प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
अद्वैत समाधान-काँसी आदिके पात्रोंमें जो सूर्यका तेज प्रतिबिम्बित होता है, वह घरके भीतर प्रवेश कर अन्य पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है, उसी प्रकार बुद्धिमें पड़ा हुआ चेतनका प्रतिबिम्ब जो जीव-भावको प्राप्त हुआ है वह नेत्रादि इन्द्रियोंके द्वारा बाह्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है । अद्वैत तदिदं य एवमार्यो वेद ब्रह्माहमस्मीति । स इदं सर्वं च स्यात्तस्य हि देवाश्च नेशतेऽभूत्यै॥११९॥ एषां स भवत्यात्मा योऽन्यामथ देवतामुपास्तेऽन्यः । अहमन्योऽसावन्यश्चेत्थं नो वेद पशुवत्सः ॥१२०॥ इत्युपनिषदामुक्तिस्तथा श्रुतिर्भगवदुक्तिश्च । ज्ञानी त्वात्मैवेयं मतिर्ममेत्यत्र युक्तिरपि ॥१२१॥ 'वह ब्रह्म मैं हूँ' जो भद्र पुरुष ऐसा जानता है वह यह सम्पूर्ण विश्वरूप हो जाता है, उसका पराभव ( ब्रह्मात्मभावसे पतन ) करनेमें देवगण भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा हो जाता है । तथा जो आत्मासे भिन्न किसी और देवकी उपासना करता है और यह समझता है कि 'मैं अन्य हूँ और यह उपास्यदेव अन्य है, उसे आत्मज्ञान नहीं है, वह पशुके समान है'—ऐसी उपनिषद् तथा श्रुतिकी उक्ति है; तथा भगवान्ने भी ३५
प्रबोधसुधाकर कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है।' इसके अतिरिक्त इस विषयमें यह युक्ति भी है— ऋजु वक्रं वा काष्ठं हुताशदग्धं सदग्मितां याति । तत्किं हस्तग्राह्यं ऋजुवक्राकारसत्त्वेऽपि ॥१२२॥ अग्निसे दग्ध हो जानेपर टेढ़ी या सीधी जैसी भी लकड़ी हो, अग्निरूप हो जाती है; उसमें सीधा या टेढ़ा आकार रहता भी है तथापि क्या उसे हाथसे छू सकते हैं ? एवं य आत्मनिष्ठो ह्यात्माकारश्च जायते पुरुषः। देहीव दृश्यतेऽसौ परं त्वसौ केवलो ह्यात्मा ॥१२३॥ इसी प्रकार आत्मनिष्ठ पुरुष भी आत्माकार हो जाता है; वह देही-सा प्रतीत तो होता है तथापि होता शुद्ध आत्मामात्र ही है । प्रतिफलति भानुरेकोऽनेकशरावोदकेषु यथा । तद्वदसौ परमात्मा ह्येकोऽनेकेषु देहेषु ॥१२४॥ जिस प्रकार जलके अनेक शकोरोंमें एक ही सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसो प्रकार यह एक ही परमात्मा अनेक देहोंमें भास रहा है । दैवादेकशरावे भग्ने किं वा विलीयते सूर्यः । प्रतिबिम्बचञ्चलत्वादर्कः किं चञ्चलो भवति ॥१२५॥ ३६
अद्वैत दैवयोगसे यदि एक शकोरा टूट जाय तो क्या उससे सूर्यका लय हो जाता है ? जलकी चञ्चलताके कारण प्रतिबिम्बके चलायमान होनेसे क्या सूर्य भी चञ्चल हो जाता है ? स्वव्यापारं कुरुते यथैकसवितुः प्रकाशेन । तद्वच्चराचरमिदं ह्येकात्मसत्तया चलति ॥१२६॥ यह चराचर जगत् जैसे एक ही सूर्यके प्रकाशमें अपने समस्त कार्य करता है, उसी प्रकार यह एक ही आत्माकी सत्तासे गतिशील हो रहा है । येनोदकेन कदलीचम्पकजात्यादयः प्रवर्धन्ते । मूलकपलाण्डुलशुनास्तेनैवैते विभिन्नरसगन्धाः॥१२७॥ जिस जलसे केला, चम्पा और जाती आदिके पौधे बढ़ते हैं, उसीसे सर्वथा भिन्न रस और गन्धवाले मूली, प्याज और लहसुन आदि भी पोषित होते हैं । एको हि सूत्रधारः काष्ठप्रकृतीरनेकशो युगपत् । स्तम्भाग्रपट्टिकायां नर्तयतीह प्रगूढतया ॥१२८॥ एक ही सूत्रधार स्वयं छिपा रहकर काष्ठकी अनेक पुतलियों- को स्तम्भके अग्रपटपर एक साथ नचाता रहता है । ३७
प्रबोधसुधाकर गुडखण्डशर्कराद्या भिन्नाः स्युर्विकृतयो यथैकेक्षोः । केयूरकङ्कणाद्या यथैकहेम्नो भिदाश्च पृथक् ॥१२९॥ एवं पृथक्स्वभावं पृथगाकारं पृथग्वृत्ति । जगदुच्चावचमुच्चैरेकेनैवात्मना चलति ॥१३०॥ जिस प्रकार एक ही ईखके गुड़, खाँड और शक्कर आदि नाना प्रकारके विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्णके कङ्कण, केयूर आदि पृथक्-पृथक् अनेक भेद होते हैं, उसी प्रकार भिन्न- भिन्न स्वभाव, आकार और आचरणवाला उच्च और नीच जगत् एक ही आत्माकी सत्तासे प्रवृत्त हो रहा है । स्कन्धधृतसिद्धमन्नं यावन्नाश्नाति मार्गगस्तावत् । स्पर्शभयक्षुत्पीडे तस्मिन्भुक्ते न ते भवतः ॥१३१॥ मार्गमें जानेवाला पुरुष, जबतक कन्धेपर रक्खे हुए बने- बनाये भोजनको नहीं खाता, तभीतक उसके छूनेका भय और क्षुधाकी पीड़ा रहती है; उसको खा लेनेपर वे दोनों ही नहीं रहते । मानुषमातङ्गमहिषश्वसूकरादिष्वनुस्यूतम् । यः पश्यति जगदीशं स एव भुङ्क्तेऽद्वयानन्दम् ॥१३२॥ जो पुरुष हाथी, भैंसे, कुत्ते और शूकर आदिमें एक ही जगदीश्वरको व्याप्त देखता है, वही अद्वैतानन्दका भोग करता है । ३८
कर्तृत्व-भोक्तृत्व कर्तृत्व-भोक्तृत्व यद्वत्सूर्येऽभ्युदिते स्वव्यवहारं जनः कुरुते । तं न करोति विवस्वान्न कारयति तद्वदात्मापि॥१३३॥ सूर्यके उदय होनेपर जैसे मनुष्य ही अपने-अपने कार्योंको करते हैं, सूर्य कुछ भी नहीं करता-कराता, वैसे ही आत्मा भी न कुछ करता है, न कराता है । लोहे हुतभुग्व्याप्ते लोहान्तरताड्यमानेऽपि । तस्यान्तर्गतवह्नेः किं स्यान्निर्घातजं दुःखम् ॥१३४॥ अग्निसे व्याप्त हुए लोहेको दूसरे लोहेसे पीटनेपर क्या उसके भीतर स्थित अग्निको भी कोई चोट लगती है ? निष्ठुरकुठारघातैः काष्ठे सञ्छिद्यमानेऽपि । अन्तर्वर्ती वह्निः किं घातैश्छिद्यते तद्वत् ॥१३५॥ कठोर कुठारसे काठको काटनेपर क्या उसके घात-प्रतिघातसे काष्ठके भीतर रहनेवाला अग्नि भी कट जाता है ? तनुसम्बन्धाज्जातैः सुखदुःखैर्लिप्यते नात्मा । ब्रूते श्रुतिरपि भूयोऽनश्नन्नन्योऽभिचाकशीत्यादि।१३६। इसी प्रकार शरीर-सम्बन्धसे प्राप्त हुए सुख-दुःखोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता । इस विषयमें श्रुति भी बारंबार कहती ३९
प्रबोधसुधाकर है कि 'अन्य ( आत्मा ) तो कर्म-फलको न भोगता हुआ केवल साक्षीभावसे देखा ही करता है ।' निशि वेश्मनि प्रदीपे दीप्यति चौरस्तु वित्तमपहरति । ईरयति वारयति वा तं दीपः किं तथात्मापि ॥१३७॥ रात्रिके समय दीपकके जलते रहनेपर चोर घरमेंसे धन चुराकर ले जाता है; क्या दीपक उसे इसके लिये प्रेरित करता या रोकता है ? [नहीं] । इसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि इन्द्रियों- को उनके व्यापारमें न नियुक्त करता है, न वियुक्त । गेहान्ते दैववशात्कस्मिंश्चित्समुदिते विपन्ने वा। दीपस्तुष्यत्यथवा खिद्यति किं तद्वदात्मापि ॥१३८॥ घरके भीतर दैवयोगसे किसीके जन्मने अथवा मर जानेपर क्या दीपकको किसी प्रकारका हर्ष या खेद होता है ? [ नहीं ] । उसी प्रकार आत्मा भी चित्तादिके हर्ष-शोकमें सर्वथा असंग और उदासीन साक्षीमात्र ही रहता है । स्वप्रकाशता रविचन्द्रवह्निदीपप्रमुखाः स्वपरप्रकाशाः स्युः । यद्यपि तथाप्यमीभिः प्रकाशते क्वापि नैवात्मा॥१३६॥ यद्यपि सूर्य, चन्द्र, अग्नि और दीपक आदि अपने और पराये सबके प्रकाशक हैं, तथापि इनसे आत्मा कभी प्रकाशित नहीं होता । ४०
स्वप्रकाशता चक्षुर्द्वारैव स्यात्परात्मना भानमेतेषाम् । यद्वा तेऽपि पदार्था न ज्ञायन्तेऽथ केवलालोकात् ॥ १४०॥ तत्राप्यक्षिद्वारा सहायभूतो न चेदात्मा । नो चेत्सत्यालोके पश्यत्यन्धः कथं नार्थान् ॥ १४१॥ तथा इनका भान भी चक्षु-इन्द्रियद्वारा परमात्मासे ही होता है । अथवा यों कहो कि यदि नेत्रेन्द्रियद्वारा आत्मा सहायक न होता तो केवल प्रकाशसे ही इन पदार्थोंका भी ज्ञान नहीं हो सकता था । यदि हो सकता तो प्रकाशके रहते हुए भी अन्धा पुरुष पदार्थोंको क्यों नहीं देख लेता ? सत्यात्मन्यपि किं नो ज्ञानं तच्चेन्द्रियान्तरेण स्यात् । अन्धे दृक्प्रतिबन्धे करसम्बन्धे पदार्थभानं हि ॥ १४२॥ यदि कहो कि आत्माके रहते हुए [ नेत्रेन्द्रियके अभावमें भी ] अन्धे मनुष्यको पदार्थका ज्ञान क्यों नहीं होता ? सो उसे अन्य इन्द्रियोंसे ज्ञान होता ही है, क्योंकि अन्धे मनुष्यको नेत्र बन्द होनेपर भी हाथसे छूकर पदार्थका ज्ञान हो ही जाता है । जानाति येन सर्वं केन च तं वा विजानीयात् । इत्युपनिषदामुक्तिर्बुद्ध्यत आत्मात्मना तस्मात् ॥ १४३॥ उपनिषदोंका कथन है कि 'जिसके द्वारा सब कुछ जाना जाता है उस ( आत्मा ) को किससे जाने ?' अतः आत्मा तो आत्मासे ही जाना जाता है । ४१
विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है,
प्रबोधसुधाकर नादानुसन्धान यावत्क्षणं क्षणार्धं स्वरूपपरिचिन्तनं क्रियते । तावद्दक्षिणकर्णे त्वनाहतः श्रूयते शब्दः ॥१४४॥ जब एक क्षण अथवा आधे क्षणके लिये भी स्वरूपका चिन्तन किया जाता है तब सीधे कानमें अनाहत-शब्द सुनायी देता है । सिद्ध्यारम्भस्थिरताविश्रमविश्वासबीजशुद्धीनाम् । उपलक्षणं हि मनसः परमं नादानुसन्धानम् ॥१४५॥ नादानुसन्धान मनके लिये सिद्धिके आरम्भ, स्थिरता, विश्राम, विश्वास और वीर्य-शुद्धिका बतलानेवाला परम चिह्न है । भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहतनादे मनः क्षणं रमते । किं पुनरनाहतेऽस्मिन्मधुमधुरेऽखण्डिते स्वच्छे ॥१४६॥ मन तो भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदिके आघातजन्य नादों- में भी एक क्षणके लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नादकी तो बात ही क्या है ? चित्तं विषयोपरमाद्यथा यथा याति नैश्चल्यम् । वेणोरिव दीर्घतरस्तथा तथा श्रूयते नादः ॥१४७॥ विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरीके शब्दके समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है । ४२
मनोलय नादाभ्यन्तरवर्ति ज्योतिर्यद्वर्त्तते हि चिरम् । तत्र मनो लीनं चेन्न पुनः संसारबन्धाय ॥१४८॥ नादके भीतर रहनेवाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकालतक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता । परमानन्दानुभवात्सुचिरं नादानुसन्धानात् । श्रेष्ठश्चित्तलयोऽयं सत्स्वन्यलयेष्वनेकेषु ॥१४९॥ यद्यपि लयके और भी अनेक उपाय हैं तथापि जो चित्तलय दीर्घ कालतक नादानुसन्धान करते हुए परमानन्दका अनुभव होनेसे प्राप्त होता है वह सर्वोत्तम है ।
मनोलय
संसारतापतप्तं नानायोनिभ्रमात्परिश्रान्तम् । लब्ध्वा परमानन्दं न चलति चेतः कदा क्वापि ॥१५०॥ संसार-तापसे सन्तप्त और नाना योनियोंमें आने-जानेसे श्रान्त ( थका ) हुआ चित्त परमानन्दको प्राप्त करके फिर कभी चञ्चल नहीं होता । अद्वैतानन्दभरात्किमिदं कोऽहं च कस्याहम् । इति मन्थरतां यातं यदा तदा मूर्च्छितं चेतः ॥१५१॥ ४३
प्रबोधसुधाकर अद्वैतानन्दके उद्वेगसे जब 'यह क्या है ? मैं कौन हूँ ! और किसका हूँ ?' ऐसी जिज्ञासासे चित्त सुस्त पड़ जाता है तो [ अन्तमें ] वह मूच्छित हो जाता है । चिरतरमात्मानुभवादात्माकारं प्रजायते चेतः। सरिदिव सागरयाता समुद्रभावं प्रयात्युच्चैः ॥१५२॥ चिरकालतक आत्मानुभव करते रहनेसे चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्रको जानेवाली नदी अन्तमें पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है । आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं नापेक्षते पुनर्विषयान् । क्षीरादुद्धृतमाज्यं यथा पुनः क्षीरतां न यातीह ॥१५३॥ आत्मस्वरूपमें लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयोंकी इच्छा नहीं करता, जैसे दूधमेंसे निकाला हुआ घी फिर दुग्धभावको प्राप्त नहीं हो सकता । दृष्टौ द्रष्टरि दृश्ये यदनुस्यूतं च भानमात्रं स्यात् । तत्रोपक्षीर्णं चेच्चित्तं तन्मूर्च्छितं भवति ॥१५४॥ दृष्टि, द्रष्टा और दृश्यमें जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्च्छित हो जाता है । याति स्वसम्मुखत्वं दृङ्मात्रं वा यदा तदा भवति । दृश्यद्रष्टृविभेदो ह्यसम्मुखेऽस्मिन् तद्भवति ॥१५५॥ ४४
प्रबोध जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टाका भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहनेपर ऐसा नहीं होता। एकस्मिन्दृङ्मात्रे त्रेधा द्रष्ट्रादिकं हि समुदेति । त्रिविधे तस्मिँल्लीने दृङ्मात्रं शिष्यते पश्चात् ॥१५६॥ एक दृङ्मात्रमें ही द्रष्टा आदि त्रिपुटीका उदय होता है, उस त्रिपुटीका लय हो जानेपर पीछे केवल दृङ्मात्र ही रह जाता है। दर्पणतः प्राक्पश्चादस्ति मुखं प्रतिमुखं तदाभाति । आदर्शेऽपि च नष्टे मुखमस्ति मुखे तथैवात्मा॥१५७॥ दर्पणसे पूर्व और उसके पीछे भी मुख होता है तभी उसमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण यदि टूट जाय तब भी मुख तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, इसी प्रकार आत्मा उपाधिके नष्ट हो जानेपर भी रहता ही है। प्रबोध माधुर्यं गुडपिण्डे यत्तत्तस्यांशकेऽणुमात्रेऽपि । एवं न पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥१५८॥ गुड़के पिण्डमें जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कणमें भी होती है, इस प्रकार गुड़त्व और मधुरत्वमें कोई भेद नहीं है। ४५
प्रबोधसुधाकर अथवा न भिन्नभावः कर्पूरामोदयोरेवम् । आत्मस्वरूपमनसां पुंसां जगदात्मतां याति ॥१५६॥ अथवा जिस प्रकार कर्पूर और उसकी सुगन्धमें कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जिनका चित्त आत्मस्वरूप हो गया है, उन पुरुषोंके लिये यह संसार आत्मभावको प्राप्त हो जाता है। यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदाद्वयानन्दम् ॥ निद्राके आरम्भमें और जागृतिके अन्तमें जिस [शुद्ध निर्विषय] भावका अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरणमें स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्दकी ही प्राप्ति होती है। अतिगम्भीरेऽपारे ज्ञानचिदानन्दसागरे स्फारे । कर्मसमीरणतरला जीवतरङ्गावलिः स्फुरति ॥१६१॥ अति गम्भीर, अपार और विस्तृत सच्चिदानन्द-समुद्रमें कर्म- वायुसे प्रेरित हुई जीवात्मारूपी तरङ्गें उठती रहती हैं। खरतरकरैः प्रदीप्तेऽभ्युदिते चैतन्यतिग्मांशौ । स्फुरति मृषैव समन्तादनेकविधजीवमृगतृष्णा । १६२। अपनी प्रचण्ड किरणोंसे देदीप्यमान अत्यन्त दीप्तिशाली चैतन्य-भास्करके प्रकाशमें ही सब ओर यह अनेक जीवरूप मृग- तृष्णा सर्वथा मिथ्या ही प्रतीत हो रही है। ४६
प्रबोध अन्तरदृष्टे यस्मिञ्जगदिदमारातपरिस्फुरति । दृष्टे यस्मिन्सकृदपि विलीयते क्वाप्यसद्रूपम् ॥१६३॥ बाह्याभ्यन्तरपूर्णः परमानन्दार्णवे निमग्नो यः । चिरमाप्लुत इव कलशो महाह्रदे जह्नुतनयायाः।१६४। जिस चैतन्य-सूर्यको अपने अन्तःकरणमें न देखनेसे ही अपने समीप इस जगत्की स्फूर्ति होती है और जिसे एक बार देख लेनेपर ही यह असत् संसार मानो कहीं लीन हो जाता है, उस परमानन्दरूप समुद्रमें जो पुरुष बाहर-भीतरसे पूर्ण होकर डूब गया है, उसकी दशा ऐसी होती है जैसे गंगाजीके महान् कुण्डमें चिरकालसे डूबा हुआ कोई कलश हो । पूर्णात्पूर्णतरे परात्परतरेऽप्यज्ञातपारे हरौ संवित्स्फारसुधार्णवे विरहिते वीचीतरङ्गादिभिः । भास्वत्कोटिविकासितोज्ज्वलदिगाकाशप्रकाशे परे स्वानन्दैकरसे निमग्नमनसां न त्वं न चाहं जगत् । १६५। जो पूर्णसे भी पूर्ण और परसे भी पर है, जिसके पारका कोई पता नहीं है, जो भँवर और तरङ्गादिसे रहित प्रज्ञारूपी सुधाका महान् समुद्र है तथा जो अपने कोटि-कोटि सूर्योंके सदृश प्रकाशसे दशों दिशाओंको और प्रकाशको प्रकाशित तथा उज्ज्वल कर रहा है, उस निजानन्दमय परब्रह्म परमात्मामें जिनका मन डूबा हुआ है, उनकी दृष्टिमें न मैं हूँ, न तू है और न यह संसार ही है। ४७
प्रबोधसुधाकर द्विधाभक्ति चित्ते सत्त्वोत्पत्तौ तडिदिव बोधोदयो भवति । तर्ह्येव स स्थिरः स्याद्यदि चित्तं शुद्धिमुपयाति ॥१६६॥ चित्तमें सत्त्वगुण उत्पन्न होनेपर ज्ञानका बिजलीके समान उदय तो हो जाता है, परन्तु वह स्थिर तभी रहता है जब चित्त शुद्ध हो जाता है । शुद्धयति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते । वसनमिव क्षारोदैर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः ॥१६७॥ किन्तु अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंकी भक्तिके बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता । जैसे वस्त्रको खारयुक्त जलसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्तको भक्तिसे निर्मल किया जा सकता है । यद्वत्समलादर्शो सुचिरं भस्मादिना शुद्धे । प्रतिफलति वक्त्रमुच्चैः शुद्धे चित्ते तथा ज्ञानम्॥१६८॥ जिस प्रकार राख आदिसे चिरकालतक मार्जन करनेसे मलिन दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्तमें ज्ञानका आविर्भाव हो जाता है । ४८
द्विधाभक्ति जानन्तु तत्र बीजं हरिभक्त्या ज्ञानिनो ये स्युः। मूर्त्तं चैवामूर्त्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥ इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ । क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिः स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥ जो लोग हरि-भक्तिसे ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञानका बीज (कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्मके रूप हैं'—ऐसा उपनिषद् कहते हैं; और भगवान्ने भी उन दोनों रूपोंके [ व्यक्तोपासक तथा अव्यक्तोपासक-भेदसे ] दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक (अव्यक्तोपासक) को क्लेशसे और दूसरे (व्यक्तोपासक) को सुगमतासे मुक्ति मिलती है। स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिष्टा । प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच्च॥१७१॥ भगवान्की भक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी कही गयी है; उनमें पहले स्थूल-भक्ति होती है और फिर उसीमेंसे सूक्ष्म- भक्तिका उदय होता है। स्वाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् । विविधोपचारकरणैर्हरिदासैः सङ्गमः शश्वत् ॥१७२॥ कृष्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१७३॥ ४९
प्रबोधसुधाकर ग्राम्यकथासूद्वेगः सुतीर्थगमनेषु तात्पर्यम् । यदुपतिकथावियोगे व्यर्थं गतमायुरिति चिन्ता॥१७४॥ अपने वर्णाश्रम-धर्मोंका आचरण करना, नित्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रतिमाका उत्साहपूर्वक विविध सामग्रियोंसे पूजनो- त्सव करना, निरन्तर हरि-भक्तोंका संग करना, भगवत्कथाओंके सुननेमें अत्यन्त उत्साह रखना, सत्य भाषण करना तथा परस्त्री, परधन और परनिन्दासे दूर रहना, अश्लील बातोंसे घृणा करना, पुण्य-तीर्थ-स्थानोंमें जानेके लिये तत्पर रहना तथा 'भगवत्कथा- श्रवणादिके बिना यह आयु व्यर्थ ही बीत गयी'—ऐसी चिन्ता करना—ये सब स्थूल-भक्तिके लक्षण हैं । एवं कुर्वति भक्तिं कृष्णकथानुग्रहोत्पन्ना । समुदेति सूक्ष्मभक्तिर्यस्या हरिरन्तराविशति ॥१७५॥ इस प्रकार स्थूल-भक्तिका अभ्यास करते-करते भगवत्कथाके अनुग्रहसे सूक्ष्म-भक्तिका उदय होता है, जिसके भीतर भगवान्की उपलब्धि होती है । स्मृतिसत्पुराणवाक्यैर्यथाश्रुतायां हरेर्मूर्तौ । मानसपूजाभ्यासो विजननिवासेऽपि तात्पर्यम् ॥१७६॥ सत्यं समस्तजन्तुषु कृष्णस्यावस्थितेर्ज्ञानम् । अद्रोहो भूतगणे ततस्तु भूतानुकम्पा स्यात् ॥१७७॥ ५०
द्विधाभक्ति प्रमितयदृच्छालाभे सन्तुष्टिर्दारपुत्रादौ । ममताशून्यत्वमतो निरहङ्कारत्वमक्रोधः ॥१७८॥ मृदुभाषिता प्रसादो निजनिन्दायां स्तुतौ समता । सुखदुःखशीतलोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदो न भयम् ॥ निद्राहारविहारेष्वनादरः सङ्गराहित्यम् । वचने चानवकाशः कृष्णस्मरणेन शाश्वती शान्तिः ॥ केनापि गीयमाने हरिगीते वेणुनादे वा । आनन्दाविर्भावो युगपत्स्यादृष्टसात्त्विकोद्रेकः॥ [ उस सूक्ष्म-भक्तिके लक्षण ये हैं— ] स्मृति और पुराणोंके सद्वाक्योंसे सुनी हुई भगवान्की मूर्तिके मानस-पूजनका अभ्यास, एकान्त-सेवनमें तत्पर रहना, सत्य, समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्णचन्द्र- को वर्तमान जानना और सम्पूर्ण प्राणियोंसे अद्रोह । इन साधनोंसे समस्त प्राणियोंपर दया उत्पन्न हो जाती है । इनके सिवा प्रारब्धा- नुकूल स्वल्प लाभमें सन्तोष रखना, स्त्री और पुत्र आदिमें ममता- शून्य होना, अहङ्कार और क्रोधसे रहित होना, मृदु भाषण करना, प्रसन्न-चित्त रहना, अपनी निन्दा और स्तुतिमें समान रहना, सुख- दुःख और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करना, आपत्तिसे भय न करना, निद्रा, आहार और विहारादिमें अनादर, अनासक्त रहना, व्यर्थ वार्तालापके लिये अवकाश न देना, श्रीकृष्ण-स्मरणसे ५१
प्रबोधसुधाकर निरन्तर शान्त-चित्त रहना तथा कोई भगवत्सम्बन्धी गीतका गान करे अथवा बाँसुरी बजावे तो एक ही समय आनन्दका आविर्भाव और सात्त्विक भावोंका प्रौढ़ उद्रेक हो जाना । तस्मिन्ननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम्। स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्॥१८२॥ उस सत्त्वोद्रेकमें रोककर रक्खा हुआ मन परमात्मसुखका अनुभव करता है । फिर उस ( परमात्मसुख ) के स्थिर हो जानेपर चित्तकी अवस्था मतवाले हाथीके समान हो जाती है । जन्तुषु भगवद्भावं भगवति भूतानि पश्यति क्रमशः । एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ॥१८३॥ और वह क्रमशः समस्त प्राणियोंमें भगवान्को और भगवान्में समस्त प्राणियोंको देखने लगता है, यदि ऐसी अवस्था हो जाय तो वह तत्काल भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ हो जाता है । ध्यानविधि यमुनाटटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये । कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्य ॥१८४॥ तिष्ठन्तं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वाङ्गम् ॥१८५॥ ५२
श्रीशंकराचे दोन बाल-कृष्ण
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