प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर जिसे सिंहासनपर विराजमान देखकर लोग आनन्दित होते थे उसी पुरुषको आज कालके गालमें पड़ा देखकर वे नेत्र मूँद लेते हैं। एवंविधोऽतिमलिनो देहो यत्सत्तया चलति । तं विस्मृत्य परेशं वहत्यहंतामनित्येऽस्मिन् ॥२७॥ ऐसा महामलिन देह जिसकी सत्तासे चलता है उस परमेश्वरको भुलाकर इस अनित्य और अपवित्र देहमें लोग 'अहं- बुद्धि' करते हैं ! क्वात्मा सच्चिद्रूपः क मांसरुधिरास्थिनिर्मितो देहः । इति यो लज्जति धीमानितरशरीरं स किं मनुते॥२८॥ 'कहाँ तो सत्-चित्-स्वरूप आत्मा और कहाँ अस्थि, मांस और रुधिर आदिका बना हुआ यह अति घृणित देह ?' ऐसा विचारकर जो बुद्धिमान् लज्जित होता है, वह दूसरोंके देहों- को क्या समझेगा ? [ उनसे अपना सम्बन्ध क्यों जोड़ेगा ? ] विषय-निन्दा मूढः कुरुते विषयजकर्दमसम्मार्जनं मिथ्या । दुरदृष्टवृष्टिभिरसौ देहो गेहं पतत्येव ॥२९॥ अविचारी लोग इस विषयभोगजनित मांसपिण्डको व्यर्थ ही धोते-पोंछते हैं । आखिर दुर्भाग्यरूप वर्षासे एक दिन यह देहरूप घर गिर ही जाता है । ८