प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकथासार १० द्वितीय अङ्क महाराज मोहने दम्भको बुलाकर कहा कि—विवेकने प्रबोधोदयकीप्र तिज्ञा की है और तीर्थोंमें शमदम आदिको भेज दिया है । यह हमारे लिये कुलक्षयका समय आगया है, अतः आपलोग सावधान होकर प्रतिकार करें । पृथिवीमें सबसे बड़ा मुक्तिस्थान काशी है, आप वहाँ जाकर चारों आश्रममें निःश्रेयसको विघ्नित करें। मैने यहाँ अधिकांशपर अपना प्रभाव जमा लिया है । धूर्त्तलोग शराब पीकर वेश्याओंके पास रात बिताते हैं और प्रातःकाल इस तरहका स्वाङ्ग बनाते हैं कि लोग उन्हें तपस्वी समझते है। इसी समय दक्षिण राढासे अहङ्कार आकर कहता है कि ये यहाँके रहनेवाले निरे मूर्ख है फिर भी इन्हे पाण्डित्यका गर्व है, यह साधु लोग मूंड मुडा लेने भरसे वेदान्तका दावा करने लगे है, प्रत्यक्ष सिद्ध वस्तुका अपलापमात्र ही वेदान्त नहीं है । इस तरह कहता हुआ वह दम्भके आश्रममे पहुँचता है, वहाँकी सजावट देखकर कुछ समयके लिये उस स्थानको अपना आश्रय चुनता है और वहाँ जाना चाहता है । उसे वहाँ आते देखकर दम्भशिष्य बटु उसे कहता है कि अलग ही रहिये, बिना पैर पखारे यहाँ नहीं जाना होता है। वह बटुके परामर्शानुसार पैर पखारकर जाना चाहता है फिर भी दम्भकी मौन चेष्टासे बटु उसे रोकता है, अहङ्कारको इस अद्भुत ब्राह्मण्यपर बड़ा आश्चर्य होता है, इसी सिलसिलेमें अहङ्कार अपनी प्रशंसा करता है जिससे दम्भ उसे पहचानकर कहता है—अरे ये तो हमारे पितामह है, पहचान लेनेपर दम्भ अहङ्कारके चरणोंमें प्रणाम करके अपना परिचय देता है । अहङ्कार दम्भसे कहता है—मैने तुम्हे द्वापरके अन्तमे शिशुरूपमे देखा था, तुम अब बड़े हो गये हो, इसलिये और कुछ अपनी वृद्धताके कारण पहचान नही सका । तुम्हारे परिवारमें कुशलता तो है ? दम्भने कहा-हाँ वे लोग भी यही है । अहङ्कारने मोहके बारेमे पूछा कि सुना है विवेकको मोहसे भय उपस्थित है, इसीलिये आया हूं। दम्भने कहा—महाराज मोह इन्द्रलोकसे आरहे है, उन्होंने काशीको ही राजधानी बनानेका विचार किया है। अहङ्कारने जानना चाहा कि मोह वही क्यों रहना चाहते है इसपर दम्भने बताया कि विवेकोपरोध ही इसका कारण है । अहङ्कारको यह सुनकर कुछ खटका हुआ । दम्भने मोहके स्वागतमे नगर परिष्कारकी आज्ञा प्रचारित की । यथासमय मोहका आगमन हुआ, उसके साथ चार्वाकमत भी आया और उसने अपने मतका प्रचार किया । चार्वाक सिद्धान्तोंको सुनकर मोहको बड़ी प्रसन्नता हुई : चार्वाकसे मोहने कहा कि कुशल तो है, चार्वाकने कहा—सब कुशल है, अपना कर्त्तव्य समाप्त करके श्रीमान्के पास आया हू, एक बात कहनी है— विष्णुभक्ति नामकी एक योगिनी है, कलिने यद्यपि उसका प्रचार रोक दिया है ? तथापि उसका बड़ा प्रभाव है, वह जहाँ रहती है उस वंशकी ओर ताकना भी हमारे लिये कठिन हो जाता है । इसी समय मदमानका पत्र लेकर पुरीसे एक पुरुष आता है, उस पत्रसे ज्ञात होता है कि शान्ति अपनी माता श्रद्धाके साथ विवेकको उपनिषदसे