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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

विषय-निन्दा भार्या रूपविहीना मनसः क्षोभाय जायते पुंसाम् । अत्यन्तं रूपाढ्या सा परपुरुषैर्वशीक्रियते ॥३०॥ जो स्त्री कुरूपा होती है उससे तो पुरुषोंका चित्त कुढ़ा करता है और जो अत्यन्त रूपवती होती है वह परपुरुषोंके चंगुलमें फँस जाती है । यः कश्चित्परपुरुषो मित्रं भृत्योऽथवा भिक्षुः । पश्यति हि साभिलाषं विलक्षणोदाररूपवतीम् ॥३१॥ मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्यों न हो अति अद्भुत रूपवती स्त्रीको वह चाहभरी दृष्टिसे देखने ही लगता है । यं कञ्चित्पुरुषवरं स्वभर्तुरतिसुन्दरं दृष्ट्वा । मृगयति किं न मृगाक्षी मनसेव परस्त्रियं पुरुषः ॥३२॥ जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्रीकी ताकमें रहता है उसी प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पतिसे अधिक रूपवान् पुरुषको देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूँ ढ़ा करती ? एवं सुरूपनार्या भर्ता कोपात्प्रतिक्षणं क्षीणः । नो लभते सुखलेशं बलिमिव बलिभुग्बहुष्वेकः ॥३३॥ इस प्रकार रूपवती स्त्रीका पति क्षण-क्षणमें ईर्ष्यानलसे क्षीण होता हुआ जरा भी चैन नहीं पाता; जैसे बहुत-से कौवोंमें पड़ी हुई बलिको एक कौवा नहीं पा सकता । ९

प्रबोधसुधाकर वनिता नितान्तमज्ञा स्वाज्ञामुल्लङ्घ्य वर्तते यदि सा । शत्रोरप्यधिकतरा पराभिलाषिण्यसौ किमुत ॥३४॥ स्त्री अत्यन्त बुद्धिहीना होती है। वह यदि अपनी ( पतिकी ) आज्ञाका उल्लंघन करके चलने लगे तो शत्रुसे भी बढ़कर है; फिर उसके परपुरुषकी इच्छा करनेवाली होनेपर तो कहना ही क्या है ? लोको नापुत्रस्यास्तीति श्रुत्यास्य कः प्रभाषितो लोकः। मुक्तिः संसरणं वा तदन्यलोकोऽथवा नाद्यः ॥३५॥ सर्वेऽपि पुत्रभाजस्तन्मुक्तौ नैव संसृतिर्भवति । श्रवणादयोऽप्युपाया मृषा भवेयुस्तृतीयेऽपि ॥३६॥ तत्प्राप्त्युपायसत्त्वाद् द्वितीयपक्षेऽप्यपुत्रस्य । पुत्रेष्ट्यादिकयागप्रवृत्तये वेदवादोऽयम् ॥३७॥ 'पुत्रहीनको शुभलोककी प्राप्ति नहीं हो सकती' इस श्रुतिमें 'लोक' शब्दसे क्या कहा गया है ? मुक्ति, संसार या इन दोनोंसे भिन्न कोई और लोक ? इनमें पहला पक्ष तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य पुत्रवान् हैं; अतः उनकी मुक्ति हो जानेपर संसार ही नहीं रहेगा [-सारा जगत् शून्यप्राय हो जायगा ] । इसके सिवा [ मुक्तिके साधक ] शास्त्रश्रवणादि उपाय भी मिथ्या हो जायँगे । तीसरा पक्ष भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन ( स्वर्गादि लोकों ) की प्राप्तिके तो अन्य ( यज्ञादि ) उपाय भी १०

विषय-निन्दा हैं। [ अतः इन दो पक्षोंका निराकरण हो जानेसे इस शब्दका तात्पर्य दूसरे पक्ष ( संसार ) में ही है किन्तु इस ] द्वितीय पक्षमें भी यह वेदवाक्य पुत्रहीन पुरुषोंकी पुत्रेष्टि आदि यज्ञोंमें प्रवृत्ति करानेके लिये ही है । नानाशरीरकष्टैर्धनव्ययैः साध्यते पुत्रः । उत्पन्नमात्रपुत्रे जीवितचिन्ता गरीयसी तस्य ॥३८॥ नाना प्रकारके शारीरिक कष्ट और धनादिके व्ययसे तो पुत्र उत्पन्न होता है और उत्पन्न होनेपर भी उसके जीवित रहनेकी बड़ी चिन्ता लगी रहती है । जीवन्नपि किं मूर्खः प्राज्ञः किंवा सुशीलभाग्भविता । जारश्चौरः पिशुनः पतितो द्यूतप्रियः क्रूरः ॥३६॥ जीवित रहनेपर भी न जाने वह मूर्ख, बुद्धिमान्, सुशील, जार, चोर, चुगलखोर, पतित, जुआरी या क्रूर कैसी प्रकृतिका निकले ? पितृमातृबन्धुघाती मनसः खेदाय जायते पुत्रः । चिन्तयति तातनिधनं पुत्रो द्रव्याधधीशताहेतोः॥४०॥ माता, पिता और बन्धुओंका घात करनेवाला पुत्र सदैव उनके चित्तको दुःखित करनेवाला ही होता हैं। वह धन एवं ११

प्रबोधसुधाकर धरतीके आधिपत्यके लिये सदा अपने पिताके मरणका ही चिन्तन करता रहता है । सर्वगुणैरुपपन्नः पुत्रः कस्यापि कुत्रचिद्भवति । सोऽल्पायू रुग्णो वा ह्यनपत्यो वा तथापि खेदाय ॥४१॥ सर्व-गुण-सम्पन्न पुत्र तो कभी कहीं किसीके होता है; वह भी यदि अल्पायु, रोगी अथवा पुत्रहीन हुआ तो दुःखका ही कारण होता है । पुत्रात्सद्गतिरिति चेत्तदपि प्रायोऽस्ति युक्त्यसहम् । इत्थं शरीरकष्टैर्दुःखं सम्प्रार्थ्यते मूढैः ॥४२॥ पुत्रसे सद्गति होती है-यह सर्वथा युक्ति-विरुद्ध है । [ हम तो समझते हैं ] इस प्रकार मूढलोग शारीरिक कष्ट उठाकर दुःखोंको ही मोल लेते हैं । पितृमातृबन्धुभगिनीपितृव्यजामातृमुख्यानाम् । मार्गस्थानामिव युतिरनेकयोनिभ्रमात्क्षणिका ॥४३॥ नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए पिता, माता, भाई, बहिन, पितृव्य और जामाता आदि सम्बन्धियोंका मेल मार्गमें ठहरे हुए पथिकोंके संयोगके समान क्षणभरके लिये ही होता है । दैवं यावद्विपुलं यावत्प्रचुरः परोपकारश्च । तावत्सर्वे सुहृदो व्यत्ययतः शत्रवः सर्वे ॥४४॥ १२

विषय-निन्दा जबतक दैव अनुकूल रहता है और परोपकारकी अधिकता होती है तभीतक सब सगे-सम्बन्धी होते हैं, उनमें अन्तर पड़ा कि वे उलटे अपने शत्रु हो जाते हैं । अश्नन्ति चेदनुदिनं वन्दिन इव वर्णयन्ति सन्तृप्ताः । तच्चेद्द्वित्रदिनान्तरमभिनिन्दन्तः प्रकुप्यन्ति ॥४५॥ यदि वे नित्यप्रति नाना प्रकारके पदार्थ खाते रहते हैं, तो खूब तृप्त होकर बन्दीजनकी भाँति बड़ाई करते हैं, उनमें यदि दो-तीन दिनका भी अन्तर पड़ जाय तो वे ( प्रशंसा करनेवाले ) ही कुवाक्य कहते हुए कोप करने लगते हैं । दुर्भरजठरनिमित्तं समुपार्जयितुं प्रवर्तते चित्तम् । लक्षावधि बहुवित्तं तथाप्यलभ्यं कपर्दिकामात्रम् ॥४६॥ इस दुर्भर ( कठिनतासे भरे जाने योग्य ) पेटके लिये चित्त लाखों रुपयेतक बहुत-सा धन कमानेको प्रवृत्त होता है, तथापि बिना प्रारब्धके एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती । लब्धश्चेदधिकोऽर्थः पत्न्यादीनां भवेत्स्वार्थः । नृपचौरतोऽप्यनर्थस्तस्माद्द्रव्योद्यमो व्यर्थः ॥४७॥ यदि अधिक धन मिल भी जाय तो उससे स्त्री आदिका ही स्वार्थ-साधन होता है, तथा राजा और चोरोंसे भी अनर्थकी आशंका रहती है; इसलिये धनके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ ही है। १३

प्रबोधसुधाकर अन्याय॒मर्थभाजां पश्यति भूपोऽध्वगामितां चौरः । पिशुनो व्यसनप्राप्तिं दायादानां गणः कलहम् ॥४८॥ राजा [ द्रव्यहरणकी इच्छासे ] धनी पुरुषोंके अन्यायकी ताकमें रहता है । चोर उसके मार्गमें जानेकी प्रतीक्षा किया करता है । दुष्ट पुरुष उसे विपत्तिमें पड़ा देखना चाहते हैं और उसके उत्तराधिकारियोंकी दृष्टि सदा कलहपर रहती है । पातकभरैरनेकैर्थं समुपा‌र्जयन्ति राजानः । अश्वमतङ्गजहेतोः प्रतिक्षणं नाश्यते सोऽर्थः ॥४९॥ राजालोग नाना प्रकारके पाप-कर्मोंसे धनको इकट्ठा करते हैं और फिर वह धन हाथी-घोड़ोंके लिये क्षण-क्षणमें नष्ट किया जाता है । राजान्तराभिगमनाद्रणभङ्गान्मन्त्रिभृत्यदोषाद्वा । विषशस्त्रगुप्तघातान्मग्नाश्चिन्तार्णवे भूपाः ॥५०॥ राजालोग अन्य राजाओंके आक्रमणसे, युद्धमें पराजयसे, मन्त्री और सेवकादिके षड्यन्त्रोंसे तथा विष अथवा शस्त्रोंके द्वारा गुप्त- घात आदिसे [ शङ्कितचित्त रहकर ] सदा ही चिन्तासागरमें डूबे रहते हैं । १४

मनोनिन्दा मनोनिन्दा हसति कदाचिद्रौति भ्रान्तं सदशदिशो भ्रमति । हृष्टं कदापि रुष्टं शिष्टं दुष्टं च निन्दति स्तौति ॥५१॥ कमपि द्वेष्टि सरोषं ह्यात्मानं श्लाघते कदाचिदपि । चित्तं पिशाचमभवद्राक्षस्या तृष्णया व्याप्तम् ॥५२॥ इस तृष्णा-राक्षसीके अधीन होकर यह चित्त पिशाचरूप हो गया है । कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी भ्रान्त-सा होकर दशों दिशाओंमें घूमने लगता है । [ इसी प्रकार ] कभी हर्षित होता है और कभी रुष्ट हो जाता है । [ विवेकहीन हो जानेके कारण ] यह भद्र पुरुषोंकी निन्दा करता है और दुष्टोंकी स्तुति तथा कभी तो किसीसे रोषपूर्वक द्वेष करने लगता है और कभी अपनी प्रशंसा करने लगता है । दम्भाभिमानलोभैः कामक्रोधोरुमत्सरैश्चेतः । आकृष्यते समन्ताच्छ्वभिरिव पतितास्थिकं मार्गे ॥५३॥ मार्गमें पड़ी हुई हड्डीको जिस प्रकार कुत्ते अपनी-अपनी ओर खींचते हैं उसी प्रकार यह चित्त दम्भ, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध और मत्सरादिसे चारों ओरसे खींचा जा रहा है । तस्माच्छुद्धविरागो मनोऽभिलषितं त्यजेदर्थम् । तदनभिलषितं कुर्यान्निर्व्यापारं ततो भवति ॥५४॥ १५

प्रबोधसुधाकर अतः शुद्ध वैराग्यका आश्रय लेकर जो पदार्थ मनको रुचिकर हों उन्हें त्याग दे और जो बात उसे रुचिकर न हो वही करे, इससे चित्त निष्क्रिय हो जाता है। विषयनिग्रह संसृतिपारावारे ह्यगाधविषयोदकेन सम्पूर्णे । नृशरीरमम्बुतरणं कर्मसमीरैरितस्ततश्चलति ॥५५॥ अगाध विषय-जलसे भरे हुए इस संसार-समुद्रमें नर-देहरूप एक नौका है, जो कर्म-वायुसे प्रेरित होकर इधर-उधर डगमगाती फिरती है। छिद्रैर्नवभिरुपेतं जीवो नौकापतिर्महानलसः । छिद्राणामनिरोधाज्जलपरिपूर्णं पतत्यधः सततम्॥५६॥ यह नौका [ इन्द्रिय-गोलकरूप ] नौ छिद्रोंसे युक्त है, इसका स्वामी जीव अत्यन्त आलसी है। छिद्रोंके न रोकनेसे उसमें [ विषय- रूप ] जल भर जाता है और वह निरन्तर डूबती रहती है। छिद्राणां तु निरोधात्सुखेन पारं परं याति । तस्मादिन्द्रियनिग्रहमृते न कश्चित्तरत्यनृतम् ॥५७॥ इन छिद्रोंके रोक देनेसे यह सुखपूर्वक संसार-सागरके उस पार पहुँच सकती है, इसलिये इन्द्रिय-निग्रहके बिना इस मिथ्या प्रपञ्चको कोई पार नहीं कर सकता। १६

विषयनिग्रह

विषयनिग्रह पश्यति परस्य युवतिं सकाममपि तन्मनोरथं कुरुते । ज्ञात्वैव तदप्राप्तिं व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ॥५८॥ पुरुष परस्त्रीको कामवश देखता है और उसकी प्राप्तिकी कामना भी करता है । यद्यपि यह जानता है कि उसका मिलना सर्वथा असम्भव है तथापि [ उसकी कामना करके ] वह व्यर्थ घोर पापका भागी बन जाता हैं । पिशुनैः प्रकाममुदितां परस्य निन्दां शृणोति कर्णाभ्याम् तेन परः किं म्रियते व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ५६ मनुष्य अपने कानोंसे चुगलखोरोंद्वारा मनमानी कही हुई परायी निन्दा सुनता रहता हैं; इससे क्या वह पुरुष [ जिसकी निन्दा की जाती है ] मर जाता है ? [ उसका तो कुछ भी नहीं बिगड़ता ] उलटे निन्दा सुननेवाला ही, घोर पापका भागी बन जाता है । अनृतं परापवादं रसना वदति प्रतिक्षणं तेन । परहानिर्लब्धिः का व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ६० जिह्वा क्षण-क्षणमें दूसरे पुरुषोंकी निन्दा और मिथ्याभाषण किया करती है, इससे दूसरोंकी क्या हानि अथवा [ अपना क्या ] लाभ हो सकता है ? वह निन्दक पुरुष व्यर्थ ही महापापका भागी हो जाता है । १७ २

विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेषसमयेन यत्सुखं भवति ।

प्रबोधसुधाकर विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेषसमयेन यत्सुखं भवति । विषये नष्टे दुःखं यावज्जीवं च तत्तयोर्मध्ये ॥६१॥ हेयमुपादेयं वा प्रविचार्य सुनिश्चितं तस्मात् । अल्पसुखस्य त्यागादनल्पदुःखं जहाति सुधीः ॥६२॥ विषय और इन्द्रियोंका संयोग होनेपर पुरुषको पलभरके लिये जो सुख होता है, विषयके नष्ट होनेपर वही यावज्जीवन दुःखरूप हो जाता है; अतः इन दोनोंमें त्याज्य और ग्राह्यका भलीभाँति विचार करके यह निश्चय हुआ कि यदि बुद्धिमान् पुरुष अल्प सुखकी वासना छोड़ दे तो वह बड़े भारी दुःखका अन्त कर देता है । धीवरदत्तमहामिषमश्नन्वैसारिणो म्रियते । तद्वद्विषयान्भुञ्जन्कालाकृष्टो नरः पतति ॥६३॥ धीवरद्वारा काँटेमें लगाकर डाले हुए थोड़े-से मांसको खानेसे मछलीको प्राण-त्याग करना पड़ता है, इसी प्रकार विषयोंका सेवन करता हुआ पुरुष कालके जालमें पड़कर नष्ट हो जाता है । उरगग्रस्तार्धतनुर्भैकोऽश्नातीह मक्षिकाः शतशः । एवं गतायुरपि सन्विषयान्समुपार्जयत्यन्धः ॥६४॥ सर्पके द्वारा आधा निगल लिये जानेपर भी मेंढक सैकड़ों मक्खियोंको खाता रहता है, इसी प्रकार तृष्णान्ध पुरुष अवस्थाके ढल जानेपर भी विषय-सेवन करता ही रहता है । १८

मनोनिग्रह मनोनिग्रह स्वीयोद्गमतोयवहा सागरमुपयाति नीचमार्गेण । सा स्वीयोद्गम एव स्थिरा सती किं न याति वार्धित्त्वम् ६५ अपने उद्गम-स्थान (निकासकी जगह) से निकलकर नीचे मार्गसे बहनेवाली नदी समुद्रमें जा मिलती है, वह यदि उद्गम स्थानपर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती ? एवं मनः स्वहेतुं विचारयत्सुस्थिरं भवेदन्तः । न बहिर्वोदेति तदा किं नात्मत्वं स्वयं याति ॥६६॥ इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारणका विचार करता हुआ अपने आपमें ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयोंमें न जाय तो क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा ? वर्षास्वम्भःप्रचयात्कूपे गुरुनिर्झरे पयः क्षारम् । ग्रीष्मेणैव तु शुष्के माधुर्यं भजति तत्राम्भः ॥६७॥ कुओं और बड़े-बड़े झरनोंमें वर्षाऋतुमें अधिक जल इकट्ठा हो जानेसे वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतुमें सूखकर अल्प परिमाणमें रह जानेपर उनका जल मीठा हो जाता है ! तद्वद्विषयोद्रिक्तं तमःप्रधानं मनः कलुषम् । तस्मिन्विरागशुष्के शनकैराविर्भवेत्सत्त्वम् ॥६८॥ १९

प्रबोधसुधाकर उसी प्रकार विषय-वासनाओंसे भरा हुआ चित्त तमोगुणी और पापमय होता है, वैराग्यद्वारा उसीके सूख जानेपर उसमें धीरे-धीरे सत्त्वगुणका आविर्भाव हो जाता है । यं विषयमभिलषित्वा धावति बाह्येन्द्रियद्वारा । तस्याप्राप्तौ खिद्यति तथा यथा स्वं गतं किञ्चित्॥६९॥ जिस विषयकी अभिलाषासे यह चित्त किसी बाह्येन्द्रिय- द्वारा दौड़ता है उसके न मिलनेपर ऐसा दुखी होता है मानो इसका कुछ खो गया हो ! नगनगरदुर्गदुर्गमसरितः परितः परिभ्रमच्चेतः । यदि नो लभते विषयं यन्त्रितमिव खिन्नतां याति ॥७०॥ अपने अभीष्ट विषयकी खोजमें पर्वत, नगर, दुर्ग और दुर्गम नदियोंमें सब ओर भटकता हुआ चित्त यदि उस विषयको नहीं पाता तो विवश-सा होकर खिन्न हो जाता है । तुम्बीफलं जलान्तर्बलादधः क्षिप्तमप्युपैत्यूर्ध्वम् । तद्वन्मनः स्वरूपे निहितं यत्नाद्बहिर्याति ॥७१॥ तूँबेको बड़े वेगसे भी जलमें फेंका जाय तो भी वह तुरन्त जलके ऊपर ही आ जाता है, इसी प्रकार अपने स्वरूपमें यत्न- पूर्वक लगानेपर भी चित्त पुनः-पुनः बाहर निकल जाता है । २०

मनोनिग्रह इह वा पूर्वभवे वा स्वकर्मणैवार्जितं फलं यद्यत् । शुभमशुभं वा तत्तद्भोगोऽप्यप्रार्थितो भवति ॥७२॥ इस जन्मके अथवा पूर्वजन्मके कर्मोंसे उपार्जित जैसे-जैसे शुभ अथवा अशुभ फल होने होते हैं, उनके भोग भी बिना माँगे उपस्थित हो जाते हैं । चेतःपशुमशुभपथं प्रधावमानं निराकर्तुम् । वैराग्यमेकमुचितं गलकाष्ठं निर्मितं धात्रा ॥७३॥ कुमार्गकी ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशुको रोकनेके लिये विधाताने एकमात्र वैराग्यको ही गलेका उचित काष्ठ बनाया । निद्रावसरे यत्सुखमेतत्किं विषयजं यस्मात् । न हि चेन्द्रियप्रदेशावस्थानं चेतसो निद्रा ॥७४॥ निद्राके समय जो सुख होता है क्या वह विषयजन्य होता है ? [ कदापि नहीं ] क्योंकि चित्तका इन्द्रिय-गोलकोंमें न रहना ही तो निद्रा है । अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः । बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतद्भ्रूसंश्र तथा॥७५॥ सर्वेन्द्रियावरोधाद्योगशतैर्निर्गमं वीक्ष्य । शान्तं तिष्ठति चेतो निरुद्यमत्वं तदा याति ॥७६॥ २१

प्रबोधसुधाकर बिना द्वारके ऊँचे परकोटेवाले घरमें बंद किया हुआ सिंह बाहर निकलनेके बहुत-से प्रयत्न करनेपर अन्तमें थककर लम्बे-लम्बे श्वास लेता हुआ जैसे पड़ रहता है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियोंके रोक देनेपर सैकड़ों उपायोंसे भी बाहर निकलना असम्भव जानकर चित्त शान्त होकर स्थिर हो जाता है और फिर धूम-धाम नहीं करता । प्राणस्पन्दनिरोधात्सत्सङ्गाद्वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥७७॥ प्राण-स्पन्दनके रोक देनेसे, सत्संगसे, वासनाओंके त्यागसे और भगवच्चरणारविन्दोंकी भक्तिसे मन धीरे-धीरे अपने वेगको छोड़ देता है । वैराग्य परगृहगृहिणीपुत्रद्रविणानामागमे विनाशे वा । प्रथितौ हर्षविषादौ किं वा स्यातां क्षणं स्थातुः ॥७८॥ दूसरेके गृह, स्त्री, पुत्र और धनादिके आने-जानेसे होनेवाले हर्ष या विषाद क्या वहाँ क्षणभर ठहरनेवाले पुरुषको हो सकते हैं ? दैवात्स्थितं गतं वा यं कञ्चिद्विषयमीड्यमल्पं वा । नो तुष्यन्न च सीदन्वीक्ष्य गृहेष्वतिथिवन्निवसेत् । ७९ । २२

वैराग्य इसी प्रकार मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि घरमें अतिथिके समान रहे; किसी भी स्तुत्य अथवा तुच्छ विषयको दैववश स्थित अथवा गया हुआ देखकर न तो सन्तुष्ट ही हो और न दुःख ही माने । ममताभिमानशून्यो विषयेषु पराङ्मुखः पुरुषः । तिष्ठन्नपि निजसदने न बाध्यते कर्मभिः क्वापि ॥८०॥ अपनेपनके अभिमानसे शून्य तथा विषयोंसे विमुख रहने- वाला पुरुष अपने घरमें रहता हुआ भी कर्मोंसे कभी बाधित नहीं होता । कुत्राप्यरण्यदेशे सुनीलतृणवालुकोपचिते । शीतलतरुतलभूमौ सुखं शयानस्य पुरुषस्य ॥८१॥ तरवः पत्रफलाढ्याः सुगन्धशीतानिलाः परितः । कलकूजितवरविहगाः सरितो मित्राणि किं न स्युः॥८२॥ हरी-भरी घास और सुकोमल श्वेत वालुकासे ढँके हुए किसी वन्य-प्रदेशमें वृक्षकी शीतल छायामें सुखपूर्वक सोते हुए पुरुषके फल-दलसे युक्त वृक्ष, मन्द सुगन्ध शीतल वायु, सब ओर सुन्दर कलरव करते हुए पक्षी और नदियाँ भी क्या मित्र नहीं बन जाते ? [ अर्थात् क्या इन सबमे उसका चित्त नहीं बहल जाता ? ] वैराग्यभाग्यभाजः प्रसन्नमनसो निराशस्य । अप्रार्थितफलभोक्तुः पुंसो जन्मनि कृतार्थतेह स्यात् ॥ २३

प्रबोधसुधाकर संसारमें वैराग्यरूपी सौभाग्यके पात्र, प्रसन्नचित्त, विषयाशा- हीन और यथा-प्राप्त प्रारब्ध-फल भोगनेवाले पुरुषको इसी जन्ममें कृतार्थता प्राप्त हो जाती है। द्रव्यं पाणितलाच्च्युतं यदि भवेत्क्वापि प्रमादात्तदा शोकायाथ तदर्पितं श्रुतवते तोषाय च श्रेयसे । स्वातन्त्र्याद्विषयाः प्रयान्ति यदमी शोकाय ते स्युश्चिरं सन्त्यक्ताः स्वयमेव चेत्सुखमयं निःश्रेयसं तन्वते ॥८४॥ जिस प्रकार असावधानतावश हाथसे गिरा हुआ पदार्थ तो शोकका कारण होता है, किन्तु यदि उसे किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान कर दिया जाय तो वही सन्तोष और शुभ गतिका देने- वाला हो जाता है, उसी प्रकार यदि विषय अपने-आप छूटते हैं तब तो बहुत दिनोंतक खटकते रहते हैं; किन्तु यदि उन्हें अपनी इच्छासे छोड़ा जाय तो वे सुख और कल्याणके देनेवाले हो जाते हैं। विस्मृत्यात्मनिवासमुत्कटभवाटव्यां चिरं पर्यट- न्सन्तापत्रयदीर्घदावदहनज्वालावलीव्याकुलः । वल्गन्फल्गुषु सुप्रदीप्तनयनश्चेतःकुरङ्गो बला- दाशापाशवशीकृतोऽपि विषयव्याघ्रैर्मृषा हन्यते॥८५॥ अपने निवासस्थानको भूलकर चिरकालतक इस भयङ्कर संसार-वनमें भटकता और तापत्रयरूपी प्रचण्ड दावानलकी ज्वाला- २४

आत्मसिद्धि मालाओंसे व्याकुल होकर तुच्छ विषयोंके लिये उछलता-कूदता यह चमकीली आँखोंवाला चित्तरूपी हरिण आशा-पाशमें पड़ा हुआ ही विषयरूपी व्याघ्रोंद्वारा बेमौत मारा जाता है । आत्मसिद्धि उत्पन्नेऽपि विरागे विना प्रबोधं सुखं न स्यात्। स भवेद्गुरूपदेशात्तस्माद्गुरुमाश्रयेत्प्रथमम् ॥८६॥ वैराग्य हो जानेपर भी बिना बोधके आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती, बोध गुरुके उपदेशसे ही होता है, अतः सबसे पहले गुरु- देवकी शरणमें जाय । यद्यपि जलधेरुदकं यद्यपि वा प्रेरकोऽनिलस्तत्र । तदपि पिपासाकुलितः प्रतीक्षते चातको मेघम् ॥८७॥ यद्यपि [मेघमें रहनेवाला] समुद्रका जल सामने भरा पड़ा है, और उसे ऊपर उड़ानेवाला प्रेरक वायु भी वहाँ है परन्तु प्याससे तड़पता हुआ चातक मेघकी ही प्रतीक्षा करता है [इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र विराजमान है तथापि जिज्ञासुको उसका ज्ञान गुरुके द्वारा ही होता है ] । त्रेधा प्रतीतिरुक्ता शास्त्राद्गुरुतस्तथात्मनस्तत्र । शास्त्रप्रतीतिरादौ यद्वन्मुखतः गुरोऽस्तीति ॥८८॥

प्रबोधसुधाकर आत्माकी प्रतीति शास्त्र, गुरु और अपना अन्तःकरण इन तीन साधनोंसे होती बतलायी जाती है। उनमें प्रथम प्रतीति शास्त्रद्वारा होती है, जैसे पहले लोगोंसे सुनकर यह ज्ञान होता है कि 'गुड़ मीठा होता है'। अग्रे गुरुप्रतीतिर्दूराद्गुडदर्शनं यद्वत् । आत्मप्रतीतिरस्माद्गुडभक्षणजं सुखं यद्वत् ॥८९॥ तदुपरान्त गुड़को दूरसे देख लेनेके समान दूसरी प्रतीति गुरुद्वारा होती है और उससे गुड़भक्षणजनित सुखके समान आत्माकी [ साक्षात् ] प्रतीति होती है । रसगन्धरूपशब्दस्पर्शा अन्ये पदार्थाश्च । कस्मादनुभूयन्ते नो देहान्नेन्द्रियग्रामात् ॥९०॥ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तथा अन्यान्य पदार्थ किसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं ? देह या इन्द्रियोंद्वारा तो इनका अनुभव हो नहीं सकता । मृतदेहेन्द्रियवर्गो यतो न जानाति दाहजं दुःखम् । प्राणश्चेन्निद्रायां तस्करबाधां स किं वेत्ति ॥९१॥ क्योंकि मरे हुए प्राणीके देह और इन्द्रियाँ दाह-जन्य दुःख- का अनुभव नहीं करते । यदि कहा जाय कि प्राण ही इनका अनुभव करता है, तो सो जानेपर क्या उसे चोर आदिसे होनेवाली हानिका ज्ञान होता है ? २६

आत्मसिद्धि मनसो यदि वा विषयस्तद्युगपत्किं न जानाति । तस्य पराधीनत्वाद्यतः प्रमादस्य कस्त्राता ॥६३॥ यदि इन्हें मनका विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही अनुभव क्यों नहीं कर लेता ? वास्तवमें वह तो पराधीन है क्योंकि यदि उसे स्वतन्त्र माना जाय तो उसको प्रमादसे कौन बचा सकता था ? गाढध्वान्तगृहान्ततः क्षितितले दीपं निधायोज्ज्वलं पञ्चच्छिद्रमधोमुखं हि कलशं तस्योपरि स्थापयेत् । तद्वाह्ये परितोऽनुरन्ध्रममलां वीणां च कस्तूरिकां सद्रत्नं व्यजनं न्यसेच्च कलशाच्छिद्राध्वनिर्गच्छता ॥ तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा । किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥६४॥ एक गाढ़ अन्धकारमय घरके भीतर पृथ्वीपर एक स्फुट- प्रकाशमय दीपक रक्खे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला घड़ा नीचेको मुख करके स्थापित करे । उसके बाहर प्रत्येक छिद्रके सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तूरी, रत्न और पङ्खा रक्खे । २७

प्रबोधसुधाकर अब उस कलशके छिद्रोंसे बाहर निकलनेवाले तेजके अंशोंसे जो उन विविध पदार्थोंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है ? छिद्रोंसे, कलशसे, मृत्तिकासे, पात्रसे, तैलसे या बत्तीसे ? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होनेके कारण इनमेंसे किसीसे भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थोंके ज्ञानमें तो एकमात्र दीपकका प्रकाश ही शरण ( कारण ) है, इसी प्रकार शरीरमें भी प्रत्येक ज्ञानका आधार आत्मा ही है ।

मायासिद्धि

चिन्मात्रः परमात्मा ह्यपश्यदात्मानमात्मतया । अभवत्सोऽहंनामा तस्मादासीद्भिदो मूलम् ॥६५॥ चिन्मात्र परमात्माने ही प्रथम अपने आपको आपरूपसे देखा । तब उसका नाम 'अहंकार' हुआ । उसीसे भेदकी नींव पड़ी । द्वैधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै । तस्मादयमाकाशः स्त्रियैव परिपूर्यते सततम् ॥६६॥ सेयमपीक्षाञ्चक्रे ततो मनुष्या अजायन्त । इत्युपनिषदः प्राहुर्बृहदारण्यके याज्ञवल्क्योक्त्या ॥६७॥ बृहदारण्यक शाखामें याज्ञवल्क्यकी उक्तिद्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नीका आविर्भाव हो जाता है । तब यह २८