भारतकोश
प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

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समालोचना ६ करते है¹। घटनाक्रममें सिद्धान्तोंके प्रतिपादनका प्रयास इतना प्रत्यक्ष होता है कि मनोर- ञ्जकता नाममात्र भी नहीं रह जाती । यह ठीक है कि नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तोंके अनुकूल ही इनके आकार प्रकार निर्धारित होते हैं और मान्य नियमोंकी अवहेलना नहीं की जाती परन्तु फिर भी कुछ ऐसा लगता है कि सामान्य नाटकोंकी श्रेणीमें नाम लिखाने के लिये ही यह सब हो रहा है। वास्तवमें होता यह है कि अधिकतर ऐसे नाटक धार्मिक या नैतिक शिक्षा देनेकी दृष्टिसे या पाण्डित्य प्रदर्शनके लिये लिखे जाते हैं, प्रती कात्मक घटनाओंकी नीरसताका यह एक प्रबल कारण है। श्रीकृष्ण मिश्र की कविता श्रीकृष्ण मिश्र कवि एवं दार्शनिक दोनों थे, फिर भी उनकी कविता अन्य दार्शनिक कवियों की तरह जटिल नही है, इनकी कवितामे प्रवाह और प्रसाद है। किसी पदार्थके वर्णनमें उस वस्तु की रूपरेखा प्रस्तुत कर देना इनकी कविताका प्रधान गुण है। वे जब कामदेवको पाठकोंके सामने उपस्थित करते है तब वह साकार हो उठता है :— 'उत्तुङ्गपीवरकुचद्वयपीडिताङ्गमालिङ्गितः पुलकितेन भुजेन रत्या । श्रीमान् जगन्ति मदयन्नयनाभिरामः कामोऽयमेति मदघूर्णितनेत्रपद्मः' ॥ यह श्लोक पढते ही कामदेवका सर सचित्र नयनोंके सामने झूलने लगता है। इसी प्रकार जब वे दाम्भिकोंका वर्णन करते हैं तो ऐसा मालूम पडता है मानो कोई बडा भारी ठग लोगोंको वञ्चित करने की शक्ल बनाये सामने आ रहा है — 'गङ्गातीरतरङ्गशीतलशिलाविन्यस्तभास्वद्वृसी- संविष्टाः कुशमुष्टिमण्डितमहादण्डाः करण्डोज्ज्वलाः । पर्यायग्रथिताक्षसूत्रवलयप्रत्येकवीडाग्रह- व्यग्राङ्गुलयो हरन्ति धनिनां वित्तान्यहो दाम्भिकाः' ॥ जिन लोगोंने काशी आदि क्षेत्रोंमें धूर्त धर्मध्वजियोको देखा है उन्हे इस श्लोकके पढनेसे पूरा मजा मिलेगा, वह इस चित्र की बारीकियोंको आसानीसे पहचान लेंगे । क्रोध आदि, मानसिकभावोंका मूर्त्तरूप है उनके चित्रणमें इस दार्शनिक महाकविने बडी चतुरता दिखलाई है, क्रोधका चित्र इतना सुन्दर हुआ है कि हृदय बरवस आकृष्ट हो जाता है । 'अन्धीकरोमि भुवनं वधिरीकरोमि धीरं सचेतनमचेतनतां नयामि । कृत्यं न पश्यति न येन हितं शृणोति धीमानधीतमपि न प्रतिसन्दधाति' । १. देखिये—अमृतोदय, 'गर्भं धत्तां परामर्शसन्निकर्षेण पक्षता । अपत्ये जातमात्रे तु दम्पती न भविष्यतः' ॥ २, २० 'पूर्वं प्रमित्या परतोऽनुमित्या सिद्ध्या ततोऽस्मिन्पुरुषे प्रसक्ते । सङ्गच्छमाने पुरुषोत्तमेन मोहः स्वयं प्राप्स्यति नाशमेषः' ॥ ३. २७.