प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर वनिता नितान्तमज्ञा स्वाज्ञामुल्लङ्घ्य वर्तते यदि सा । शत्रोरप्यधिकतरा पराभिलाषिण्यसौ किमुत ॥३४॥ स्त्री अत्यन्त बुद्धिहीना होती है। वह यदि अपनी ( पतिकी ) आज्ञाका उल्लंघन करके चलने लगे तो शत्रुसे भी बढ़कर है; फिर उसके परपुरुषकी इच्छा करनेवाली होनेपर तो कहना ही क्या है ? लोको नापुत्रस्यास्तीति श्रुत्यास्य कः प्रभाषितो लोकः। मुक्तिः संसरणं वा तदन्यलोकोऽथवा नाद्यः ॥३५॥ सर्वेऽपि पुत्रभाजस्तन्मुक्तौ नैव संसृतिर्भवति । श्रवणादयोऽप्युपाया मृषा भवेयुस्तृतीयेऽपि ॥३६॥ तत्प्राप्त्युपायसत्त्वाद् द्वितीयपक्षेऽप्यपुत्रस्य । पुत्रेष्ट्यादिकयागप्रवृत्तये वेदवादोऽयम् ॥३७॥ 'पुत्रहीनको शुभलोककी प्राप्ति नहीं हो सकती' इस श्रुतिमें 'लोक' शब्दसे क्या कहा गया है ? मुक्ति, संसार या इन दोनोंसे भिन्न कोई और लोक ? इनमें पहला पक्ष तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य पुत्रवान् हैं; अतः उनकी मुक्ति हो जानेपर संसार ही नहीं रहेगा [-सारा जगत् शून्यप्राय हो जायगा ] । इसके सिवा [ मुक्तिके साधक ] शास्त्रश्रवणादि उपाय भी मिथ्या हो जायँगे । तीसरा पक्ष भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन ( स्वर्गादि लोकों ) की प्राप्तिके तो अन्य ( यज्ञादि ) उपाय भी १०