प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोध अन्तरदृष्टे यस्मिञ्जगदिदमारातपरिस्फुरति । दृष्टे यस्मिन्सकृदपि विलीयते क्वाप्यसद्रूपम् ॥१६३॥ बाह्याभ्यन्तरपूर्णः परमानन्दार्णवे निमग्नो यः । चिरमाप्लुत इव कलशो महाह्रदे जह्नुतनयायाः।१६४। जिस चैतन्य-सूर्यको अपने अन्तःकरणमें न देखनेसे ही अपने समीप इस जगत्की स्फूर्ति होती है और जिसे एक बार देख लेनेपर ही यह असत् संसार मानो कहीं लीन हो जाता है, उस परमानन्दरूप समुद्रमें जो पुरुष बाहर-भीतरसे पूर्ण होकर डूब गया है, उसकी दशा ऐसी होती है जैसे गंगाजीके महान् कुण्डमें चिरकालसे डूबा हुआ कोई कलश हो । पूर्णात्पूर्णतरे परात्परतरेऽप्यज्ञातपारे हरौ संवित्स्फारसुधार्णवे विरहिते वीचीतरङ्गादिभिः । भास्वत्कोटिविकासितोज्ज्वलदिगाकाशप्रकाशे परे स्वानन्दैकरसे निमग्नमनसां न त्वं न चाहं जगत् । १६५। जो पूर्णसे भी पूर्ण और परसे भी पर है, जिसके पारका कोई पता नहीं है, जो भँवर और तरङ्गादिसे रहित प्रज्ञारूपी सुधाका महान् समुद्र है तथा जो अपने कोटि-कोटि सूर्योंके सदृश प्रकाशसे दशों दिशाओंको और प्रकाशको प्रकाशित तथा उज्ज्वल कर रहा है, उस निजानन्दमय परब्रह्म परमात्मामें जिनका मन डूबा हुआ है, उनकी दृष्टिमें न मैं हूँ, न तू है और न यह संसार ही है। ४७