुआ है, अतः आभिनयिक सफलता भी इस रूपकको प्राप्त है—यह कहा जा चुका है । नाटकमें आनेवाले पात्र विवेक, यह विचारका प्रतीक है, विवेक उस विचारको कहते हैं जो वस्तुकी यथात्म- कताको सोच समझ सकता हो । मति उस बुद्धिको कहा गया है जो विवेकानुगत हो । इसी तरह और भी मानसिक भाव ही इस नाटकमे पात्र बनाये गये हैं । विज्ञपाठक इस नाटकके अध्ययनके पहले इतना सोचलें कि हम केवल नाटक नही दार्शनिक नाटक पढ रहे हैं, तब इस नाटकका आनन्द उन्हे वास्तविकरूपमें प्राप्त हो सकेगा, अन्यथा उन्हे साधारण अन्य नाटकोका सा कथोपकथनका आनन्द या भोग्यरस परिपाक इसमें नही प्राप्त होगा और उनका मन इससे उचट जायगा । ⸻oogoo⸻