प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर लिंगदेहकी साररूपा बुद्धिमें प्रतिबिम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसीको पूर्वाचार्योंने जीव कहा है, जिसके कारण शरीरमें 'मैं' इस प्रकारकी स्फूर्ति होती है । चलतरतरङ्गसङ्गात्प्रतिविम्बं भास्करस्य च चलं स्यात् । अस्ति तथा चञ्चलता चैतन्ये चित्तचाञ्चल्यात् ॥११५॥ जिस प्रकार अति चञ्चल तरंगोंके कारण सूर्यका प्रतिबिम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्तकी चञ्चलतासे चैतन्यमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । नन्वर्कप्रतिविम्बः सलिलादिषु यः स चावभासयति । किमितरपदार्थनिवहं प्रतिविम्बोऽप्यात्मनस्तद्वत् ११६ शंका-जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब तो अन्यान्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है, क्या आत्म-प्रतिबिम्ब भी उसीके समान दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है ? प्रतिफलितं यत्तेजः सवितुः कांस्यादिपात्रेषु । तदनुप्रविष्टमन्तर्गृहमन्यार्थान्प्रकाशयति ॥११७॥ चित्प्रतिविम्बस्तद्वद्बुद्धिषु यो जीवतां प्राप्तः। नेत्रादीन्द्रियमार्गैर्बहिरर्थान् सोऽवभासयति ॥११८॥ ३४