भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 86 में से

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अद्वैत दैवयोगसे यदि एक शकोरा टूट जाय तो क्या उससे सूर्यका लय हो जाता है ? जलकी चञ्चलताके कारण प्रतिबिम्बके चलायमान होनेसे क्या सूर्य भी चञ्चल हो जाता है ? स्वव्यापारं कुरुते यथैकसवितुः प्रकाशेन । तद्वच्चराचरमिदं ह्येकात्मसत्तया चलति ॥१२६॥ यह चराचर जगत् जैसे एक ही सूर्यके प्रकाशमें अपने समस्त कार्य करता है, उसी प्रकार यह एक ही आत्माकी सत्तासे गतिशील हो रहा है । येनोदकेन कदलीचम्पकजात्यादयः प्रवर्धन्ते । मूलकपलाण्डुलशुनास्तेनैवैते विभिन्नरसगन्धाः॥१२७॥ जिस जलसे केला, चम्पा और जाती आदिके पौधे बढ़ते हैं, उसीसे सर्वथा भिन्न रस और गन्धवाले मूली, प्याज और लहसुन आदि भी पोषित होते हैं । एको हि सूत्रधारः काष्ठप्रकृतीरनेकशो युगपत् । स्तम्भाग्रपट्टिकायां नर्तयतीह प्रगूढतया ॥१२८॥ एक ही सूत्रधार स्वयं छिपा रहकर काष्ठकी अनेक पुतलियों- को स्तम्भके अग्रपटपर एक साथ नचाता रहता है । ३७