भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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विषय-निन्दा भार्या रूपविहीना मनसः क्षोभाय जायते पुंसाम् । अत्यन्तं रूपाढ्या सा परपुरुषैर्वशीक्रियते ॥३०॥ जो स्त्री कुरूपा होती है उससे तो पुरुषोंका चित्त कुढ़ा करता है और जो अत्यन्त रूपवती होती है वह परपुरुषोंके चंगुलमें फँस जाती है । यः कश्चित्परपुरुषो मित्रं भृत्योऽथवा भिक्षुः । पश्यति हि साभिलाषं विलक्षणोदाररूपवतीम् ॥३१॥ मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्यों न हो अति अद्भुत रूपवती स्त्रीको वह चाहभरी दृष्टिसे देखने ही लगता है । यं कञ्चित्पुरुषवरं स्वभर्तुरतिसुन्दरं दृष्ट्वा । मृगयति किं न मृगाक्षी मनसेव परस्त्रियं पुरुषः ॥३२॥ जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्रीकी ताकमें रहता है उसी प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पतिसे अधिक रूपवान् पुरुषको देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूँ ढ़ा करती ? एवं सुरूपनार्या भर्ता कोपात्प्रतिक्षणं क्षीणः । नो लभते सुखलेशं बलिमिव बलिभुग्बहुष्वेकः ॥३३॥ इस प्रकार रूपवती स्त्रीका पति क्षण-क्षणमें ईर्ष्यानलसे क्षीण होता हुआ जरा भी चैन नहीं पाता; जैसे बहुत-से कौवोंमें पड़ी हुई बलिको एक कौवा नहीं पा सकता । ९