प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेह-निन्दा पाकर भी जिनको आत्मा और अनात्माका विवेक तथा देहकी विनाशशीलताका ज्ञान नहीं हुआ वे भले ही बड़े बुद्धिमान् हों, ऐसी स्थितिमें उनकी आयु व्यर्थ ही जाती है । आयुः क्षणलवमात्रं न लभ्यते हेमकोटिभिः क्वापि । तच्चेद्गच्छति सर्वं मृषा ततः काधिका हानिः ॥१६॥ क्षण और पलभरकी आयु भी करोड़ों सुवर्ण-मुद्राओंके बदलेमें कभी नहीं मिल सकती । यदि ऐसी अमूल्य आयु व्यर्थ ही चली गयी तो इससे बढ़कर और क्या हानि होगी ? नरदेहातिक्रमणात्प्राप्तौ पश्चादिदेहानाम् । स्वतनोरप्यज्ञाने परमार्थस्यात्र का वार्ता ॥१७॥ नर-देहके नष्ट हो जानेपर यदि पशु आदिकी योनि मिली तो उसमें तो भलीभाँति अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रहती, परमार्थकी तो बात ही क्या है ? सततं प्रवाह्यमानैर्वृषभैरश्वैः खरैर्गजैर्महिषैः । हा कष्टं क्षुत्क्षामैः श्रान्तैर्नो शक्यते वक्तुम् ॥१८॥ हा ! वे क्षुधाक्षीण और थके होनेपर भी निरन्तर बोझा ढोनेवाले बैल, घोड़े, गधे, हाथी और भैंसे अपना कष्ट कुछ भी नहीं कह सकते । ५