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प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

कथासार १२ श्रद्धासे कही कि हम चारो बहनें महात्माओंके हृदयों में रहती हैं। इसी प्रसङ्गसे देव विवेक वस्तुविचारको बुला भेजता है, विवेकने वस्तुविचारसे कहा कि मोहके साथ हम लोगोंका सग्राम छिड़ गया है, उसकी ओरसे काम मुख्य योद्धा बना है, हमने आपको उससे लड़नेके लिये चुना है। वस्तुविचारने कहा कि यह कोई बडा भारी काम नहीं है, काम तो पुष्पधन्वा और पञ्चशर है, उसे जीतना कौनसी बड़ी बात है। क्षमाने कहा कि मै क्रोध पर विजय पा सकूँगी और क्रोधके जीते जानेपर हिंसा, मद, मान, मात्सर्य पौरुष्य आदि स्वय हार मानने लगेंगे। लोभको जीतनेवाले सन्तोषको बुलाया गया, सन्तोषने राय दी कि वाराणसी पर चढ़ाई की जाय। राजाने भी सेनाको भेजनेका आदेश दिया।

पञ्चम अङ्क विवेक की सेना द्वारा जब मोहपक्ष का सहार हो जाता है तब श्रद्धा इस निष्कर्ष पर पहुचती है कि आत्मीयोंका विरोध कुलसंहारक होता है। विष्णुभक्ति और शान्ति श्रद्धासे मिलती है, विष्णुभक्तिने श्रद्धाको मुनिजन हृदयमे रहने का वरदान दिया और पूछा कि युद्धका क्या समाचार है, इसका उत्तर श्रद्धाने दिया कि देवीके विरोधसे जो होना चाहिये। आदि केशव मन्दिर से आप चलीं, सबेरा हुआ, दोनों ओर की सेना आमने सामने आ खडी हुई। विवेकने मोहके पास न्यायदर्शनको दूतके रूपमे भेजा। दूतने जाकर मोहसे कहा कि आप देवस्थान आदिको छोडकर हट जांय, अन्यथा आपका समूल नाश होगा। इस संवादसे मोहको बड़ा क्रोध हुआ। इसी समय हमारी सेनाके आगे सरस्वती प्रकट हुई। बडा घोर सग्राम हुआ, सभी मोहपक्षीय निहत हुए। मोह कहीं जाकर छिप गया। सारा समाचार जब मनने सुना तो उसे अपने प्यारे पुत्रोंके निधनसे बडा कष्ट हुआ, प्यारी प्रवृत्तिके मरनेका समाचारने तोउसे जर्जर बना दिया, इसी समय उसके पास वैयासकी सरस्वती पहुंची और उसने मनको ससारकी वास्तविकतासे परिचय कराकर वैराग्यकी ओर झुकाया, निवृत्तिको मनकी पत्नीके पदपर नियुक्त किया, मनको शान्ति प्राप्त हुई।

षष्ठ अङ्क शान्ति और श्रद्धाके दिन आरामसे बीतने लगे, शान्तिने एक-एक करके राजकुलका समाचार पूछा जिसे श्रद्धाने विशदपूर्वक बताया। श्रद्धाके अनुसार यह समझा गया कि पुरुषने मायाका सबन्ध त्याग कर दिया है, नित्यानित्यविचारणा प्रणयिनी, एकमात्र वैराग्य मित्र, शम, दम आदि सहाय, मैत्री आदि परिचारिकायें, मुमुक्षा सहचरी, ये ही पुरुषके परिजन रह गये हैं। यह भी श्रद्धाके द्वारा ज्ञात हुआ कि इस स्थितिमें भी मोहने अपनी

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