प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर अथवा न भिन्नभावः कर्पूरामोदयोरेवम् । आत्मस्वरूपमनसां पुंसां जगदात्मतां याति ॥१५६॥ अथवा जिस प्रकार कर्पूर और उसकी सुगन्धमें कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जिनका चित्त आत्मस्वरूप हो गया है, उन पुरुषोंके लिये यह संसार आत्मभावको प्राप्त हो जाता है। यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदाद्वयानन्दम् ॥ निद्राके आरम्भमें और जागृतिके अन्तमें जिस [शुद्ध निर्विषय] भावका अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरणमें स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्दकी ही प्राप्ति होती है। अतिगम्भीरेऽपारे ज्ञानचिदानन्दसागरे स्फारे । कर्मसमीरणतरला जीवतरङ्गावलिः स्फुरति ॥१६१॥ अति गम्भीर, अपार और विस्तृत सच्चिदानन्द-समुद्रमें कर्म- वायुसे प्रेरित हुई जीवात्मारूपी तरङ्गें उठती रहती हैं। खरतरकरैः प्रदीप्तेऽभ्युदिते चैतन्यतिग्मांशौ । स्फुरति मृषैव समन्तादनेकविधजीवमृगतृष्णा । १६२। अपनी प्रचण्ड किरणोंसे देदीप्यमान अत्यन्त दीप्तिशाली चैतन्य-भास्करके प्रकाशमें ही सब ओर यह अनेक जीवरूप मृग- तृष्णा सर्वथा मिथ्या ही प्रतीत हो रही है। ४६