प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३ कथासार दुष्टताका त्याग नहीं किया है, उसने पुरुषको फुसलानेके लिये 'मधुमती' को नियुक्त कि- मधुमतीने पुरुषको बहुतसा सब्ज बाग दिखलाया, मायाने भी हामी भरदी, मनने उ- मोदन किया, सङ्कल्पने प्रोत्साहित किया, पुरुष भी सहमत होगया, परन्तु पाश्र्ववर्त्ती त- समय पर सबोंको आडे हाथों लिया, उसने इस मायाजाल का पर्दाफास करके पुरुष सचेत कर दिया। पुरुषने विवेकको देखना चाहा और उपनिषद् को भी बुला भेज उपनिषद्-विवेकसे मिलनेमे आनाकानी करती रही, क्योंकि बुरे दिनोंमे विवेकने उस रक्षा नहीं की थी, जिससे उसे बहुत कष्ट सहने पडे थे। शान्तिने उसे विवेककी परिस्थि बाध्यता बताकर समझाया और वह विवेकसे मिली, पुरुषसे उपनिषद्ने अपनी बीती व- सुनाई। पुरुषने उपनिषद्से प्रश्न किया कि तुमने इतने दिन कहाँ बिताये । उपनिषद्- कहा-मै मठ, चत्वर, पुराने देवागार प्रभृति स्थानोंमें रही, वहाँ मैने देखा कि वह- रहनेवाले हमारे अर्थका अनर्थ कर रहे है, इसके बाद मैने कभी देखा कि यज्ञविद्या जारह- हैं, मै उसके पास आश्रय पाने गई, उसने मेरे कार्यके विषयमे प्रश्न किया, मैने अपना का- ब्रह्मज्ञान बताया। इसपर यज्ञविद्याने कहा कि मुझे ऐसे अकर्त्तापुरुषकी कोई आवश्यकता नहं है। इसके बाद मुझे मीमांसा मिली, उसे भी मैने आश्रयप्रदानके लिये कहा, उसने भी अस्वीकार किया, अनन्तर मै तर्कविद्याओं की शरणागत हुई, उनके उत्तर भी हमारे कामके नहीं हुए। इस प्रकार भागती-भागती मै दण्डकवनमें प्रवेशकर गई, वहाँके गदापाणि पुरुषोंने हमारे अनुगामी तर्कोंको भगाया। अनन्तर उपनिषद्ने आज्ञाका स्वरूप बताया और इसी समय निदिध्यासन प्रकट हुआ। उसने आकर पुरुषके समक्ष ही उपनिषद्से निवेदन किया कि आपके गर्भसे विद्या और प्रबोधोदय नामकी दो सन्तानें होंगी, उनमे विद्याको सङ्घर्ष विद्याद्वारा मनमें सङ्क्रान्त करादे और प्रबोधचन्द्रको पुरुषके हाथों सौंपकर विवेकके साथ उपनिषद् विष्णुभक्तिके पास चली जाय । वैसा ही हुआ, प्रबोधोदय होनेसे सबका अज्ञानान्धकार दूर हो गया। पुरुषको विष्णुभक्तिके प्रसादसे मुक्ति मिली।