प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मसिद्धि मालाओंसे व्याकुल होकर तुच्छ विषयोंके लिये उछलता-कूदता यह चमकीली आँखोंवाला चित्तरूपी हरिण आशा-पाशमें पड़ा हुआ ही विषयरूपी व्याघ्रोंद्वारा बेमौत मारा जाता है । आत्मसिद्धि उत्पन्नेऽपि विरागे विना प्रबोधं सुखं न स्यात्। स भवेद्गुरूपदेशात्तस्माद्गुरुमाश्रयेत्प्रथमम् ॥८६॥ वैराग्य हो जानेपर भी बिना बोधके आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती, बोध गुरुके उपदेशसे ही होता है, अतः सबसे पहले गुरु- देवकी शरणमें जाय । यद्यपि जलधेरुदकं यद्यपि वा प्रेरकोऽनिलस्तत्र । तदपि पिपासाकुलितः प्रतीक्षते चातको मेघम् ॥८७॥ यद्यपि [मेघमें रहनेवाला] समुद्रका जल सामने भरा पड़ा है, और उसे ऊपर उड़ानेवाला प्रेरक वायु भी वहाँ है परन्तु प्याससे तड़पता हुआ चातक मेघकी ही प्रतीक्षा करता है [इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र विराजमान है तथापि जिज्ञासुको उसका ज्ञान गुरुके द्वारा ही होता है ] । त्रेधा प्रतीतिरुक्ता शास्त्राद्गुरुतस्तथात्मनस्तत्र । शास्त्रप्रतीतिरादौ यद्वन्मुखतः गुरोऽस्तीति ॥८८॥