प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है।' इसके अतिरिक्त इस विषयमें यह युक्ति भी है— ऋजु वक्रं वा काष्ठं हुताशदग्धं सदग्मितां याति । तत्किं हस्तग्राह्यं ऋजुवक्राकारसत्त्वेऽपि ॥१२२॥ अग्निसे दग्ध हो जानेपर टेढ़ी या सीधी जैसी भी लकड़ी हो, अग्निरूप हो जाती है; उसमें सीधा या टेढ़ा आकार रहता भी है तथापि क्या उसे हाथसे छू सकते हैं ? एवं य आत्मनिष्ठो ह्यात्माकारश्च जायते पुरुषः। देहीव दृश्यतेऽसौ परं त्वसौ केवलो ह्यात्मा ॥१२३॥ इसी प्रकार आत्मनिष्ठ पुरुष भी आत्माकार हो जाता है; वह देही-सा प्रतीत तो होता है तथापि होता शुद्ध आत्मामात्र ही है । प्रतिफलति भानुरेकोऽनेकशरावोदकेषु यथा । तद्वदसौ परमात्मा ह्येकोऽनेकेषु देहेषु ॥१२४॥ जिस प्रकार जलके अनेक शकोरोंमें एक ही सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसो प्रकार यह एक ही परमात्मा अनेक देहोंमें भास रहा है । दैवादेकशरावे भग्ने किं वा विलीयते सूर्यः । प्रतिबिम्बचञ्चलत्वादर्कः किं चञ्चलो भवति ॥१२५॥ ३६