प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयही है क्रोधका वास्तविक रूप । भर्तृहरिके नीतिश्लोक बहुत प्रसिद्ध हैं, उनके पढ़नेसे हृदयमे सात्त्विक सुखका उदय होना है, और यही कारण है कि उनके श्लोकोंका अधिक आदर है। इस दार्शनिक कविने भी अपने पात्रोंके मुंहसे समय समय पर कुछ नीतिश्लोक कहवाये हैं जो अतिहृदय- ग्राही हुए है—‘श्रीदेवीजनकत्मजा दशमुखस्यासीद् गृहे रक्षसो नीता चैव रसातल भगवती वेदत्रयी दानवैः । गन्धर्वस्य मदालसां च तनयां पातालकेतुश्छला- द्वैत्येन्द्रोऽपजहार हन्त विषमा वामा विधेर्वृत्तयः' ॥ ‘कान्तेत्युत्पललोचनेति विपुलश्रोणीभरेत्युन्नमत् पीनोत्तङ्गपयोधरेति सुमुखाम्भोजेति सुभ्रूरिति । दृष्ट्वा माद्यति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति विद्वानिति प्रत्यक्षाशुचि पुत्तिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम्' ॥ इन उक्तियोंके पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता हैं कि हम भर्तृहरिकी कविता ही पढ़ रहे हैं। दुनियाके झमेलेमें अत्यासक्ति होनेपर मनुष्यका मन सदा चिन्तित तथा कष्टपतित रहा करता है, इस बातसे संतोप दिलानेके लिए स्त्री-पुत्रादिकोंसे अनासक्ति रखनेके लिये वैराग्योपदेश दिये जाते हैं, उनमें भी एक चमत्कार होता है, देखिये.— ‘पान्थानामिव वर्त्मनि क्षितिरुहां नद्यामिव भ्रश्यतां मेघानामिव पुष्करे जलनिधौ सांयात्रिकाणामिव । संयोगः पितृमातृबन्धुतनयभ्रातृप्रियाणां यदा सिद्धो दूरवियोग एव विदुषा शोकोदयः कस्तदा' ॥ वैषयिक सुखोंके लिये मनमें जो स्वाभाविक अभिलाप हुआ करता है उसकी इस ग्रन्थमे खूब निन्दा की गई है, उस अंशमें भी इस ग्रन्थके निर्माताको अधिक सफलता मिली है। इस ग्रन्थका प्रतिपादनीय विषय है अद्वैतवेदना सम्मत मोक्षप्रकार, उसके साथ विष्णुभक्तिका संयोग हो जाय तो वह और चमक उठता है, इस बातको श्रीकृष्णमिश्रने पद, तदर्थ तथा कथाविन्यास द्वारा इतनी मार्मिकतासे प्रस्तुत किया है कि ग्रन्थका अन्तिम अङ्क चमत्कारातिशयाधायक हो उठा है, 'बाह्वोर्भग्नादलितमणयः श्रेणयः कङ्कणानां, चूडारत्नग्रहनिकृतिभिर्दुषितः केशपाशः' इस श्लोकके पढनेसे ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई स्त्री ही अपने हितचिन्तकजनसे अपनी बीती बात कह रही है, अपनी कहानी सुनाकर सहानुभूति प्राप्त करनेका प्रयास कर रही है, यह नहीं मालूम पडता है कि कुछ दार्शनिकतत्त्व अपनी स्थिति प्रकट कर रहे हैं। दार्शनिकतत्त्व स्वभावतः कठिन होते हैं, उन्हे सरल सरस बनाकर उपस्थित करना कविताकी सफलता मानी जाती है, इस दृष्टिसे देखनेपर भी श्रीकृष्ण मिश्र अतिसफल प्रतीत होते हैं। देखिये.—