प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिलानेके लिये दिनरात उपनिषद्को समझाती रहती है, काम सहचर धर्म भी वैराग्य आदि द्वारा फोड लिया गया है, इस स्थितिमें आप यथायोग्य विचार तथा प्रतिकार करें । मोहने इसपर कहा कि शान्तिकी क्या बात है, जब काम आदि उसके विपक्षमे हैं तब क्या उसकी हस्ती है और मदमानसे हमारा आदेश सुना देना कि धर्मको बाधकर रखा करे । इसी अवसरपर क्रोध और लोभ अपना गुण प्रकट करते हुए प्रवेश करते हैं । महामोहने शान्तिको वशीकृत करनेके लिये यह उपाय सोचा कि शान्ति श्रद्धाकी पुत्री है, मिथ्यादृष्टिसे श्रद्धाको ग्रस्त करवा देता हूँ, फिर माके दुःखमे शान्ति निकम्मी बन जायगी । तदनुसार मोहने मिथ्यादृष्टिको श्रद्धाके वशीकारार्थ आज्ञा दी, उसने भी इस कार्यकी सफलताके विषयमें आश्वासन दिया ।
तृतीय अङ्क
श्रद्धाको मिथ्यादृष्टि ग्रस्तकर लेती है, वन, पर्वत, नदीतट, पुण्याश्रम सर्वत्र शान्ति श्रद्धाको ढूँढती फिरती है । करुणा नामक सखीके परामर्शानुसार शान्ति श्रद्धाको पाखण्डा- लयोंमें भी ढूढने चलती है, वहा वह दिगम्बर जैन साधुओको देखती है जो अपने मतकी श्रेष्ठता बताते घूमते रहते हैं । वहाँ उसे जो श्रद्धा मिलती है वह तामसी श्रद्धा होती है । इसी सिलसिलेमें उसे बौद्धभिक्षुके भी दर्शन होते हैं वह भी अपने मतकी श्रेष्ठता बताता हुआ घूमता है । वहाँ भी उसे तामसी श्रद्धाके ही दर्शन होते हैं । जैनबौद्धमतमे अपने अपने मतकी श्रेष्ठताके विषयमे शास्त्रार्थ होता है जिसमें दोनों अपने-अपने मतको श्रेष्ठ सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । शान्ति आगे बढकर सोमसिद्धान्तको देखती है जिससे जैनमत साधुने उसका सिद्धान्त-दर्शन पूछा । उसने नारी मदिराके प्रलोभनसे भिक्षु और क्षपणक दोनोंको आकृष्टकर लिया और कापालिकीवेष धारिणी राजसी श्रद्धा उन दोनोंको आलिङ्गित करके कापालिक सेव्य मदिराका सेवन कराया । नामसाम्यसे शान्तिको सन्देह हुआ कि यह हमारी माता श्रद्धा ही तो नही है परन्तु करुणा बताती है कि तुम्हारी माता श्रद्धा विष्णुभक्तिके पास है यह तो कोई दूसरी राजसी श्रद्धा है । कापालिकके अनुरोधसे जैनभिक्षु ने गणना करके कहा कि—धर्म और श्रद्धा इस समय विष्णुभक्तिके आश्रयमें है । इस बातको सुनकर कापालिकने आकर्षण विद्यासे उन दोनोंका आकर्षण करना चाहा ।
चतुर्थ अङ्क
श्रद्धा और मैत्री बातें करती हुई प्रवेश करती है। मैत्रीने श्रद्धासे कहा कि मैने मुदितासे सुना है कि महाभैरवीके चङ्गुलसे तुम्हे देवी विष्णुभक्तिने बचाया है, यही सुनकर तुम्हे देखने आ रही हूँ । श्रद्धाने महाभैरवी वाली घटना कही । मैत्रीने भी अपनी कथा