भारतकोश
प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

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३ समालोचना श्रीकृष्णमिश्रका काल श्रीकृष्णमिश्रका समय—उनकी कृति प्रबोधचन्द्रोदयकी प्रस्तावनामे 'गोपाल' के प्रति जो सङ्केत है उसीसे निश्चित प्राय है। यह गोपाल श्रीकृष्णमिश्र को प्रकृत नाटककी रचनाके लिये प्रोत्साहित किया करता था और उसके द्वारा अपने मित्र राजा कीर्त्तिवर्माकी चेदी राजा कर्णपर विजयकी स्मृतिको अमिट करना चाहता था। कर्णका नामोल्लेख १०४२ के एक शिला लेख मे पाया जाता है। एक दूसरा शिलालेख १०९२ ई० का भी है, जिसमे चन्देलराजा कर्ण का नामोल्लेख प्राप्त हुआ है। इन सबसे यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि श्रीकृष्णमिश्रका काल ११ वी शदीका उत्तरार्ध है। श्रीकृष्णमिश्रका निवासदेश श्रीकृष्णमिश्र कहां के रहनेवाले थे इस विषयमे हमारा विश्वास है कि वे बिहारके ही थे, क्योंकि उन्होंने अपनी कृतिमें द्वारका, मथुरा आदिको छोड़कर 'मन्दार' बिहारस्थित नामक तीर्थका सादर उल्लेख किया है, और गौड़ोंकी दाम्भिकताका सरस उपहास प्रस्तुत किया है। आप बिहारी न होते तो इस तरह गौड़ोंसे परिचय नहीं रखते। प्रबोधचन्द्रोदयकी कथावस्तु श्रीकृष्णमिश्रकी एकमात्र रचना प्रबोधचन्द्रोदयका नाम ही इसके विषयका निर्देश करता है। यह एक गम्भीर दार्शनिक प्रतीक नाटक है, इसमें छः अङ्क है जिनमे समस्त मानवजीवन का चित्रण है--किसी एक गुण या दोषका नही। इसमें मानवहृदयकी शक्तियोंके अन्तर्विरोधका सफल उपस्थापन है। इस उपस्थापनमें मानवहृदयकी दो स्वाभाविक वृत्तियोंके चित्र है जिनमें एक पक्षकी वृत्तियों आत्मज्ञानकी ओर प्रवृत्ति रखती है, और दूसरे पक्ष की वृत्तिया उसके विमुख। मनके दो शक्तिशाली पुत्रोंके विरोधकी कल्पना है, यह दोनों सौतेले भाई हैं जो मनकी स्त्रियों प्रवृत्ति तथा निवृत्तिसे उत्पन्न हुए है। इनका नाम क्रमशः मोह तथा विवेक है। मोहके परिजन काम, रति, लोभ, हिंसा और अहङ्कार आदि है। इसका पौत्र दम्भ है जो इसके पुत्र लोभ और पुत्रवधू तृष्णासे उत्पन्न है। मिथ्यादृष्टि एक कुलटाके रूपमें वर्णित है। भौतिकतावादियों का प्रतिनिधित्व चार्वाक करता है। दूसरे पक्षका प्रधान है विवेक, जिसके दलमें मति, करुणा, शान्ति, श्रद्धा, क्षमा, सन्तोष और वस्तुविचार आदि है। विवेक कुछ समयके लिये पराजित सा प्रतीत होने लगता है, उसकी सेना जो पूर्वोक्त पात्रों द्वारा गठित है छिन्न-भिन्नसी हो जाती है, परन्तु अन्तमें विवेककी जीत होती है; जिसमें विष्णुभक्तिकी बड़ी चेष्टा रहती है। इस मुख्य कथानकके साथ श्रद्धा और शान्तिकी कथा जोड़ दी गई है, शान्ति अपनी मां श्रद्धाको खो चुकी है, श्रद्धा पर दुष्टोंका आक्रमण होता है पर वह विष्णुभक्तिद्वारा सुरक्षित रखली जाती है। इस कथानकमें बड़ी निपुणतासे जैनधर्म, बौद्धधर्म और ब्राह्मणधर्म (पाशुपतधर्म) में श्रद्धाका अभाव दिखलाया गया है। अनेक सङ्घर्षोंके पश्चात घटनाचक्रासे सत्य पक्षकी जय होती है