प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
DevanagariHindipublished274 पृष्ठ
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५ समालोचना विषय भी विचारणीय है। यद्यपि अश्वघोषके द्वारा रचित कहाकर प्राप्त अपूर्ण कृतियोंमे अमूर्त्तभावों तथा गुणोंका मानवीकरण प्रयास पाया जाता है परन्तु इसमे कोई प्रमाण नहीं कि प्रतीकनाटकोंने संस्कृतनाटकीय साहित्यके प्रारम्भिक विकासमे कोई महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। यह भी सप्रमाण नहीं कहा जा सकता कि यदा कदा प्रतीकनाटक बनते रहे है। वस्तुतः इस प्रकारके सभी नाटक बहुत बादमे रचे गये। ऐसे नाटककोमे सर्वप्रथम रचना श्रीकृष्ण मिश्रकी ही है, जिनका काल ११ वी शताब्दी है। दृढतापूर्वक यह नहीं कहा जासकता कि श्रीकृष्ण मिश्र एक मृतप्राय परम्पराको कायमकर रहे थे अथवा स्वय एक नई परम्पराको उत्पन्न कर रहे थे। कुछ भी हो, अमूर्त्तभावोंके विशुद्ध मानवीकरणके माध्यमसे एक प्रतीकनाटककी रचना प्रस्तुत करनेका श्रेय उन्हे अवश्य प्राप्त है। विशेषता यह है कि आकार तथा शैलीमें यह नाटक अन्य नाटकोंसे सर्वाशतः मिलता जुलता है। प्रवाहविरुद्ध यह प्रयास सफल नहीं हो सका, अत एव अनेक अन्य महारथियों द्वारा इस प्रकारके प्रयत्नोंके बावजूद भी इस शैलीका अधिक विकास नहीं हो सका और न इसकी कोई अलग परम्परा कायम हो सकी। फल चाहे जो हो, वे प्रयास निस्सन्देह प्रशंसनीय थे, न केवल अपनी नवीनताके लिये, अपितु सफल प्रतीकात्मकताके लिये भी। यह कोई सहज कवित्वशक्ति नही है प्रत्युत एक सतर्क बौद्धिक प्रवृत्ति है, जो जीवनसे दूर रहकर अमूर्त्तभावों तथा प्रतीकात्मक पात्रोंसे मनोरंजन किया करती है। किसी दार्शनिक सिद्धान्तको नाटकीय रूप देना संभवतः कठिन हो, परन्तु श्रीमद्भागवते¹ (स्कं. ४. अ. २५-२८) पुरञ्जनकी दार्शनिक प्रतीक कथाओंने इस दिशामे सङ्केत किया हो, ऐसी संभावना की जासकती है। इस तरहकी रचनाओंमें एक दोष यह होता है कि वे अमूर्त्तभाव जिनका मानवीकरण किया जाता है इतने स्फुटीभूत व्यक्ति हो जाते हैं कि उनका उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है या उनमें इतना कम व्यक्तित्व होता है कि वे केवल जीवनहीन भावमात्र बने रह जाते है। बहुधा वे जीवित व्यक्तिसे अधिक सैद्धान्तिक सूत्र ही हुआ
१. भागवते ४र्थस्कन्दे २५ अध्यायतः पुरञ्जनोपाख्यानं विद्यते। २९ अध्याये च तत्पूत्तिः। ‘इत्थं पुरञ्जनं सम्यग् वशमानीयविभ्रमैः। पुरञ्जनी महाराज रेमेर मयतीपतिम् ॥ अत्र पुरञ्जनपदं पुरुषपरम्, पुरञ्जनीपद च बुद्धिपरम् । एवमेव सर्वत्र । विवृतमिदमिदं तदुपाख्यानसमाप्तौ, २९ तमेऽध्याये । तथा च— ‘पुरुषं पुरञ्जनं विद्याद्यद्व्यनक्त्यात्मनः पुरम्’ । ‘बुद्धिं तु प्रमदां विद्यात्’ ‘सखाय इन्द्रियगणाः’ ‘सख्यस्तद् वृत्तयः’ ‘बृहद्बलं मनोविद्यादुभयेन्द्रियनायकम्’ । ‘पञ्चालाः पञ्चविषयाः’