प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमालोचना नाटक साहित्य की प्राचीनता भारतीय नाटक साहित्य विचारधारा तथा विकासक्रममें मूलतः स्वतन्त्र है इस बातको अब सभी आलोचक मानने लग गये है। वैदिकसाहित्य की समीक्षासे पता चलता है कि वैदिककालमे नाटकके सभी अङ्गों—सवाद, सङ्गीत, नृत्य एवं अभिनयका किसी न किसी रूपमे अस्तित्व था। ऋग्वेदमें यमयमी, उर्वशीपुरूरवा और सरमा-पणिके सवादात्मक सूक्तोमें नाटकीय संवादका तत्त्व वर्त्तमान है। सामवेद तो सङ्गीत प्राण ही है। आलोचको का अनुमान है कि ऐसे सवाद ही कालान्तरमें परिमार्जित होकर नाटकोके रूपमें परिणत हुए। रामायण-महाभारत कालमे नाटकका कुछ और स्पष्ट उल्लेख पाया जाता है। विराट पर्वमे रङ्गशालाका स्पष्ट उल्लेख हुआ है। नटशब्दका भी वहाँ प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ श्रीधरस्वामीने 'नवरसाभिनयचतुर' किया है। हरिवंशमें रामायणकी कथापर आश्रित एक नाटकके खेले जानेका वर्णन आया है। रामायणमे भी 'नट' 'नर्त्तक' 'नाटक' 'रङ्गमञ्च' आदिका वर्णन स्थान-स्थान पर मिलता है, तथा कुशीलव शब्दका प्रयोग भी नट या अभिनेताके अर्थमें हुआ है। महावैयाकरण पाणिनिने 'पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयो-' इस सूत्रमे नटसूत्र अर्थात् नाट्यशास्त्रका स्मरण किया है। इन बातोँसे स्पष्ट है कि उनके पूर्व ही अनेक नाटक रचे जाचुके होगे, जिनके आधारपर इन नटसूत्रोंकी रचना की गई होगी, क्योंकि लक्ष्य ग्रन्थोंको देख कर ही लक्षण ग्रन्थ बनते है। इधर द्वितीय ईशवीसदी पूर्वकी एक प्राचीन नाट्यशाला छोटा नागपुर की पहाडियोंमें पाई गई है जो नाट्यशास्त्रमें वर्णित प्रेक्षागृहोंसे मिलती जुलती है। इस तरह संस्कृत नाटकोकी अपनी प्राचीन परम्परा सिद्ध होती है। संस्कृत नाटकोमें रङ्गमञ्चके पर्देके लिये कहीँ कहीँ 'यवनिका' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसीसे कुछ पाश्चात्य विद्वानोने अनुमान किया है कि सस्कृत नाटकोंकी उत्पत्ति 'यवन'अर्थात ग्रीक नाटकोंके प्रभावसे हुई है, किन्तु यह धारणाभ्रान्त है। 'यवनिका' शब्दके प्रयोगका रहस्य तो इतना ही भर है कि वह पर्दे-'यवन' (Ionea) देशसे आये हुए वस्त्रोंसे बनाये जाते थे। प्राचीन पद्धत्यनुसार विचार करनेसे भी नाटक साहित्यकी प्राचीनता सिद्ध होती है, भरतने अपने नाट्यशास्त्रमे लिखा है:— 'महेन्द्रप्रमुखैर्देवैरुक्तः किल पितामहः । क्रीडनीयकमिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद् भवेत् ॥ न वेदव्यवहारोऽय संश्राव्यः शूद्रजातिषु । तस्मात्सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम्' ॥