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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

प्रबोधसुधाकर आत्माकी प्रतीति शास्त्र, गुरु और अपना अन्तःकरण इन तीन साधनोंसे होती बतलायी जाती है। उनमें प्रथम प्रतीति शास्त्रद्वारा होती है, जैसे पहले लोगोंसे सुनकर यह ज्ञान होता है कि 'गुड़ मीठा होता है'। अग्रे गुरुप्रतीतिर्दूराद्गुडदर्शनं यद्वत् । आत्मप्रतीतिरस्माद्गुडभक्षणजं सुखं यद्वत् ॥८९॥ तदुपरान्त गुड़को दूरसे देख लेनेके समान दूसरी प्रतीति गुरुद्वारा होती है और उससे गुड़भक्षणजनित सुखके समान आत्माकी [ साक्षात् ] प्रतीति होती है । रसगन्धरूपशब्दस्पर्शा अन्ये पदार्थाश्च । कस्मादनुभूयन्ते नो देहान्नेन्द्रियग्रामात् ॥९०॥ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तथा अन्यान्य पदार्थ किसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं ? देह या इन्द्रियोंद्वारा तो इनका अनुभव हो नहीं सकता । मृतदेहेन्द्रियवर्गो यतो न जानाति दाहजं दुःखम् । प्राणश्चेन्निद्रायां तस्करबाधां स किं वेत्ति ॥९१॥ क्योंकि मरे हुए प्राणीके देह और इन्द्रियाँ दाह-जन्य दुःख- का अनुभव नहीं करते । यदि कहा जाय कि प्राण ही इनका अनुभव करता है, तो सो जानेपर क्या उसे चोर आदिसे होनेवाली हानिका ज्ञान होता है ? २६

आत्मसिद्धि मनसो यदि वा विषयस्तद्युगपत्किं न जानाति । तस्य पराधीनत्वाद्यतः प्रमादस्य कस्त्राता ॥६३॥ यदि इन्हें मनका विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही अनुभव क्यों नहीं कर लेता ? वास्तवमें वह तो पराधीन है क्योंकि यदि उसे स्वतन्त्र माना जाय तो उसको प्रमादसे कौन बचा सकता था ? गाढध्वान्तगृहान्ततः क्षितितले दीपं निधायोज्ज्वलं पञ्चच्छिद्रमधोमुखं हि कलशं तस्योपरि स्थापयेत् । तद्वाह्ये परितोऽनुरन्ध्रममलां वीणां च कस्तूरिकां सद्रत्नं व्यजनं न्यसेच्च कलशाच्छिद्राध्वनिर्गच्छता ॥ तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा । किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥६४॥ एक गाढ़ अन्धकारमय घरके भीतर पृथ्वीपर एक स्फुट- प्रकाशमय दीपक रक्खे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला घड़ा नीचेको मुख करके स्थापित करे । उसके बाहर प्रत्येक छिद्रके सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तूरी, रत्न और पङ्खा रक्खे । २७

प्रबोधसुधाकर अब उस कलशके छिद्रोंसे बाहर निकलनेवाले तेजके अंशोंसे जो उन विविध पदार्थोंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है ? छिद्रोंसे, कलशसे, मृत्तिकासे, पात्रसे, तैलसे या बत्तीसे ? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होनेके कारण इनमेंसे किसीसे भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थोंके ज्ञानमें तो एकमात्र दीपकका प्रकाश ही शरण ( कारण ) है, इसी प्रकार शरीरमें भी प्रत्येक ज्ञानका आधार आत्मा ही है ।

मायासिद्धि

चिन्मात्रः परमात्मा ह्यपश्यदात्मानमात्मतया । अभवत्सोऽहंनामा तस्मादासीद्भिदो मूलम् ॥६५॥ चिन्मात्र परमात्माने ही प्रथम अपने आपको आपरूपसे देखा । तब उसका नाम 'अहंकार' हुआ । उसीसे भेदकी नींव पड़ी । द्वैधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै । तस्मादयमाकाशः स्त्रियैव परिपूर्यते सततम् ॥६६॥ सेयमपीक्षाञ्चक्रे ततो मनुष्या अजायन्त । इत्युपनिषदः प्राहुर्बृहदारण्यके याज्ञवल्क्योक्त्या ॥६७॥ बृहदारण्यक शाखामें याज्ञवल्क्यकी उक्तिद्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नीका आविर्भाव हो जाता है । तब यह २८

मायासिद्धि आकाश ( आकाशके समान शून्यप्राय पुरुष ) सर्वदा स्त्रीके द्वारा ही पूर्ण होता है । उस स्त्रीने ईक्षण किया और तब उससे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । * चिरमानन्दानुभवात्सुषुप्तिरिव काप्यवस्थाभूत् । परमात्मनस्तु तस्मात्स्वप्नवदेवोत्थिता माया ॥६८॥ चिरकालीन आनन्दका अनुभव करते-करते परमात्माकी सुषुप्तिके समान कोई अवस्था हो गयी थी । उसीसे स्वप्नके समान मायाका आविर्भाव हुआ । सदसद्विलक्षणासौ परमात्मसदाश्रयानादिः । सा च गुणत्रयरूपा सूते सचराचरं विश्वम् ॥६९॥ यह माया सत् और असत्से विलक्षण है, अनादि है और सदैव परमात्माके आश्रय रहनेवाली है । यह त्रिगुणात्मिका माया ही चराचर जगत्को उत्पन्न करती है ।

  • इस श्लोकमें भगवान् शङ्कराचार्यने बृहदारण्यक उपनिषद्की इस श्रुतिका अभिप्राय ही अभिव्यक्त किया है— स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् । स हैतावानास यथा स्त्रीपुमा ँ सौ संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्य- स्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ता ँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ( बृह० १ । ४ । ३ ) २९

प्रबोधसुधाकर माया तावददृश्या दृश्यं कार्यं कथं जनयेत् । तन्तुभिरदृश्यरूपैः पटोऽत्र दृश्यः कथं भवति ॥१००॥ यदि कहें कि माया तो अव्यक्त है वह इस व्यक्त प्रपञ्चको कैसे उत्पन्न कर सकती है ? तो यह बताओ कि अदृश्यरूप सूक्ष्म तन्तुओंसे दृश्य ( स्थूल ) पट कैसे उत्पन्न हो जाता है ? स्वप्ने सुरतानुभवाच्छुक्रद्रावो यथा शुभे वसने । अनृतं रतं प्रबोधे वसनोपहतिर्भवेत्सत्या ॥१०१॥ स्वप्ने पुरुषः सत्यो योषिदसत्या तयोर्युतिश्च मृषा । शुक्रद्रावः सत्यस्तद्वत्प्रकृतेऽपि सम्भवति ॥१०२॥ स्वप्नमें स्त्री-सम्भोगका अनुभव होनेसे जिस प्रकार शुद्ध वस्त्रमें ही वीर्यपात हो जाता है [ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे व्यक्त जगत् हो जाता है ] जग जानेपर स्वप्नका रमण तो मिथ्या हो जाता है, किन्तु उससे वस्त्र सचमुच बिगड़ जाता है; स्वप्नावस्थामें भी पुरुष तो सत्य ही होता है किन्तु स्त्री असत्य और उन दोनोंका संयोग भी मिथ्या ही होता है, फिर भी वीर्यपात सत्य ही हो जाता है । इसी प्रकार प्रस्तुत विषय ( अदृश्य मायासे दृश्य प्रपञ्चके उत्पन्न होने ) में भी हो सकता है । एवमदृश्या माया तत्कार्यं जगदिदं दृश्यम् । माया तावदियं स्याद्या स्वविनाशेन हर्षदा भवति॥१०३॥ ३०

मायासिद्धि इसी प्रकार माया तो अदृश्य है किन्तु उसका कार्य यह जगत् दृश्यरूप है, और माया तो यही है कि वह अपने नाशसे ही आनन्द देनेवाली होती है। रजनीवातिदुरन्ता न लक्ष्यतेऽत्र स्वभावोऽस्याः। सौदामनीव नश्यति मुनिभिः सम्प्रेक्ष्यमाणैव ॥१०४॥ यह अन्धकारमयी रात्रिके समान दुरन्त है, इसके स्वभावका कुछ पता ही नहीं चलता; क्योंकि मुनिजनोंद्वारा विचारपूर्वक देखी जाते ही यह बिजलीके समान तुरन्त नष्ट हो जाती है। माया ब्रह्मोपगताविद्या जीवाश्रया प्रोक्ता। चिद्चिद्ग्रन्थिश्चेतस्तदक्षयं ज्ञेयमामोक्षात् ॥१०५॥ यह ब्रह्मके अधीन होनेसे 'माया' और जीवके आश्रित होनेसे 'अविद्या' कही जाती है। यह जड और चेतनकी ग्रन्थि ही 'चित्त' है। इसे जबतक मोक्ष न हो, अक्षय ही जानना चाहिये। घटमठकुड्यैरावृतमाकाशं तत्तदाह्वयं भवति। तद्वदविद्यावृतमिह चैतन्यं जीव इत्युक्तः ॥१०६॥ घट, मठ और भित्ति आदि उपाधियोंसे आवृत आकाश भी घटाकाश, मठाकाश आदि तदनुकूल नामवाला हो जाता है, उसी प्रकार अविद्यासे आवृत शुद्ध, चेतन ही जीव कहलाता है। ३१

प्रबोधसुधाकर ननु कथमावरणं स्यादज्ञानं ब्रह्मणो विशुद्धस्य । सूर्यस्येव तमिस्रं रात्रिभवं स्वप्रकाशस्य ॥१०७॥ शंका-अज्ञान विशुद्ध ब्रह्मका आवरण किस प्रकार कर सकता है ? रात्रिका अन्धकार भी क्या स्वयंप्रकाश सूर्यको ढक सकता है ? दिनकरकिरणोत्पन्नैर्मेघैराच्छाद्यते यथा सूर्यः । न खलु दिनस्य दिनत्वं तैर्विकृतं सान्द्रसङ्घातैः॥१०८॥ अज्ञानेन तथात्मा शुद्धोऽपि च्छाद्यते सुचिरम् । न परन्तु लोकसिद्धा प्राणिषु तच्चेतनाशक्तिः ॥१०९॥ समाधान-जिस प्रकार सूर्य अपनी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए मेघोंसे ढक जाता है किन्तु उस मेघ-समूहसे दिनके दिनत्वमें कोई विकार नहीं होता, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा भी चिरकालतक अज्ञानसे आवृत तो रहता है, परन्तु प्राणियोंमें जो लोक-प्रसिद्ध चेतनाशक्ति है उसका आच्छादन नहीं होता । लिङ्गदेहादि-निरूपण स्थूलशरीरस्यान्तर्लिङ्गशरीरं च तस्यान्तः । कारणमस्याप्यन्तस्ततो महाकारणं तुर्यम् ॥११०॥ स्थूल शरीरके भीतर लिङ्गदेह है, उसके भीतर कारणशरीर है और उसके भी भीतर महाकारण नामक तुरीय आत्मा है । ३२

लिङ्गदेहादि-निरूपण स्थूलं निरूपितं प्रागधुना सूक्ष्मादितो ब्रूमः । अंगुष्ठमात्रः पुरुषः श्रुतिरिति यत्प्राह तत्सूक्ष्मम् ॥१११॥ स्थूल शरीरका तो पहले निरूपण हो चुका, अब सूक्ष्मादिका वर्णन करते हैं । जिसको श्रुतिने 'अंगुष्ठमात्र पुरुष' कहा है वही यह सूक्ष्म शरीर है । सूक्ष्माणि महाभूतान्यसवः पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चैव । षोडशमन्तःकरणं तत्सङ्घातो हि लिङ्गतनुः ॥११२॥ पाँच सूक्ष्म महाभूत, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और सोलहवाँ अन्तःकरण-इन तत्त्वोंके समूहका नाम ही 'सूक्ष्म शरीर' है । तत्कारणं स्मृतं यत्तस्यान्तर्वासनाजालम् । तस्य प्रवृत्तिहेतुर्बुद्ध्याश्रयमत्र तुर्यं स्यात् ॥११३॥ उस लिंगदेहके अन्दर जो वासनाओंका समूह है वही 'कारण-शरीर' कहलाता है । उसकी भी प्रवृत्तियोंके कारण और बुद्धिके आश्रयको 'तुर्य' ( महाकारण ) समझना चाहिये । तत्सारभूतबुद्धौ यत्प्रतिफलितं तु शुद्धचैतन्यम् । जीवः स उक्त आद्यैर्योऽहमिति स्फूर्तिकृद्वपुषि ॥११४॥ ३३ २

प्रबोधसुधाकर लिंगदेहकी साररूपा बुद्धिमें प्रतिबिम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसीको पूर्वाचार्योंने जीव कहा है, जिसके कारण शरीरमें 'मैं' इस प्रकारकी स्फूर्ति होती है । चलतरतरङ्गसङ्गात्प्रतिविम्बं भास्करस्य च चलं स्यात् । अस्ति तथा चञ्चलता चैतन्ये चित्तचाञ्चल्यात् ॥११५॥ जिस प्रकार अति चञ्चल तरंगोंके कारण सूर्यका प्रतिबिम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्तकी चञ्चलतासे चैतन्यमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । नन्वर्कप्रतिविम्बः सलिलादिषु यः स चावभासयति । किमितरपदार्थनिवहं प्रतिविम्बोऽप्यात्मनस्तद्वत् ११६ शंका-जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब तो अन्यान्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है, क्या आत्म-प्रतिबिम्ब भी उसीके समान दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है ? प्रतिफलितं यत्तेजः सवितुः कांस्यादिपात्रेषु । तदनुप्रविष्टमन्तर्गृहमन्यार्थान्प्रकाशयति ॥११७॥ चित्प्रतिविम्बस्तद्वद्बुद्धिषु यो जीवतां प्राप्तः। नेत्रादीन्द्रियमार्गैर्बहिरर्थान् सोऽवभासयति ॥११८॥ ३४

अद्वैत समाधान-काँसी आदिके पात्रोंमें जो सूर्यका तेज प्रतिबिम्बित होता है, वह घरके भीतर प्रवेश कर अन्य पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है, उसी प्रकार बुद्धिमें पड़ा हुआ चेतनका प्रतिबिम्ब जो जीव-भावको प्राप्त हुआ है वह नेत्रादि इन्द्रियोंके द्वारा बाह्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है । अद्वैत तदिदं य एवमार्यो वेद ब्रह्माहमस्मीति । स इदं सर्वं च स्यात्तस्य हि देवाश्च नेशतेऽभूत्यै॥११९॥ एषां स भवत्यात्मा योऽन्यामथ देवतामुपास्तेऽन्यः । अहमन्योऽसावन्यश्चेत्थं नो वेद पशुवत्सः ॥१२०॥ इत्युपनिषदामुक्तिस्तथा श्रुतिर्भगवदुक्तिश्च । ज्ञानी त्वात्मैवेयं मतिर्ममेत्यत्र युक्तिरपि ॥१२१॥ 'वह ब्रह्म मैं हूँ' जो भद्र पुरुष ऐसा जानता है वह यह सम्पूर्ण विश्वरूप हो जाता है, उसका पराभव ( ब्रह्मात्मभावसे पतन ) करनेमें देवगण भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा हो जाता है । तथा जो आत्मासे भिन्न किसी और देवकी उपासना करता है और यह समझता है कि 'मैं अन्य हूँ और यह उपास्यदेव अन्य है, उसे आत्मज्ञान नहीं है, वह पशुके समान है'—ऐसी उपनिषद् तथा श्रुतिकी उक्ति है; तथा भगवान्ने भी ३५

प्रबोधसुधाकर कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है।' इसके अतिरिक्त इस विषयमें यह युक्ति भी है— ऋजु वक्रं वा काष्ठं हुताशदग्धं सदग्मितां याति । तत्किं हस्तग्राह्यं ऋजुवक्राकारसत्त्वेऽपि ॥१२२॥ अग्निसे दग्ध हो जानेपर टेढ़ी या सीधी जैसी भी लकड़ी हो, अग्निरूप हो जाती है; उसमें सीधा या टेढ़ा आकार रहता भी है तथापि क्या उसे हाथसे छू सकते हैं ? एवं य आत्मनिष्ठो ह्यात्माकारश्च जायते पुरुषः। देहीव दृश्यतेऽसौ परं त्वसौ केवलो ह्यात्मा ॥१२३॥ इसी प्रकार आत्मनिष्ठ पुरुष भी आत्माकार हो जाता है; वह देही-सा प्रतीत तो होता है तथापि होता शुद्ध आत्मामात्र ही है । प्रतिफलति भानुरेकोऽनेकशरावोदकेषु यथा । तद्वदसौ परमात्मा ह्येकोऽनेकेषु देहेषु ॥१२४॥ जिस प्रकार जलके अनेक शकोरोंमें एक ही सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसो प्रकार यह एक ही परमात्मा अनेक देहोंमें भास रहा है । दैवादेकशरावे भग्ने किं वा विलीयते सूर्यः । प्रतिबिम्बचञ्चलत्वादर्कः किं चञ्चलो भवति ॥१२५॥ ३६

अद्वैत दैवयोगसे यदि एक शकोरा टूट जाय तो क्या उससे सूर्यका लय हो जाता है ? जलकी चञ्चलताके कारण प्रतिबिम्बके चलायमान होनेसे क्या सूर्य भी चञ्चल हो जाता है ? स्वव्यापारं कुरुते यथैकसवितुः प्रकाशेन । तद्वच्चराचरमिदं ह्येकात्मसत्तया चलति ॥१२६॥ यह चराचर जगत् जैसे एक ही सूर्यके प्रकाशमें अपने समस्त कार्य करता है, उसी प्रकार यह एक ही आत्माकी सत्तासे गतिशील हो रहा है । येनोदकेन कदलीचम्पकजात्यादयः प्रवर्धन्ते । मूलकपलाण्डुलशुनास्तेनैवैते विभिन्नरसगन्धाः॥१२७॥ जिस जलसे केला, चम्पा और जाती आदिके पौधे बढ़ते हैं, उसीसे सर्वथा भिन्न रस और गन्धवाले मूली, प्याज और लहसुन आदि भी पोषित होते हैं । एको हि सूत्रधारः काष्ठप्रकृतीरनेकशो युगपत् । स्तम्भाग्रपट्टिकायां नर्तयतीह प्रगूढतया ॥१२८॥ एक ही सूत्रधार स्वयं छिपा रहकर काष्ठकी अनेक पुतलियों- को स्तम्भके अग्रपटपर एक साथ नचाता रहता है । ३७

प्रबोधसुधाकर गुडखण्डशर्कराद्या भिन्नाः स्युर्विकृतयो यथैकेक्षोः । केयूरकङ्कणाद्या यथैकहेम्नो भिदाश्च पृथक् ॥१२९॥ एवं पृथक्स्वभावं पृथगाकारं पृथग्वृत्ति । जगदुच्चावचमुच्चैरेकेनैवात्मना चलति ॥१३०॥ जिस प्रकार एक ही ईखके गुड़, खाँड और शक्कर आदि नाना प्रकारके विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्णके कङ्कण, केयूर आदि पृथक्-पृथक् अनेक भेद होते हैं, उसी प्रकार भिन्न- भिन्न स्वभाव, आकार और आचरणवाला उच्च और नीच जगत् एक ही आत्माकी सत्तासे प्रवृत्त हो रहा है । स्कन्धधृतसिद्धमन्नं यावन्नाश्नाति मार्गगस्तावत् । स्पर्शभयक्षुत्पीडे तस्मिन्भुक्ते न ते भवतः ॥१३१॥ मार्गमें जानेवाला पुरुष, जबतक कन्धेपर रक्खे हुए बने- बनाये भोजनको नहीं खाता, तभीतक उसके छूनेका भय और क्षुधाकी पीड़ा रहती है; उसको खा लेनेपर वे दोनों ही नहीं रहते । मानुषमातङ्गमहिषश्वसूकरादिष्वनुस्यूतम् । यः पश्यति जगदीशं स एव भुङ्क्तेऽद्वयानन्दम् ॥१३२॥ जो पुरुष हाथी, भैंसे, कुत्ते और शूकर आदिमें एक ही जगदीश्वरको व्याप्त देखता है, वही अद्वैतानन्दका भोग करता है । ३८

कर्तृत्व-भोक्तृत्व कर्तृत्व-भोक्तृत्व यद्वत्सूर्येऽभ्युदिते स्वव्यवहारं जनः कुरुते । तं न करोति विवस्वान्न कारयति तद्वदात्मापि॥१३३॥ सूर्यके उदय होनेपर जैसे मनुष्य ही अपने-अपने कार्योंको करते हैं, सूर्य कुछ भी नहीं करता-कराता, वैसे ही आत्मा भी न कुछ करता है, न कराता है । लोहे हुतभुग्व्याप्ते लोहान्तरताड्यमानेऽपि । तस्यान्तर्गतवह्नेः किं स्यान्निर्घातजं दुःखम् ॥१३४॥ अग्निसे व्याप्त हुए लोहेको दूसरे लोहेसे पीटनेपर क्या उसके भीतर स्थित अग्निको भी कोई चोट लगती है ? निष्ठुरकुठारघातैः काष्ठे सञ्छिद्यमानेऽपि । अन्तर्वर्ती वह्निः किं घातैश्छिद्यते तद्वत् ॥१३५॥ कठोर कुठारसे काठको काटनेपर क्या उसके घात-प्रतिघातसे काष्ठके भीतर रहनेवाला अग्नि भी कट जाता है ? तनुसम्बन्धाज्जातैः सुखदुःखैर्लिप्यते नात्मा । ब्रूते श्रुतिरपि भूयोऽनश्नन्नन्योऽभिचाकशीत्यादि।१३६। इसी प्रकार शरीर-सम्बन्धसे प्राप्त हुए सुख-दुःखोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता । इस विषयमें श्रुति भी बारंबार कहती ३९

प्रबोधसुधाकर है कि 'अन्य ( आत्मा ) तो कर्म-फलको न भोगता हुआ केवल साक्षीभावसे देखा ही करता है ।' निशि वेश्मनि प्रदीपे दीप्यति चौरस्तु वित्तमपहरति । ईरयति वारयति वा तं दीपः किं तथात्मापि ॥१३७॥ रात्रिके समय दीपकके जलते रहनेपर चोर घरमेंसे धन चुराकर ले जाता है; क्या दीपक उसे इसके लिये प्रेरित करता या रोकता है ? [नहीं] । इसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि इन्द्रियों- को उनके व्यापारमें न नियुक्त करता है, न वियुक्त । गेहान्ते दैववशात्कस्मिंश्चित्समुदिते विपन्ने वा। दीपस्तुष्यत्यथवा खिद्यति किं तद्वदात्मापि ॥१३८॥ घरके भीतर दैवयोगसे किसीके जन्मने अथवा मर जानेपर क्या दीपकको किसी प्रकारका हर्ष या खेद होता है ? [ नहीं ] । उसी प्रकार आत्मा भी चित्तादिके हर्ष-शोकमें सर्वथा असंग और उदासीन साक्षीमात्र ही रहता है । स्वप्रकाशता रविचन्द्रवह्निदीपप्रमुखाः स्वपरप्रकाशाः स्युः । यद्यपि तथाप्यमीभिः प्रकाशते क्वापि नैवात्मा॥१३६॥ यद्यपि सूर्य, चन्द्र, अग्नि और दीपक आदि अपने और पराये सबके प्रकाशक हैं, तथापि इनसे आत्मा कभी प्रकाशित नहीं होता । ४०

स्वप्रकाशता चक्षुर्द्वारैव स्यात्परात्मना भानमेतेषाम् । यद्वा तेऽपि पदार्था न ज्ञायन्तेऽथ केवलालोकात् ॥ १४०॥ तत्राप्यक्षिद्वारा सहायभूतो न चेदात्मा । नो चेत्सत्यालोके पश्यत्यन्धः कथं नार्थान् ॥ १४१॥ तथा इनका भान भी चक्षु-इन्द्रियद्वारा परमात्मासे ही होता है । अथवा यों कहो कि यदि नेत्रेन्द्रियद्वारा आत्मा सहायक न होता तो केवल प्रकाशसे ही इन पदार्थोंका भी ज्ञान नहीं हो सकता था । यदि हो सकता तो प्रकाशके रहते हुए भी अन्धा पुरुष पदार्थोंको क्यों नहीं देख लेता ? सत्यात्मन्यपि किं नो ज्ञानं तच्चेन्द्रियान्तरेण स्यात् । अन्धे दृक्प्रतिबन्धे करसम्बन्धे पदार्थभानं हि ॥ १४२॥ यदि कहो कि आत्माके रहते हुए [ नेत्रेन्द्रियके अभावमें भी ] अन्धे मनुष्यको पदार्थका ज्ञान क्यों नहीं होता ? सो उसे अन्य इन्द्रियोंसे ज्ञान होता ही है, क्योंकि अन्धे मनुष्यको नेत्र बन्द होनेपर भी हाथसे छूकर पदार्थका ज्ञान हो ही जाता है । जानाति येन सर्वं केन च तं वा विजानीयात् । इत्युपनिषदामुक्तिर्बुद्ध्यत आत्मात्मना तस्मात् ॥ १४३॥ उपनिषदोंका कथन है कि 'जिसके द्वारा सब कुछ जाना जाता है उस ( आत्मा ) को किससे जाने ?' अतः आत्मा तो आत्मासे ही जाना जाता है । ४१

विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है,

प्रबोधसुधाकर नादानुसन्धान यावत्क्षणं क्षणार्धं स्वरूपपरिचिन्तनं क्रियते । तावद्दक्षिणकर्णे त्वनाहतः श्रूयते शब्दः ॥१४४॥ जब एक क्षण अथवा आधे क्षणके लिये भी स्वरूपका चिन्तन किया जाता है तब सीधे कानमें अनाहत-शब्द सुनायी देता है । सिद्ध्यारम्भस्थिरताविश्रमविश्वासबीजशुद्धीनाम् । उपलक्षणं हि मनसः परमं नादानुसन्धानम् ॥१४५॥ नादानुसन्धान मनके लिये सिद्धिके आरम्भ, स्थिरता, विश्राम, विश्वास और वीर्य-शुद्धिका बतलानेवाला परम चिह्न है । भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहतनादे मनः क्षणं रमते । किं पुनरनाहतेऽस्मिन्मधुमधुरेऽखण्डिते स्वच्छे ॥१४६॥ मन तो भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदिके आघातजन्य नादों- में भी एक क्षणके लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नादकी तो बात ही क्या है ? चित्तं विषयोपरमाद्यथा यथा याति नैश्चल्यम् । वेणोरिव दीर्घतरस्तथा तथा श्रूयते नादः ॥१४७॥ विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरीके शब्दके समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है । ४२

मनोलय नादाभ्यन्तरवर्ति ज्योतिर्यद्वर्त्तते हि चिरम् । तत्र मनो लीनं चेन्न पुनः संसारबन्धाय ॥१४८॥ नादके भीतर रहनेवाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकालतक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता । परमानन्दानुभवात्सुचिरं नादानुसन्धानात् । श्रेष्ठश्चित्तलयोऽयं सत्स्वन्यलयेष्वनेकेषु ॥१४९॥ यद्यपि लयके और भी अनेक उपाय हैं तथापि जो चित्तलय दीर्घ कालतक नादानुसन्धान करते हुए परमानन्दका अनुभव होनेसे प्राप्त होता है वह सर्वोत्तम है ।

मनोलय

संसारतापतप्तं नानायोनिभ्रमात्परिश्रान्तम् । लब्ध्वा परमानन्दं न चलति चेतः कदा क्वापि ॥१५०॥ संसार-तापसे सन्तप्त और नाना योनियोंमें आने-जानेसे श्रान्त ( थका ) हुआ चित्त परमानन्दको प्राप्त करके फिर कभी चञ्चल नहीं होता । अद्वैतानन्दभरात्किमिदं कोऽहं च कस्याहम् । इति मन्थरतां यातं यदा तदा मूर्च्छितं चेतः ॥१५१॥ ४३

प्रबोधसुधाकर अद्वैतानन्दके उद्वेगसे जब 'यह क्या है ? मैं कौन हूँ ! और किसका हूँ ?' ऐसी जिज्ञासासे चित्त सुस्त पड़ जाता है तो [ अन्तमें ] वह मूच्छित हो जाता है । चिरतरमात्मानुभवादात्माकारं प्रजायते चेतः। सरिदिव सागरयाता समुद्रभावं प्रयात्युच्चैः ॥१५२॥ चिरकालतक आत्मानुभव करते रहनेसे चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्रको जानेवाली नदी अन्तमें पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है । आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं नापेक्षते पुनर्विषयान् । क्षीरादुद्धृतमाज्यं यथा पुनः क्षीरतां न यातीह ॥१५३॥ आत्मस्वरूपमें लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयोंकी इच्छा नहीं करता, जैसे दूधमेंसे निकाला हुआ घी फिर दुग्धभावको प्राप्त नहीं हो सकता । दृष्टौ द्रष्टरि दृश्ये यदनुस्यूतं च भानमात्रं स्यात् । तत्रोपक्षीर्णं चेच्चित्तं तन्मूर्च्छितं भवति ॥१५४॥ दृष्टि, द्रष्टा और दृश्यमें जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्च्छित हो जाता है । याति स्वसम्मुखत्वं दृङ्मात्रं वा यदा तदा भवति । दृश्यद्रष्टृविभेदो ह्यसम्मुखेऽस्मिन् तद्भवति ॥१५५॥ ४४

प्रबोध जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टाका भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहनेपर ऐसा नहीं होता। एकस्मिन्दृङ्मात्रे त्रेधा द्रष्ट्रादिकं हि समुदेति । त्रिविधे तस्मिँल्लीने दृङ्मात्रं शिष्यते पश्चात् ॥१५६॥ एक दृङ्मात्रमें ही द्रष्टा आदि त्रिपुटीका उदय होता है, उस त्रिपुटीका लय हो जानेपर पीछे केवल दृङ्मात्र ही रह जाता है। दर्पणतः प्राक्पश्चादस्ति मुखं प्रतिमुखं तदाभाति । आदर्शेऽपि च नष्टे मुखमस्ति मुखे तथैवात्मा॥१५७॥ दर्पणसे पूर्व और उसके पीछे भी मुख होता है तभी उसमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण यदि टूट जाय तब भी मुख तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, इसी प्रकार आत्मा उपाधिके नष्ट हो जानेपर भी रहता ही है। प्रबोध माधुर्यं गुडपिण्डे यत्तत्तस्यांशकेऽणुमात्रेऽपि । एवं न पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥१५८॥ गुड़के पिण्डमें जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कणमें भी होती है, इस प्रकार गुड़त्व और मधुरत्वमें कोई भेद नहीं है। ४५