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प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

३ समालोचना श्रीकृष्णमिश्रका काल श्रीकृष्णमिश्रका समय—उनकी कृति प्रबोधचन्द्रोदयकी प्रस्तावनामे 'गोपाल' के प्रति जो सङ्केत है उसीसे निश्चित प्राय है। यह गोपाल श्रीकृष्णमिश्र को प्रकृत नाटककी रचनाके लिये प्रोत्साहित किया करता था और उसके द्वारा अपने मित्र राजा कीर्त्तिवर्माकी चेदी राजा कर्णपर विजयकी स्मृतिको अमिट करना चाहता था। कर्णका नामोल्लेख १०४२ के एक शिला लेख मे पाया जाता है। एक दूसरा शिलालेख १०९२ ई० का भी है, जिसमे चन्देलराजा कर्ण का नामोल्लेख प्राप्त हुआ है। इन सबसे यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि श्रीकृष्णमिश्रका काल ११ वी शदीका उत्तरार्ध है। श्रीकृष्णमिश्रका निवासदेश श्रीकृष्णमिश्र कहां के रहनेवाले थे इस विषयमे हमारा विश्वास है कि वे बिहारके ही थे, क्योंकि उन्होंने अपनी कृतिमें द्वारका, मथुरा आदिको छोड़कर 'मन्दार' बिहारस्थित नामक तीर्थका सादर उल्लेख किया है, और गौड़ोंकी दाम्भिकताका सरस उपहास प्रस्तुत किया है। आप बिहारी न होते तो इस तरह गौड़ोंसे परिचय नहीं रखते। प्रबोधचन्द्रोदयकी कथावस्तु श्रीकृष्णमिश्रकी एकमात्र रचना प्रबोधचन्द्रोदयका नाम ही इसके विषयका निर्देश करता है। यह एक गम्भीर दार्शनिक प्रतीक नाटक है, इसमें छः अङ्क है जिनमे समस्त मानवजीवन का चित्रण है--किसी एक गुण या दोषका नही। इसमें मानवहृदयकी शक्तियोंके अन्तर्विरोधका सफल उपस्थापन है। इस उपस्थापनमें मानवहृदयकी दो स्वाभाविक वृत्तियोंके चित्र है जिनमें एक पक्षकी वृत्तियों आत्मज्ञानकी ओर प्रवृत्ति रखती है, और दूसरे पक्ष की वृत्तिया उसके विमुख। मनके दो शक्तिशाली पुत्रोंके विरोधकी कल्पना है, यह दोनों सौतेले भाई हैं जो मनकी स्त्रियों प्रवृत्ति तथा निवृत्तिसे उत्पन्न हुए है। इनका नाम क्रमशः मोह तथा विवेक है। मोहके परिजन काम, रति, लोभ, हिंसा और अहङ्कार आदि है। इसका पौत्र दम्भ है जो इसके पुत्र लोभ और पुत्रवधू तृष्णासे उत्पन्न है। मिथ्यादृष्टि एक कुलटाके रूपमें वर्णित है। भौतिकतावादियों का प्रतिनिधित्व चार्वाक करता है। दूसरे पक्षका प्रधान है विवेक, जिसके दलमें मति, करुणा, शान्ति, श्रद्धा, क्षमा, सन्तोष और वस्तुविचार आदि है। विवेक कुछ समयके लिये पराजित सा प्रतीत होने लगता है, उसकी सेना जो पूर्वोक्त पात्रों द्वारा गठित है छिन्न-भिन्नसी हो जाती है, परन्तु अन्तमें विवेककी जीत होती है; जिसमें विष्णुभक्तिकी बड़ी चेष्टा रहती है। इस मुख्य कथानकके साथ श्रद्धा और शान्तिकी कथा जोड़ दी गई है, शान्ति अपनी मां श्रद्धाको खो चुकी है, श्रद्धा पर दुष्टोंका आक्रमण होता है पर वह विष्णुभक्तिद्वारा सुरक्षित रखली जाती है। इस कथानकमें बड़ी निपुणतासे जैनधर्म, बौद्धधर्म और ब्राह्मणधर्म (पाशुपतधर्म) में श्रद्धाका अभाव दिखलाया गया है। अनेक सङ्घर्षोंके पश्चात घटनाचक्रासे सत्य पक्षकी जय होती है

समालोचना ४ जिसे संग्राम विजयके रूपमे वर्णित किया गया है। राजा मनको अपने पुत्र मोह आदि तथा पत्नी प्रवृत्तिके वियोगमें बडा दुःख होता है, परन्तु सत्सिद्धान्त वेदान्त द्वारा प्रबोधित होने पर उसे धीरज बंधता है, वह निवृत्तिको पत्नी रूपमे स्वीकार करता है। अन्तमें विवेक का उपनिषद्मे मिलन होता है और उसके द्वारा उत्पन्न प्रबोधोदय और विद्यासे सबकी संसारनिवृत्ति हो जाती है । नाटक साहित्यमें प्रबोधचन्द्रोदयका स्थान गम्भीर भावपूर्ण दार्शनिक विचार धाराको आधार बनाकर एक मनोरंजक नाटक प्रस्तुत करना कठिन है, किन्तु यह अत्यन्त सत्य है कि इस प्रकार की कठिनाइयोंके रहते हुए भी श्रीकृष्ण मिश्रकी यह रचना अधिक सफल हुई है । श्रीकृष्ण मिश्रने मानव-आत्माके शाश्वत सङ्घर्षका जो कलात्मक नाटकीय चित्र उपस्थित किया है वह वास्तवमे मनोहर है । वस्तुतः यह रचना एक सुखान्त नाटकके रूपमे बडी निपुणतासे प्रस्तुत हो सकी है, इसमें सामान्य नाटकीय नियमोका उल्लङ्घन कहीं नही किया गया है, कथोपकथन तथा अन्य अपेक्षित गुणो की दृष्टिसे भी यह निर्दोष कहा जा सकता है। सैद्धान्तिक दृष्टिसे यह नाटक अद्वैत वेदान्त एव विष्णुभक्तिका समन्वयात्मक रूप उपस्थित करता है, किन्तु कहीं भी दार्शनिक विषय तथा उपदेशोने नीरसता की सृष्टि नही की है। यद्यपि इस नाटकमें सूक्ष्म भावोंको व्यक्त करनेके लिये उनकी व्यक्तीकरण किया गया है तथापि उनको लेकर कोई आध्यात्मिक व्यायाम नही किया गया है। इस रचना की प्रतीकात्मकता बुद्धिगम्य एवं तर्कसङ्गत है, कथावस्तु आद्यन्त सर्वत्र नीरसतासे रहित है, रोचकता इतनी है कि हम इसे उत्सुकतासे अन्त तक पढते है । काव्य की दृष्टि से भी श्रीकृष्ण मिश्र की वाग्रचना प्रशसनीय है, इनकी कवितायें भावपक्ष एव विचारपक्ष, दोनों पक्षोंकी सफल कवितायें है । इन सब उल्लेखनीय गुणोंके होते हुए भी यह कहना पक्षपातपूर्ण होगा कि लेखकने अमूर्त्तभावोंको मानवोंका रूप देनेमें पूरी सफलता पाई है । नाटकीय सफलताके होनेपर कुछ कमी रह गई है। किसी भावविशेषको गतिशील मनुष्यकी तरह चित्रित करनेके प्रयाससे पूरी सफलता प्राप्त करना असम्भवसा होता है । यथार्थ चित्रणक्षमता एवं प्रौढकवित्वशक्ति यदि वरदान के रूपमें प्राप्त हों तभी इस दिशामें कविको सफलता प्राप्त हो सकती है और वह निर्जीव भावचित्रोंमें उष्णरक्तका संचारकर सकता है। यही कमी है कि इस नाटकके छायाचित्र केवल बुद्धिवेद्य ही होकर रह जाते हैं, उनकी मनुष्यता हमें सहानुभूति प्रकट करनेको बाधित नही कर पाती । इस अशमें पाश्चात्य नाटककारोको अधिक सफलता प्राप्त हुई है । इतना तो सबको मानना ही पड़ेगा कि सस्कृतमें जितने इस प्रकारके नाटक हैं उनमें सबसे अधिक सफलता श्रीकृष्ण मिश्रकी इस कृतिको ही प्राप्त हो सकी है । इस तरहके जो नाटक इस समय उपलब्ध होते हैं उनकी संख्या अधिक नहीं है । छायानाटक, प्रतीकनाटक या भावनाटक जो कहे, इनकी रचना कबसे प्रारम्भ की गई यह

५ समालोचना विषय भी विचारणीय है। यद्यपि अश्वघोषके द्वारा रचित कहाकर प्राप्त अपूर्ण कृतियोंमे अमूर्त्तभावों तथा गुणोंका मानवीकरण प्रयास पाया जाता है परन्तु इसमे कोई प्रमाण नहीं कि प्रतीकनाटकोंने संस्कृतनाटकीय साहित्यके प्रारम्भिक विकासमे कोई महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। यह भी सप्रमाण नहीं कहा जा सकता कि यदा कदा प्रतीकनाटक बनते रहे है। वस्तुतः इस प्रकारके सभी नाटक बहुत बादमे रचे गये। ऐसे नाटककोमे सर्वप्रथम रचना श्रीकृष्ण मिश्रकी ही है, जिनका काल ११ वी शताब्दी है। दृढतापूर्वक यह नहीं कहा जासकता कि श्रीकृष्ण मिश्र एक मृतप्राय परम्पराको कायमकर रहे थे अथवा स्वय एक नई परम्पराको उत्पन्न कर रहे थे। कुछ भी हो, अमूर्त्तभावोंके विशुद्ध मानवीकरणके माध्यमसे एक प्रतीकनाटककी रचना प्रस्तुत करनेका श्रेय उन्हे अवश्य प्राप्त है। विशेषता यह है कि आकार तथा शैलीमें यह नाटक अन्य नाटकोंसे सर्वाशतः मिलता जुलता है। प्रवाहविरुद्ध यह प्रयास सफल नहीं हो सका, अत एव अनेक अन्य महारथियों द्वारा इस प्रकारके प्रयत्नोंके बावजूद भी इस शैलीका अधिक विकास नहीं हो सका और न इसकी कोई अलग परम्परा कायम हो सकी। फल चाहे जो हो, वे प्रयास निस्सन्देह प्रशंसनीय थे, न केवल अपनी नवीनताके लिये, अपितु सफल प्रतीकात्मकताके लिये भी। यह कोई सहज कवित्वशक्ति नही है प्रत्युत एक सतर्क बौद्धिक प्रवृत्ति है, जो जीवनसे दूर रहकर अमूर्त्तभावों तथा प्रतीकात्मक पात्रोंसे मनोरंजन किया करती है। किसी दार्शनिक सिद्धान्तको नाटकीय रूप देना संभवतः कठिन हो, परन्तु श्रीमद्भागवते¹ (स्कं. ४. अ. २५-२८) पुरञ्जनकी दार्शनिक प्रतीक कथाओंने इस दिशामे सङ्केत किया हो, ऐसी संभावना की जासकती है। इस तरहकी रचनाओंमें एक दोष यह होता है कि वे अमूर्त्तभाव जिनका मानवीकरण किया जाता है इतने स्फुटीभूत व्यक्ति हो जाते हैं कि उनका उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है या उनमें इतना कम व्यक्तित्व होता है कि वे केवल जीवनहीन भावमात्र बने रह जाते है। बहुधा वे जीवित व्यक्तिसे अधिक सैद्धान्तिक सूत्र ही हुआ

१. भागवते ४र्थस्कन्दे २५ अध्यायतः पुरञ्जनोपाख्यानं विद्यते। २९ अध्याये च तत्पूत्तिः। ‘इत्थं पुरञ्जनं सम्यग् वशमानीयविभ्रमैः। पुरञ्जनी महाराज रेमेर मयतीपतिम् ॥ अत्र पुरञ्जनपदं पुरुषपरम्, पुरञ्जनीपद च बुद्धिपरम् । एवमेव सर्वत्र । विवृतमिदमिदं तदुपाख्यानसमाप्तौ, २९ तमेऽध्याये । तथा च— ‘पुरुषं पुरञ्जनं विद्याद्यद्व्यनक्त्यात्मनः पुरम्’ । ‘बुद्धिं तु प्रमदां विद्यात्’ ‘सखाय इन्द्रियगणाः’ ‘सख्यस्तद् वृत्तयः’ ‘बृहद्बलं मनोविद्यादुभयेन्द्रियनायकम्’ । ‘पञ्चालाः पञ्चविषयाः’

समालोचना ६ करते है¹। घटनाक्रममें सिद्धान्तोंके प्रतिपादनका प्रयास इतना प्रत्यक्ष होता है कि मनोर- ञ्जकता नाममात्र भी नहीं रह जाती । यह ठीक है कि नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तोंके अनुकूल ही इनके आकार प्रकार निर्धारित होते हैं और मान्य नियमोंकी अवहेलना नहीं की जाती परन्तु फिर भी कुछ ऐसा लगता है कि सामान्य नाटकोंकी श्रेणीमें नाम लिखाने के लिये ही यह सब हो रहा है। वास्तवमें होता यह है कि अधिकतर ऐसे नाटक धार्मिक या नैतिक शिक्षा देनेकी दृष्टिसे या पाण्डित्य प्रदर्शनके लिये लिखे जाते हैं, प्रती कात्मक घटनाओंकी नीरसताका यह एक प्रबल कारण है। श्रीकृष्ण मिश्र की कविता श्रीकृष्ण मिश्र कवि एवं दार्शनिक दोनों थे, फिर भी उनकी कविता अन्य दार्शनिक कवियों की तरह जटिल नही है, इनकी कवितामे प्रवाह और प्रसाद है। किसी पदार्थके वर्णनमें उस वस्तु की रूपरेखा प्रस्तुत कर देना इनकी कविताका प्रधान गुण है। वे जब कामदेवको पाठकोंके सामने उपस्थित करते है तब वह साकार हो उठता है :— 'उत्तुङ्गपीवरकुचद्वयपीडिताङ्गमालिङ्गितः पुलकितेन भुजेन रत्या । श्रीमान् जगन्ति मदयन्नयनाभिरामः कामोऽयमेति मदघूर्णितनेत्रपद्मः' ॥ यह श्लोक पढते ही कामदेवका सर सचित्र नयनोंके सामने झूलने लगता है। इसी प्रकार जब वे दाम्भिकोंका वर्णन करते हैं तो ऐसा मालूम पडता है मानो कोई बडा भारी ठग लोगोंको वञ्चित करने की शक्ल बनाये सामने आ रहा है — 'गङ्गातीरतरङ्गशीतलशिलाविन्यस्तभास्वद्वृसी- संविष्टाः कुशमुष्टिमण्डितमहादण्डाः करण्डोज्ज्वलाः । पर्यायग्रथिताक्षसूत्रवलयप्रत्येकवीडाग्रह- व्यग्राङ्गुलयो हरन्ति धनिनां वित्तान्यहो दाम्भिकाः' ॥ जिन लोगोंने काशी आदि क्षेत्रोंमें धूर्त धर्मध्वजियोको देखा है उन्हे इस श्लोकके पढनेसे पूरा मजा मिलेगा, वह इस चित्र की बारीकियोंको आसानीसे पहचान लेंगे । क्रोध आदि, मानसिकभावोंका मूर्त्तरूप है उनके चित्रणमें इस दार्शनिक महाकविने बडी चतुरता दिखलाई है, क्रोधका चित्र इतना सुन्दर हुआ है कि हृदय बरवस आकृष्ट हो जाता है । 'अन्धीकरोमि भुवनं वधिरीकरोमि धीरं सचेतनमचेतनतां नयामि । कृत्यं न पश्यति न येन हितं शृणोति धीमानधीतमपि न प्रतिसन्दधाति' । १. देखिये—अमृतोदय, 'गर्भं धत्तां परामर्शसन्निकर्षेण पक्षता । अपत्ये जातमात्रे तु दम्पती न भविष्यतः' ॥ २, २० 'पूर्वं प्रमित्या परतोऽनुमित्या सिद्ध्या ततोऽस्मिन्पुरुषे प्रसक्ते । सङ्गच्छमाने पुरुषोत्तमेन मोहः स्वयं प्राप्स्यति नाशमेषः' ॥ ३. २७.

यही है क्रोधका वास्तविक रूप । भर्तृहरिके नीतिश्लोक बहुत प्रसिद्ध हैं, उनके पढ़नेसे हृदयमे सात्त्विक सुखका उदय होना है, और यही कारण है कि उनके श्लोकोंका अधिक आदर है। इस दार्शनिक कविने भी अपने पात्रोंके मुंहसे समय समय पर कुछ नीतिश्लोक कहवाये हैं जो अतिहृदय- ग्राही हुए है—‘श्रीदेवीजनकत्मजा दशमुखस्यासीद् गृहे रक्षसो नीता चैव रसातल भगवती वेदत्रयी दानवैः । गन्धर्वस्य मदालसां च तनयां पातालकेतुश्छला- द्वैत्येन्द्रोऽपजहार हन्त विषमा वामा विधेर्वृत्तयः' ॥ ‘कान्तेत्युत्पललोचनेति विपुलश्रोणीभरेत्युन्नमत् पीनोत्तङ्गपयोधरेति सुमुखाम्भोजेति सुभ्रूरिति । दृष्ट्वा माद्यति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति विद्वानिति प्रत्यक्षाशुचि पुत्तिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम्' ॥ इन उक्तियोंके पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता हैं कि हम भर्तृहरिकी कविता ही पढ़ रहे हैं। दुनियाके झमेलेमें अत्यासक्ति होनेपर मनुष्यका मन सदा चिन्तित तथा कष्टपतित रहा करता है, इस बातसे संतोप दिलानेके लिए स्त्री-पुत्रादिकोंसे अनासक्ति रखनेके लिये वैराग्योपदेश दिये जाते हैं, उनमें भी एक चमत्कार होता है, देखिये.— ‘पान्थानामिव वर्त्मनि क्षितिरुहां नद्यामिव भ्रश्यतां मेघानामिव पुष्करे जलनिधौ सांयात्रिकाणामिव । संयोगः पितृमातृबन्धुतनयभ्रातृप्रियाणां यदा सिद्धो दूरवियोग एव विदुषा शोकोदयः कस्तदा' ॥ वैषयिक सुखोंके लिये मनमें जो स्वाभाविक अभिलाप हुआ करता है उसकी इस ग्रन्थमे खूब निन्दा की गई है, उस अंशमें भी इस ग्रन्थके निर्माताको अधिक सफलता मिली है। इस ग्रन्थका प्रतिपादनीय विषय है अद्वैतवेदना सम्मत मोक्षप्रकार, उसके साथ विष्णुभक्तिका संयोग हो जाय तो वह और चमक उठता है, इस बातको श्रीकृष्णमिश्रने पद, तदर्थ तथा कथाविन्यास द्वारा इतनी मार्मिकतासे प्रस्तुत किया है कि ग्रन्थका अन्तिम अङ्क चमत्कारातिशयाधायक हो उठा है, 'बाह्वोर्भग्नादलितमणयः श्रेणयः कङ्कणानां, चूडारत्नग्रहनिकृतिभिर्दुषितः केशपाशः' इस श्लोकके पढनेसे ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई स्त्री ही अपने हितचिन्तकजनसे अपनी बीती बात कह रही है, अपनी कहानी सुनाकर सहानुभूति प्राप्त करनेका प्रयास कर रही है, यह नहीं मालूम पडता है कि कुछ दार्शनिकतत्त्व अपनी स्थिति प्रकट कर रहे हैं। दार्शनिकतत्त्व स्वभावतः कठिन होते हैं, उन्हे सरल सरस बनाकर उपस्थित करना कविताकी सफलता मानी जाती है, इस दृष्टिसे देखनेपर भी श्रीकृष्ण मिश्र अतिसफल प्रतीत होते हैं। देखिये.—

समालोचना ८ 'अयः स्वभावादचलं बलाच्चलत्यचेतनं चुम्बकसन्निधाविव । तनोति विश्वेचितुरीचितेरिता जगन्ति मायेश्वरतेयमीशितुः' ॥ ईश्वर और मायाका सम्बन्ध कैसा है ? ईश्वर सृष्टि करते हैं या स्वतन्त्र माया सृष्टि करती है ?, इस प्रश्नको इस श्लोकमे बडी सरलतासे समझाया गया है । चुम्बक लौहके सन्निधानसे स्वभावतः अचल लौह जैसे चल हो जाता है उसी प्रकार माया भी ईश्वरेक्षित होकर जगत् की सृष्टि करती है, यही मायेक्षण ही ईश्वर की ईश्वरता है । कितने सरल रूपसे यह गूढतत्त्व हृदयङ्गम कराया गया है । भक्तिका स्वरूप सदासे मधुररूपमे वर्णित होता रहा है और वही उसकी वास्तविक रूपरेखा होती है । भक्तका एक मधुरचित्र इस ग्रन्थमे देखिये :— 'तोयार्द्राः सुरसरितः सिताः परागैरर्चन्तश्च्युतकुसुमैरिन्दुमौलिम् । प्रोद्गीतां मधुपकुलैः स्तुति पठन्तो नृत्यन्ति प्रचललताभुजैः समीराः' ॥ वायुरूपभक्त शिवभक्तिमे ओत-प्रोत है, वह गङ्गा स्नान करके विभूतिसे अपने अङ्गोंको स्वच्छ बना रखा है, उसकी विभूति पराग ही है, वृक्षोंसे फूल चू रहे हैं मानों वह भक्त वायु अपने आराध्यके ऊपर फूल चढ़ा रहा है, भ्रमर शब्द कर रहे हैं, मानो वह महिम्नः स्तोत्रका मधुर पारायण कर रहा है, लतायें झूल रही हैं, मानो वह भक्तिकी प्रचुरतामें नाच रहा है । जिन्होने बैद्यनाथ आदि शैवतीर्थोमे भक्तोको भावना की तन्म- यतामे विभूति रमाये तथा—'कखन हरब दुःख मोर' इत्यादि नचारियां गाते देखा है उन्हे इस पदकी मधुरता अनायास प्रतीत हो जायगी । इस प्रकार आप इन उद्धरणोसे समझ सकेंगे कि यह रूपक किस कोटिकी कविता प्रस्तुत करता है । जहा तक अभिनयकी योग्यताका प्रश्न है प्रतीक नाटकोमे पात्रोंकी मानवीकरणमे जितनी सफलता प्राप्त होगी, अभिनय भी उसी मात्रामें सफल होगा । हम पहले लिख आये हैं कि इस ग्रन्थमे भावनाओका मानवाकरण सफलहुआ है, अतः आभिनयिक सफलता भी इस रूपकको प्राप्त है—यह कहा जा चुका है । नाटकमें आनेवाले पात्र विवेक, यह विचारका प्रतीक है, विवेक उस विचारको कहते हैं जो वस्तुकी यथात्म- कताको सोच समझ सकता हो । मति उस बुद्धिको कहा गया है जो विवेकानुगत हो । इसी तरह और भी मानसिक भाव ही इस नाटकमे पात्र बनाये गये हैं । विज्ञपाठक इस नाटकके अध्ययनके पहले इतना सोचलें कि हम केवल नाटक नही दार्शनिक नाटक पढ रहे हैं, तब इस नाटकका आनन्द उन्हे वास्तविकरूपमें प्राप्त हो सकेगा, अन्यथा उन्हे साधारण अन्य नाटकोका सा कथोपकथनका आनन्द या भोग्यरस परिपाक इसमें नही प्राप्त होगा और उनका मन इससे उचट जायगा । ⸻oogoo⸻

कथासार प्रथम अङ्क मनकी दोस्त्रियाँ प्रवृत्ति और निवृत्तिसे उत्पन्न मोह और विवेक एक दूसरेके विरोधी हों जाते हैं । विवेकके पक्षमे शान्ति, श्रद्धा आदि और मोहके पक्षमे काम, लोभ, तृष्णा, क्रोध, हिंसा आदि है । काम और रति का प्रवेश होता है, रति कामसे कहती है मोहके प्रतिपक्ष विवेक ऐक आफत है । काम उसे विश्वास दिलाता है कि तुम स्त्री होनेसे ही इस तरह डर रही हो नहीं तो विवेककी कुछ हस्ती नहीं है, तुम जो विवेकके मन्त्री यम, नियम आदिकी बातें करती हो उनके विपक्षमें तो अकेला हमारा चित्तविकार ही पर्याप्त है । खास करके मद, मात्सर्य आदिके सामने तो वह यम, नियम आदि ठहर ही नहीं सकने । स्त्रीजाति सामान्यतः अपने को सुरक्षित रखना चाहती है, स्वभावतः रति कामसे पूछती है कि सुनती हूं-आप लोगों का और विवेक आदिका एक ही वंश है । कामने उत्तर दिया कि वंश एक है यह क्या पूछती हो ? पिता ही हम दोनोंके एक है । विषयका लोभ ही सदासे सोदरोंमें विरोध कराता आया है । इस संसारको हमारे पिता मनने अर्जित किया, हम पिताके प्रिय थे, हमने उस पर सर्वाधिकार कर लिया, इसीलिये यह विवेक हमलोगोको और पिताजी को उन्मूलित करना चाहता है । रतिने प्रश्न किया कि क्या इतना बडा पाप विद्वेषमात्रसे किया जारहा है ? इस पर कामने बताया कि तुम स्त्री हो, डर जाओगी, हमारे वंशमे विद्या नामकी राक्षसी जन्म ग्रहण करनेवाली है । इस पर रति डरकर कामसे लिपट जाती है, काम उसे भरोसा देता है कि हमारे जीते विद्या की उत्पत्ति कैसे होगी, तुम धीरज धरो। इस पर रतिने पूछा कि क्या विवेक आदि विद्या की उत्पत्ति चाहते हैं ? यह तो उनका भी संहार कर देगी । इसका उत्तर कामने हाँ में दिया । इधर मति और विवेक बातें कर रहे है-विवेक मतिसे कहता है कि-प्रिये, सुना तुमने यह अभागा काम हमे ही पापी बता रहा है । यह अभागे नित्यशुद्धबुद्ध पुरुषको बन्धनमें डाला है फिर भी यह सुकृती है और उनकी मुक्तिके लिये प्रयत्नपरायण हम पापी है । मति पूछती है कि पुरुष तो स्वाभाविक आनन्दमय है उसे इन लोगोने कैसे बन्धनमें डाला ? इसका उत्तर विवेकने दिया कि-होशियार आदमी भी स्त्रियों द्वारा प्रतारित होकर बन्धनमें पड़ता है, ये भी तो मायाके द्वारा ही बन्धनमें डाले गये है। मतिने इसके उद्धार का कारण पूछा, विवेकने उत्तर दिया कि उपनिषत्के साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे प्रबोध की उत्पत्ति होगी तभी यह बन्धन छूट सकता है, मतिने इसमें कोई आपत्ति नही की । ⸻❁⸻

कथासार १० द्वितीय अङ्क महाराज मोहने दम्भको बुलाकर कहा कि—विवेकने प्रबोधोदयकीप्र तिज्ञा की है और तीर्थोंमें शमदम आदिको भेज दिया है । यह हमारे लिये कुलक्षयका समय आगया है, अतः आपलोग सावधान होकर प्रतिकार करें । पृथिवीमें सबसे बड़ा मुक्तिस्थान काशी है, आप वहाँ जाकर चारों आश्रममें निःश्रेयसको विघ्नित करें। मैने यहाँ अधिकांशपर अपना प्रभाव जमा लिया है । धूर्त्तलोग शराब पीकर वेश्याओंके पास रात बिताते हैं और प्रातःकाल इस तरहका स्वाङ्ग बनाते हैं कि लोग उन्हें तपस्वी समझते है। इसी समय दक्षिण राढासे अहङ्कार आकर कहता है कि ये यहाँके रहनेवाले निरे मूर्ख है फिर भी इन्हे पाण्डित्यका गर्व है, यह साधु लोग मूंड मुडा लेने भरसे वेदान्तका दावा करने लगे है, प्रत्यक्ष सिद्ध वस्तुका अपलापमात्र ही वेदान्त नहीं है । इस तरह कहता हुआ वह दम्भके आश्रममे पहुँचता है, वहाँकी सजावट देखकर कुछ समयके लिये उस स्थानको अपना आश्रय चुनता है और वहाँ जाना चाहता है । उसे वहाँ आते देखकर दम्भशिष्य बटु उसे कहता है कि अलग ही रहिये, बिना पैर पखारे यहाँ नहीं जाना होता है। वह बटुके परामर्शानुसार पैर पखारकर जाना चाहता है फिर भी दम्भकी मौन चेष्टासे बटु उसे रोकता है, अहङ्कारको इस अद्भुत ब्राह्मण्यपर बड़ा आश्चर्य होता है, इसी सिलसिलेमें अहङ्कार अपनी प्रशंसा करता है जिससे दम्भ उसे पहचानकर कहता है—अरे ये तो हमारे पितामह है, पहचान लेनेपर दम्भ अहङ्कारके चरणोंमें प्रणाम करके अपना परिचय देता है । अहङ्कार दम्भसे कहता है—मैने तुम्हे द्वापरके अन्तमे शिशुरूपमे देखा था, तुम अब बड़े हो गये हो, इसलिये और कुछ अपनी वृद्धताके कारण पहचान नही सका । तुम्हारे परिवारमें कुशलता तो है ? दम्भने कहा-हाँ वे लोग भी यही है । अहङ्कारने मोहके बारेमे पूछा कि सुना है विवेकको मोहसे भय उपस्थित है, इसीलिये आया हूं। दम्भने कहा—महाराज मोह इन्द्रलोकसे आरहे है, उन्होंने काशीको ही राजधानी बनानेका विचार किया है। अहङ्कारने जानना चाहा कि मोह वही क्यों रहना चाहते है इसपर दम्भने बताया कि विवेकोपरोध ही इसका कारण है । अहङ्कारको यह सुनकर कुछ खटका हुआ । दम्भने मोहके स्वागतमे नगर परिष्कारकी आज्ञा प्रचारित की । यथासमय मोहका आगमन हुआ, उसके साथ चार्वाकमत भी आया और उसने अपने मतका प्रचार किया । चार्वाक सिद्धान्तोंको सुनकर मोहको बड़ी प्रसन्नता हुई : चार्वाकसे मोहने कहा कि कुशल तो है, चार्वाकने कहा—सब कुशल है, अपना कर्त्तव्य समाप्त करके श्रीमान्के पास आया हू, एक बात कहनी है— विष्णुभक्ति नामकी एक योगिनी है, कलिने यद्यपि उसका प्रचार रोक दिया है ? तथापि उसका बड़ा प्रभाव है, वह जहाँ रहती है उस वंशकी ओर ताकना भी हमारे लिये कठिन हो जाता है । इसी समय मदमानका पत्र लेकर पुरीसे एक पुरुष आता है, उस पत्रसे ज्ञात होता है कि शान्ति अपनी माता श्रद्धाके साथ विवेकको उपनिषदसे

मिलानेके लिये दिनरात उपनिषद्‌को समझाती रहती है, काम सहचर धर्म भी वैराग्य आदि द्वारा फोड लिया गया है, इस स्थितिमें आप यथायोग्य विचार तथा प्रतिकार करें । मोहने इसपर कहा कि शान्तिकी क्या बात है, जब काम आदि उसके विपक्षमे हैं तब क्या उसकी हस्ती है और मदमानसे हमारा आदेश सुना देना कि धर्मको बाधकर रखा करे । इसी अवसरपर क्रोध और लोभ अपना गुण प्रकट करते हुए प्रवेश करते हैं । महामोहने शान्तिको वशीकृत करनेके लिये यह उपाय सोचा कि शान्ति श्रद्धाकी पुत्री है, मिथ्यादृष्टिसे श्रद्धाको ग्रस्त करवा देता हूँ, फिर माके दुःखमे शान्ति निकम्मी बन जायगी । तदनुसार मोहने मिथ्यादृष्टिको श्रद्धाके वशीकारार्थ आज्ञा दी, उसने भी इस कार्यकी सफलताके विषयमें आश्वासन दिया ।

तृतीय अङ्क

श्रद्धाको मिथ्यादृष्टि ग्रस्तकर लेती है, वन, पर्वत, नदीतट, पुण्याश्रम सर्वत्र शान्ति श्रद्धाको ढूँढती फिरती है । करुणा नामक सखीके परामर्शानुसार शान्ति श्रद्धाको पाखण्डा- लयोंमें भी ढूढने चलती है, वहा वह दिगम्बर जैन साधुओको देखती है जो अपने मतकी श्रेष्ठता बताते घूमते रहते हैं । वहाँ उसे जो श्रद्धा मिलती है वह तामसी श्रद्धा होती है । इसी सिलसिलेमें उसे बौद्धभिक्षुके भी दर्शन होते हैं वह भी अपने मतकी श्रेष्ठता बताता हुआ घूमता है । वहाँ भी उसे तामसी श्रद्धाके ही दर्शन होते हैं । जैनबौद्धमतमे अपने अपने मतकी श्रेष्ठताके विषयमे शास्त्रार्थ होता है जिसमें दोनों अपने-अपने मतको श्रेष्ठ सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । शान्ति आगे बढकर सोमसिद्धान्तको देखती है जिससे जैनमत साधुने उसका सिद्धान्त-दर्शन पूछा । उसने नारी मदिराके प्रलोभनसे भिक्षु और क्षपणक दोनोंको आकृष्टकर लिया और कापालिकीवेष धारिणी राजसी श्रद्धा उन दोनोंको आलिङ्गित करके कापालिक सेव्य मदिराका सेवन कराया । नामसाम्यसे शान्तिको सन्देह हुआ कि यह हमारी माता श्रद्धा ही तो नही है परन्तु करुणा बताती है कि तुम्हारी माता श्रद्धा विष्णुभक्तिके पास है यह तो कोई दूसरी राजसी श्रद्धा है । कापालिकके अनुरोधसे जैनभिक्षु ने गणना करके कहा कि—धर्म और श्रद्धा इस समय विष्णुभक्तिके आश्रयमें है । इस बातको सुनकर कापालिकने आकर्षण विद्यासे उन दोनोंका आकर्षण करना चाहा ।

चतुर्थ अङ्क

श्रद्धा और मैत्री बातें करती हुई प्रवेश करती है। मैत्रीने श्रद्धासे कहा कि मैने मुदितासे सुना है कि महाभैरवीके चङ्गुलसे तुम्हे देवी विष्णुभक्तिने बचाया है, यही सुनकर तुम्हे देखने आ रही हूँ । श्रद्धाने महाभैरवी वाली घटना कही । मैत्रीने भी अपनी कथा

कथासार १२ श्रद्धासे कही कि हम चारो बहनें महात्माओंके हृदयों में रहती हैं। इसी प्रसङ्गसे देव विवेक वस्तुविचारको बुला भेजता है, विवेकने वस्तुविचारसे कहा कि मोहके साथ हम लोगोंका सग्राम छिड़ गया है, उसकी ओरसे काम मुख्य योद्धा बना है, हमने आपको उससे लड़नेके लिये चुना है। वस्तुविचारने कहा कि यह कोई बडा भारी काम नहीं है, काम तो पुष्पधन्वा और पञ्चशर है, उसे जीतना कौनसी बड़ी बात है। क्षमाने कहा कि मै क्रोध पर विजय पा सकूँगी और क्रोधके जीते जानेपर हिंसा, मद, मान, मात्सर्य पौरुष्य आदि स्वय हार मानने लगेंगे। लोभको जीतनेवाले सन्तोषको बुलाया गया, सन्तोषने राय दी कि वाराणसी पर चढ़ाई की जाय। राजाने भी सेनाको भेजनेका आदेश दिया।

पञ्चम अङ्क विवेक की सेना द्वारा जब मोहपक्ष का सहार हो जाता है तब श्रद्धा इस निष्कर्ष पर पहुचती है कि आत्मीयोंका विरोध कुलसंहारक होता है। विष्णुभक्ति और शान्ति श्रद्धासे मिलती है, विष्णुभक्तिने श्रद्धाको मुनिजन हृदयमे रहने का वरदान दिया और पूछा कि युद्धका क्या समाचार है, इसका उत्तर श्रद्धाने दिया कि देवीके विरोधसे जो होना चाहिये। आदि केशव मन्दिर से आप चलीं, सबेरा हुआ, दोनों ओर की सेना आमने सामने आ खडी हुई। विवेकने मोहके पास न्यायदर्शनको दूतके रूपमे भेजा। दूतने जाकर मोहसे कहा कि आप देवस्थान आदिको छोडकर हट जांय, अन्यथा आपका समूल नाश होगा। इस संवादसे मोहको बड़ा क्रोध हुआ। इसी समय हमारी सेनाके आगे सरस्वती प्रकट हुई। बडा घोर सग्राम हुआ, सभी मोहपक्षीय निहत हुए। मोह कहीं जाकर छिप गया। सारा समाचार जब मनने सुना तो उसे अपने प्यारे पुत्रोंके निधनसे बडा कष्ट हुआ, प्यारी प्रवृत्तिके मरनेका समाचारने तोउसे जर्जर बना दिया, इसी समय उसके पास वैयासकी सरस्वती पहुंची और उसने मनको ससारकी वास्तविकतासे परिचय कराकर वैराग्यकी ओर झुकाया, निवृत्तिको मनकी पत्नीके पदपर नियुक्त किया, मनको शान्ति प्राप्त हुई।

षष्ठ अङ्क शान्ति और श्रद्धाके दिन आरामसे बीतने लगे, शान्तिने एक-एक करके राजकुलका समाचार पूछा जिसे श्रद्धाने विशदपूर्वक बताया। श्रद्धाके अनुसार यह समझा गया कि पुरुषने मायाका सबन्ध त्याग कर दिया है, नित्यानित्यविचारणा प्रणयिनी, एकमात्र वैराग्य मित्र, शम, दम आदि सहाय, मैत्री आदि परिचारिकायें, मुमुक्षा सहचरी, ये ही पुरुषके परिजन रह गये हैं। यह भी श्रद्धाके द्वारा ज्ञात हुआ कि इस स्थितिमें भी मोहने अपनी

१३ कथासार दुष्टताका त्याग नहीं किया है, उसने पुरुषको फुसलानेके लिये 'मधुमती' को नियुक्त कि- मधुमतीने पुरुषको बहुतसा सब्ज बाग दिखलाया, मायाने भी हामी भरदी, मनने उ- मोदन किया, सङ्कल्पने प्रोत्साहित किया, पुरुष भी सहमत होगया, परन्तु पाश्र्ववर्त्ती त- समय पर सबोंको आडे हाथों लिया, उसने इस मायाजाल का पर्दाफास करके पुरुष सचेत कर दिया। पुरुषने विवेकको देखना चाहा और उपनिषद् को भी बुला भेज उपनिषद्-विवेकसे मिलनेमे आनाकानी करती रही, क्योंकि बुरे दिनोंमे विवेकने उस रक्षा नहीं की थी, जिससे उसे बहुत कष्ट सहने पडे थे। शान्तिने उसे विवेककी परिस्थि बाध्यता बताकर समझाया और वह विवेकसे मिली, पुरुषसे उपनिषद्ने अपनी बीती व- सुनाई। पुरुषने उपनिषद्से प्रश्न किया कि तुमने इतने दिन कहाँ बिताये । उपनिषद्- कहा-मै मठ, चत्वर, पुराने देवागार प्रभृति स्थानोंमें रही, वहाँ मैने देखा कि वह- रहनेवाले हमारे अर्थका अनर्थ कर रहे है, इसके बाद मैने कभी देखा कि यज्ञविद्या जारह- हैं, मै उसके पास आश्रय पाने गई, उसने मेरे कार्यके विषयमे प्रश्न किया, मैने अपना का- ब्रह्मज्ञान बताया। इसपर यज्ञविद्याने कहा कि मुझे ऐसे अकर्त्तापुरुषकी कोई आवश्यकता नहं है। इसके बाद मुझे मीमांसा मिली, उसे भी मैने आश्रयप्रदानके लिये कहा, उसने भी अस्वीकार किया, अनन्तर मै तर्कविद्याओं की शरणागत हुई, उनके उत्तर भी हमारे कामके नहीं हुए। इस प्रकार भागती-भागती मै दण्डकवनमें प्रवेशकर गई, वहाँके गदापाणि पुरुषोंने हमारे अनुगामी तर्कोंको भगाया। अनन्तर उपनिषद्ने आज्ञाका स्वरूप बताया और इसी समय निदिध्यासन प्रकट हुआ। उसने आकर पुरुषके समक्ष ही उपनिषद्से निवेदन किया कि आपके गर्भसे विद्या और प्रबोधोदय नामकी दो सन्तानें होंगी, उनमे विद्याको सङ्घर्ष विद्याद्वारा मनमें सङ्क्रान्त करादे और प्रबोधचन्द्रको पुरुषके हाथों सौंपकर विवेकके साथ उपनिषद् विष्णुभक्तिके पास चली जाय । वैसा ही हुआ, प्रबोधोदय होनेसे सबका अज्ञानान्धकार दूर हो गया। पुरुषको विष्णुभक्तिके प्रसादसे मुक्ति मिली।

समर्पणपत्रम् श्रीमतां स्वनामधन्यानां गुरुवर- पण्डित श्रीईश्वरनाथझा शर्मणां करकमलयोः सादरं समर्प्यतेऽयं प्रकाशः पूज्यपादाः ! अबोधस्यानिच्छोरपि हतमतेरश्रमकृतो दृशं मे यद्यत्नैरुत्कृषत भवन्तो विकसिताम् । अशेषे शास्त्रार्थे फलमुपहृतं तेन विरसं रसाढ्यं वा स्वत्वाद्भवतु भवदङ्गीकृतमिदम् ॥ तदीयशिष्यान्यतमेन रामचन्द्रेण

पात्रपरिचयः -:००:७:००:- पुरुषपात्राणि १ सूत्रधारः—नाटकप्रयोगप्रबन्धकरः ९ महामोहः—प्रतिनायकः २ विवेकः—प्रधाननायकः १० चार्वाकः—मोहमित्रम् ३ वस्तुविचारः—विवेकभृत्यः ११ कामक्रोधलोभ- ⎫ मोहामात्याः ४ सन्तोषः—सतां सहचरः दम्भाहङ्काराः ⎭ ५ पुरुषः—उपनिषत्पतिः १२ मनः—सङ्कल्परूपम् ६ प्रबोधोदयः—उपनिषदुत्पन्नपुरुषः पुत्रः १३ दिगम्बरभिक्षु- ⎫ बौद्धजैनादि ७ वैराग्य-निदिध्या ⎫ मनस उत्पन्नाः कापालिकाः ⎭ मतप्रवर्त्तकाः सन-सङ्कल्पाः ⎭ ८ पारिपार्श्वक, पुरुष, ⎫ इतरे जनाः १४ बटुः, शिष्यः, ⎫ इतरे जनाः, सारथी, प्रतिहारिणः ⎭ पुरुषः, दौवारिकः ⎭ स्त्रीपात्राणि १ नटी—सूत्रधारस्त्री ८ सरस्वती—विष्णुभक्तिसखी २ मतिः—विवेकस्त्री ९ क्षमा—विवेकदासी ३ श्रद्धा—शान्तिमाता १० मिथ्यादृष्टिः—मोहजाया ४ शान्तिः—विवेकभगिनी ११ विभ्रमवती—तत्सखी ५ करुणा—शान्तिसखी १२ रतिः—कामपत्नी ६ मैत्री—श्रद्धासखी १३ हिंसा—क्रोधपत्नी ७ उपनिषत्—वेदान्तविद्या १४ तृष्णा—लोभपत्नी 𑁋𑁋𑁋𑁋❧𑁋𑁋𑁋𑁋

॥ श्रीः ॥ प्रबोधचन्द्रोदयम् 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेतम् प्रथमोऽङ्कः मध्याह्नार्कमरीचिकासु च पयःपूरो यदज्ञानतः खं वायुर्ज्वलनो जलं क्षितिरिति त्रैलोक्यमुन्मीलति । यत्तत्त्वं विदुषां निमीलति पुनः स्रग्भोगिभोगोपमं चिरविततमिस्रासङ्कुचद्दिग्विभागे विगतकरणतारामण्डलीशुभ्रभासि । विषयजलदमालासम्परीतेऽम्बरेऽस्मिन् मनसि सकृदुदीयाज्जातु मे बोधविद्युत् ॥ १ ॥ श्रद्धानतेन शिरसा पितरं 'मधुसूदनम्' । प्रसूं 'जयमणिं' चाहं प्रणमामि पुनः पुनः ॥ २ ॥ श्रीकृष्णमिश्रकविताभावानवबोधबद्धवैमुख्यान् । मन्ये कतिचन बालान् प्रोत्साहयिता 'प्रकाशो'ऽयम् ॥ ३ ॥ दार्शनिककविः श्रीकृष्णमिश्रो विद्वद्वर्यः प्रबोधचन्द्रोदयनामकं नाटकं चिकीर्षुः प्रारिप्सितग्रन्थप्रत्यूहव्यूहप्रशमकामनया मङ्गलमादौ निबध्नाति—मध्याह्नेति० यद्- ज्ञानतः यस्य ब्रह्मात्मकस्य महसः प्रकाशस्य अज्ञानतः अबोधात् मध्याह्नार्कमरीचि- कासु अह्नो मध्यं मध्याह्नस्तस्य योऽर्कः सूर्यस्तस्य मरीचयः किरणा एव मरीचिकाः सिकतागतसूर्यकरप्रभाचाक्चिक्याकारास्तासु पयःपूरः जलराशिरिव खम् आकाशम् वायुः पवनः ज्वलनः वह्निः जलं वारि क्षितिः पृथिवी एवं क्रमेण त्रैलोक्यम् समस्तं धरामण्डलम् समुन्मीलति प्रकटति । यत्तत्त्वं यदीयं स्वरूपम् विदुषाम् जानताम् मध्याह्नसूर्यकी मरीचिकामें जलराशिकी तरह जिसके अज्ञानसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इस क्रमसे त्रैलोक्य प्रकट होता है और जिसके ज्ञानसे मालासर्पकी

२ प्रबोधचन्द्रोदयम् सान्द्रानन्दमुपास्महे तदमलं स्वात्मावबोधं महः ॥ १ ॥ अपि च— अन्तर्नाडीनियमितमरुल्लङ्घितब्रह्मरन्ध्रं पुनः स्रग्भोगिभोगोपमम् मालासर्पफणवत् निमीलति विलीयते, तद् अमलम् विग- तसकलकलङ्कपङ्कम् स्वात्मावबोधम् स्वप्रकाशम् सान्द्रानन्दम् आनन्दघनम् महः परमात्मलक्षणं ज्योतिः उपास्महे ध्यायामः । यदज्ञानवशादयं संसारो मध्यन्दिन- सावित्रकरोल्लासिमृगमरीचिकासु पयःपूर इवाकाशादिक्रमेणोपजायते, यज्ज्ञान- वशाच्च मालाफणीव निलीयते तदखण्डानन्दैकरसं ब्रह्म भावयाम इत्यर्थः । अत्र प्रथमोदाहरणं संसारिविषयं द्वितीयन्तु मुक्तविषयम् । अत्र मध्याह्नार्कमरीचि- कासु पयःपूर इव यदज्ञानतो लोकोऽयमुन्मीलति तिष्ठति निमीलति चेत्युक्त्या जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूपं तटस्थलक्षणं 'यतो वा इमानि भूतानि' इत्यादि श्रुत्युक्तं 'सान्द्रानन्दम्' इति च सच्चिदानन्दत्वरूपं स्वरूपलक्षणं ब्रह्मणो निवेशित- मवगन्तव्यम् । 'खं वायुर्ज्वलनः' इति क्रमश्च 'तस्माद्वा एतस्मादाकाशस्संभूतः' इत्यादि श्रुतिसमर्थितो ज्ञेयः । एतेन 'अज्ञानानिवृत्तिः प्रयोजनं, तत्कामोऽधिकारी, प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबन्धः, ऐक्यमभिधेयमि'ति सूचितम् । 'नैदाघभानु- किरणेष्विव वारिपूरः सर्वो विभाति यदबोधवशात्प्रपञ्चः । मालाफणीव च निमीलति यत्प्रबोधात्तद्ब्रह्म नौमि सुखमद्वयमात्मरूपम्' इति शिखामणिश्लोकोऽस्य च्छाया- मनुहरति । त्रयो लोकास्त्रैलोक्यम्, स्वार्थे ष्यञ् । तत्त्वं विदुषामित्यत्र 'नलोकाव्यये'ति षष्ठीनिषेधात्तत्त्वपदे द्वितीयैव । यद्यपि—'आनन्दनिष्यन्दिषु रूपकेषु व्युत्पत्ति- मात्रं फलमल्पबुद्धिः । योऽपीतिहासादिवदाह साधुस्तस्यै नमः स्वादपराङ्मुखाय' इति, 'धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च । करोति कीर्तिं प्रीतिञ्च साधुकाव्य- निषेवणम्' इति चोक्तत्वेनाविद्यानिवृत्ते रूपकस्यास्य फलत्वेनोपादानमयुक्तं तथापि ग्रन्थस्यास्य रूपकभूमिकाम्नवेदान्तशास्त्रतयाऽविद्यानिवृत्तिः परमं प्रयोजनं रसा- स्वादश्चावान्तरं प्रयोजनम् , तत्र मुखप्रतिमुखसन्ध्यादौ रसास्वादोऽवसाने चा- विद्यानिवृत्तिरिति विवेकः । उपमाऽलङ्कार आंशिकः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तं, तल्लक्षणं यथा—'सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्' इति ॥ १ ॥ अन्तर्नाडीति० अन्तर्नाड्याम् सुषुम्नायाम् नियमितः सन्निरुद्धो यो मरुत् वायुस्तेन लङ्घितम् उल्लङ्घितम् ब्रह्मरन्ध्रम् येन तादृशम् , 'सुषुम्ना तिसृषु श्रेष्ठा वैष्णवी मुक्ति- तरहं लीन हो जाता है, उस आनन्दस्वरूप तथा स्वप्रकाशरूप उस ब्रह्मकी हम उपासना करते हैं ॥ १ ॥ सुषुम्ना नाड़ीमें प्राणको अवरुद्ध करके ब्रह्मरन्ध्रमें प्रवेशित करने के लिये शान्तियुक्त

१. प्रथम अङ्क: काम-क्रोध उदय एवं विवेक-विचार द्वन्द्व

प्रथमोऽङ्कः ३ स्वान्ते शान्तिप्रणयिनि समुन्मीलदानन्दसान्द्रम् । प्रत्यग्ज्योतिर्जयति यमिनः स्पष्टलालाटनेत्र- व्याजव्यक्तीकृतमिव जगद्व्यापि चन्द्रार्धमौलेः ॥ २ ॥ ( नान्द्यन्ते सूत्रधारः ) मार्गदा । सुषुम्नया ब्रह्मरन्ध्रमारोहत्यवरोहति । जीवः प्राणसमारूढो ब्रह्मरन्ध्रं विशत्यसौ । नाडीषु बध्यमानासु मध्यनाडीं विशत्यसौ' इत्युक्त्या सुषुम्ना- माविश्य ब्रह्मरन्ध्रं प्रविष्टमित्यर्थः । शान्तिप्रणयिनि उपशमंगते स्वान्ते चित्ते समु- न्मीलदानन्दसान्द्रम् प्रकटीभवदानन्दसुखाभिन्नम्—स्वप्रकाशसुखरूपमित्यर्थः । यमिनो ध्यानमग्नस्य चन्द्रार्धमौलेः खण्डशशधरालङ्कृतशिरसः शिवस्य स्पष्टं स्फुटदृश्यं यल्लालाटनेत्रम् भालनयनं तद्व्याजेन तच्छलेन अव्यक्तं व्यक्तं कृतम् स्वभावतश्चाक्षुषायोग्यमपि चाक्षुषविषयतां नीतम् इव जगद्व्यापि ब्रह्माण्डव्यापकं प्रत्यग्ज्योतिः जडानुताहङ्कारादिभ्यः प्रातिकूल्येनाञ्चतीति प्रत्यक् ( प्रातिकूल्यं च सत्यज्ञानानन्दादिरूपेण भानम् ) ज्योतिःप्रकाशरूपम् जयति सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते । ध्यायतः शिवस्य ध्यानविषयीभूतं ब्रह्मैव प्रकाशतत्तृतीयनयनव्याजेन स्फुरजयती- त्यर्थः । जयत्यर्थेन च नमस्कार आक्षिप्यते इति तत्प्रतिप्रणतोऽस्तीति व्यज्यते । 'अर्थतः शब्दतो वापि मनाक्काव्यार्थसूचनम्' इति प्रतापरुद्रीयोक्तदिशाऽत्र नान्दीद्वये शब्दतः षष्ठाङ्कार्थः, अर्थतोऽपि मध्याह्नार्कत्यादिप्रथमार्धेन महामोहस्तत्सेन च, तृतीयपादेन ससेनो विवेकः, चतुर्थपादेनोभयोः सेनाविलयानन्तरं स्वरूपावस्थान- श्चोक्तम् । मन्दाक्रान्ता वृत्तम्, तल्लक्षणं यथा—'मन्दाक्रान्ता जलधिषडगैर्भौ नतौ ताद्गुरू चेत्' ॥ २ ॥ नान्द्यन्त इति० नान्द्याः रङ्गविघ्नोपशान्तये विधीयमानाया आशीर्नमस्क्रियाद्य- न्यतमभेदभूतमङ्गलाचरणरूपायाः, अन्ते अवसाने, चरमवर्णध्वंसोऽन्तपदार्थः । सूत्रधारः प्रविश्याहेत्यग्रिमेणान्वयः । नाटकादिप्रयोगे सूत्रधारो नान्दीं पठतीति समु- दाचारः 'सूत्रधारः पठेन्नान्दीं मध्यमं स्वरमाश्रितः' इति भरतोक्तिमाधारीकृत्य प्रवृत्तः । यद्यपि नाट्योपक्रमे विघ्नोपशान्तये कुशीलवैर्द्वाविंशत्यङ्गसहितः पूर्वरङ्गः कर्त्तव्यः, 'प्रथमं पूर्वरङ्गश्च ततः प्रस्तावेनेति च । आरम्भे सर्वनाट्यानामेतत्सामान्य- मिष्यते' ॥ यन्नाट्यवस्तुनः पूर्वं रङ्गविघ्नोपशान्तये । कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः स हृदयमें आनन्दरूपसे प्रकटित होनेवाला तपनिष्ठ महादेवकी तृतीय दृष्टिके रूपमें प्रकटीभूत महादेवकी प्रत्यक् ज्योति की जय हो ॥ २ ॥ ( नान्दीके अन्तमें सूत्रधारका प्रवेश )

४ प्रबोधचन्द्रोदयम् सूत्रधारः—अलमतिविस्तरेण । आदिष्टोऽस्मि सकलसामन्तचक्र- चूडामणिमरीचिमञ्जरीनीराजितचरणकमलेन बलवदरिनिवहवक्षस्तटक- पाटपाटनप्रकटितनृसिंहरूपेण प्रबलतरनरपतिकुलप्रलयमहार्णवनि मग्ने- उच्यते'॥ किञ्च—सभापतिस्तथा सभ्या गायका वादका अपि । नटी नटश्चामोदन्ते यन्नान्योन्यानुरञ्जनात् ॥ अतो रङ्ग इति ज्ञेयः पूर्वं यत्स प्रकल्प्यते । तस्मादयं पूर्वरङ्ग इति विद्वद्भिरुच्यते' ॥ इति पूर्वरङ्गस्य प्रथमविधेयत्वं बुध्यते, तथापि द्वाविंशत्यङ्ग- सहितरङ्गमध्ये नान्दीरूपस्यैवाङ्गस्यावश्यविधेयतया सैवात्र विहिता । तथा चोक्तम्- 'यद्यप्यङ्गानि भूयांसि पूर्वरङ्गस्य नाटके । तेषामवश्यं कर्त्तव्या नान्दी नन्दीश्वरप्रिया ॥' इति । नान्दीलक्षणं यथा—'आशीर्नमस्क्रियारूपः श्लोकः काव्यार्थसूचकः । नान्दी पदैर्द्वादशभिरष्टाभिर्वाप्यलङ्कृता' ॥ अत्र पदशब्देन सुप्तिङन्तरूपं पदं श्लोकचतुर्थां- रूपम्, अवान्तरवाक्यार्थरूपञ्च गृह्यते, तदुक्तं नाट्यप्रदीपे—'श्लोकपादं पदं केचित् सुप्तिङन्तमथापरे । परेऽवान्तरवाक्यैकस्वरूपं पदमूचिरे' इति । विश्वनाथस्तु कैश्चि- न्नान्द्यां पदनियमो नाभ्युपगम्यते' इत्याह । अतोऽत्र नान्द्यां पदनियमानादरेऽपि न क्षतिः। नान्दीपदव्युत्पत्तिरुक्ता नाट्यप्रदीपे यथा—'नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवर्गाः कुशीलवाः पारिषदाश्च सन्तः । यस्मादलं सज्जनसिन्धुहंसी तस्मादियं सा कथितेहि नान्दी' । 'चन्द्रार्धमौलेः' इति चन्द्रपदोपादानेनास्या नान्द्याश्चन्द्रशंसिता बोध्या । चन्द्रपदोपादानेन नान्द्यां काव्यगता रसस्फीतताऽऽशंस्यते—यथोक्तम्—'चन्द्रनामा- ङ्किता कार्या रसानां स यतो निधिः प्रीते चन्द्रमसि स्फीता रसश्रीरिति बालुकिः ॥' सूत्रधारः-सूत्रं धरतीति सूत्रधारः, कर्मण्यण् । सूत्रं चात्र नाटकप्रयोगव्यवस्था, तथा चामरः-'सूत्रं तन्तुव्यवस्थयोः' इति । उक्तञ्च-'नाटकीयकथासूत्रं प्रथमं येन सूच्यते । रङ्गभूमिं समाक्रम्य सूत्रधारः स उच्यते' ॥ आदिष्टः-आज्ञप्तः। सकलाः सर्वे ये सामन्ताः मण्डलेश्वरास्तेषां चक्रं समूहस्तस्य चूडासु मुकुटेषु ये मणयः पद्मरागाद्यास्तेषां मरीचिमञ्जर्यः किरणपरम्परास्ताभिः नीराजितम् पूजितं चरणकमलं पादपङ्कजं यस्य तेन सकलसामन्तवन्दितेनेत्यर्थः । इदमेकं भूपालगोपालस्य विशेषणम् । बलवन्तः प्रबला येऽरिसमूहाः शत्रुनिवहास्तेषां वक्षस्तटम् उरोदेश एव (विस्तृतत्वात्) कपाटं तस्य पाटने विदारणे प्रकटितं नृसिंह- रूपं येन तेन, प्रबलशत्रुवक्षोभेदिनेत्यर्थः । इदमपि तस्यैव विशेषणम् । प्रबलतरा सूत्रधार—विस्तारकी जरूरत नहीं है। समस्त सामन्तजन अपने मस्तकस्थित रत्नोंसे जिसके चरणोंको पूजते हैं; जिसने दुर्जय शत्रुओं की चौड़ी छातियों के फाड़नेमें नृसिंहरूप धारण किया है, जिसने बलशाली राजमण्डलरूप महार्णवके प्रताप जलमें निमग्न

प्रथमोऽङ्कः ५ दिनीसमुद्धरणमहावराहरूपेण सकलदिग्विलासिनीकर्णपूरीकृतकीर्तिलता- पल्लवेन समस्ताशास्तम्बेरमकणंतालास्फालनबहलपवनसम्पातनर्तितप्र- तापानलेन श्रीमता गोपालेन । यथा खल्वस्य सहजसुहृदो राज्ञः कीर्ति- वर्मदेवस्य दिग्विजयव्यापारान्तरितपरब्रह्मानन्दरसैरस्माभिः समुन्मीलि- तविविधविषयरसास्वाददूषिता इवातिवाहिता दिवसाः । इदानीं तु कृत- कृत्या वयम् । यतः— अतिसामर्थ्यशालिनो ये नरपतयो राजानस्तेषां कुलमेव प्रलयमहार्णवः कल्पावसान- समयसमुद्रस्तत्र निमग्नायाः लीनायाः मेदिन्याः पृथिव्या समुद्धरणे समुद्धारे महा- वराहरूपेण आदिवराहतुल्येन । सकलराजन्यकुलाद्विजित्य पृथिवीं स्ववशीकृत- वतेत्यर्थः । सकलाः सर्वाः या दिग्विलासिन्यो दिगङ्गनाः तासां कर्णपूरीकृतः कर्णाव- तंसीकृतः कीर्त्तिलतापल्लवो यशोवल्लरीकिसलयो यस्य तेन, दिगन्तविश्रान्तयशसे- त्यर्थः । समस्ताः निखिलाः आशास्तम्बेरमाः दिग्गजास्तेषां कर्णतालाः तेषामास्फाल- नेन चालनेन बहलो बहुलीभूतः पवनो वायुस्तस्य सम्पातेन संसर्गेण नर्तितः समे- धितः प्रतापानलो यस्य तादृशेन, दशदिक्प्रख्यातप्रतापेनेत्यर्थः । सकलसामन्तेत्यत्रा- तिशयोक्तिः, बलवदरिनिवहेत्यत्र परम्परितरूपकम् । प्रबलतरेत्यादावुपमारूपकयोः सङ्करः । सकलदिग्विलासिनीत्यत्र विशेषणे परिणामः । समस्ताशास्तम्बरेमेत्यत्राप्य- तिशयोक्तिः । सहजसुहृदः—स्वभावसहृदयस्य । दिग्विजयव्यापारेण-जैत्रयात्रा- प्रसङ्गेन । अन्तरितपरब्रह्मानन्दरसैः—विघ्नितात्मानन्दानुभवचमत्कारैः । समुन्मी- लितविविधविषयास्वाददूषिताः—समुपस्थितनानाप्रकारक शब्दस्पर्श—प्रभृत्युपभोग- कलुषाः । अतिवाहिता—गमिताः । कीर्त्तिवर्मयात्राप्रसङ्गव्यासक्ततायां सांसारिक- सुखोपभोगासक्ततया ब्रह्मास्वादसमुत्थानन्दवञ्चितैरस्माभिः कलुषभावेनैव दिनानि गमितानीत्याशयः । कृतकृत्याः—कीर्तिवर्मणो राज्ये स्थापनात स्वस्थचित्ताः । वयम् इत्यत्र ‘अस्मदो द्वयोश्च’ इत्येकत्वे बहुवचनम् । यतः स्वस्थताकारणं वर्णा- यितुमिदम् । धराके उद्धारमें महावराहका रूप धारण किया है, सभी दिशारूप ललनाओके कर्णपूरका स्थान जिसके यशको प्राप्त है, सकलदिग्गजके कर्णतालजनित वायुसे प्रेरित होकर जिसका प्रतापानल नृत्य करता है, ऐसे श्रीमान् गोपाल ने आज्ञा दी है कि इस स्वभावसुहृद् राजा कीर्तिवर्माकी दिग्विजय-यात्राके प्रसङ्गसे ब्रह्मानन्दपराङ्मुख होकर हमने नाना- प्रकारके विषयरसोंसे दूषित दिन बिताये हैं, अब हम कृतकृत्य हो गये हैं; क्योंकि—

६ प्रबोधचन्द्रोदयम् नीताः क्षयं क्षितिभुजो नृपतेर्विपक्षा रक्षावती क्षितिरभूत्प्रथितैरमात्यैः । साम्राज्यमस्य विहितं क्षितिपालमौलि- मालार्चितं भुवि पयोनिधिमेखलायाम् ॥ ३ ॥ तद्यं शान्तरसप्रयोगाभिनयेनात्मानं विनोदयितुमिच्छामः । ततो यत्पूर्वमस्मद्गुरुभिस्तत्रभवद्भिः श्रीकृष्णमिश्रैः प्रबोधचन्द्रोदयं नाम नाटकं निर्माय भवतः समर्पितमासीत् तदद्य राज्ञः श्रीकीर्तिवर्मणः पुरस्ता- नीता क्षयमिति० नृपतेः कीर्त्तिवर्मणः विपक्षाः शत्रवः क्षितिभुजः राजानः क्षयं नीताः विनाशिताः, प्रथितैः स्वचातुर्यख्यातैः अमात्यैः क्षितिः पृथिवी रक्षावती सुर- क्षिता अभूत् । पयोनिधिमेखलायाम् सागरवसनायाम् भुवि क्षितिपालमौलिमा- लार्चितं राजशिरोभिरुह्यमानम् अस्य कीर्त्तिवर्मणः साम्राज्यम् मण्डलेश्वरत्वम् विहि- तम् । शत्रुविनाशमन्त्रिन्यासौ कृत्वा कीर्त्तिवर्मणः साम्राज्यं स्थिरीकृतमित्यर्थः । 'सम्राट् स्यान्मण्डलेश्वरः' । तस्य भावः साम्राज्यम् ॥ ३ ॥ तत्-कृतकृत्यत्वेन हेतुना । शान्तरसप्रयोगाभिनयेन-शान्तरसप्रचुरनाटकेन । विनोदयितुम्-प्रसन्नतां प्रापयितुम् । यत इत्यारभ्येच्छाम इत्यन्तेन सन्दर्भेण काव्यार्थसूचकैर्वचनैः समारोचनात्मकं प्ररोचनाङ्गमुक्तम्, तथा हि—'नीताः क्षयं क्षितिभुजो नृपतेर्विपक्षाः' इत्येतेन विवेक- महाराजकर्त्तृको मोहविजयः सूचितः । 'रक्षावती क्षितिरभूत् प्रथितैरमात्यैः' इत्यनेन यमाद्यष्टाङ्गयोगैरन्तःकरणशुद्धिः सूचिता । 'साम्राज्यमस्य विहितम्' इत्यनेन पुरु- षस्य स्वरूपलाभरूपं सायुज्यं सूचितम् ॥ अस्मद्गुरुभिः-अस्माकमुपदेशकैः । तत्रभवद्भिः पूज्यैः । निर्माय विरचय्य । भवतः समर्पितम् । तुभ्यं दत्तम् । पुरस्तात् अग्रतः । अभिनेतव्यम्-प्रयोक्तव्यम् । इस राजाके सभी शत्रु मार दिये गये हैं, प्रसिद्ध मन्त्रियोंके हाथोमे पृथिवीकी रक्षाका भार सौंप दिया गया है, सभी राजाओने इसके साम्राज्यको नतमस्तक हो मान लिया है, जो साम्राज्य समुद्रपरिवृत पृथिवी व्यापी है ॥ ३ ॥ इसलिये अब हम शान्तरसके नाटकसे अपनेको विनोदित करना चाहते है । इसलिये हमारे गुरु पूज्य श्रीकृष्णमिश्रने प्रबोधचन्द्रोदय नामका जो नाटक बनाकर आपको दिया था उसे ही आज कीर्त्तिवर्माके सामने अभिनीत करें। सभासदों के साथ राजा भी

प्रथमोऽङ्कः दभिनेतव्यं भवता। अस्ति चास्य भूपतेः सपरिषदस्तदवलोकने कुतू- हलमिति। तद्भवतु। गृहं गत्वा गृहिणीमाहूय सङ्गीतकमनुतिष्ठामि। (परिक्रम्य, नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) आर्ये, इतस्तावत्। (प्रविश्य नटी) नटी—एषास्मि। आज्ञापयत्वार्यपुत्रः को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति। (एसम्हि। आणवेदु अज्जउत्तो को णिओओ अणुचिट्ठियदु त्ति) सूत्रधारः—आर्ये, विदितमेव भवत्या। अस्ति प्रत्यर्थिपृथ्वीपतिविपुलबलारण्यमूर्च्छत्प्रताप- ज्योतिर्ज्वालावलीढत्रिभुवनविवरो विश्वविश्रान्तकीर्तिः। सपरिषदः 'परिषत् सभा, तया सहितस्य। तदवलोकने-प्रबोधचन्द्राभिधनाटक- दर्शने। कुतूहलम्-उत्कण्ठा। एतावत्पर्यन्तं गोपालभूपालवाक्यानुवादः, इतः परतः सूत्रधारोक्तिः। गृहिणीम्-स्वभार्याम्-नटीम्। आज्ञापयतु-कथयतु। नियोगः-आदेशः। अनुष्ठीयताम्-सम्पाद्यताम्। कं तवा- देशं पूरयामीति प्रश्नाशयः। विदितम्-ज्ञातम्। अस्ति प्रत्यर्थीति० प्रत्यर्थिनः शत्रुभूताः ये पृथ्वीपतयः राजानः तेषां विपु- लम् बहुलं यद्वलम् सैन्यम् तदेव (दुःसञ्चारत्वसाम्येन) अरण्यं काननम् तस्मिन् मूर्च्छन् वृद्धिं भजमानः प्रतापः पराक्रम एव ज्योतिः प्रकाशस्तस्य ज्वालया भासा अवलीढम् आक्रान्तम् त्रिभुवनविवरम् लोकत्रयरूपं बिलं येन तादृशः, शत्रु- संहारजन्ययशसा भुवनाभोगं पूरयन्नित्यर्थः। त्रिभुवने विवरत्वारोपः सुखव्या- प्यतां ध्वनयितुम्, तेन च प्रतापप्रकर्षो व्यज्यते। विश्वविश्रान्तकीर्त्तिः संसारख्यात- उस नाटक का अभिनय देखना चाहते हैं। अच्छा, तब तक घरसे गृहिणी को बुलाकर संगीतका आयोजन कर दूं। (चलकर, नेपथ्यकी ओर) आर्ये, जरा इधर तो आओ। नटी—यह आई। क्या आदेश है? सूत्रधार—आर्ये, जानती ही हो— शत्रुराजगण सैन्यरूप वनमे प्रतापानलको विस्तृत करके उस प्रतापकी लपटों से त्रिभुवन विवरको अतिक्रान्त करनेवाले विश्वविख्यात कीर्त्ति तथा केवल तलवारकी मददसे