भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 86 में से

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प्रबोधसुधाकर आत्माकी प्रतीति शास्त्र, गुरु और अपना अन्तःकरण इन तीन साधनोंसे होती बतलायी जाती है। उनमें प्रथम प्रतीति शास्त्रद्वारा होती है, जैसे पहले लोगोंसे सुनकर यह ज्ञान होता है कि 'गुड़ मीठा होता है'। अग्रे गुरुप्रतीतिर्दूराद्गुडदर्शनं यद्वत् । आत्मप्रतीतिरस्माद्गुडभक्षणजं सुखं यद्वत् ॥८९॥ तदुपरान्त गुड़को दूरसे देख लेनेके समान दूसरी प्रतीति गुरुद्वारा होती है और उससे गुड़भक्षणजनित सुखके समान आत्माकी [ साक्षात् ] प्रतीति होती है । रसगन्धरूपशब्दस्पर्शा अन्ये पदार्थाश्च । कस्मादनुभूयन्ते नो देहान्नेन्द्रियग्रामात् ॥९०॥ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तथा अन्यान्य पदार्थ किसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं ? देह या इन्द्रियोंद्वारा तो इनका अनुभव हो नहीं सकता । मृतदेहेन्द्रियवर्गो यतो न जानाति दाहजं दुःखम् । प्राणश्चेन्निद्रायां तस्करबाधां स किं वेत्ति ॥९१॥ क्योंकि मरे हुए प्राणीके देह और इन्द्रियाँ दाह-जन्य दुःख- का अनुभव नहीं करते । यदि कहा जाय कि प्राण ही इनका अनुभव करता है, तो सो जानेपर क्या उसे चोर आदिसे होनेवाली हानिका ज्ञान होता है ? २६