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प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

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समालोचना ४ जिसे संग्राम विजयके रूपमे वर्णित किया गया है। राजा मनको अपने पुत्र मोह आदि तथा पत्नी प्रवृत्तिके वियोगमें बडा दुःख होता है, परन्तु सत्सिद्धान्त वेदान्त द्वारा प्रबोधित होने पर उसे धीरज बंधता है, वह निवृत्तिको पत्नी रूपमे स्वीकार करता है। अन्तमें विवेक का उपनिषद्मे मिलन होता है और उसके द्वारा उत्पन्न प्रबोधोदय और विद्यासे सबकी संसारनिवृत्ति हो जाती है । नाटक साहित्यमें प्रबोधचन्द्रोदयका स्थान गम्भीर भावपूर्ण दार्शनिक विचार धाराको आधार बनाकर एक मनोरंजक नाटक प्रस्तुत करना कठिन है, किन्तु यह अत्यन्त सत्य है कि इस प्रकार की कठिनाइयोंके रहते हुए भी श्रीकृष्ण मिश्रकी यह रचना अधिक सफल हुई है । श्रीकृष्ण मिश्रने मानव-आत्माके शाश्वत सङ्घर्षका जो कलात्मक नाटकीय चित्र उपस्थित किया है वह वास्तवमे मनोहर है । वस्तुतः यह रचना एक सुखान्त नाटकके रूपमे बडी निपुणतासे प्रस्तुत हो सकी है, इसमें सामान्य नाटकीय नियमोका उल्लङ्घन कहीं नही किया गया है, कथोपकथन तथा अन्य अपेक्षित गुणो की दृष्टिसे भी यह निर्दोष कहा जा सकता है। सैद्धान्तिक दृष्टिसे यह नाटक अद्वैत वेदान्त एव विष्णुभक्तिका समन्वयात्मक रूप उपस्थित करता है, किन्तु कहीं भी दार्शनिक विषय तथा उपदेशोने नीरसता की सृष्टि नही की है। यद्यपि इस नाटकमें सूक्ष्म भावोंको व्यक्त करनेके लिये उनकी व्यक्तीकरण किया गया है तथापि उनको लेकर कोई आध्यात्मिक व्यायाम नही किया गया है। इस रचना की प्रतीकात्मकता बुद्धिगम्य एवं तर्कसङ्गत है, कथावस्तु आद्यन्त सर्वत्र नीरसतासे रहित है, रोचकता इतनी है कि हम इसे उत्सुकतासे अन्त तक पढते है । काव्य की दृष्टि से भी श्रीकृष्ण मिश्र की वाग्रचना प्रशसनीय है, इनकी कवितायें भावपक्ष एव विचारपक्ष, दोनों पक्षोंकी सफल कवितायें है । इन सब उल्लेखनीय गुणोंके होते हुए भी यह कहना पक्षपातपूर्ण होगा कि लेखकने अमूर्त्तभावोंको मानवोंका रूप देनेमें पूरी सफलता पाई है । नाटकीय सफलताके होनेपर कुछ कमी रह गई है। किसी भावविशेषको गतिशील मनुष्यकी तरह चित्रित करनेके प्रयाससे पूरी सफलता प्राप्त करना असम्भवसा होता है । यथार्थ चित्रणक्षमता एवं प्रौढकवित्वशक्ति यदि वरदान के रूपमें प्राप्त हों तभी इस दिशामें कविको सफलता प्राप्त हो सकती है और वह निर्जीव भावचित्रोंमें उष्णरक्तका संचारकर सकता है। यही कमी है कि इस नाटकके छायाचित्र केवल बुद्धिवेद्य ही होकर रह जाते हैं, उनकी मनुष्यता हमें सहानुभूति प्रकट करनेको बाधित नही कर पाती । इस अशमें पाश्चात्य नाटककारोको अधिक सफलता प्राप्त हुई है । इतना तो सबको मानना ही पड़ेगा कि सस्कृतमें जितने इस प्रकारके नाटक हैं उनमें सबसे अधिक सफलता श्रीकृष्ण मिश्रकी इस कृतिको ही प्राप्त हो सकी है । इस तरहके जो नाटक इस समय उपलब्ध होते हैं उनकी संख्या अधिक नहीं है । छायानाटक, प्रतीकनाटक या भावनाटक जो कहे, इनकी रचना कबसे प्रारम्भ की गई यह