प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्वैत समाधान-काँसी आदिके पात्रोंमें जो सूर्यका तेज प्रतिबिम्बित होता है, वह घरके भीतर प्रवेश कर अन्य पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है, उसी प्रकार बुद्धिमें पड़ा हुआ चेतनका प्रतिबिम्ब जो जीव-भावको प्राप्त हुआ है वह नेत्रादि इन्द्रियोंके द्वारा बाह्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है । अद्वैत तदिदं य एवमार्यो वेद ब्रह्माहमस्मीति । स इदं सर्वं च स्यात्तस्य हि देवाश्च नेशतेऽभूत्यै॥११९॥ एषां स भवत्यात्मा योऽन्यामथ देवतामुपास्तेऽन्यः । अहमन्योऽसावन्यश्चेत्थं नो वेद पशुवत्सः ॥१२०॥ इत्युपनिषदामुक्तिस्तथा श्रुतिर्भगवदुक्तिश्च । ज्ञानी त्वात्मैवेयं मतिर्ममेत्यत्र युक्तिरपि ॥१२१॥ 'वह ब्रह्म मैं हूँ' जो भद्र पुरुष ऐसा जानता है वह यह सम्पूर्ण विश्वरूप हो जाता है, उसका पराभव ( ब्रह्मात्मभावसे पतन ) करनेमें देवगण भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा हो जाता है । तथा जो आत्मासे भिन्न किसी और देवकी उपासना करता है और यह समझता है कि 'मैं अन्य हूँ और यह उपास्यदेव अन्य है, उसे आत्मज्ञान नहीं है, वह पशुके समान है'—ऐसी उपनिषद् तथा श्रुतिकी उक्ति है; तथा भगवान्ने भी ३५