प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेह-निन्दा हुआ है, फिर भी मनुष्य बाहरसे इसपर अगरु, चन्दन और कर्पूर आदिका लेप करता है ! यत्नादस्य पिधत्ते स्वाभाविकदोषसङ्घातम् । औपाधिकगुणनिवहं प्रकाशयञ्छ्लाघते मूढः ॥२३॥ मूढ पुरुष इसके स्वाभाविक दोषोंको यत्नपूर्वक छिपाता है, और औपाधिक ( ऊपरी ) गुणोंको प्रकट करता हुआ इसकी प्रशंसा करता है । क्षतमुत्पन्नं देहे यदि न प्रक्षाल्यते त्रिदिनम् । तत्रोत्पतन्ति बहवः कृमयो दुर्गन्धसङ्कीर्णाः ॥२४॥ शरीरमें यदि थोड़ा-सा घाव हो जाय और उसको तीन दिन भी न धोया जाय तो दुर्गन्धके कारण उसमें बहुत-से कीड़े पड़ जाते हैं । यो देहः सुप्तोऽभूत्सुपुष्पशय्योपशोभिते तल्पे । सम्प्रति स रज्जुकाष्ठैर्नियन्त्रितः क्षिप्यते वह्नौ ॥२५॥ देखो, जो शरीर अति सुशोभित फूलोंकी सेजपर सुखपूर्वक सोया हुआ था वह अब रस्सी और काठसे जकड़ा जाकर अग्निमें फेंका जा रहा है ! सिंहासनोपविष्टं दृष्ट्वा यं मुदमवाप लोकोऽयम् । तं कालाकृष्टतनुं विलोक्य नेत्रे निमीलयति ॥२६॥ ७